
अगर उम्र के लिहाज से विचार करें तो संपूर्ण क्रांति सामाजिक परिवर्तन की सर्वथा नई अवधारणा है। इसकी उद्घोषणा और आह्वान(5 जून 1974) को महज 28 वर्ष हुए हैं। यों तो विचारधारा बनते-बनते बनती है लेकिन संपूर्णक्रांति की अवधारणा के बारे में एक मत नहीं है, राजनीतिकों में भी नहीं, न ही समाजविज्ञानियों अथवा परिवर्तनकामी समूहों में।अलग-अलग ढंग से इसकी व्याख्या की जाती है और शायद आगे भी की जाती रहेगी, बल्कि यह आकस्मिक भी नहीं है क्योंकि ‘जीवंत विचार’ के प्रति प्रायः कोई एक मत होता नहीं, उसकी जीवतंता का तकाजा ही यही है कि अलग-अलग परिप्रेक्ष्यों और परिस्थितियों में यह नया स्वरूप ग्रहण करता रहे, पुनर्नवा होता रहे।
संपूर्ण क्रांति का कोई शास्त्र नहीं है। इस मायने में यह ‘खुला’ विचार है लेकिन ये दोनों शब्द ‘संपूर्ण’ और ‘क्रांति’ इसकी सीमा और स्वरूप बनाते हैं। यहाँ क्रांति शब्द अपनी समस्त प्रगतिशील और रैडिकल्जि के साथ उपस्थित है। वास्तव में संपूर्ण क्रांति ‘समग्र परिवर्तन’ नहीं है जैसा कि कुछ लोग अंदाजा लगाते हैं। क्रांति तो क्रांति ही है वह परिवर्तन मात्र नहीं है, परिवर्तन तो प्रकृति के नियमों के अनुसार सतत् रूप से चलता ही रहता है, आज जो है वह कल उसी रूप में नहीं होगा। परिवर्तन होता है जबकि क्रांति लाई जाती है। इस मुद्दे पर कोई भ्रम की गुजांइश नहीं है। क्रांति के साथ जो शब्द युग्म बनाता है वह है ‘संपूर्ण’। पहले कभी क्रांति के साथ संपूर्ण या अपूर्ण का ऐसा प्रयोग नहीं हुआ और यदि जेपी ने इस बहाने क्रांति की संपूर्णता की ओर इशारा किया तो यह अनायास नहीं है। ‘संपूर्ण’ शब्द ने लोगों को खूब भरमाया है और अलग-अलग क्षेत्र और विचार के लोगों ने इसे अपने ढंग से, अपनी सुविधा के हिसाब से परिभाषित करने की कोशिश भी की है। स्वयं जेपी के ही कुछ साथियों ने ‘संपूर्ण क्रांति’ को रहस्यमय और उलझी हुई शब्दावली करार दिया। लेकिन जेपी ने अनायास ही इस शब्द-युग्म का इस्तेमाल कर दिया हो, ऐसा मानना भूल होगी।
इतिहास बीसवीं शताब्दी को क्रांतियों की शताब्दी के रूप में भी याद करेगा। मानव-मुक्ति के लिए मात्र सौ सालों के अंदर इतने सघन प्रयास इसके पहले कभी नहीं हुए। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में शोषितों व वंचितों की मुक्ति के लिए क्रांतियाँ हुई। रूस, चीन, कोरिया, वियतनाम, क्यूबा जैसे देशों में क्रांतियों का सफल संचालन किया गया, लेकिन जेपी इन क्रांतियों को अपूर्ण और एकांगी मानते थे। उनकी मान्यता में इन देशों में क्रांति का अभीष्ट पूरा नहीं हो पाया था। सिर्फ क्रांति के तरीकों अथवा ‘साधन’ को लेकर उनका विरोध रहा हो, ऐसा नहीं। इन देशों में जो नई व्यवस्थाएँ आईं, जेपी की दृष्टि में उस ढाँचे में मनुष्य की मुक्ति संभव ही नहीं थी, बल्कि उन देशों में एक नई तरह की गुलामी आमजन को झेलनी पड़ी – सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के नाम पर। सोवियत साम्राज्यवाद और चीन की सांस्कृतिक क्रांति ने क्रांति का एक वीभत्स रूप दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया। जेपी का मार्क्सवाद के ऐसे ‘क्रियान्वयन’ (application) से मौलिक मतभेद था। स्वतंत्रता जेपी के जीवन का आकाशदीप थी। वे व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता को क्रांति की अपनी अवधारणा में सर्वोच्च मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते थे। मार्क्सवाद का प्रचलित सिद्धांत इसके विलोम में खड़ा था। जेपी क्रांति को मनुष्य की संपूर्ण मुक्ति के रूप में परिभाषित करते थे जिसमें रोटी, कपड़ा और मकान सुलभ कराना ही अंतिम लक्ष्य नहीं था बल्कि ऐसे समाज का निर्माण करना है जिसमें सबसे कमजोर व्यक्ति भी अपने व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर सके, स्वतंत्रता व स्वाभिमान के साथ जी सके।
जहाँ तक क्रांति के अभीष्ट का सवाल है, 1789 की फ्रांसिसी क्रांति के चार मूल्य स्वतंत्रता, समानता, न्याय एवं बंधुत्व मानव समाज को बहुत आगे ले जाते हैं। वास्तव में ये मानव सभ्यता-संस्कृति के शाश्वत मूल्य बन गए हैं। इन चार लक्ष्यों में भी स्वतंत्रता प्रथमाप्रथम है। जयप्रकाश जिस पीढ़ी और दौर का नेतृत्व करते हैं उसके लिए ब्रिटिश साम्राज्यशाही से मुक्ति ही पहला मूल्य था। आश्चर्य नहीं कि लाख मार्क्सवादी होने के बावजूद वे ‘स्वतंत्रता’ के साथ समझौता नहीं कर सके। गाँधीजी के प्रथम सत्याग्रह आंदोलन की याद करते वे लिखते हैं – ‘‘यही वह समय था जब स्वतंत्रता मेरे जीवन का आकाशदीप बनी। कालांतर में वह स्वतंत्रता अपने देश की स्वतंत्रता मात्र के भाव का अतिक्रमण करके मनुष्य की सब जगह और सब प्रकार के बंधनों से ही मुक्ति नहीं, बल्कि इससे भी आगे बढ़कर मानवीय व्यक्तित्व की स्वतंत्रता, विचार की स्वतंत्रता, आत्मा की स्वतंत्रता की अर्थदात्री बन गई। यह स्वतंत्रता जीवन की एक निष्ठा बन गई है। मैं रोटी के लिए, सत्ता के लिए, सुरक्षा के लिए, समृद्धि के लिए, राज्य की प्रतिष्ठा के लिए या किसी अन्य वस्तु के लिए इसके साथ समझौता नहीं कर सकता।’’ स्वतंत्रता के मूल्य के प्रति उनकी यह प्रतिबद्धता उन्हें भारत में दूसरे-तीसरे दशक के मार्क्सवादी ‘लाइन’ से अलग दिशा में ले गई और उसके पश्चात् भी उन्हें शोध की नई मंजिलें तलाशने पर विवश किया। वे इसके लिए ‘करो या मरो’ के निर्णायक क्षणों में हजारीबाग जेल से फरार हो सकते थे, सक्रिय दलगत राजनीति को लात मार सकते थे, कश्मीर और नगालैंड पर गलत समझे जाने का खतरा उठाकर भी अलग स्टैंड ले सकते थे,
बहत्तर वर्ष की उम्र में पटने के बेली रोड पर लाठियाँ खा सकते थे, करोड़ों हम वतनों की आजादी और नागरिक अधिकारों की गारंटी सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक सौदेबाजों से राजघाट में दूसरी आजादी के लिए एक होने की कसमें दिलवा सकते थे। जेपी की स्वतंत्रता की परिकल्पना में व्यष्टि और समष्टि एक हैं, उसमें कहीं कोई द्वैत नहीं है, उन्होंने हर मौके पर इसे साबित किया।
स्वतंत्रता आंदोलन उदात्त मूल्यों के आधार पर लड़ा गया लेकिन पच्चीस के सालों के अंदर ही सिर्फ सत्ता के स्तर पर ही नहीं ‘लोक’ के स्तर पर भी इनका तेजी से क्षरण हुआ। जिसके लिए जेपी ने सर्वस्व न्योछावर कर दिया वह सर्वोदय आंदोलन भी ठहराव का शिकार हो गया था, यद्यपि मूल्य और विचार के रूप में सर्वोदय में अब भी बहुत आकर्षण था, लेकिन मात्र हृदय-परिवर्तन की युक्ति साधारण भारतीय की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त न कर सकी। यह एक आकस्मिक संयोग था कि बिहार के छात्रों ने जेपी से 18 मार्च 1974 से आरंभ हुए आंदोलन का नेतृत्व संभालने का आग्रह किया, क्योंकि सरकारी दमन से वे एकदम विचलित हो गए थे। जेपी को क्षितिज पर संभावनाओं की रेख दिख पड़ी। छात्रों की प्रमुख चार मांगों – महंगाई दूर करो, बेकारी दूर करो, भ्रष्टाचार खत्म करो, शिक्षा व्यवस्था को सुधारो – में स्पष्ट ही व्यवस्था-परिवर्तन की आकांक्षा से साक्षात् हुआ। बाद में उन्होंने इस आंदोलन को संपूर्ण क्रांति का आंदोलन करार दिया। उल्लेखनीय है कि आजादी के पश्चात् क्रांति का आवाहन इसके पहले सिर्फ उग्र वामपंथी आंदोलनों के माध्यम से तेलांगाना और नक्सलबाड़ी में ही आया था।
ऐसे में जीवनदानी जयप्रकाश द्वारा क्रांति का आवाहन अपने आप में एक विलक्षण घटना है जिसने भारतीय समाज और राजनीति में आई जड़ता को तोड़ा। अपने मुसहरी प्रयोग के दौरान जेपी ने नक्सलपंथ के वैचारिक और व्यावहारिक सीमाओं का गहराई से अवलोकन किया (किंतु उन्होंने उसके औचित्य और प्रासंगिकता को चुनौती नहीं दी।) कुछ लोग समझते हैं कि संपूर्ण क्रांति की अवधारणा में जो सातत्य का पक्ष है वह उसके साधनों की शुद्धता, अर्थात् शांतिमयता अथवा अहिंसा के कारण है। जेपी ने कई बार कहा है कि यह मानना एक बड़ी भूल है कि हिंसक क्रांति का आधार आनन-फानन में तैयार किया जा सकता है, या कि हिंसक क्रांति समय-साध्य नहीं है। बल्कि हिंसक क्रांति के पश्चात् परिवर्तन के जो फलित होते हैं उन्हें सुस्थिर करने में काफी समय लगता है। कभी तो हिंसा-प्रतिहिंसा का लंबा दौर चलता है और कभी क्रांति के नायकों की आपसी प्रतिस्पर्धाओं में क्रांति का सुफल ही नष्ट हो जाता है।
इसी से हिंसक क्रांतियों में विपथगमन की गुंजाइश भी ज्यादा होती है और वस्तुतः आज तक कोई भी क्रांति अपने को विपथगा होने से रोक नहीं पाई। ऐसे में क्रांति के लक्ष्य इस प्रकार निर्धारित किए जाने चाहिएँ जिसमें वह अपने को ‘नयी’ करती रहे, अपना शोधन करती रह सके। क्रांति में सातत्य का यही अर्थ है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है जेपी के लिए स्वतंत्रता सर्वोच्च मानवीय मूल्य मूल्य है इसलिए उनकी क्रांति के केन्द्र में है व्यक्ति। व्यक्ति की स्वतंत्रता के बिना सामूहिक स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं – अन्य देशों में हुई क्रांतियों का यह अनुभव जेपी के लिए प्रयोज्य नहीं था। दूसरी ओर उनके पीछे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत थी जो परिवर्तन के लिए हिंसा या अधिनायकत्व की अपरिहार्यता का निषेध करती थी। क्रांति शब्द का जिन अर्थों में हम प्रयोग करते हैं वह भारत के जातीय अनुभव का हिस्सा नहीं है। भारत एक प्राचीन देश है, इसकी सभ्यता-संस्कृति बहुत पुरानी है। जब आज के विकसित देश आदिम अवस्था में ही थे भारत में सभ्यता का अलख जग चुका था और सभ्य समाज की कई सारी संस्थाएं अस्तित्व में आ चुकी थीं। भारत की जलवायु, जीवनदायनी नदियों, उर्वर भूमि के कारण एक सुव्यवस्थित जीवन-प्रणाली आकार ले चुकी थी। लेकिन प्राचीन समाज होने के बावजूद यहाँ की जनसंख्यात्मक (डेमोग्रैफिक) वास्तविकताएँ बदलती रही हैं। क्या विचित्र बात है कि ऊपरी तौर पर जाति जैसी संस्थाओं के रहते दृढ़ और अविचल दिखने के बावजूद भारतीय समाज लगातार बदलता रहा है।
लगभग हर काल में यहाँ नयी-नयी सामाजिक इकाइयों और वर्गों का उदय होता रहा है जिन्होंने भारतीय समाज के साथ सामंजस्य बिठाने अथवा ठौर ढूँढ़ने के लिए यहाँ की जाति-व्यवस्था में आश्रय ढूँढ़ा है। भारत का बहुलतावादी सामाजिक ढाँचा एक सतत् सामाजिक प्रक्रिया के माध्यम से बना, जो आज तक जारी है। जिस सांस्कृतिक सम्मिलन (cultural assimilation) की बात की जाती है वह दरअसल यही प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया ने भारतीय समाज को कई प्रकार की अतियों से बचाए रखा है, जैसे – धार्मिक राज्यों (theocratic state) का अस्तित्व यहाँ नहीं रहा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनी रही, राजा का जमीन पर स्वामित्व नहीं रहा बल्कि किसान का रहा, शक्ति का कोई भी सिरा सर्वसत्तावादी नहीं हो पाया….। किंतु यहाँ आशय भारतीय समाज और शासन व्यवस्था को निर्दोष करार देना नहीं है बल्कि यह इशारा करना भर है कि पाश्चात्य समाज की जमीनी वास्तविकताएँ भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं से भिन्न रही हैं। यही कारण है कि भारतीय समाज में शायद ही किसी काल में ‘हठात् परिवर्तन’ के प्रति कोई ऐसी तत्परता या आग्रह दिखाई देता हो। यहाँ चीजें बनते-बनते बन जाती रही हैं। यदि भारत के सामाजिक इतिहास पर दृष्टि डालें तो सुधार आंदोलनों की एक अविच्छिन्न कड़ी दिखाई देती है जिससे समय-समय पर जड़ता टूटी और समाज जीवंत बना रहा। विरासत की वह कड़ी आज भी विलुप्त नहीं हुई है, वह चौतरफे हमले का शिकार जरूर है।
किंतु ब्रिटिश काल तक हालात बदल गए। ब्रिटिश औपनिवेशिक दोहन ने भारतीय समाज व अर्थतंत्र के आत्मनिर्भर ढाँचे को ही तोड़ दिया। अंग्रेजों की मार्फत जो उद्योगीकरण भारत में पहुँचा, उसने औद्योगिक मजदूरों के एक नए वर्ग को तो जन्म दिया ही, शहरी मध्यवर्ग की परिधि का भी विस्तार किया। दूसरी ओर ग्रामीण अर्थतंत्र चरमराने से कृषि मजदूरों का भी एक नया वर्ग अस्तित्व में आया। अट्ठारहवीं सदी के मध्य तक, ऊपर जिस विरासत का जिक्र किया गया, वह समाज की प्रमुख चालक-शक्ति नहीं रह गई, हम अन्तरराष्ट्रीय औपनिवेशिक तंत्र का हिस्सा बन गए। जब यूरोप में औद्योगिक क्रांति के पश्चात् पूँजीवाद आया तो मुनाफाखोरी, प्रतिद्वन्द्विता और शोषण जैसे दुर्गुणों को रोकने के लिए वहाँ कोई संस्थागत ढांचा पहले से तैयार न था। जो कुछ था वह चर्च और राजशाही के इर्द-गिर्द सिमटा था। ऐसे में शोषित और वंचित जन (जिन्हें बाद में कार्ल मार्क्स ने ‘सर्वहारा’ की संज्ञा दी) की मुक्ति के लिए ‘क्रांति’ ही एकमात्र उपाय बचा। वास्तव ने पूँजीवादी शोषण ने क्रांति को औचित्य ही प्रदान किया। सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है कि यदि औद्योगिक क्रांति भारत में हुई होती तो आज अन्तरराष्ट्रीय पूँजीवाद का स्वरूप क्या होता। वैसे उन्नीसवीं सदी तक भारतीय मनीषा का जोर मुख्यतः भाषा, साहित्य और नीतिशास्त्र पर ही रहा, वैज्ञानिक खोजों की कोई सार्थक दिशा नहीं बन पाई। इसका एक प्रमुख कारण यह भी रहा कि हमारे यहाँ ज्ञान-विज्ञान की कोई स्वतंत्र और स्वायत्त शाखा नहीं बन पाई, यह क्षेत्र एक तरह से धर्म (पंथ नहीं) के विषय-क्षेत्र में ही आवेष्टित रहा।
ब्रिटिशकाल में यदि भारत में औद्योगिक पूँजीवाद आया तो उससे त्राण दिलाने के विचार भी सामने आए। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान आया तो सामाजिक परिवर्तन संबंधी अवधारणाएँ भी आईं। 1917 की रूसी क्रांति ने जिस प्रकार मार्क्सवाद को जमीन पर उतार दिखाया, उससे भारत सहित दुनिया के अन्य कई देश क्रांति के संभाव्य क्षेत्र बन गए। परिवर्तन की आकांक्षा रखनेवाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिस पर बोल्शेविकवाद का प्रभाव नहीं पड़ा हो। दुनिया के प्रायः हर देश में रूसी क्रांति ने मार्क्सवादियों अथवा वामपंथियों की एक पीढ़ी तैयार की। उच्च शिक्षा प्राप्त करने गए स्वयं जेपी अमेरिका से मार्क्सवाद में दीक्षित होकर लौटे लेकिन भारत में परिस्थितियाँ भिन्न थीं, यहाँ जब विदेशी शासन से मुक्ति के लिए राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व महात्मा गांधी के हाथों में था जिन्होंने चरखा, अछूतोद्धार और सांप्रदायिक एकता के महत्वपूर्ण आयाम इसमें जोड़कर इसे सामाजिक-आर्थिक मुक्ति का भी आंदोलन बना दिया। विलक्षण बात यह थी कि गांधीजी ने भारतीय समाज के शुभ-पक्षों व प्रगतिशील तत्वों को संघटित कर स्वराज की जो अपनी परिकल्पना प्रस्तुत की, उससे दुनिया भर के मुक्ति आंदोलनों को नई दिशा और ऊर्जा मिल सकती थी। जिस विरासत का ऊपर उल्लेख दिया गया, गांधीजी को रोशनी उसी से मिली और अपने हिसाब से उन्होंने क्रांति का एक नया मार्ग प्रशस्त किया।
बहुत लोगों को गांधी के साथ क्रांति शब्द जोड़ने पर आपत्ति हो सकती है लेकिन उन्होंने साध्य और साधन को लेकर जो स्थापनाएँ प्रस्तुत कीं वे आधारभूत बदलाव की ओर इंगित करती थीं और इस मायने में उनकी प्रासंगिकता अब तक बनी हुई है। यही बात जेपी को सर्वोदय की खींच लाई थी। सर्वोदय आंदोलन ने शुरूआत में सफलता के कई सोपान तय किए, बिहार में भूमिहीनों को सबसे ज्यादा जमीन भूदान के माध्यम से ही मिली। किंतु सर्वोदय में संघर्ष का पक्ष अछूता रह गया, उसमें गांधीजी के ‘रैडिकलिज्म’ का अभाव था, उसका कोई राजनीतिक स्वरूप नहीं बन पाया (गांधीजी हर दृष्टि से राजनीतिक व्यक्तित्व थे और एक राजनीतिक आंदोलन की अगुआई कर रहे थे)। जिस परिमाण में संसदीय लोकतंत्र आमजन से विमुख होता जा रहा था, स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्य तिरोहित हो रहे थे, उसके लिए एक व्यापक राजनीतिक पहल की जरूरत थी। इन प्रवृत्तियों से राजनीतिक स्तर पर ही प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता था। सर्वोदय ने यह मौका गँवा दिया था। जेपी द्वारा सन् 1974 में संपूर्ण क्रांति का शंखनाद इसी खोए हुए अवसर को दोबारा उपलब्ध करने का उपक्रम था।
संपूर्ण क्रांति के आवाहनकर्त्ता जयप्रकाश एक बदले हुए विचारक और नायक हैं। वे शोधन की प्रक्रिया से उबरकर अवतरित होते हैं। वे परिवर्तन के लिए वर्ग-संघर्ष की अनिवार्यता से इनकार नहीं करते। वे शोषितों और मजलूमों का संगठन चाहते हैं, अर्थात् वर्ग संगठन की अनवरत प्रक्रिया चलाना चाहते हैं। वे व्यवस्था परिवर्तन के लिए युवाओं को गाँवों में भेजते हैं और उन्हें क्रांति का संवाहक घोषित करते हैं, और इसके लिए उनसे ‘वर्गीय आग्रहों से रहित’, अर्थात् ‘de-class’ होने की अपेक्षा रखते हैं। वे ‘छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी’ के नाम से एक अर्द्ध-सैनिक संगठन का निर्माण करते हैं और स्वयं उसका सेनापतित्व स्वीकार करते हैं। संपूर्ण क्रांति के प्रति संपूर्ण प्रतिबद्धता इसका लक्ष्य भी है और कार्यक्रम भी। वे वाहिनी कार्यकर्ताओं को व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलन का आरंभ करने के लिए भूमि का सवाल हाथ में लेने को कहते हैं और बिहार के सबसे बड़े भूधारी – बोधगया के शंकराचार्य मठ के खिलाफ
शांतिमय लड़ाई की अनुमति देते हैं। वे लोकसमितियों के माध्यम से लोकशक्ति संगठित कर राज्य-शक्ति पर अंकुश लगाना चाहते हैं। वे शक्ति और सत्ता का पिरामिड उलट देना चाहते हैं। वे संसदीय लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्रांतिकारी इस्तेमाल चाहते हैं। वे किसी भी कीमत पर लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं – सिर्फ इसलिए नहीं कि आजादी बरकरार रहे, बल्कि इसलिए भी कि क्रांति का, परिवर्तन का मार्ग सुगम हो। स्वतंत्रता उनके जीवन का आकाशदीप है और वे हीन से हीन व्यक्ति को भी इसे सुलभ कराना चाहते हैं। सच्ची स्वतंत्रता के लिए वे न सिर्फ अर्थ, समाज और शिक्षा वरन् परम्परा, धर्म, आस्था और नैतिकता को भी संपूर्ण क्रांति के दायरे में ले आते हैं (ये क्षेत्र हिंसक साधनों की पहुँच के बाहर हैं, रूस और पूर्वी यूरोप के हाल के अनुभव इसका सबूत है)।
आज सोवियत समाजवाद की समाप्ति के पश्चात् दुनिया में हर कहीं वामपंथ बचाव की मुद्रा में है। एकध्रुवीय विश्व में वैश्विकीकरण एवं बाजारीकरण के अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा पकड़ने का साहस किसी में नहीं दिखाई देता। भारत के वैचारिक समुदाय में कुछ लोग इन दिनों गांधी और मार्क्स के ‘ब्लेंड’ की, यानी दोनों विचारधाराओं को एक-दूसरे के लिए निकट लाने की बात कह रहे हैं। उन्हें संपूर्ण क्रांति के वैचारिक और व्यावहारिक पक्षों का बारीकी से अध्ययन करना चाहिए। बोधगया भूमि आंदोलन और गंगा मुक्ति आंदोलन जैसे जन संघर्षों की सफलता इस बात का प्रमाण है कि संपूर्ण क्रांति का एक ठोस वैचारिक और व्यावहारिक आधार है। पिछड़े और वंचित वर्गों की संपूर्ण क्रांति आंदोलन में व्यापक भागीदारी, इन वर्गों में आई अभूतपूर्व राजनीतिक और सामाजिक चेतना ने परिवर्तन की आधार-भूमि तैयार कर दी है। अगर क्रांति के संदर्भ में चेतना के इस उभार को मूल्यबद्ध और संस्कारित किया जा सकता तो समय के इसी पड़ाव पर संपूर्ण क्रांति का प्रस्थान बिंदु अवस्थित है।
(यह लेख जयप्रकाश जन्मशती वर्ष 2002 में लिखा गया। सर्वोदय से संपूर्ण क्रांति; बिहार में आंदोलन, राजनीति और विकास तथा जयप्रकाश : परिवर्तन की वैचारिकी में संगृहीत।)
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