महात्मा गांधी : एक ‘उपन्यासकार’ जिसने आधुनिक भारत का आविष्कार किया

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Mahatma Gandhi

क्सर हम महात्मा गांधी को एक राजनेता, समाज सुधारक या दार्शनिक के रूप में देखते हैं। लेकिन प्रसिद्ध लेखक और आलोचक अमित चौधरी ने गांधीजी की आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ (त्रिदीप सुहृद द्वारा संपादित संस्करण) की समीक्षा करते हुए एक अत्यंत मौलिक स्थापना दी है। वे गांधीजी को एक ‘उपन्यासकार’ के रूप में देखते हैं।

अमित चौधरी का मानना है कि गांधी, नेहरू और अंबेडकर भारत के सबसे महान ‘उपन्यासकार’ की तरह हैं। यहाँ उपन्यासकार का अर्थ काल्पनिक कथा लिखना नहीं, बल्कि एक ऐसी दुनिया का ‘सृजन’ करना है जिसके अर्थ हम आज भी तलाश रहे हैं। गांधी का गद्य (Prose) किसी भव्य उत्सव की तरह नहीं, बल्कि ‘छर्रों’ (Shrapnel) की तरह छोटे और सटीक वाक्यों में निकलता था, जो सीधे पाठक के अंतर्मन पर प्रहार करता है।

​उपन्यासकार के रूप में गांधीजी

हम अंबेडकर और नेहरू पर कभी अलग से चर्चा करेंगे। यहां हम गांधीजी को एक उपन्यासकार के रूप में देखें तो इसका क्या अर्थ है?

​अमित चौधरी के अनुसार, एक उपन्यासकार वह होता है जो हमें हमारी ही दुनिया वापस लौटा देता है, लेकिन एक बिल्कुल नए नजरिए के साथ। उपन्यास की जिल्द के बीच में जो देखते है वो बाहर नहीं है। इसलिए वह एक कल्पना लोक का सृजन करके हमको हमारी दुनिया वापस कर देता है।

उपन्यासकार यथार्थ (Reality) से सामग्री उठाता है, उसे अपनी दृष्टि से गढ़ता है और फिर सृजन (Creation) के माध्यम से एक ऐसा संसार खड़ा करता है जिसे हम पहचानते तो हैं, पर उसका वह अर्थ पहले कभी नहीं समझा होता। यही लेखक की ‘उदारता’ है।

​गांधीजी ने भी ठीक यही किया। उन्होंने भारत के बिखरे हुए यथार्थ को देखा, उसे अपनी कल्पना और नैतिकता के सांचे में ढाला और हमें ‘भारत’ नाम का एक ऐसा उपन्यास लिखकर दिया जिसमें हम सब रहना तो चाहते हैं, पर वह यथार्थ नहीं है या जिसे हम उसे यथार्थ नहीं कर पाए।

​एक ‘मौलिक भारतीयता’ का आविष्कार

अमित ​चौधरी का तर्क है कि गांधी ने जिस ‘भारतीयता’ को प्रस्तुत किया, वह कोई 5000 साल पुरानी निरंतरता नहीं थी। वह विशुद्ध रूप में एक ‘गांधियन आधुनिकता’ थी।
​यह भारतीयता न तो भगवान बुद्ध के पास थी, न भगवान महावीर के पास। उसे न तो सम्राट अशोक ने निर्मित किया था और न ही अकबर ने। ​गांधीजी ने इस भारतीयता को गढ़ा, इसका पुनः आविष्कार किया और हम एक ‘भ्रम’ या ‘छलावा’ में आ गए कि यह मूल्य हमारी प्राचीन परंपरा का हिस्सा हैं। हम यह विश्वास करने लगे कि गांधीजी जिस सत्य, अहिंसा और समावेशी भारतीयता की बात कर रहे हैं, वह सदियों पुरानी है, जबकि वास्तव में वह गांधीजी की अपनी मौलिक रचना थी।

​यथार्थ और कल्पना का सेतु

हम जानते हैं कि ​उपन्यास की जिल्दों के भीतर जो संसार होता है, वह हूबहू बाहर की दुनिया जैसा नहीं होता। गांधीजी का भारत भी एक ऐसा ही ‘कल्पनालोक’ (Utopia) था। उन्होंने एक ऐसे राष्ट्र की रूपरेखा तैयार की जो हमारे सपनों में तो बसता है, लेकिन जिसे पूरी तरह यथार्थ के धरातल पर उतार पाना आज भी हमारे लिए एक चुनौती बना हुआ है।

गांधी की महानता इसमें नहीं थी कि उन्होंने इतिहास को दोहराया, बल्कि इसमें थी कि उन्होंने एक नए इतिहास और एक नई भारतीय पहचान का ‘सृजन’ किया। अमित चौधरी का यह नजरिया गांधीजी को केवल एक ऐतिहासिक पुरुष न मानकर, एक महान सृजक के रूप में देखने और सोचने का विचार प्रस्तुत करता है, जिसने आधुनिक भारत की आत्मा की पटकथा लिखी।


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