ईरान को कब्रिस्तान बनाने से पहले इज़रायल और अमेरिका के जंगखोर अपना इतिहास याद करें!

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Iran

Raj kumar Jain

– प्रोफेसर राजकुमार जैन —

ज़रायल के पुरखे, जो कभी हिटलर के मौत के गैस चैंबरों से बच निकले थे, आज वही अमेरिका के साथ मिलकर ईरान को खत्म करने का ख्वाब देख रहे हैं। अमेरिका–इज़रायल और ईरान के बीच चल रही इस जंग में दोनों तरफ से जो हमले हो रहे हैं, उनसे इंसानों, संपत्तियों, इमारतों, पुलों और अरबों-खरबों के हथियारों की जो बर्बादी हो रही है, उसकी भरपाई कब और कैसे हो पाएगी, यह कहना मुश्किल है। परंतु इस लड़ाई से हिंदुस्तान को भी सियासी रूप से कम नुकसान नहीं हुआ है।

हमारे अति-उत्साही प्रधानमंत्री, जो अक्सर विदेशी हुक्मरानों से मिलते समय कभी कंधे पर हाथ रखकर, कभी हाथ में हाथ मिलाकर उन्हें “मेरा दोस्त” घोषित कर देते हैं, शायद यह भूल जाते हैं कि विदेश नीति का पहला पाठ यह है कि कोई किसी का स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता; केवल मुल्क का हित ही स्थायी होता है। इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से व्यक्तिगत निकटता और मुस्लिम देशों के विरोध की प्रवृत्ति में भारत ने शुरू में ही इज़रायल की तरफदारी कर दी। जबकि भारत और ईरान की प्राचीन सभ्यताओं के बीच न केवल भौगोलिक निकटता रही है, बल्कि भाषा, धर्म और सांस्कृतिक परंपराओं में भी अनेक समानताएँ रही हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ में जब पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया था, तब ईरान ने भारत का समर्थन किया था।

1937-39 के दौर में, जब जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष थे, उन्होंने डॉ. राममनोहर लोहिया को कांग्रेस के विदेश विभाग का सचिव नियुक्त किया था। नेहरू की निगरानी में पहली बार एक ठोस विदेश नीति का खाका तैयार किया गया, जिसमें गुटनिरपेक्षता अथवा किसी भी शक्ति-ब्लॉक में शामिल न होने की नीति को महत्व दिया गया। लंबे समय तक यही नीति भारत की पहचान रही। किंतु हाल के वर्षों में इस नीति से जल्दबाजी में विचलन ने भारत की उस साख को कमजोर किया है, जिसके कारण वह इज़रायल–ईरान या फिलिस्तीन प्रश्न पर एक संभावित मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता था। अब उस जल्दबाजी को सुधारने की कोशिश भले की जा रही हो, पर जो नुकसान होना था, वह हो चुका है।

यह संकट कभी भी बम, गोलों, मिसाइलों या आणविक हथियारों से हल नहीं होगा। आज नहीं तो कल, इन पक्षों को वार्ता की मेज पर आना ही होगा। 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इज़रायली स्त्री, पुरुषों और बच्चों को जबरन पकड़कर सुरंगों में बंधक बनाकर रखना किसी भी रूप में जायज नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन उसके बाद जिस तरह बेकसूर इंसानों, बच्चों और औरतों का संहार हुआ, अस्पतालों में इलाज करा रहे लोगों तक को नहीं बख्शा गया, औरतों और बच्चों के खून से सने चेहरे, क्षत-विक्षत शरीर और उजड़े घरों की जो तस्वीरें दुनिया ने देखीं, वे मानवता को शर्मसार करने वाली हैं।

दुखद यह है कि हमास की कैद में बंद इज़रायली स्त्री-पुरुषों और बच्चों को बचाने के नाम पर भी कोई ऐसा वैश्विक नैतिक हस्तक्षेप सामने नहीं आया, जो इंसानियत की रक्षा कर पाता। राष्ट्र संघ, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और दौलत तथा हथियारों से लैस बड़े-बड़े मुल्क सब अपने-अपने निशाने साधने में लगे रहे। लगता है कि हथियारों के बल पर इंसानियत का यह कत्लेआम रुकने वाला नहीं है।

सबसे अधिक अफसोस इस बात का है कि जिस यहूदी समाज ने अपने इतिहास में वह बर्बरता, तबाही और जुल्म सहे, जिन्हें पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, उसी समाज का एक हिस्सा आज फिलिस्तीन के बेकसूर आवाम पर वैसा ही अमानवीय व्यवहार कर रहा है। राशन, पानी और दवाइयों जैसी बुनियादी जरूरतों पर पाबंदी लगाकर लोगों को मरने के लिए मजबूर करना किसी भी दृष्टि से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।

तवारीख के मुताबिक, यहूदी धर्म की शुरुआत यरूशलम से मानी जाती है, जो दुनिया के तीन बड़े मजहबों—यहूदी, ईसाई और इस्लाम—का पवित्र केंद्र है। पैगंबर इब्राहीम से अपने इतिहास को जोड़ने वाले ये तीनों मजहब यरूशलम को पवित्र मानते हैं। मुसलमानों के लिए अल-अक्सा मस्जिद मक्का और मदीना के बाद अत्यंत पवित्र मानी जाती है। यहूदियों के लिए भी यह क्षेत्र उनकी ऐतिहासिक और धार्मिक आस्था का केंद्र है। इसी कारण यरूशलम लंबे समय से संघर्ष का विषय बना हुआ है।
आधुनिक इतिहास बताता है कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश शासन वाले इस इलाके को दो भागों में बाँटने की योजना बनी—एक अरबों के लिए और दूसरा यहूदियों के लिए। 1948 में इज़रायल को मान्यता मिल गई, और इसके साथ ही बड़ी संख्या में फिलिस्तीनियों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा। उसके बाद से दोनों पक्षों के बीच संघर्ष लगातार चलता रहा है। इज़रायल और फिलिस्तीन, दोनों ही यरूशलम को अपनी राजधानी मानते हैं। यही कारण है कि यह प्रश्न केवल भू-राजनीतिक नहीं, बल्कि गहरे धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है।

यहूदियों पर हुआ जुल्म “होलोकॉस्ट” के नाम से जाना जाता है, जिसका उद्देश्य यहूदियों का संगठित विनाश था। इसकी शुरुआत 1933 में एडोल्फ हिटलर के जर्मनी का चांसलर बनने के बाद हुई। वह यहूदियों से घृणा करता था। सत्ता में आते ही नाजियों ने बड़े पैमाने पर यहूदियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण कानून बनाए और उन्हें जर्मनी की तमाम समस्याओं का कारण ठहराया। प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी की हार के लिए भी यहूदियों को दोषी बताया गया। जर्मन नाजी खुद को श्रेष्ठ “आर्य” मानते थे और यहूदियों को नीच तथा खतरनाक जाति के रूप में चित्रित करते थे।

होलोकॉस्ट इतिहास का वह भीषण नरसंहार था, जिसमें लगभग 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी गई, जिनमें लगभग 15 लाख बच्चे थे। पोलैंड के आउशवित्ज़ जैसे कंसंट्रेशन कैंप मौत के पर्याय बन गए थे। यहूदियों को गैस चैंबरों में डालकर मारा जाता था। बच्चों, बीमारों और बुजुर्गों को पहले खत्म किया जाता, जबकि तंदुरुस्त लोगों से गुलामों की तरह काम लिया जाता। लाशों को जलाने के लिए भट्टियाँ बनाई गई थीं। 1941 से नाजी सैनिकों ने यहूदियों को खुली खाइयों के सामने खड़ा करके मशीनगनों से मारना शुरू किया। यहूदी महिलाओं के साथ बलात्कार किए गए, और उनके साथ पशुवत व्यवहार किया गया। जिन देशों पर जर्मनी ने कब्जा किया, वहाँ-वहाँ यातना शिविर बनाए गए। यहूदियों को रेलों में ठूँसकर एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता, जहाँ उन्हें भोजन, पानी, चिकित्सा और मानवीय गरिमा—सबसे वंचित रखा जाता। इस अमानवीयता का अंत 1945 में जर्मनी की हार के साथ हुआ, जब इंग्लैंड, अमेरिका और रूस ने मिलकर नाजी शासन को परास्त किया। लेकिन जो यहूदी बच गए, वे अपने परिवारों और समुदायों के विनाश की पीड़ा के साथ जीवन भर जीते रहे।

इतिहास की यही त्रासदी आज सबसे बड़ी चेतावनी बनकर हमारे सामने खड़ी है। जिस समुदाय ने नरसंहार का दंश झेला हो, उसे दूसरों पर वैसा ही जुल्म ढहाने से बचना चाहिए। लेकिन आज जो कुछ फिलिस्तीन और व्यापक पश्चिम एशिया में हो रहा है, वह बताता है कि दुनिया अब भी इतिहास से सीखने को तैयार नहीं है।

लगता है कि हथियारों के बल पर इंसानियत का कत्लेआम अभी रुकने वाला नहीं है। इसका अंतिम इलाज महात्मा गांधी का अहिंसात्मक सत्याग्रह ही हो सकता है—वह सत्याग्रह, जिसके माध्यम से अपने-अपने देशों के आम नागरिक अपनी सरकारों को युद्ध से परहेज करने के लिए मजबूर करें। शायद यही रास्ता अंततः सबसे कारगर सिद्ध हो।


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