आज विवेकानंद के जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए उनका वो कथन याद आ रहा है जो उन्होंने सन् 1900 के आठ अप्रैल को सेन फ़्रांसिस्को के यूनियन स्क्वायर हॉल में “ क्या वेदांत भविष्य का धर्म है “ पर बोलते हुए कहा था कि “ मैं इस विषय पर अपने वक्तव्य की शुरुआत इस बात से करूँगा कि “वेदांत क्या नहीं है “ ।
आज राम के नाम पर जिस तरह का वातावरण तैयार किया जा रहा है,इस समय उनका ये कथन और महत्वपूर्ण हो जाता है।क्या हमारे आज के ये नेता खुद से कभी ये सवाल करेंगे ?
याद आता है उनका शिकागो का ऐतिहासिक भाषण!
इस देश की महान विरासत को नष्ट करके कौन सी विरासत की रक्षा कर रहें हैं ये तथाकथित धर्म संसद के धर्म रक्षक ?
एक धर्म संसद जो शिकागो में हुई थी और जिसमें इस देश की ओर से प्रतिनिधित्व करते हुए स्वामी विवेकानंद ने दुनिया का दिल जीत लिया था।
उस विश्व विख्यात भाषण में विवेकानंद ने कहा था :
मुझे एक ऐसे धर्म से संबंधित होने पर गर्व है जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति दोनों सिखाई है। हम न केवल सार्वभौमिक सहिष्णुता में विश्वास करते हैं, बल्कि हम सभी धर्मों को सत्य मानते हैं।
वर्तमान अधिवेशन, जो अब तक की सबसे प्रतिष्ठित सभाओं में से एक है, अपने आप में गीता में प्रचारित अद्भुत सिद्धांत की दुनिया के लिए एक घोषणा है: “जो कोई भी मेरे पास आता है, किसी भी रूप में, मैं उस तक पहुंचता हूं; सभी लोग उन रास्तों से जूझ रहे हैं जो अंत में मुझे ले जाते हैं।”
इस देश का दुर्भाग्य देखिये कि आज धर्म के नाम पर कुछ पाखंडी और अज्ञानी लोग खुलेआम दूसरे धर्म के लोगों को धमका रहें हैं, मारने की धमकियाँ दे रहें हैं और दुनिया भर में हमारे देश के नाम को बदनाम कर रहें हैं।
इससे भी ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि ये सब सत्ता के संरक्षण और आशीर्वाद से हो रहा है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे का गुणगान किया जा रहा है।
साम्प्रदायिक सद्भाव को नफ़रत की विषैली हवा से प्रदूषित करने वाले इन कट्टरपंथी तत्वों के खिलाफ इस देश के तमाम शांतिप्रिय, धर्मनिरपेक्ष और जनतांत्रिक लोगों को एकजुट होकर प्रतिवाद और प्रतिरोध को तेज करने की सख़्त ज़रूरत है।
-सरला माहेश्वरी
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