मंदिर के द्वार बंद हों तो नानक बनिए, आश्रम रोके तो मीरा

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र्म यदि मनुष्य को छोटा करे, तो समझ लीजिए कि वह धर्म नहीं रहा—केवल सत्ता और डर का उपकरण बन गया है। भारतीय भक्ति परंपरा का इतिहास ऐसे ही क्षणों से भरा है, जब किसी संत, कवि या सत्याग्रही को मंदिर या आश्रम के द्वार पर रोका गया, और उसी निषेध से एक बड़ा आध्यात्मिक उद्घोष जन्म ले बैठा।

मीराबाई की एक प्रसिद्ध कथा इसी सत्य को रेखांकित करती है। कहा जाता है कि मीरा एक बार मथुरा पहुँचीं और वहाँ एक संन्यासी के दर्शन के लिए उसके आश्रम गईं। आश्रम के द्वार पर ही उन्हें रोक दिया गया—कारण बताया गया कि संन्यासी स्त्रियों से नहीं मिलते। यह सुनकर मीरा ने जो कहा, वह केवल व्यक्तिगत प्रतिवाद नहीं था, बल्कि पूरे पितृसत्तात्मक धार्मिक ढाँचे पर एक तीखा प्रश्न था। मीरा का आशय स्पष्ट था—व्रजभूमि में यदि कोई ‘पुरुष’ है, तो वह केवल कृष्ण हैं; शेष सब देह के भ्रम हैं। मीरा ने संन्यासी को यह स्मरण कराया कि आध्यात्मिक चेतना देह, लिंग और बाहरी पहचान से परे होती है।

हों तो जाणती हती के व्रज में पुरुष छे एक।

व्रज में रही तमे पुरुष रह्या, भलो तुमारो विवेक।

भक्ति आंदोलन ने अपनी भाषा खुद गढ़ी जिसे लोकभाषा में व्यक्त किया।

ऐसी ही घटना गुरु नानक देव के साथ घटित हुई। अपनी लंबी यात्राओं के क्रम में जब वे अपने साथी मरदाना के साथ पुरी पहुँचे, तो उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। कारण वही—परंपरा, पहचान और शुद्धता की संकीर्ण व्याख्या। नानक ने कोई विवाद नहीं किया। वे मंदिर की सीढ़ियों पर ही बैठ गए और एक ऐसा पद रच डाला, जो आगे चलकर सिख परंपरा की रात्रि-वाणी बन गया। उस पद में नानक ने कहा कि ईश्वर के हज़ारों रूप हैं, फिर भी वह निराकार है; वही ज्योति सबके भीतर चमक रही है। इस तरह मंदिर के द्वार बंद होने से एक और मंदिर खुल गया—मानव हृदय का।

सहस तव नैन नन नैन हहि तोहि
कउ सहस मूरति नना एक तोही॥
सभ महि जोति जोति है सोइ ॥
तिसदै चानणि सभमहि चानणु होइ॥

बीसवीं सदी में यही संघर्ष सामाजिक न्याय के रूप में सामने आया। मंदिर-प्रवेश आंदोलनों के दौरान सत्याग्रहियों पर अमानवीय अत्याचार हुए। जन्मना श्रेष्ठता के भ्रम में फँसे कुछ वर्गों ने हिंसा को धर्म का रक्षक मान लिया। गांधीजी भी इस हिंसा के शिकार हुए।

वैद्यनाथ धाम में हरिजनों के मंदिर प्रवेश के दौरान गांधीजी को भी “अछूत” कहकर रोका गया—क्योंकि वे अछूतों के साथ थे। पण्डों ने उन पर पत्थर फेंके गए। इस घटना से नेहरू इतने क्रुद्ध हो गए कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि मैँ जिंदगी में कभी वैद्यनाथ धाम नहीं जाऊंगा।

गांधीजी मंदिर जाने वालों में नहीं थे, पर अन्याय के विरुद्ध खड़े होने में संकोच नहीं करते थे। वे कहते थे—मैं मंदिर जाने वाला व्यक्ति नहीं हूँ, लेकिन यदि किसी को रोका जाएगा, तो मैं उस रोक का उल्लंघन करूँगा, चाहे मेरे प्राण क्यों न चले जाएँ।

गांधीजी ने इस हटना के बावजूद अहिंसा और धैर्य का मार्ग नहीं छोड़ा। उनका विश्वास था कि अन्याय जितना बढ़ेगा मेरा नैतिक बल उतना ही मजबूत होगा।

इसी क्रम में विनोबा भावे का उदाहरण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जब उन्होंने मंदिर-प्रवेश के लिए शांतिपूर्ण प्रयास किया, तो उन पर हिंसक हमला हुआ।हिंसक हमले में उनके कान को हमेशा के लिए क्षतिग्रस्त कर दिया, लेकिन विनोबा का उत्तर और भी गहरा—उन्होंने आक्रमणकारियों के लिए दंड नहीं, क्षमा की बात की। यह क्षमा कायरता नहीं थी, बल्कि उस नैतिक ऊँचाई का प्रमाण थी, जहाँ से हिंसा अपने आप छोटी दिखने लगती है।

इतिहास गवाह है कि मंदिरों ने कई बार उन्हीं लोगों को रोका, जिन्होंने समाज को सबसे अधिक दिया। सुधारक, कवि, दार्शनिक—सब किसी न किसी समय ‘अयोग्य’ ठहरा दिए गए। लेकिन समय ने निर्णय किया कि स्मरण किनका रहेगा—द्वार बंद करने वालों का या उन लोगों का, जिन्होंने बंद द्वारों के सामने खड़े होकर मनुष्य को बड़ा बनाया।

इसलिए यदि कभी मंदिर के द्वार बंद मिलें, तो निराश मत होइए। नामक, मीराबाई ,महात्मा गांधी और विनोबा की तरह एक नया उद्घोष कीजिए।


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