
स्वामी विवेकानंद जी (१२ जनवरी १८६३ ४ जुलाई १९०२) का वैचारिक योगदान देश-काल-पात्र की दृष्टि से अद्वितीय है। प्रायः चिंतकों के योगदान पर समय की धूल जम जाती है और प्रासंगिकता कम होती जाती है. लेकिन १९वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हमारे बीच उदित हुए स्वामी विवेकानंद के विचार प्रवाह का वेदांती जीवन दृष्टि में निहित उद्गम और सर्व-धर्म सद्भाव पर आधारित व्यापकता (शिकागो सम्बोधन, १८९३) के कारण आज भी महत्व बना हुआ है. उन्हें भारतीय वेदांत परंपरा का श्रेष्ठ अनुयायी माना जाता है. मुलतः शंकराचार्य और रामानुज की स्थापनाओं पर आधारित वेदांत चिंतन को वल्लभाचार्य, माधवाचार्य और निबार्क के विचारों से जोड़कर ‘व्यावहारिक वेदांत’ (प्रैक्टिकल वेदांत) को प्रचारित करनेवाले स्वामी विवेकांनद को ‘वेदांती समाजवादी’ भी माना जाता है. उनके विचारों से भारतीय अस्मिता और चिंतन धारा को ‘उपनिवेशवाद’ और ‘पश्चिमीकरण’ के विनाशक प्रभाव से मुक्ति मिली. उनके विचार-प्रसार से वसुधैव कुटुम्बकम, राष्ट्रीयता, लोकतंत्र और प्रगतिशीलता को बल मिला. उनकी चिंतन धारा में ‘राजयोग’ (१८९६) और ‘लेक्चर्स फ्रॉम कोलम्बो टू अल्मोड़ा’ (१८९७) को ‘मील के पत्थर’ का महत्व प्राप्त है. वैसे उनका सम्पूर्ण चिंतन ९ खण्डों में प्रकाशित किया गया है. यह प्रशंसनीय तथ्य है कि भारत में स्वामी विवेकानंद की जन्मतिथि १२ जनवरी को ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा है.
स्वामी विवेकानंद की संकलित और संचित रचनाएँ बंगाली, हिंदी और अंग्रेजी में अमूल्य धरोहर के रूप में कलकत्ता स्थित ‘रामकृष्ण मिशन इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कल्चर’ द्वारा सम्पादित, प्रकाशित और प्रसारित हैं। कई अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं में भी उनकी रचनाओं का अनुवाद हुआ है. इस अंतर्राष्ट्रीय संस्थान का पुस्तक भण्डार स्वामी विवेकानन्द की विद्वता, व्यापकता और गहराई आपको अचंभित कर देगी। भारतीय समाज और संस्कृति की निरंतरता और परिवर्तन को समझने में विवेकानंद जी द्वारा प्रतिपादित विमर्श की इक्कीसवीं शताब्दी में भी महत्ता निर्विवाद है. क्योंकि दर्शन और समाजविज्ञान, अध्यात्म और विज्ञान, व्यक्ति और समष्टि, देश और दुनिया, पूरब और पश्चिम, धर्म और मानवता, स्त्री और पुरुष, वर्ण और जाति, हिन्दू और मुसलमान, भारत की समस्याएं और भारतीय युवाओं के कर्तव्य, मनुष्यों के अतीत की विरासतें और मानव परिवार में निहित भविष्य की संभावनाएं इन सभी प्रश्नों पर स्वामी जी ने मनन-चिंतन किया है और उनके स्पष्ट विचारों का समग्र हमारे मार्गदर्शन के लिए सहज उपलब्ध है.
१) अल्पायु लेकिन अद्भुत जीवन यात्रा
स्वामी जी केवल उनतालीस वर्ष की आयु में इस संसार से विदा हो गए। उनके जीवन के शुरुआती बीस-बाईस वर्ष एक तरह से आत्म-अन्वेषण और सत्संग में बीते। १८ बरस की आयु में ही विज्ञान के विद्यार्थी के रूप में उनकी ईश्वर के बारे में गहरी जिज्ञासा जागृत हो गयी थी और इसका समाधान उन्हें रामकृष्ण परमहंस को गुरु के रूप में प्राप्त होने के बाद वेदांत अध्ययन और योग साधना के जरिये मिला. उन्होंने देश और विदेशों में भ्रमण और शिक्षण किया। उन्होंने १८८८ से १८९३ के बीच पांच वर्ष तक भारत का भ्रमण किया। यह भारत दर्शन यात्रा एक साधक और जिज्ञासु के रूप में था। उनकी अगली देश यात्रा १८९७ से १८९९ के बीच एक प्रबोधक सन्यासी के रूप में हुई. वे यूरोप और अमेरिका की यात्रा पर दो-दो बार गए पहला पश्चिम प्रवास १८९३-१८९७ और दूसरा प्रवास १८९९-१९०० में संपन्न किया। वह लगातार एक विद्यार्थी की तरह सीखने को उत्सुक थे। एक तरफ वे साधक और शिक्षक थे, जिन्हें लोग सुनना चाहते थे, खासकर भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म के संदर्भ में। दूसरी तरफ, वे खुद भी यह समझना चाहते थे कि भारत में क्या श्रेष्ठ है और विश्व में ऐसा क्या है जो भारत के पास नहीं है। वे यह भी देखना चाहते थे कि विश्व की तुलना में भारत कई मोर्चों पर पराजित या पिछड़ा क्यों है?
शिकागो की प्रसिद्ध विश्व धर्म महासभा में हिस्सा लेने के बाद जब वे अमेरिका से लौटे, तो उन्होंने १८ जनवरी १८९७ में कोलंबो (श्रीलंका) से अपनी यात्रा आरंभ की और १९ जून १८९७ को उत्तराखंड के अल्मोड़ा तक पहुँचे। इस ऐतिहासिक व्याख्यान यात्रा में उन्होंने समाज और संस्कृति के पाँच प्रमुख प्रश्नों पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार प्रस्तुत किएः
1. धर्म और समाज का संबंध
2. विज्ञान और ज्ञान का विवेक
3. जाति व्यवस्था
4 सभ्यता का उत्थान और पतन
5. भविष्य का रास्ता और विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय।
स्वामी जी ने इन मुद्दों पर जो विचार रखे, वे आज भी हमारे लिए प्रस्थान बिंदु की तरह हैं। उनके विचारों ने भारतीय विमर्श में निहित प्रगतिउन्मुखता और वैश्विकता को देश और दुनिया के सामने रखा. उनका प्रसिद्ध ‘शिकागो व्याख्यान’ (विश्व धर्म संसद, शिकागो; ११ सितम्बर १८९३) इसकी पहली झलक था. आगे इसको अमरीका में स्थापित वेदांत सोसाइटी (१८९४, न्यूयार्क) और भारत में बनाये गए श्री रामकृष्ण मठ (१८८६) और रामकृष्ण मिशन ( कलकत्ता, १८९७) ने पुष्पित-पल्लवित किया. यह उल्लेखनीय है कि वह उस दौर के सबसे महत्वपूर्ण समाजशास्त्री हर्बर्ट स्पेंसर के उद्विकासवादी दृष्टिकोण से बहुत प्रभावित थे. उन्होंने स्पेंसर की कुछ रचनाओं का बंगाली में अनुवाद भी किया था. उन्होंने ईसाई चिंतक थॉमस अ केमपिस (१५ वीं शताब्दी) की प्रसिद्ध आध्यात्मिक पुस्तक ‘इमिटेशन ऑफ़ क्राइस्ट’ का स्वयं अनुवाद किया और अपनी पत्रिका ‘प्रबुद्ध भारत’ में छपवाया. फ्रेंच विद्वान् रोम्यां रोलां ने स्वामी विवेकानन्द की जीवनी को ‘द लाइफ ऑफ़ विवेकानंद एंड यूनिवर्सल गॉस्पेल’ शीर्षक के साथ प्रस्तुत किया था और यह किताब आज भी लोकप्रिय है.
२) विज्ञान, आध्यात्म और समाज विज्ञान का समन्वय
उन्होंने इसी क्रम में मनुष्य की विज्ञान यात्रा की प्रगतिशीलता को भी रेखांकित किया था । प्रारंभिक समय में न्यूटन के दौर तक यह माना गया कि विज्ञान की आधारशिला ‘शक्ति’ (force) है। शक्ति का महत्व इसलिए है क्योंकि गुरुत्वाकर्षण जैसी शक्तियाँ धरती और अन्य वस्तुओं को गतिशील रखती हैं। एक बच्चा यदि कंकड़ ऊपर फेंकता है, तो वह नीचे गिरता है – यह ‘शक्ति’ का प्रभाव है। न्यूटन के उपरान्त यह समझा गया कि शक्ति से भी अधिक महत्वपूर्ण चीज ऊर्जा (energy) है। हर जीव और वस्तु ऊर्जा का रूप है। जब यह शरीर शांत हो जाएगा, तब भी ऊर्जा अपने किसी अन्य रूप में बनी रहेगी। आइंस्टीन के योगदान से आज के क्वांटम भौतिकी के दौर तक ऊर्जा’ भौतिक विज्ञान से लेकर बौद्ध विपस्सना तक विमर्श का सबसे बड़ा प्रश्न है। यह आश्चर्य की बात है कि स्वामी जी ने १९वीं शताब्दी के समापन काल में बता दिया था कि हमारा अस्तित्व आध्यात्मिक ऊर्जा से जुड़ा हुआ है।
समाजविज्ञान के क्षेत्र में स्वामी विवेकानंद ने स्पष्ट कहा कि समाज की बुनियादी रचना को समझना और सामाजिक क्रियाओं का उद्देश्य स्पष्ट करना समाज वैज्ञानिकों का कार्य है। उन्होंने कहा कि सामाजिक जीवन में क्रियाओं के दो पक्ष होते हैं: एक व्यक्तिगत और दूसरा सामूहिक। जीवन का अधिकांश भाग सामाजिक होता है। माँ के गर्भ से लेकर अंतिम साँस तक, व्यक्ति का अधिकांश समय सामाजिक स्थानों में बीतता है। सामाजिक क्रिया का उद्देश्य यह होता है कि यह व्यक्तिगत और सामूहिक हित को संतुलित रखे। सामाजिक संबंध, जैसे माँ और संतान, पति-पत्नी, भाई-बहन, और अन्य रक्त संबंध, समाज की आधारशिला हैं और मानव जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. लेकिन असामाजिक प्रवृत्तियां जैसे ईर्ष्या, हिंसा और असामाजिक कार्य जैसे दंगा-फसाद आदि भी हमारे जीवन का हिस्सा है। जो हमारे लिए गड्ढा खोद रहा है, जो हमें नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहा है, वह भी सामाजिक जीवन का हिस्सा है।
उन्होंने समझाया है कि सामाजिक क्रियाओं से भी अधिक महत्वपूर्ण तथ्य समाज की सत्ता-व्यवस्था है और सारा मानव समाज एक बुनियादी आधार पर टिका हुआ है-वर्ग व्यवस्था। हम सभी किसी न किसी वर्ग के सदस्य हैं। वर्गों के अपने-अपने हित हैं। वर्गों में संघर्ष है, तो एकता भी है। उदाहरण के लिए, मजदूर और पूंजीपति के बीच एक सामान्य हित यह है कि व्यवस्था चलती रहे। लेकिन उनके बीच अंतर्विरोध भी है। मजदूर अपनी मेहनत का अधिक से अधिक श्रम मूल्य पाना चाहता है, जबकि पूंजीपति अधिक से अधिक काम कम से कम लागत में करवाना चाहता है। यह विरोधाभास मानव सभ्यता की कहानी को दिशा देता है। कई बार वर्ग आधारित दृष्टिकोण अधिक भ्रम पैदा करता है और मानव चेतना को धूमिल करता है। वस्तुतः मनुष्य एक चेतन प्राणी है और उसके जीवन का आधार उसके ‘हित’ हैं। यह हित केवल वर्ग व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं। मनुष्य एक समय में कई समूहों का सदस्य होता है। उदाहरण के लिए, मैं एक अध्यापक हूँ, तो अध्यापक संघ का हिस्सा हूँ। मैं एक मोहल्ले का निवासी हूँ, तो वहाँ की पानी-बिजली जैसी समस्याओं का भागी हूँ। मेरा एक परिवार है, यह एक तीसरा समूह है। मेरी मित्र मंडली, मेरी पसंद की राजनीतिक संस्था, विचारधारा, या आंदोलन-ये सभी समूह मेरी भूमिकाओं को परिभाषित करते हैं।
मनुष्य के हित इन समूहों के अनुसार बदलते रहते हैं। इसी कारण यूरोप के मजदूरों ने अपने-अपने समाज में बदलाव की लड़ाई लड़ी, लेकिन जब यूरोपीय राष्ट्र राष्ट्रीयता के आधार पर एशिया और अफ्रीका जैसे देशों को गुलाम बनाने निकले, तो ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, स्पेन और पुर्तगाल के मजदूर आंदोलनों ने अपने-अपने राष्ट्रों के शासकों का साथ दिया। जबकि अधिकाँश मार्क्सवादियों ने, वर्गवाद के सिद्धांत के आधार पर यह सोचा था कि जब दुनिया के देश अपने शासक वर्ग की हितों के लिये आपस में लड़ेंगे तो दुनिया के मजदूर एक होकर युद्ध के विरुद्ध बगावत करेंगे क्योंकि मजदूरों का राष्ट्रीयता से कोई लेना-देना नहीं है।
लेकिन वास्तविकता यह थी कि मजदूरों ने अपने-अपने देशों के शासकों का साथ दिया। इससे अंतरराष्ट्रीय मजदूर आंदोलन को झटका लगा। कुछ नेताओं की हत्या भी हुई।
जर्मनी में हिटलर और इटली में मुसोलिनी के शासनकाल में मार्क्सवाद और समाजवाद पराजित हुआ। इस विफलता ने मार्क्सवादियों के बीच नए विमर्श को जन्म दिया। उदाहरण के लिए, जर्मनी में दुनिया का सबसे सशक्त मजदूर संगठन था, लेकिन वहीं सबसे दमनकारी राजसत्ता भी आई। मजदूरों ने इस राजसत्ता का समर्थन किया। यह क्यों हुआ?
इस पर आत्मचिंतन करते हुए, इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के एक नेता अंतोनियो ग्राम्सी ने ‘प्रीजन नोटबुक्स’ में स्वीकारा कि हमने संस्कृति और समाज के सम्बंधों को समझने में चूक की। मनुष्य सिर्फ आर्थिक सरोकारों से संचालित नहीं होता. मनुष्य एक सांस्कृतिक प्राणी भी है। संस्कृति के अंतर्गत ही उसका आर्थिक हित और राजनीतिक व्यवहार परिभाषित होता है। जैसे हमारी संस्कृति यह निर्धारित करती है कि हम क्या खा सकते हैं और क्या नहीं। उदाहरण के लिए, हमारे कुछ मित्र जो शाकाहारी हैं, वे भूखे मर जाएँगे लेकिन मांसाहार नहीं करेंगे। वहीं, मांसाहार करने वाले माँसाहारी भोजन खुशी-खुशी कर लेंगे. इससे आगे, भाषा और धर्म के उद्धार पर जो अलगाव उत्पन्न होता है वह आर्थिक हितों की एकता पर भारी पड़ता है,
३) भारतीय वैचारिक विशिष्टता
स्वामी विवेकानंद जी ने पश्चिम में प्रचलित विचारधाराओं से अच्छी तरह परिचित थे. लेकिन उन्होंने पाश्चात्य चिंतन से परे जाकर एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। अगर हमें भारतीय समाज और भारत में समाजविज्ञान की वर्तमान असफलताओं को संबोधित करना है, तो हमें उन चिंतकों को फिर से पढ़ना होगा जिन्होंने हमारे समाज को जगाने का कार्य किया। विवेकानंद जी से पहले और उनके बाद, कई लोगों ने भारतीय समाज, भारत की दुर्गति, और भारत के स्वराज को समझने की कोशिश की है. उस चिंतन से जो धारणाएँ निकलीं, उन्हें मैं संक्षेप में आपके सामने रखना चाहता हूँ।
एक धारणा यह है कि मनुष्य का एक सामूहिक चिंतन होता है जो हमारी ‘अस्मिता’ ( आइडेंटिटी) और प्रवृत्ति (ईथोस) को आधार देता है. इस सामूहिक चिंतन के इर्द-गिर्द ही विचार विकसित होते हैं और उनका लगातार संशोधन भी होता रहता है। ‘शिष्टाचार’ और ‘अशिष्टता’ क्या हैं? यह हमारे संस्कारों का हिस्सा है। हम बचपन से बुढ़ापे तक सुसंस्कृत होने की प्रक्रिया से गुजरते हैं। हमें यह माँ, परिवार, पड़ोस, विद्यालय आदि अनेकों माध्यमों से सिखाया जाता है।
दूसरा चिंतक समूह यह कहता है कि मनुष्य अस्तित्व की रक्षा में लगा हुआ प्राणी है। हमारे सभी आचरण अस्तित्व के इर्द-गिर्द केंद्रित होते हैं। पुराने ज्ञान और परंपराओं ने हमें सिखाया कि आहार, निद्रा, भय, और मैथुन हमारे अस्तित्व की चार मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। बिना आहार के हमारा शरीर नष्ट हो जाएगा। निद्रा के बिना शरीर थकान से टूट जाएगा। भय वास्तविक हो सकता है, लेकिन कई बार हमारे द्वारा निर्मित भय भी होते हैं, जो हमारे आचरण को प्रभावित करते हैं। मैथुन और अन्य आवश्यकताएँ भी हमारे व्यवहार और संस्थाओं को संचालित करती हैं। इस अस्तित्ववादी दृष्टिकोण में विद्या और गुरु की भूमिका महत्वपूर्ण है। विद्या को प्रकाश माना गया है, और यह प्रकाश हमें गुरु के माध्यम से प्राप्त होता है। ‘अंधकार से प्रकाश की ओर’ का विचार हमारी ज्ञान-परंपरा का मूल है। यह केवल भौतिक प्रकाश की बात नहीं करता, बल्कि ज्ञान के उस प्रकाश की बात करता है, जो हमें सत्य और उद्देश्य तक पहुँचाने में सहायक होता है।
हमारी संस्कृति में अमरत्व की चाह भी गहराई तक बैठी हुई है। जैसे, एक प्रसिद्ध प्राचीन श्लोक में कहा गया है कि “असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय।” ( ‘हमें असत्य से सत्य की ओर अग्रसर करो अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो. मृत्यु से अमृतं की तरफ चलें।’). यह अमरत्व की सनातन तलाश है। लेकिन अमरत्व का अर्थ केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं है। हमारी संस्कृति कहती है कि हमारे तीन काय होते हैं-शरीर, कर्म, और आत्मा। शरीर अस्सी-पचासी वर्ष का होता है और फिर नष्ट हो जाता है। लेकिन कर्म, मृत्यु के बाद भी जीवित रहते हैं। जैसे कृष्ण का कर्म, दुर्योधन का कर्म, या रावण का कर्म। यह कर्म व्यक्ति को शरीर के क्षय के बावजूद अमर बनाते हैं.
अब इस अस्तित्व के परस्पर विरोधी सच के बारे में हमारे पुरखों में से एक दार्शनिक सम्राट भर्तृहरि ने बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया है. राजा भर्तृहरि ने तीन शतक लिखे हैं-शृंगार शतक, वैराग्य शतक, और नीति शतक। ‘शृंगार शतक’ में आसक्ति और अनुराग के भावों की व्याख्या है- प्रेम, आकर्षण, और स्त्री-पुरुष के संबंधों के बारे में सुंदर भाव व्यक्त किए गए। लेकिन श्रृंगार शतक की रचना के बाद भर्तृहरि के मन में अपनी ही रानी के आचरण के कारण सांसारिकता के प्रति वैराग्य उत्पन्न हुआ। इसके बाद उन्होंने ‘वैराग्य शतक’ की रचना की, जिसमें संसार की नश्वरता और माया का वर्णन किया। फिर तीसरे चरण में, उन्होंने नीति शतक लिखा, जो मनुष्य के व्यवहार और नीति के सूत्रों की व्याख्या करता है। इन तीनों शतकों को साथ में पढ़ने पर जीवन और समाज के गहरे अर्थ सामने आते हैं।
एक और दृष्टिकोण हमें बौद्धों की ‘शून्यता’ के सिद्धांत में मिलता है और भारत में बौद्ध धर्म तक महात्मा बुद्ध से लेकर शंकराचार्य के बीच शताब्दियों तक वर्चस्व रहा है। बौद्धों ने ‘प्रतीत्य समुत्पाद’ की बात की जो प्रतीत होता है, उसी से ‘कार्य-कारण’ का जन्म होता है, और वही हमारे आचरण का आधार बनता है। इसी से संस्थाएँ खड़ी होती हैं और समाज के नियम बनते हैं। प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धांत के माध्यम से यह समझाया गया है कि हमारे दृष्टिकोण से हमारे कर्मों, आचरण और भावनाओं का आधार बनता है.
इसके बाद की अवधि, आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैतवाद के वर्चस्व के अंतर्गत ‘कर्म सिद्धांत’ और ‘पुनर्जन्म सिद्धांत’ से संचालित हुई है. इसी दौर में वर्णव्यवस्था और फिर जातिप्रथा का विस्तार हुआ. फिर १२ वीं शताब्दी में भारतीय समाज का इस्लाम से साक्षात्कार हुआ. अरब व्यापारियों, सूफी चिंतकों और बर्बर हमलावरों की इस्लाम के विस्तार में अलग-अलग भूमिका थी. अकबर के सुलहे कुल और दीने इलाही से लेकर औरंगज़ेब के कठोर सत्ता सञ्चालन ने विविध प्रतिक्रियाएं पैदा की. १७५७ से १९४७ का समय ब्रिटिश साम्राज्य के उत्थान और पतन से जुड़ा रहा. यह भारत में ईसाई धर्म द्वारा धर्म परिवर्तन की कोशिशों के फैलाव का भी था. इस अवधि में ‘पश्चिमीकरण’ का भी दबाव था. जातिप्रथा को ब्रिटिश राज के अंतिम दशकों में १९७१ और १९३१ के बीच हुई जनगणना से बहुत बल मिला। इसका असर इस्लाम और ईसाई धर्म अपनाने वाले भारतीओं पर बना रहा. आज़ादी के पूर्व हुए सांप्रदायिक दंगों और भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य व्यवस्था के कारण धर्म परिवर्तन का दबाव काम हुआ है. लेकिन स्वाधीन भारत की जनगणनाओं में भी १९५१ से २०११ के बीच पिछड़े मुसलमान और दलित ईसाई बड़ी संख्या में पाए गए हैं. बाबा साहब आम्बेडकर की प्रेरणा से बाद के दशकों में दलित समुदायों में बौद्ध धर्म अपनाने का अभियान चलाया गया है.
४) ) समाजविज्ञान की धार्मिक पृष्ठभूमि
अब अगर हम सामाजिक विज्ञान को देखें, तो यह बड़े धर्मों- ईसाई, इस्लाम, हिंदू, और बौद्ध-जैन के दर्शन और सिद्धांतों से गहराई से प्रभावित है। पश्चिमी विज्ञान और दर्शन पर बाइबल और यूरोपीय परंपराओं का प्रभाव है। उदाहरण के लिए, न्यूटन पर चर्च के गहरे प्रभाव की चर्चा होती है। बौद्ध शून्यता और प्रतीत्यसमुत्पाद का जो सिद्धांत है, वह भारतीय मनीषा में गहराई से जुड़ा हुआ है। भारतीय चिंतन में ‘अनासक्ति’ का बड़ा महत्व है। यह कहा
गया है कि हमारे झंझट का मूल कारण ‘आसक्ति है। हमारी संतान, पत्नि, पति से आसक्ति स्वाभाविक है, लेकिन इसे नियंत्रित करने का अभ्यास करना चाहिए। साथ ही, यह भी समझना चाहिए कि जो है, वह कल नहीं रहेगा। अनित्यता परिवर्तन। हमारी सांसों के साथ हर क्षण कुछ नया आता है और कुछ पुराना चला जाता है। इसी के माध्यम से आनंद और दुःख का अनुभव होता है। लेकिन हम ‘अमरत्व’ की तलाश में रहते हैं। हजारों वर्षों से मनुष्य ‘नित्यता’ के भ्रम में पड़ा है। जब कोई नेता जीवित होता है, तो उसके लिए नारे लगते हैं-‘जब तक सूरज चाँद रहेगा, नेता का नाम रहेगा।’ लेकिन शाम होते-होते खबर आती है कि नेता के देहांत के साथ ही नारे लगाने वाले किसी और के पीछे चलने लगे. चाँद और सूरज जैसा अजर-अमर नेता गुमनाम हो गया।
हिन्दू धर्म के ध्वजवाहक आदि-शंकराचार्य ने मानव समाज के सन्दर्भ में ‘माया’ की भूमिका और वर्णाश्रम व्यवस्था की विस्तृत व्याख्या की। माया, मृत्यु और अमृत के त्रिकोण में मनुष्य जीवन गतिमान है. लेकिन इसकी प्रामाणिक आध्यात्मिक व्याख्या का अभाव लगता है. आज के समाज में कई नए पंथों के विस्तार के बावजूद ज्ञानी और विश्वसनीय धर्माचार्यों का दर्शन दुर्लभ हो गया है। स्वामी विवेकानन्द जैसा तो कोई भी नहीं दीखता. फिर भी माया, मृत्यु और अमरत्व का यह त्रिकोण हमें नश्वरता और अमरत्व के बीच संतुलन सिखाता है।
कबीर दास कहते हैं कि दुनिया में दो तरह के लोग हैं- ‘सुखिया सब संसार है – खाए और सोए। दुखिया दास कबीर है, जागे और रोए।’ हमें सोचना चाहिए कि हम इन दो में से किस समूह के सदस्य है? जागे हुए या सोए हुए? स्वामी जी निश्चय जगे हुए भारतीय साधक थे जो रोने की बजाए औरों को जगाने में जुटे रहे. पूरे समाज में भी ‘खाए और सोए’ प्रवृत्ति की प्रधानता होती है। कबीर, रविदास, मीरा, तुलसी, रहीम और स्वामी विवेकानंद जैसे परमज्ञानी हमारे मार्गदर्शक हैं, लेकिन हम, विशेषकर सुविधा-प्राप्त वर्गों के लोग उनकी शिक्षा का सिर्फ सुविधाजनक अंश ग्रहण करते हैं।
यह अ-संतुलन समाज के हर स्तर पर देखने को मिलता है। ‘सुखिया सब संसार है, खाए और सोए’ यह सत्य और चुनौती दोनों है। भारत और विश्व ने २००० में परस्पर मिलकर यह संकल्प लिया था कि वंचितों को न्यायपूर्ण समाज की रचना के लिए सशक्त किया जाए। इस प्रस्ताव को ‘सहस्त्राब्दी विकास के लक्ष्य’ (मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स) कहा गया. २०१५ तक विशेष सफलता नहीं मिली तो इसी सवाल को नए सिरे से २०१५ २०३० के बीच सुलझाने का बीड़ा उठाया गया टिकाऊ विकास का अभियान (सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स/ एस. डी. जी.) इसमें १७ लक्ष्य चिन्हित किये गए हैं और सभी देशों की सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य, और न्याय के माध्यम से वंचितों को सक्षम बनाने के लिए प्रयासरत हैं।
लेकिन न्याय का आधार क्या है? चारो तरफ ‘मत्स्य न्याय’ का बोलबाला है यहां बड़ी मछली छोटी मछलियों को खा जाती हैं. न्याय का अधिकारी वही होगा जो सक्षम होगा। यदि किसी को अधिकार दिया जाए, लेकिन वह उसे संभाल न सके, तो वह अधिकार व्यर्थ हो जाएगा। स्वराज का यही विचित्र पक्ष है। इसीलिए एरिक फ्रॉम जैसे मनोवैज्ञानिकों ने कहा है कि ‘आज़ादी का भय’ भी एक वास्तविकता है और कई लोग आज़ादी से डरते हैं। भारत की आज़ादी के लिए अमर शहीद भगत सिंह, अशफाकुल्लाह खान, राजगुरु और सुखदेव फांसी पर झूल गए, लेकिन उनकी आज़ादी का सपना हर किसी का सपना नहीं बन सका। परिवार और समाज में भी यही दृष्टिकोण दिखता है। अक्सर परिवार के सदस्य तय करते हैं कि बच्चा क्या बनेगा-संगीतकार बनना चाहता था, लेकिन उसे डॉक्टर बना दिया गया। यह क्षमता और स्वतंत्रता के बीच संतुलन की जटिलता को दर्शाता है।
समाज में दो प्रवृत्तियाँ भी दिखती हैं-सामाजिकता और वैयक्तिकता। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, लेकिन उसकी अपनी एक व्यक्तिगत पहचान भी है। जब हम सामूहिकता में रहते हैं, तब भी हमारी निजी वैयक्तिकता का महत्व बना रहता है। वहीं जब हम अकेले पड़ जाते हैं, तो हमें समूह की ओर लौटना पड़ता है. आज का समय इस द्वंद का गवाह है। भाषाई समूह, धर्म के समूह, और राष्ट्रीयता के बीच एक खींचतान जारी है। यदि राष्ट्र का समन्वय बिगड़ जाए, तो यह संकट और गहरा हो जाता है। भाषा, जाति और धर्म के आधार पर बने समूह राष्ट्रीयता को चुनौती देने लगते हैं। ऐसे में वैयक्तिकता और सामूहिकता के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक हो जाता है. यही आज का सबसे बड़ा प्रश्न है.
५) आखिरी बात सुख की तलाश
आखिरी बात जो सामाजिक विश्लेषण के क्रम में सामने आती है वह यह है कि हर प्राणी मनुष्य ही नहीं सुख की तलाश करता है। यह हमारी प्रवृत्ति है कि हम हर उस चीज़ से बचना चाहते हैं, जो हमें कष्ट दे। लेकिन सुख की परिभाषा हर व्यक्ति के लिए अलग होती है। स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में सुख की परिभाषा एकदम अलग है श्रीमदभागवत गीता में तीन गुणों सात्विक, राजसिक और तामसिक का वर्णन है. इस सच को स्वामी विवेकानंद ने अत्यंत सतर्कता के साथ समझाया है। उन्होंने कहा कि हमारे भीतर ये तीनों गुण मौजूद हैं। जीवन का लक्ष्य यह होना चाहिए कि हम तामसिकता और राजसिकता से ऊपर उठकर सात्विकता की ओर बढ़ें। जब सात्विकता से भी परे आत्म-साक्षात्कार हो जाए तो वह आदर्श सुख है. परमानंद की, निर्विकल्प समाधि की स्थिति है.
उधर ‘सुख’ की तलाश ही आधुनिकता का आधार है। बाजारवाद और उपभोक्तावाद इसी पर टिका हुआ है। उदाहरण के लिए, लोकप्रिय सिनेमा अभिनेता अमिताभ बच्चन एक अजीब बात कहते दीखते हैं – ‘ठंडा माने कोका-कोला।’ लेकिन वह एक सांस्कृतिक नायक हैं, और जब वह यह कहते हैं तो बच्चों से लेकर बूढ़ों तक इसका व्यापक प्रभाव होता है। सभी इस अवैज्ञानिक प्रचार के कारण मधुमेह और प्यास दोनों को बढ़ानेवाले इस अमरीकी पेय को चाव से पीने लगते हैं. इसी प्रकार, माइकल जॉर्डन एक महान बास्केटबॉल खिलाड़ी हैं जो एक जूता कंपनी के लिए विज्ञापन में यह कहते हैं कि ‘रीबाक’ के जूते पहनना उनकी सफलता का आधार है। इससे आश्वस्त होकर लोगों में ‘रीबॉक’ के जूते लोकप्रिय हो जाते हैं. इसी तरह शारीरिक सौष्ठव के लिए नौजवान प्रोटीन के पाउडर का डाक्टर की चेतावनी के बावजूद उपयोग करते हैं. क्योंकि जब एक चुस्त-दुरुस्त शरीर वाला व्यक्ति इनका विज्ञापन करता है, तो लोग उसकी बातों पर भरोसा कर लेते हैं। यही ‘भरोसा’ आधुनिकता और बाजारवाद का प्राणतत्व है.
लेकिन किन्ही कारणों से ‘सुख’ के सन्दर्भ में आधुनिकता और आध्यात्मिकता के बीच संवाद टूट गया है. धर्म और विज्ञान का सम्बन्ध नहीं बचा है. इस संवाद और सम्बन्ध को कायम करने के लिए स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के १८८६ में देहांत के बाद संन्यास और समाजसेवा को एक दूसरे के निकट लाने का साहसिक प्रयोग किया। रामकृष्ण मठ (१८८६), वेदांत सोसायटी (१८९४) और रामकृष्ण मिशन (१८९७) इसके वाहक बने. आज दुनिया भर में रामकृष्ण मिशन के २६१ केंद्र हैं. इसमें भारत में १९८, बांगलादेश में २६ और संयुक्त राज्य अमरीका में १४ स्थानों पर शिक्षा, स्वास्थ्य, सांस्कृतिक नव-जागरण, आपातकालीन राहत और धार्मिक सद्भाव के लिए विविध कार्यों की एक प्रशंसनीय श्रृंखला बन गयी है. दुनिया के ३० अन्य देशों में भी मिशन की शुरुआत की जा चुकी है.
६) समाजविज्ञान की आत्मघाती उपेक्षा
इस सन्दर्भ में यह जोड़ना आवश्यक है कि आज आधुनिकता के प्रति आकर्षित दुनिया में समाज विज्ञान की भी आध्यात्मिकता के समांतर उपेक्षा हो रही है। जबकि आज समाज विज्ञान के महत्व को समझने की पहले अधिक आवश्यकता है, ताकि समाज की प्रक्रियाओं को, उनके तात्कालिक और दीर्घकालीन गुणों और दुर्गुणों को समझा जा सके। विश्व आर्थिकी में रोजगार की कमी की समस्या बढ़ रही है. इससे २१ वीं शताब्दी में टेक्नोलॉजी और विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति के बावजूद समाज और देशों के बीच गैरबराबरी, तुलनात्मक अभाव, सामुदायिक बहिष्करण और अन्यायों में बढ़ोतरी हुई है. इसी क्रम में यह गलतफ़हमी फैल गयी है कि समाजविज्ञान में रोजगार की संभावना धूमिल हो चुकी है. जबकि समाज विज्ञान में उच्च अध्ययन और शोध की दक्षता हासिल करने से कम से कम पाँच क्षेत्रों में सेवा और रोजगार के अवसर खुलते हैं।
पहला है शिक्षा का कार्य. अब ज्ञान की हर विधा में चिकित्सा और इंजीनियरिंग से लेकर कानून और कृषि विज्ञान के अध्ययन संस्थानों में समाजविज्ञान का अध्ययन जरुरी माना जाता है. वैसे भी अभी उच्च शिक्षा के केंद्रों की जरूरत नहीं पूरी हुई है. फिर भारत की नयी शिक्षा नीति के तहत हर विद्यार्थी के लिए समाज और संस्कृति का अध्ययन आधारित ज्ञान अनिवार्य हो गया है।
दूसरा है सामाजिक शोध केंद्र। यह खतरनाक तथ्य सर्व विदित हो चुका है कि अबतक भारत में शोध पर न्यूनतम निवेश होता रहा है, जबकि अमरीका, यूरोपीय महासंघ, चीन और अन्य देशों से हमारा मुकाबला है। शोध में अधिक पैसा लगाने की आवश्यकता के बारे में राष्ट्रीय सहमति बन रही है। सरकारी और निजी साधनाओं से समाजवैज्ञानिक शोध केन्द्रों के विस्तार की ओर सबका ध्यान गया है.
तीसरा रोजगार संसार है मीडिया। पहले सूचना और प्रसारण की दुनिया में उन लोगों को नौकरी मिलती थी, जिनकी भाषा और साहित्य में कोई खास क्षमता थी। लेकिन अब पत्रकारिता के लिए सामजिक विश्लेषण की क्षमता आवश्यक हो गई है।
चौथा आकर्षक रोजगार क्षेत्र प्रशासन और प्रबंधन का है. सरकारी नौकरियों की प्रतियोगिताओं में विज्ञान और टेक्नोलॉजी में प्रवीण विद्यार्थी भी समाजविज्ञान को अपनी पसंद का विषय क्षेत्र बनाते हैं. क्योंकि प्रशासन की सुव्यवस्था के लिए समाजविज्ञान का ज्ञान अनिवार्य है.
पांचवा कार्य क्षेत्र है नागरिक संगठन। श्री नरसिंह राव और डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में सरकार सामाजिक जिम्मेदारियों से पीछे हटने लगी. इसे नयी आर्थिक नीति का मूल तत्व बताया गया. यह नीति आज ‘वैश्वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण’ के रूप में आज भी जारी है. इससे बाल श्रमिकों, निर्धनताग्रस्त परिवारों, निरक्षरता में फंसे नागरिकों, महिला आश्रित परिवारों, वृद्धों, विकलांगों, सामाजिक भेदभाव से पीड़ितों, पर्यावरण विनाश के पीड़ितों और स्वराज और लोकतंत्र की प्रक्रियाओं से वंचितों के बीच सक्रीय संगठनों की जिम्मेदारी बढ़ गयी है और इसमें सुशिक्षित और प्रशिक्षित समाजवैज्ञानिकों की मांग बढ़ती जायेगी.
इसका एक उदाहरण ओडिशा है. ओडिशा में जनजातीय समाज की जरूरतों और बाजारवादी विकास उन्मुख विकास के मॉडल का टकराव देखने को मिलता है। ओडिशा का कौंध जनजातीय समाज नियमगिरि पर्वत को अपना पिता मानता है। नियमगिरि पर्वत में बाक्साइट का भण्डार है और दुनियाभर की अल्युमिनियम निर्माता कम्पनिया इस पर्वत का खनन करके बाक्साइट निकालने की योजना के जरिये नियमगिरि को नष्ट करने वाले ‘विकास’ प्रयास को भुवनेश्वर और दिल्ली के सत्ताधीशों की मदद से लागू करना चाहती हैं. जनजातियां इसका विरोध कर रही थीं. यह विवाद सर्वोच्च न्यायालय तक गया जहां गाँववालों के सरोकार को मान्यता मिली। सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में हुए जनमत-संग्रह में नियमगिरि निवासियों की सभी बारह पंचायतों ने एकमत से कहा कि वे इस विनाश को स्वीकार नहीं करेंगे।
ऐसी ही परिस्थितियाँ झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, नर्मदा घाटी और लद्दाख में भी देखी जा सकती हैं. मुनाफे की तलाश में प्रकृति का संहार करने पर उतारू कॉर्पोरेट शक्तियां प्रकृति के साथ सहअस्तित्व में सक्षम आदिवासियों के प्रतिरोध को ‘उग्रवादी’ और ‘विकासविरोधी’ प्रचारित करके गृहयुद्ध को बढ़ावा दे रही हैं. ‘विकास’ की आड़ में एक नया महाभारत रचा जा रहा है. ऐसे माहौल में समाज वैज्ञानिकों की भूमिका हमारे समाज में हो रहे बदलावों को समझने और उन्हें सही दिशा में ले जाने की है। कृष्ण, विदुर और विवेकानंद की भूमिकाओं से प्रेरणा लेनी चाहिए. यह भूमिका सभी को समझनी होगी और उसे निभाने की तैयारी करनी होगी।
७) सच्ची श्रद्धांजलि
देश-दुनिया में नवयुग के पथप्रदर्शक स्वामी विवेकानंद जी को यही सही श्रद्धांजलि होगी. क्योंकि स्वामी विवेकानंद जी ने जो भूमिका अदा की थी, वह मार्गदर्शक और आलोचक दोनों रूपों में थी। उनके सामने दोनों काम थे। एक तरफ भारत का आत्मविश्वास वापस लाना था, और दूसरी तरफ वे यह भी बताते थे कि मनुष्य के रूप में तुम क्या हो?
इस संदर्भ में उन्होंने एक लोक-कथा बार बार सुनाई थी, जिसमें एक शेर का बच्चा भेड़ों के झुंड में फंसा हुआ था। उसकी मां शेरनी प्रसव के दौरान मर गई थी और वह भेड़ों के साथ पला बढ़ा. एक दिन एक शेर आया, उसने भेंड़ों के बीच एक सिंह-शावक के होने का विचित्र दृश्य देखा और पूछा, ‘तुम यहां भेड़ों के बीच क्या कर रहे हो? शेर का बच्चा भेंड़ की तरह मिमियाता हुआ बोला ‘यही हमारा परिवार है।’ तब शेर ने उसे पकड़ा और निकट के तालाब तक ले जाकर पानी में अपनी छबि देखने को कहा. अपनी आत्मछबि को देखकर चकित हुए सिंह-शावक को शेर ने दहाड़ते हुए समझाया ‘तुम स्वयं को पहचानो. तुम भेड़ नहीं हो. मिमियाना बंद करो तुम शेर हो।’ इसके बाद सिंह-शावक को आत्मबोध हुआ. वह मिमियाने की बजाय दहाड़ने लगा और उसने भेड़ों के झुण्ड से अपने फर्क को जाना.
वस्तुतः विवेकानंद जी का विचार क) वेदांत और विज्ञान के बीच समन्वय, ख) परंपरा तथा आधुनिकता को जोड़नेवाला, और ग) सर्वधर्म सद्भाव आधारित वैश्विकता और स्वावलम्बी राष्ट्रीयता के बीच का सेतु है. उनके चिंतन में सांप्रदायिक कलह, जातिगत संकीर्णता, और अज्ञानता के अंधकार के प्रति कोई गुंजाइश नहीं थी. वह मूलतः एक हिन्दू सन्यासी थे लेकिन उन्होने हिन्दू समाज सुधारक के रूप में भारतीय आध्यात्मिकता और संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाई हिन्दू अस्मिता को आत्म-उत्थान के बहुआयामी मार्ग की शिक्षा देकर और मानवसेवा से जोड़कर एक नयी ऊंचाई दी. उनकी मान्यता थी कि प्रत्येक मनुष्य के लिए वेदांत और विज्ञान दो प्रकाश स्त्रोत हैं और दुनिया ही आपका अंतिम कुटुंब होना चाहिए, इसी उदात्त सोच के साथ उन्होंने योग, नैतिकता, स्वास्थ्य, शिक्षा प्रसार और पीड़ितों की सेवा के माध्यम से आध्यात्मिकता को परिभाषित किया. मानवता के उत्थान के लिए पूरी एकाग्रता से अपने को समर्पित करनेवाले सन्यासियों और गृहस्थों को एकजुट किया और आनेवाली पीढ़ियों के लिया आत्म साक्षात्कार का रास्ता बनाया।
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