संकट बढ़ाता कचरा – राजकुमार सिन्हा

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Waste Aggravating the Crisis

रिद्वार की कांवड़ यात्रा के बाद घाटों पर करीब 8,000 टन कचरा छोड़ दिया जाना और पेशाब से भरी बोतलों तक का मिलना केवल सफाई व्यवस्था की समस्या नहीं है। यह उस गहरे संकट का संकेत है जिसमें धार्मिक आस्था, पर्यटन, उपभोग और हमारी कचरा संस्कृति पर्यावरणीय जिम्मेदारी से लगातार दूर होती जा रही है। आस्था का अधिकार सबको है, लेकिन आस्था के नाम पर प्रकृति को कचरे का ढेर बना देना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकता।

पिछले वर्ष 2025 में केदारनाथ धाम में रिकॉर्ड 17 लाख 68 हजार लोगों ने बाबा केदार के दर्शन किए। इस विशाल धार्मिक यात्रा के साथ केदारनाथ धाम में लगभग 2,300 टन कचरे का पहाड़ भी जमा हो गया। हर यात्री ने औसतन डेढ़ किलो कचरा छोड़ा। यह कचरा गौरीकुंड से लेकर केदारनाथ धाम तक फैला था। इसमें करीब 100 टन प्लास्टिक और 2,200 टन अन्य कचरा था।

उच्च हिमालयी क्षेत्र में जमा यह कचरा पारिस्थितिकी, जलस्रोतों, वनस्पतियों और वन्यजीवों के लिए गंभीर चुनौती है। समस्या केवल धार्मिक यात्राओं तक सीमित नहीं है। दिल्ली सरकार की 23 दिसंबर 2025 को एनजीटी को दी गई जानकारी के अनुसार शहर में प्रतिदिन 11,852 टन कचरा उत्पन्न होता है। इसमें से 7,611 टन यानी 64.2 प्रतिशत कचरे का प्रतिदिन प्रसंस्करण किया जाता है, जबकि लगभग 4,241 टन यानी 35.8 प्रतिशत कचरा प्रतिदिन डंपसाइटों भलस्वा और गाजीपुर में निपटान के लिए बच जाता है।

इसका अर्थ है कि कचरे का पहाड़ केवल हिमालय या तीर्थस्थर्ता में नहीं बन रहा, बल्कि महानगरों के आसपास भी लगातार बढ़ रहा है। ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ (सीएसई) की नई रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर दिन करीब 19 हजार टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। इसमें से प्लास्टिक का 62 प्रतिशत पैकेजिंग के लिए इस्तेमाल होता है, जबकि वैश्विक औसत लगभग 40 प्रतिशत है। प्लास्टिक पैकेजिंग की खपत सालाना 8 से 9 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। यदि यही रुझान जारी रहा तो 2022 में 1.1 करोड़ टन रही प्लास्टिक पैकेजिंग की खपत 2030 तक बढ़कर लगभग 2 करोड़ टन हो सकती है।

ऑनलाइन खरीदारी ने इस संकट को और तेज किया है। एक सामान्य ऑनलाइन डिलीवरी में पॉली मेलर, प्लास्टिक रैप, टेप, लेबल और अतिरिक्त पैकेजिंग जैसी कई सामग्रियां शामिल होती हैं। प्रत्येक ऑनलाइन ऑर्डर के साथ नया पैकेजिंग कचरा पैदा होता है। ई-कॉमर्स बाजार जितना बढ़ता जा रहा है, पैकेजिंग कचरे की मात्रा भी उतनी ही तेजी से बढ़ रही है। ‘केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ के अनुसार भारत में हर साल लगभग 39 लाख टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है। इसमें से लगभग आधा ही एकत्र किया जाता है और एकत्र किए गए कचरे में से भी लगभग 50 प्रतिशत का ही रिसाइकिल किया जाता है। शेष कचरा कहां जाता है? इसका बड़ा हिस्सा लैंडफिल, नदियों और समुद्रों में पहुंचता है या उसे जला दिया जाता है। जलाने से वायु-प्रदूषण और जहरीले उत्सर्जन का खतरा बढ़ता है।

प्लास्टिक हमारे हवा, पानी और भोजन में भी प्रवेश कर रहा है। वर्ष 2000 से 2019 के बीच लगभग 3 करोड टन प्लास्टिक समुद्री वातावरण में जमा हुआ था। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि मौजूदा प्रवृति जारी रही तो 2050 तक समुद्रों में मछलियों की तुलना में प्लास्टिक की मात्रा बहुत गंभीर स्तर तक पहुंच सकती है। पिछले वर्ष तमिलनाडु के जंगलों से एक ही दिन में 55 टन प्लास्टिक कचरा एकत्र किया गया था। कोयम्बटूर के निकट मास्थमलाई की तलहटी में एक गर्भवती हथिनी की मृत्यु हुई और उसकी आंत में प्लास्टिक की थैलियां पाई गई। यह घटना बताती है कि मनुष्य द्वारा फेंका गया कचरा अंततः वन्यजीवों में प्रवेश कर रहा है।

भारत में प्रतिवर्ष लगभग 70.73 लाख टन कपड़ा कचरा उत्पन्न होता है। इसमें लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा फैक्ट्रियों और विनिर्माण इकाइयों का उपभोग-पूर्व कचरा है, जबकि 58 प्रतिशत हिस्सा उपभोक्ताओं द्वारा फेंके गए पुराने कपड़ों और घरेलू वस्त्रों का है। कपड़ा उ‌द्योग का संकट केवल पुराने कपड़ों के कचरे तक सीमित नहीं है। कपड़ा रंगाई और प्रसंस्करण इकाइयों से निकलने वाला जहरीला और संदूषित पानी स्थानीय जलस्रोतों और भूजल को प्रदूषित कर सकता है। बिना रीसाइक्लिंग के फेंका गया कपड़ा लैंडफिल पर दबाव बढ़ाता है और जैविक पदार्थ के सड़ने से मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसें निकलती है। सीएसई के अनुसार आज दुनिया में बनने वाले 60 प्रतिशत से अधिक नए कपड़ों में किसी-न-किसी रूप में प्लास्टिक आधारित फाइबर का इस्तेमाल होता है। इसका मतलब है कि ‘फास्ट फैशन’ का संकट केवल कपड़ों की अधिक खपत नहीं, बल्कि प्लास्टिक की बढ़ती खपत का भी संकट है।

ऐसे में कंपनियों को केवल उत्पादन और बिक्री के लिए नहीं, बल्कि उत्पाद के उपयोग के बाद पैदा होने वाले कचरे के लिए भी जवाबदेह बनाना होगा। सबसे पहले अनावश्यक उपभोग को कम करना जरूरी है। जिस पैकेजिंग की आवश्यकता नहीं है, उसका उत्पादन ही ॉ किया जाए? ऑनलाइन खरीदारी में अनावश्यक प्लास्टिक रैप और अतिरिक्त पैकेजिंग पर रोक होनी चाहिए। दूसरा कदम पुनः उपयोग है। ऐसी पैकेजिंग सामग्री को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जिन्हें बार-बार इस्तेमाल किया जा सके। तीसरा कदम पुनर्चक्रण है, लेकिन रीसाइक्लिंग को हर समस्या का समाधान मानना भी गलत है। ऐसी सामग्री डिजाइन करनी होगी जिसे वास्तव में और आर्थिक रूप से रिसाइकिल किया जा सके। चौथा और सबसे महत्वपूर्ण कदम है जवाबदेही।

उत्पादक कंपनियों को उत्पादक उत्तरदायित्व केवल कागजी अनुपालन नहीं, बल्कि वास्तविक जिम्मेदारी के रूप में लागू करना चाहिए। तीर्थस्थलों और पर्यटन क्षेत्रों में विशेष कचरा प्रबंधन व्यवस्था होनी चाहिए। यात्रियों की संख्या के आधार पर कचरा-उत्पादन का अनुमान लगाया जाए, स्रोत पर कचरा अलग किया जाए, एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रभावी रोक हो और तीर्थयात्रियों को ‘जो लाएं, वापस ले जाएं’ के सि‌द्धांत से जोड़ा जाए। कांवड़ यात्रा, केदारनाथ जैसी धार्मिक यात्राओं और बड़े आयोजनों में आयोजकों, प्रशासन, स्थानीय निकायों और यात्रियों की साझा जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

सबसे बढ़कर उपभोक्ता संस्कृति में बदलाव जरूरी है। ‘खरीदो, इस्तेमाल करो और फेंक दो’ की संस्कृति को कम खरीदो, लंबे समय तक इस्तेमाल करो, पुनः उपयोग करो और पुनर्चक्रण करो’ की संस्कृति में बदलना होगा। असली संकट यह है कि हमने विकास, सुविधा, उपभोग और आस्था को प्रकृति की सीमाओं से अलग कर दिया है। हमें तय करना होगा कि हमारी धार्मिक यात्रा किसी नदी को गंदा करके, किसी पहाड़ को प्लास्टिक से ढककर या किसी जंगल में कचरा छोड़कर पूरी नहीं हो सकती। उसी तरह सस्ता फैशन भी पृथ्वी के संसाधनों की कीमत पर अनंत समय तक नहीं चल सकता। अब समय कचरे के पहाड़ों को हटाने की नहीं, ऐसे पहाड़ पैदा होने से रोकने और नीति बनाने का है। आस्था हो या बाजार प्रकृति को कूड़ेदान बनाने का अधिकार किसी को नहीं है।

(सप्रेस)


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