शमशेर बहादुर सिंह : जो कहा नहीं गया, वही शमशेर है

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Shamsher Bahadur Singh

Parichay Das

— परिचय दास —

।। एक ।।

मशेर बहादुर सिंह को पढ़ते हुए सबसे पहले जो अनुभव होता है, वह कविता का नहीं, संवेदना के अनुशासन का होता है। यह अनुशासन किसी नियम-पुस्तिका से नहीं आता बल्कि भीतर की उस कठोर तैयारी से जन्म लेता है जिसमें भाव को इतना तपाया जाता है कि वह शब्द बनने से पहले ही शुद्ध हो जाए। शमशेर की कविता भावुकता की सहज बहाव नहीं है; वह भाव की महीन छाननी है, जिसमें बहुत कुछ गिर जाता है और जो बचता है वही कविता कहलाता है।

उनकी काव्य-भाषा में कोई शोर नहीं है। वह चिल्लाती नहीं, आकर्षित नहीं करती, आमंत्रित भी नहीं करती—वह बस उपस्थित रहती है और यही उपस्थिति धीरे-धीरे पाठक को अपनी ओर खींच लेती है। शमशेर की कविता का सौंदर्य तत्काल प्रभाव में नहीं बल्कि देर से खुलने वाले अर्थ में है। यह कविता पढ़ी नहीं जाती बल्कि धीरे-धीरे भीतर उतरती है, जैसे कोई हल्की सुगंध जो पहले महसूस नहीं होती, पर बाद में पूरे वातावरण को भर देती है।

शमशेर की कविता में दृश्य बहुत हैं, पर वे चित्र नहीं बनाते—वे संकेत रचते हैं। एक रंग, एक रेखा, एक स्पर्श—बस इतना ही। वे विस्तार से बचते हैं, क्योंकि विस्तार उन्हें अनावश्यक लगता है। उनके यहाँ एक शब्द भी अगर अनावश्यक हुआ, तो वह कविता के संतुलन को बिगाड़ देगा। इसीलिए उनकी कविता में विराम उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना शब्द। कई बार जो कहा नहीं गया, वही सबसे अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है।

उनकी कविता का संबंध सौंदर्य से है, लेकिन यह सौंदर्य सजावटी नहीं है। यह सौंदर्य संयमित है, कभी-कभी लगभग कठोर। उसमें कोमलता है, पर वह मुलायम नहीं है; उसमें संवेदना है, पर वह भावुक नहीं है। शमशेर की कविता में प्रेम भी आता है, तो वह प्रदर्शन नहीं करता—वह चुपचाप अपनी जगह बना लेता है। यह प्रेम आत्मा की सतह पर नहीं, उसकी गहराई में घटता है।

शमशेर बहादुर सिंह की कविता को समझने के लिए भाषा की सतह से नीचे उतरना पड़ता है। यहाँ शब्द अपने सामान्य अर्थ में नहीं, बल्कि भाव की स्थिति में प्रयुक्त होते हैं। एक रंग केवल रंग नहीं रहता, वह एक मानसिक अवस्था बन जाता है। एक दृश्य केवल दृश्य नहीं रहता, वह समय का संकेत बन जाता है। इसीलिए उनकी कविता को पढ़ते हुए कई बार यह अनुभव होता है कि शब्द पीछे छूट रहे हैं, और भाव आगे बढ़ रहा है।

उनकी काव्य-दृष्टि में एक प्रकार की चित्रात्मकता है, लेकिन यह चित्र चित्रकला का नहीं, बल्कि चेतना का है। वे रंगों को ऐसे बरतते हैं जैसे कोई चित्रकार कैनवास पर रंग रखता है—बहुत सोच-समझकर, बहुत कम मात्रा में। सफ़ेद, धूसर, नीला—ये रंग उनकी कविता में बार-बार आते हैं, लेकिन प्रतीक की तरह नहीं, बल्कि स्थिति की तरह। सफ़ेद उनके यहाँ शुद्धता नहीं, बल्कि रिक्ति है; धूसर उदासी नहीं, बल्कि ठहराव है।

शमशेर की कविता में इतिहास नहीं आता, लेकिन समय हर जगह उपस्थित है। यह समय किसी घटना का समय नहीं, बल्कि अनुभव का समय है। उनके यहाँ वर्तमान, अतीत और भविष्य आपस में गड्डमड्ड नहीं होते, बल्कि एक-दूसरे के भीतर झाँकते हैं। कभी कोई पुरानी स्मृति अचानक वर्तमान में चमक उठती है, कभी वर्तमान किसी अनाम भविष्य की छाया बन जाता है।

उनकी कविता का संबंध सामाजिक यथार्थ से भी है, लेकिन यह संबंध नारे के रूप में नहीं आता। शमशेर सामाजिक कविता लिखते हुए भी निजी बने रहते हैं। वे व्यवस्था पर चोट करते हैं, लेकिन आवाज़ ऊँची नहीं करते। उनकी आलोचना तीखी है, पर उसमें कटुता नहीं है। यह आलोचना भीतर से आती है—एक ऐसी संवेदना से, जो अन्याय को चुपचाप पहचान लेती है।

शमशेर के यहाँ आत्मसंघर्ष बहुत गहरा है। उनकी कविता आत्मा की उस स्थिति से जन्म लेती है, जहाँ मनुष्य अपने ही भीतर प्रश्न बन जाता है। यह प्रश्न कभी सीधे नहीं पूछे जाते, वे बस उपस्थित रहते हैं—जैसे कमरे में रखी कोई कुर्सी, जिस पर बैठा नहीं गया, लेकिन जिसकी उपस्थिति लगातार महसूस होती रहती है। यह उपस्थिति ही शमशेर की कविता की गहराई है।

उनकी भाषा में एक प्रकार की निस्संगता है। वे भाव को पकड़ते हैं, लेकिन उससे चिपकते नहीं। यह दूरी उन्हें भावुकता से बचाती है और कविता को संयम देती है। इसीलिए शमशेर की कविता पढ़ते हुए पाठक को भाव का बोझ नहीं, बल्कि भाव की शुद्धता महसूस होती है। यह शुद्धता किसी धार्मिक अर्थ में नहीं, बल्कि अनुभव की साफ़गोई में है।

शमशेर बहादुर सिंह की समालोचना करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वे किसी परंपरा के अनुयायी नहीं हैं, लेकिन परंपरा से कटे हुए भी नहीं हैं। उनकी कविता में शास्त्रीयता का अनुशासन है, आधुनिकता की संवेदना है, और निजी अनुभव की ईमानदारी है। वे न तो प्रयोग के लिए प्रयोग करते हैं, न परंपरा के नाम पर जड़ता स्वीकार करते हैं।

उनकी कविता का सबसे बड़ा गुण शायद यही है कि वह पाठक से कुछ माँगती नहीं। वह न सहानुभूति चाहती है, न प्रशंसा। वह बस पढ़े जाने के लिए उपस्थित होती है। अगर पाठक तैयार है, तो कविता खुल जाती है; अगर नहीं, तो वह चुपचाप अपनी जगह बनी रहती है। यह चुप्पी ही शमशेर की कविता की सबसे बड़ी शक्ति है।

शमशेर की काव्य-दृष्टि में स्त्री भी आती है, लेकिन वह देह या कल्पना का विषय नहीं बनती। वह एक संवेदनशील उपस्थिति के रूप में आती है—कभी स्मृति में, कभी दृष्टि में, कभी किसी रंग की तरह। यहाँ भी वही संयम है, वही दूरी, वही आदर। प्रेम यहाँ अधिकार नहीं, अनुभव है।

उनकी कविता पढ़ते हुए बार-बार यह महसूस होता है कि वे शब्दों से अधिक मौन के कवि हैं। उनके यहाँ मौन खालीपन नहीं है, बल्कि अर्थ से भरा हुआ है। यह मौन पाठक को अपने भीतर झाँकने का अवसर देता है। शायद इसीलिए शमशेर की कविता हर बार नए अर्थ खोलती है—क्योंकि पाठक स्वयं बदल चुका होता है।

शमशेर बहादुर सिंह की कविता किसी आंदोलन की घोषणा नहीं करती, लेकिन वह चेतना में हलचल पैदा करती है। वह किसी विचारधारा का प्रचार नहीं करती, लेकिन सोचने की जगह बनाती है। यह कविता का वह रूप है, जो अपने प्रभाव के लिए शोर नहीं करता, बल्कि धीमे-धीमे भीतर काम करता है।

उनकी काव्य-यात्रा को अगर एक वाक्य में समझना हो, तो कहा जा सकता है कि यह यात्रा शब्द से शुरू होकर मौन तक जाती है। यह मौन अंत नहीं है, बल्कि अर्थ का विस्तार है। शमशेर की कविता यहीं आकर टिकती है—जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं, और अनुभव शुरू होता है।

इस अर्थ में शमशेर बहादुर सिंह केवल कवि नहीं हैं, वे कविता की एक संवेदनात्मक संभावना हैं। उनकी कविता हमें यह सिखाती नहीं कि क्या सोचना चाहिए, बल्कि यह दिखाती है कि किस तरह महसूस किया जा सकता है। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है—कि वे कविता को फिर से अनुभूति का क्षेत्र बना देते हैं, न कि केवल अभिव्यक्ति का।

शमशेर की कविता का संसार छोटा है, सीमित है, लेकिन उसी सीमित संसार में अनंत की झलक मिलती है। यह अनंत विस्तार में नहीं, गहराई में है। उनकी कविता उसी गहराई की ओर ले जाती है—जहाँ शब्द कम हैं, लेकिन अर्थ असीम।

।। दो ।।

शमशेर बहादुर सिंह की कविता को उदाहरण सहित समझाना दरअसल कविता की व्याख्या करना नहीं, कविता के भीतर प्रवेश करना है। क्योंकि शमशेर की कविता अर्थ का उद्घाटन नहीं करती, वह अर्थ को संकेत में छोड़ देती है। पाठक को उस संकेत के साथ रहना पड़ता है—जैसे किसी चित्र के सामने खड़े होकर, बिना यह पूछे कि इसका मतलब क्या है।

उनकी प्रसिद्ध कविता की एक पंक्ति है—

“श्वेत और नीला—
एकान्त में रखे फूल जैसे”

पहली नज़र में यह पंक्ति किसी ठोस कथ्य का प्रस्ताव नहीं करती। न यहाँ कोई घटना है, न भाव का स्पष्ट उद्घोष। लेकिन यहीं शमशेर की कविता का मूल सौंदर्य है। “श्वेत और नीला” यहाँ रंग नहीं रह जाते, वे स्थिति बन जाते हैं। श्वेत—रिक्ति का संकेत है; नीला—गहराई और दूरी का। और “एकान्त में रखे फूल”—यह उपमा फूल की नहीं, बल्कि अलग-थलग पड़े सौंदर्य की है। यहाँ फूल खिलने के लिए नहीं, देखे जाने के लिए भी नहीं—वे बस रखे गए हैं। यह ‘रखे होना’ आधुनिक मनुष्य की स्थिति का अत्यंत सूक्ष्म रूपक है।

शमशेर की कविता में सौंदर्य कभी उल्लास नहीं बनता, वह हमेशा थोड़ा-सा उदास, थोड़ा-सा अलग-थलग रहता है। जैसे उनकी एक और पंक्ति—

“उदास रंगों की एक चुप-सी शाम”

यहाँ “उदास” कोई भाव नहीं, बल्कि रंग का गुण बन गया है। रंग जो सामान्यतः दृश्यात्मक होते हैं, शमशेर के यहाँ भावात्मक हो जाते हैं। यह कविता देखने से अधिक महसूस करने की प्रक्रिया है। “चुप-सी शाम” कहना, शाम को मानवीय बनाना नहीं, बल्कि मनुष्य को शाम की तरह बना देना है—धीमा, ठहरा हुआ, भीतर की ओर मुड़ा हुआ।

उनकी कविता में प्रेम भी इसी तरह आता है। उदाहरण के लिए—

“तुम्हारी आँखों में
एक अधूरी रोशनी है”

यह प्रेम का वाक्य है, लेकिन इसमें न आग्रह है, न अधिकार, न वासना। “अधूरी रोशनी” कहना, प्रेम को पूर्णता से मुक्त कर देना है। शमशेर के यहाँ प्रेम कभी पूरा नहीं होता—वह हमेशा संभावना में रहता है। यही कारण है कि उनकी कविता में प्रेम स्थायी है, क्योंकि पूर्णता अक्सर समाप्ति बन जाती है।

शमशेर की भाषा पर ध्यान दें तो पाएँगे कि वे क्रियाओं से अधिक संज्ञाओं और विशेषणों पर भरोसा करते हैं। क्रिया गति देती है, जबकि संज्ञा ठहराव। शमशेर का काव्य-संसार गति का नहीं, ठहराव का संसार है। जैसे—

“एक बहुत हल्की-सी पीड़ा
हवा में तैरती हुई”

यहाँ पीड़ा कोई घटना नहीं, वह हवा में तैर रही है। न वह किसी व्यक्ति से जुड़ी है, न किसी कारण से। यह पीड़ा अस्तित्व की अवस्था है। आधुनिक मनुष्य की वह पीड़ा, जो किसी विशेष दुःख से नहीं, बल्कि होने मात्र से उपजती है।

शमशेर की कविता में सामाजिक यथार्थ भी इसी सूक्ष्मता से आता है। वे व्यवस्था पर सीधे प्रहार नहीं करते, बल्कि उसके परिणामों को पकड़ते हैं। एक पंक्ति देखें—

“कुछ चेहरे
जो बहुत थके हुए हैं
और बहुत शांत”

यह थकान शारीरिक नहीं, ऐतिहासिक है। यह वह थकान है जो लगातार समझौते करते हुए पैदा होती है। “बहुत शांत” कहना यहाँ सकारात्मक नहीं, बल्कि डरावना है—यह वह शांति है जो विरोध के समाप्त हो जाने के बाद आती है।

शमशेर की कविता को अद्वितीय बनाता है उसका मौन का प्रयोग। कई बार लगता है कि कविता वहीं समाप्त हो गई, जहाँ वह शुरू हो सकती थी। लेकिन यही अधूरापन उसकी पूर्णता है। वे पाठक को अर्थ नहीं देते, वे पाठक को अर्थ के सामने खड़ा कर देते हैं।

उनकी कविता पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि शब्द पीछे हट रहे हैं और संवेदना आगे आ रही है। यह कविता बोलती नहीं, वह सुनती है। वह पाठक से यह नहीं कहती कि “देखो, मैंने क्या कहा”, बल्कि यह पूछती है—“तुम क्या महसूस कर रहे हो?”

यही कारण है कि शमशेर बहादुर सिंह की कविता हर पाठक के लिए अलग खुलती है, और हर बार नया अर्थ रचती है। उनकी कविता का सत्य किसी निष्कर्ष में नहीं, बल्कि उस अनिश्चितता में है, जिसे वे पूरी ईमानदारी से स्वीकार करते हैं।

इस अर्थ में शमशेर की कविता हिंदी कविता की परंपरा में एक विलक्षण उपस्थिति है—जहाँ कविता कथन नहीं, संवेदनात्मक अनुभव बन जाती है; जहाँ शब्द अंतिम नहीं, बल्कि आरंभ होते हैं; और जहाँ मौन, सबसे अर्थपूर्ण भाषा बन जाता है।

शमशेर की कविता को आगे पढ़ते हुए पता चलता है कि वे शब्दों से अधिक दृष्टि के कवि हैं। उनकी कविता आँख से शुरू होती है, लेकिन आँख पर समाप्त नहीं होती—वह भीतर कहीं जाकर ठहरती है। इसलिए उनकी कविता में दृश्य बहुत हैं, पर दृश्यात्मकता नहीं; रंग हैं पर चित्रमय सजावट नहीं। यह एक ऐसा सौंदर्य है जो अपने ही भार से झुका हुआ है।

जैसे उनकी एक पंक्ति—

“एक पतली-सी रेखा
जो तुम्हें मुझसे अलग करती है”

यह रेखा कोई भौतिक सीमा नहीं है। यह वह अंतराल है जो दो मनुष्यों के बीच हमेशा बना रहता है—चाहे वे कितने ही निकट क्यों न हों। शमशेर इस अंतराल को मिटाने की कोशिश नहीं करते, बल्कि उसे स्वीकार करते हैं। उनकी कविता संबंधों को आदर्श नहीं बनाती; वह उन्हें उनकी नाजुकता में पहचानती है।

यह नाजुकता शमशेर की कविता का केंद्रीय गुण है। वे ऊँचे स्वर में नहीं बोलते, क्योंकि ऊँचा स्वर अक्सर असुरक्षा का संकेत होता है। शमशेर का स्वर धीमा है, लगभग फुसफुसाता हुआ। लेकिन यही धीमापन उनकी कविता को टिकाऊ बनाता है। शोर समाप्त हो जाता है, फुसफुसाहट भीतर रह जाती है।

उनकी कविता में समय भी एक विशेष तरह से उपस्थित है। वह न अतीत बनकर आता है, न भविष्य बनकर—वह ठहरे हुए वर्तमान की तरह आता है। जैसे—

“यह क्षण
कुछ देर और रह जाए”

यह प्रार्थना नहीं है, यह आग्रह भी नहीं है—यह केवल एक इच्छा है, जो जानती है कि पूरी नहीं होगी। शमशेर की कविता इच्छाओं को पूरा नहीं करती, वह उन्हें ईमानदारी से व्यक्त करती है। और शायद इसी कारण उनकी कविता में छल नहीं है।

शमशेर की राजनीतिक चेतना भी इसी मौन के रास्ते आती है। वे नारे नहीं देते, घोषणाएँ नहीं करते। वे बस यह दिखा देते हैं कि मनुष्य किस तरह धीरे-धीरे अपने भीतर से खाली होता जा रहा है। एक पंक्ति देखें—

“कमरे में सब कुछ है
सिवाय मेरे”

यह पंक्ति आधुनिक सभ्यता की सबसे तीखी आलोचना है। यहाँ ‘मैं’ का न होना, वस्तुओं की अधिकता के सामने मनुष्य की अनुपस्थिति को रेखांकित करता है। यह कविता चिल्लाकर व्यवस्था को दोषी नहीं ठहराती बल्कि व्यवस्था के भीतर पैदा हुई रिक्तता को उजागर करती है।
शमशेर की कविता में प्रकृति भी इसी तरह आती है—न रोमांटिक, न भव्य। उनकी प्रकृति मानवीय दुख से अलग नहीं है। फूल, हवा, शाम, रंग—सब मानो मनुष्य की भावनाओं के विस्तार हों। प्रकृति यहाँ आश्रय नहीं, बल्कि सहभागी है।

उनकी भाषा में विदेशी शब्दों का आना भी इसी संवेदनात्मक ईमानदारी का हिस्सा है। वे भाषा को शुद्ध रखने के आग्रह में अनुभव को अशुद्ध नहीं करते। यदि किसी क्षण की अनुभूति अंग्रेज़ी शब्द माँगती है, तो वह शब्द आ जाता है। शमशेर के यहाँ भाषा कोई धर्म नहीं, बल्कि अनुभव का माध्यम है।

शमशेर की कविता का पाठ करते हुए बार-बार लगता है कि यह कविता समाप्त नहीं हो रही, बस धीरे-धीरे ओझल हो रही है—जैसे कोई रंग अँधेरे में घुल जाए। और जब कविता समाप्त होती है, तब भी वह भीतर कहीं चलती रहती है।

यही शमशेर बहादुर सिंह की कविता की अद्वितीयता है। वह पाठक को प्रभावित नहीं करती, वह उसे परिवर्तित भी नहीं करती—वह बस उसके भीतर एक ऐसी जगह बना देती है, जहाँ थोड़ी देर के लिए शोर रुक जाता है। और उस मौन में, पाठक अपने ही अस्तित्व को सुनने लगता है।

शमशेर की कविता का यही सबसे बड़ा सत्य है—कि वह कुछ कहकर नहीं बल्कि कुछ छोड़कर पूरी होती है।


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