डॉ राममनोहर लोहिया रचनाकारों की नजर में – डॉ अवधेश कुमार राय

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डॉ राममनोहर लोहिया रचनाकारों की नजर में

Dr. Awadhesh Kumar Rai

ई टी एम विश्वविद्यालय, ग्वालियर द्वारा ‘डॉ राम मनोहर लोहिया रचनाकारों की नजर में ‘ पुस्तक दो खंडों में प्रकाशित की गई है। आई टी एम विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलाधिपति श्री रमाशंकर जी एक प्रतिबद्ध समाजवादी हैं, जो 60 के दशक से ही समाजवादी आंदोलन से गहरे रूप से जुड़े रहें हैं और आज भी इस आंदोलन को गति देने का काम कर रहें है। वे गांधी और लोहिया दर्शन के गंभीर अध्येता है और लोहिया साहित्य व समाजवादी विचारधारा को जन- जन तक पहुंचाने के लिए कृत संकल्प हैं। आई टी एम विश्वविद्यालय लगातार लोहिया साहित्य को प्रकाशित कर रहा है , यह पुस्तक इसी क्रम में है।

लोहिया एक मौलिक समाजवादी थे, उनका समाजवादी चिंतन विश्व मानवता के लिए एक अमूल्य देन है । उनके चिंतन में विश्व संसद और विश्व नागरिकता की परिकल्पना है। वे एक देश से दूसरे देश में जाने के लिए

पासपोर्ट की अनिवार्यता को खत्म करना चाहते थे। लोहिया का चिंतन किसी देशकाल की सीमा से बंधा नहीं है,वह सार्वभौमिक है और विश्व की हर तरह की असमानता और गैरबराबरी के विरुद्ध है । लोहिया के समाजवादी चिंतन का प्रभाव भारतीय भाषाओं के रचनाकारों पर भी पड़ा और वे इससे प्रभावित होकर साहित्य सृजन भी किये। यह पुस्तक इन्हीं रचनाकारों की दृष्टि में लोहिया के सामाजिक, राजनीतिक ,आर्थिक और मानवतावादी प्रदेय को समझने में मदद करती है। ये रचनाकार , राजनेता और विद्वान लगभग सभी भारतीय भाषाओं के हैं। इन रचनाधर्मियों ने लोहिया के व्यक्तिव, चिंतन और दर्शन को अपने तरह से व्याख्यायित किया है, इनमें आचार्य धर्माधिकारी, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, धर्मवीर भारती, श्री कांत वर्मा, यू आर अनंत मूर्ति, नरेश सक्सेना, ,शिवप्रसाद सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, बालकवि वैरागी, इं नारायण, जैड ए अहमद, ए वासुदेवन, सत्यव्रत सेन, ब्रह्मा नंद , नेविल मैक्सवेल, राजेंद्र पूरी,, निर्मल कुमार बोस, उमा उमाकांत मालवीय, इंदुमति केलकर, गणेश मंत्री,, सुर्यनारायण व्यास , ओंकार शरद,,प्रदीप कुमार तिवारी, पु , अल देशपांडे, , रघुवीर सहाय,,

रमेशचंद शाह, के एस कारत , नंद चतुर्वेदी,, प्रयाग शुक्ल, नंद किशोर आचार्य,मकबूल फ़िदा हुसैनआदि का समावेश है। इसके अलावा राज नेताओं में रामानंदन मिश्र, , नीलम संजीव रेड्डी, कृष्ण नाथ, ओमप्रकाश दीपक,(पत्रकार), राजनारायण, मधु लिमए, चंपा लिमए, रमा मित्र, राज किशोर , सुरेंद्र मोहन, कमला देवी चटोपाध्याय,, ए वासुदेवन, गोपाल कृष्ण, ऊषा मेहता, रोहित दवे , सुगत दास गुप्ता जैसे अनेक नाम हैं । पुस्तक लोहिया के विराट व्यक्तित्व और उनकी वैचारिकी के कई अनछुए पहलुओं से अवगत कराती है।

पुस्तक का पहला लेख आचार्य दादा धर्माधिकारी का है। वे कहते है,’ डॉ लोहिया को अपना मित्र मानने में स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता हूँ’ —– किसी भी प्रश्न को विचार करने की उनकी अपनी एक अलग ही मौलिक पद्धति थी ——हमारे देश में राजनीति के क्षेत्र में जो लोग हैं उनमें लोहिया का नाम पहली कतार में माना जा सकता है।” महादेवी वर्मा लोहिया को याद करते हुए कहती हैं – ‘लोहिया का स्मृत्यार्चन मनुष्य मात्र का अर्चन -पूजन है।’
राष्ट्र कवि दिनकर उन्हें आजीवन विस्फ़ोटक व्यक्तित्व

का व्यक्ति मानते थे। वे कहते है कि वे निश्चल आदर्शवादी थे और गरीबी के साथ किसी भी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं थे। वे उन्हें संसद में हिंदी के बड़े प्रवक्ता मानते थे। वे कहते है, ‘टंडन जी के बाद संसद में वे हिंदी के बड़े योद्धा थे।’

धर्मवीर भारती जी का कथन है – ‘अंग्रेजी अखबारों ने लोहिया के साथ जितना अन्याय किया है, जितना गंदा शरारतपूर्ण प्रचार करके उनकी गलत तस्वीर देश की पढ़ी -लिखी जनता के सामने उभारने की कोशिश की है, उसकी मिसाल मिलनी मुश्किल है।’ वे कहते है, ‘उनकी समता का दर्शन पूरी भारतीय मनीषा के शुभ्र उत्तराधिकारी की आधुनिक व्याख्या थी ।नेहरू ने भारत की खोज की थी , डॉ लोहिया भारत से एकाकार थे। यही दोनों में अंतर था।’

श्रीकांत वर्मा लोहिया को महान इतिहास परिवर्तक मानते थे। वे कहते हैं- ‘डॉ लोहिया उन योद्धाओं में से थे, जिन्होंने इतिहास बदलने के लिए राजनीति का इस्तेमाल करते हुए भी राजनीति की शर्तों से पूरी तरह घृणा की।’ वे मानते है कि उनके प्रखर रूप के पीछे मनुष्य की प्रतिष्ठा बोलती थी।

रघुवीर सहाय का मत है कि लोहिया ने आम आदमी में प्रश्न पूछने का माद्दा पैदा की,यथार्थ की एक नई समझ पैदा की और हिंदुस्तान की जिंदगी को एक नए ढंग से बनाने के समझ पैदा की । वे कहते है, ‘गांधी के बाद लोहिया ने जितना हिंदुस्तान को देखा, उसके आदमी और इतिहास को देखा, उसकी भाषा को, उसके समाज को पहचाना और दूसरों को बताया, उतना किसी अन्य राजनीतिज्ञ ने नहीं बताया।’

प्रसिद्ध कन्नड़ लेखक और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता यू. आर. अनंतमूर्ति लोहिया के विचारों के अन्नय प्रशंसक रहे है। वे कहते है, ”डॉ राम मनोहर लोहिया मेरी दृष्टि में एक असाधारण चिंतक और साहसी समाजवादी जन नेता थे। मै उनका विद्यार्थी जीवन से ही प्रशंसक रहा हूँ।’

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने उनकी मृत्यु के बाद उनकी शव यात्रा का वृतांत ‘दिनमान ‘ में प्रकाशित की थी। उस रिपोर्ट में वे जयप्रकाश जी को उद्धरित करते है कि भराए गले से वे कहते है, राम मनोहर मुझसे आठ वर्ष

छोटे थे-उचित तो यह था कि वे मेरे जगह पर होते और मि उनकी जगह पर होता; लेकिन परमात्मा को यह मंजूर नहीं था।——- ऐसा बलिदानी जीवन किसी ही किसी को मयस्सर होता है। उन्होंने समाजवादी आंदोलन को बल दिया, आंधी दी। उन्होंने भारत में समाजवादी आंदोलन को प्रतिष्ठित किया।’

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी उनकों श्रद्धांजलि देते हुए कहते है-
मै साधारण—–
मुझे नहीं दिखती कोई राह और
जिधर वह गया है
उधर उसके नाम पर
एक चिंगारी और।

लोहिया की जीवनीकार श्रीमती इंदुकेलकर, लोहिया को समाजवाद का सगुण- साकार रूप मानती हैं।

कौशलेंद्र प्रपन्न लोहिया की भाषा नीति को स्पष्ट करते है और कहते है कि लोहिया ऐसी भाषा के पक्षधर है जिसमें आम जनता बातचीत करती, सोचती – विचारती है। उनका मानना है- ‘जब तक अंग्रेजी को हटाया नहीं जाता, तब तक हिंदुस्तान में भाषाई गुलामी बनी रहेगी।

रमेश चंद शाह अपने लेख ‘भारतीय पुराख्यान और लोहिया:एक नई शुरुआत ‘ में कहते है कि राजनीतिक कर्मज्ञों और बुद्धजीवियों के बीच डॉ लोहिया का व्यक्तित्व और कृतित्व कई मायनों में अभूतपूर्व और अभूतपश्चात कहा जाएगा। वे लोहिया के हवाले से कहते है, ‘राम , कृष्ण और शिव हिंदुस्तान के उन तीन चीजों में है- मै उन्हें आदमी कहूँ या देवता, इसके खास मतलब नहीं होंगे-जिनका असर हिंदुस्तान के दिमाग पर ऐतिहासिक लोगों से ज्यादा है।’

प्रयाग शुक्ल मानते है लोहिया के चिंतन का प्रभाव पूरे देश के साहित्यकारों, कला प्रेमी और राजनीतिज्ञों पर है। वे कहते है यह प्रभाव केवल हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं है बल्कि यू आर अनंतमूर्ति, वीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य, लंकेश आदि पर भी है। वे कल्पना, दिनमान, जन मैनकाइंड जैसे पत्रिकाओं पर उनके प्रभाव को भी रेखांकित करते है और कहते ही कि धर्मवीर भारती, अज्ञेय ,रघुवीर सहाय, रेणु, लक्ष्मीकांत वर्मा, विजयदेव नारायण साही, श्रीकांत वर्मा , ओमप्रकाश दीपक, राम स्वरूप चतुर्वेदी, गिरिधर राठी ,सर्वेश्वर, कृष्णनाथ, किसन पटनायक ,नंद चतुर्वेदी ,कमलेश आदि अनेक रचनाकार उनके न रहने पर भी उनकी विचारधारा को बल देते रहें । उनके चिंतन में कला, साहित्य , संस्कृति और लोक, राजनीति सभी का समावेश है।

आचार्य नन्द किशोरआचार्य अपने लेख ,’डॉ लोहिया और हिंदी साहित्य’ में कहते है कि उस दौर का रचनाकार भारतीय विचारकों में सर्वाधिक सामीप्य लोहिया से पाता है । एक बड़ा युवा वर्ग लोहिया के वैयक्तिक और वैचारिक संपर्क में रहा, जिसमे वे खुद को भी शामिल करते है। वे कहते हैं -लोहिया के लिए समता और स्वतन्त्रता दो केंद्रीय मूल्य हँ – बल्कि उनकी दृष्टि में वे एक सिक्के के दो पहलू हैं ,जैसे गांधी के लिए सत्य और अहिंसा ।’ आचार्य जी का स्पष्ट मत है कि डॉ लोहिया ने योनि और वर्ण के आधार पर होने वाले अन्याय का हमेशा विरोध किया। यदि हिदी में दलित विमर्श और स्त्री विमर्श को सहज स्वीकृति मिली तो इसमें लोहिया द्वारा निर्मित समझ के महत्व की अनदेखी नहीं की जा सकती है।

राजकिशोर मानते है कि लोहिया का समाजवाद पूरी तरफ भारतीय मन की उपज है यह भी सही है कि उनकी समाजवादी दृष्टि के विकास में मार्क्स और अन्य समाजवादी धारा का प्रभाव रहा होगा। उनके समाजवाद में लोकतंत्र और अहिंसा दोनों का समावेश है। सत्याग्रह के जगह पर वे सिविल नाफरमानी की बात करते हैं।

नन्द चतुर्वेदी, लोहिया के 23 जून,1962 को नैनीताल में दिये गये भाषण ‘निराशा के कर्तव्य’ को उद्धरित करते हैं और कहते हैं कि लोहिया इस भाषण में उस निराशा के विश्वव्यापी परिदृश्य को देखते हैं जहाँ शोषित और शोषक देश हैं और जिन्हें समतावादी व्यवस्था बनाने का काम मिलकर करना है।

मकबूल फिदा, लोहिया को याद करते हुए कहते हैं , ‘ लोहिया एक असीम ऊर्जा के धनी नायक थे, उनका व्यक्तिव विशाल था और वे दूरदृष्टि संपन्न राजनेता थे। वे कहते हैं कि एक बार उन्होंने कहा कि तुम टाटा और बिरलाओं के लिए चित्र बनाते हो, कभी -कभी साधारण लोगों के लिए भी बनाया करो। चित्रकला केवल धनी-

मानी लोगों के लिए नहीं हैं। लोहिया जी के इसी सलाह पर मैने आठ साल तक रामायण के आधार पर डेढ़ सौ चित्र कैनवास पर बनाए ।

यू आर अनंतमूर्ति कहते हैं कि राममनोहर लोहिया एवं मानवेंद्र नाथ राय मेरी दृष्टि में भारत के सर्वाधिक मौलिक चिंतक हैं।

बालकवि बैरागी लोहिया को याद करते हुए कहते हैं – हमारी धमनियों के तुम मसीहा थे, मसीहा हो सुनो! तुमको बगावत का हर एक क्षण याद करता है।

इस पुस्तक में लोहिया को याद करती हुई ओंकार शरद, बाल कृष्ण राव, उमा कांत मालवीय और प्रदीप कुमार तिवारी की भी कविताएं हैं।

‘रचनाकारों की नजर में ‘ के खंड 2 की प्रस्तावना प्रो. राज कुमार जैन ने लिखी है । प्रस्तावना में प्रो. जैन ने पूरी पुस्तक का सार प्रस्तुत कर दिया हैऔर इसके संपादन के लिए श्री रमा शंकर सिंह जी के अथक प्रयास की सराहना की है।

पुस्तक का पहला लेख समाजवादी आंदोलन के उनके साथी श्री रामानन्द मिश्र जी का है। वे कहते हैं कि ‘ राम मनोहर भारतीय राजनीतिक क्षितिक पर मौलिक विचारों का चमकता सितारा था।’

राष्ट्र कवि दिनकर , लोहिया के साथ अपने संबंधों को याद करते हुए लिखते है कि लोहिया का जीवन आजीवन विस्फोटक रहा। एनार्की में लिखी उनकी ये पक्तियां उन्हें बहुत प्रिय थी – ‘तब कहो लोहिया महान है, एक ही तो वीर यहां सीना रहा तान है।’

भूतपूर्व राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने लोहिया के चिता को जलते हुए देखकर कहा था- ‘ जो इंसान सल्तनों को भस्म करने की ताकत रखता था , आज आग ने उसे भस्म कर दिया।’ नीलम संजीव रेड्डी का यह एक वाक्य उनके सम्पूर्ण व्यक्तिव को परिभाषित कर देता है।

धर्मवीर भारती लोहिया के परम प्रशंसक थे। वे कहते है कि मैं अनेक राजनेताओं से मिला हूं जिसमे नेहरू, गोपालाचारी, सुकर्णों , शेख मुजीब , लियोपोल्ड आदि शामिल हैं, लेकिन लोहिया जैसा सहज अनुभूति कही नहीं हुई । लोहिया का व्यक्तित्व समता, स्वातंत्र्य और सौंदर्य का अद्भुत मिश्रण था।

नरेश सक्सेना, लोहिया पर लिखी कविता में लिखते है –
एक अकेला आदमी
गाता है कोरस
जिरह बस्तर पहन कर घूमता है अकेला
और बोलता है योद्धाओं की बोलियां।

कृष्णनाथ , लोहिया के अनन्य सहयोगी थे। वे लोहिया को गांधी के सिविल नाफरमानी का सबसे बड़ा पैरवीकार मानते है। ओम प्रकाश दीपक जन, मैंनकाइंड, और कल्पना के संपादक मंडल के सदस्य और सोशलिस्ट पार्टी से 1948 से ही जुड़े थे। उन्होंने लोहिया की जीवनी, ‘लोहिया एक जीवनी’ लिखी है। वे लोहिया को एक नई सभ्यता का प्रेरणास्त्रोत मानते थे। गणेश मंत्री, लोहिया की सप्त क्रांति का मीमांसा करते हैंऔर उन्हें समाजवाद के मौलिक चिंतक के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। प्रदीप कुमार तिवारी ‘किताब का एक पृष्ठ’ में कहते है कि वह अपने दर्शन, विचार की एक थाती हमारे लिए छोड़े

युगेश्वर अपने लेख ‘मार्क्स और लोहिया’ में कहते है कि मार्क्स और लोहिया दोनों की स्थितियां भिन्न हैं। मार्क्स ने भारत के बारे में पढ़ा होगा, लेकिन वे भारत आएं नहीं थे। लेकिन लोहिया ने यहां की गरीबी, गुलामी और जहालतों से संघर्ष किया था इसलिए मार्क्स दया दिखाने के स्थिति में है जबकि लोहिया के पीड़ा ,क्रोध और विद्रोह है।

प्रसिद्ध इतिहासकार राजेश्वरी प्रसाद लोहिया की ऐतिहासिक दृष्टि का विवेचन करते है। वे लोहिया की पुस्तक ‘ इतिहास चक्र’ पर विचार करते हुए कहते हैं कि वे कुछ ऐसे सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हैं जो बिल्कुल नवीन है और भविष्य का मार्ग निर्देशन भी करते हैं।

उमाकांत मालवीय अपनी कविता में कहते हैं –
जब तुम्हें मिले संदेश
उस पार दूर गांव के
तुम चल दिए
छोड़ कर आग पर
निशान पांव के।

निर्मल कुमार बोस,’ गांधी और लोहिया’ लेख में लोहिया की समाजवाद के प्रति निष्ठा की सराहना करते हैं और वे किस तरह वे अपने जान के परवाह न करते हुए गांधी जी के साथ नौआखाली के सांप्रदायिक दंगे को समाप्त करने में जुटे थे, याद करते हैं।

प्रसिद्ध साहित्यकार शिव प्रसाद सिंह लोहिया के सांस्कृतिक मानस पर विचार करते हैं। वे कहते हैं कि उनके हिंदुस्तान को सांस्कृतिक जकड़बंदी से मुक्ति दिलाने के दो मोर्चे है – शुद्र और नारी। वे इसे सीता- शंबूक धुरी भी कहते हैं। वे कहते है – शुद्र हमारी

सामाजिक स्थिति का बैरोमीटर है और नारी संपूर्ण अंतर्वैयक्तिक संबंधों का केंद्र । शूद्र की मुक्ति जाति प्रथा के ध्वंस में निहित है।’

प्रसिद्ध समाजवादी और लोहिया के सहयोगी और अनुयाई राजनरायण जी ‘लोहिया की चिंतन धारा’ की मीमांसा करते हैं और कहते हैं कि मेरा उनका संबंध कृष्ण और अर्जुन की तरह अंतिम क्षण तक बना रहा। वे लोहिया को एक प्रखर राष्ट्रवादी , समाजवादी विचारधारा का मौलिक चिंतक और राजनीति में कथनी और करनी में एकात्मकता के पैरवीकार मानते हैं।

समाजवादी आंदोलन के पुरोधा और लोहिया के अनुयाई मधुलिमये जी की पत्नी चंपा लिमए ,उन्हीं की तरह समाजवादी आंदोलन से जुड़ी रहीं। वे लोहिया जी की स्त्री मुक्ति की चिंता और अन्याय के प्रति उनके प्रतिबद्धता को रेखांकित करती हैं।

लोहिया की जीवनीकार श्रीमती इंदुमति केलकर लोहिया के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन की चर्चा करती हैं और कहती हैं कि भारत में अंग्रेजी भाषा शोषण का

महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए वे सामंती भाषा , भूषा, भवन और संस्कृति को हटाकर लोकभाषा, भूषा ,भवन, भोजन और संस्कृति की स्थापना करनी चाहिए। इसके बिना समता लाना असंभव है।

जगदीश जोशी अपने एक संस्मरण में उनके दादी के गांव उचेहरा को लेकर उनके लगाव की चर्चा करते हैं।

पु .ल देशपांडे मराठी के बड़े साहित्यकार हैं। वे अपने लेख ‘लोहिया एक रसिक तपस्वी’ में कहते है कि डॉ लोहिया ऐसे तपस्वी थे जो अकेले चल पड़े – सत्य की खोज में। अगर साथी बनकर कोई आए तो भी ठीक, न आए तो भी ठीक। गलत समय पर सच बोलने का साहस रखने वाले।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना अपनी कविता ‘लोहिया के न रहने पर’ में कहते हैं –

मै साधारण
मुझे नहीं दिखती कोई राह और
जिधर वह गया है

उधर उसके नाम पर
एक चिंगारी और।

बालकवि वैरागी लिखते हैं –

ओ बगावत की प्रबल
उद्दीप्त पीढ़ी के जनक!
हम तुम्हे कितना जिएंगे
कह नहीं सकता
*******
तुम मसीहा थे, मसीहा हो
सुनो!तुमको बगावत का
हर एक क्षण
याद करता है।

ओंकार शरद कहते हैं –

जो जुझता रहा हर क्षण
दुश्मनों और दोस्तों से;
जिसका कोई गांव नहीं
घर नहीं, वंश नहीं

घाट नहीं, श्राद्ध नहीं।

प.सूर्य नारायण व्यास कहते हैं कि राममनोहर लोहिया भारत वर्ष के सभी दृष्टि से असामान्य नेता थे। वे एक मौलिक चिंतक थे।

महान स्वतंत्रता सेनानी कमला देवी चट्टोपाध्याय कहती हैं कि वे एक मानवतावादी थे जो अपने साथियों। के प्रति गहरा प्रेम का भाव महसूस करते थे। वह कहती हैं कि उनके हिंदी के प्रति लगाव का कारण यह नहीं था कि उनकी अंग्रेजी कमजोर थी बल्कि हिंदी के प्रति लगाव उनके लिए देश के प्रति गौरव और सम्मान के बात थी।

प्रसिद्ध समाजवादी विचारक अशोक मेहता अपने लेख में लोहिया के बारे में कहते है कि वे एक अडिग विद्रोही है, जिनकी मानवीय मूल्यों के प्रति निष्ठा उतनी ही सच्ची और मजबूत है जितनी कि सच्चाई के प्रति इनकी ललक। वे एक प्रखर वक्ता और साहसी विचारक हैं और लोक से अलग चलना पसंद करते हैं।

लोहिया के सहयोगी और अनुयाई मधु लिमए, लोहिया को एक मौलिक विचारक , विशिष्ट नेता और विद्रोही नेता मानते है। उनका मानना है कि आधुनिक भारत के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। वे कहते है कि लोहिया की सप्त क्रांति, गांधी जी का सर्वोदय और जयप्रकाश जी की संपूर्ण क्रांति एक चीज के अलग – अलग नाम हैं।

कन्नड़ के महान साहित्यकार और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता यू आर अनंतमूर्ति उनकी पुस्तक ‘ गांधी मार्क्स और सोशलिज्म ‘ के अनेक उद्धरण को उद्धरित करते है – ‘ धर्म अपने अपने सबसे अच्छे रूप में करूणा और चिंतन के अनुशासन के रूप में प्रकट होता है।  लेकिन धर्म की दो अन्य अभिव्यक्तियां राजनीति और समाजवाद के लिए उदासीनता का विषय नहीं हो सकती है। ‘

भारत छोड़ो आंदोलन की नायिका और लोहिया के सहयोगिनी ऊषा मेहता कहती हैं कि उन्होंने महात्मा को सर्वोच्च सम्मान दिया और फिर भी विचार, शब्दों और कर्म में क्रांतिकारी थे। वे शायद क्रांतिकारियों में गांधीवादी और गांधीवादियों में क्रांतिकारी थे।

इस पुस्तक में रोहित दवे का लेख ‘मनुष्य -लोहिया का प्राथमिक चिंता ‘ , के एस कारंत का लेख लोहिया के यादें, सुगत दास गुप्ता का लोहिया और भारतीय बुद्धिजीवी, ब्रह्मानंद का तीसरा खेमा बनाम गुटनिरपेक्षता, सत्य सेन का मेरा मित्र, ए वासुदेवन का ‘भारतीय आर्थिक विकास पर लोहिया के विचार’, नेविल मैक्सवेल – ‘डॉ लोहिया एक संक्षिप्त संस्मरण’, भोला चटर्जी का ‘तार्किक आदमी का अकेलापन’ का समावेश है। उसके अलावा समाजवादी चिंतक सुरेंद्र मोहन का लेख राजनीतिज्ञ लोहिया – उनके विचारों के कुछ पहलू, रोमा मित्रा का निर्णायक वर्ष -1967, गोपाल कृष्ण का राममनोहर लोहिया एक प्रशंसा , ई नारायण का राम मनोहर कुछ व्यक्तिगत संस्मरण, राजेंद्र पूरी का लोहिया की दो छवियां , जेड ए अहमद का लोहिया के साथ मेरे दिन, मैनकाइंड में लिखे लोहिया के कुछ लेख, लोहिया पर पुस्तकें और लोहिया की संक्षिप्त जीवनी दी गई है।

इस पुस्तक की एक विशेषता यह भी है कि हर एक लेख के बाद लोहिया के विचारों को सुक्त वाक्य में दिया गया है जो लोहिया की वैचारिकी को समझने में बड़ा ही महत्वपूर्ण है । समग्र रूप से यह पुस्तक लोहिया के व्यक्तित्व, चिंतन, दर्शन और वैचारिकी के विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए सुधी पाठकों , विद्वानों और शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। इस महत्वपूर्ण पुस्तक के संपादन और प्रकाशन के लिए आई टी एम विश्वविद्यालय और श्री रमाशंकर सिंह जी को कोटिश: साधुवाद।


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