पेरिस पालोमा का गीत ‘श्रम’ समकालीन नारीवादी विमर्श में एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक पाठ के रूप में उभरकर सामने आया है। यह गीत महिलाओं के अदृश्य, अवैतनिक और भावनात्मक श्रम को केंद्र में रखता है तथा पितृसत्तात्मक समाज में व्याप्त लैंगिक असमानताओं को तीव्रता से उजागर करता है। अपनी प्रभावशाली भाषा और गहन भावाभिव्यक्ति के माध्यम से यह घरेलू जीवन में निहित श्रम-विभाजन, शक्ति-संबंधों और संरचनात्मक असमानताओं की आलोचना करता है। रिलीज़ होते ही इस गीत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक लोकप्रियता प्राप्त की। विश्वभर की महिलाओं ने इसके बोल “तुम मुझसे बहुत अधिक परिश्रम करवाते हो” गाते हुए अपने वीडियो साझा किए, जिनमें रोज़मर्रा की घरेलू ज़िम्मेदारियों और भावनात्मक श्रम से उत्पन्न थकान को व्यक्त किया गया। शीघ्र ही यह गीत नारीवादी आंदोलन का प्रतीक बन गया, जिसने व्यक्तिगत निराशा को सामूहिक प्रतिरोध में बदल दिया। गीत में व्यक्त क्रोध केवल निजी अनुभव तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक और संरचनात्मक असमानताओं से जुड़ा हुआ है। यह उस व्यवस्था की आलोचना करता है, जिसमें महिलाओं की ज़रूरतों और इच्छाओं को पुरुषों के अधीन रखा जाता है। इसकी लोकप्रियता का प्रमुख कारण यह है कि अधिकांश महिलाएँ किसी न किसी स्तर पर अपनी सामाजिक परिस्थितियों के कारण ऐसी असमानताओं का अनुभव करती हैं। समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह गीत लैंगिक श्रम पर नारीवादी आलोचना का एक सशक्त और अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो व्यापक सामाजिक वास्तविकताओं को उजागर
करता है।
इस गीत ‘श्रम’ की सबसे खास बात यह है कि इसमें श्रम शब्द का इस्तेमाल बार-बार हुआ है। सभी समाजों में ऐसी कई घटनाएँ और उदाहरण मौजूद हैं, जिनमें महिलाएँ दुव्यर्वहार वाले रिश्तों में फँसी हुई पाई गई हैं और उन पर थोपे गए लैंगिक बोझों का वर्णन मिलता है। देखभाल को आज भी लैंगिक विशेषता के रूप में महिलाओं का विशेषीकृत क्षेत्र, उनकी स्वाभाविक क्षमता वाला कार्य और केवल उनकी ही जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है, जो एक गंभीर समस्या है। हालांकि देखभाल सीखा और अभ्यास किया गया व्यवहार है; यह जैविक या विरासत के रूप में उपलब्ध नहीं है और इसमें श्रम लगता है। यह कठिन, नियमित और अदृश्य कार्यों की एक श्रृंखला से बना एक भावनात्मक अनुभव है। यह गीत, ‘पूरे दिन, प्रत्येक दिन चिकित्सक, माँ, नौकरानी, अप्सरा, कुंवारी, नर्स और सेविका बनकर उसकी सेवा में जीवन बिताना’ अदृश्य लैंगिक श्रम के बारे में बताता है। यह गीत वैश्विक दक्षिण अर्थात् विकासशील और पिछड़े देशों के संदर्भ में बहुत ही वास्तविक प्रतीत होता है, जहाँ महिलाओं को किसी भी
प्रकार के अधिकारों के बारे में जानकारी नहीं होती। पेरिस पालोमा का गीत श्रम के संदर्भ में समस्या केवल घर में हो रहे दुर्व्यवहार या विशेषाधिकार प्राप्त पुरुष तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज भी इस प्रकार के लैंगिक व्यवहार को बढ़ावा देता है और महिलाओं को अत्यधिक श्रम करने के लिए मजबूर करता है। नैंसी फ्रेजर का तर्क है कि परिवार के भीतर देखभाल का यह निजीकरण उस संरचनात्मक शोषण को छिपाता है, जो पूंजीवाद और पितृसत्ता को बनाए रखने में मदद करता है।
गीत में यह उल्लेख किया गया है कि महिलाएँ विविध प्रकार की भूमिकाएँ इसलिए निभाने का प्रयास करती हैं, “ताकि उसके कार्य पर कभी भी उंगली न उठाई जाए और वह अपने सपनों को जी सके।” अर्थात पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों द्वारा मान्यता प्राप्त आदर्श परिवार वह है, जिसमें महिलाएँ परिवार नामक सामाजिक संस्था के संरक्षण और पुनरुत्पादन के लिए बिना प्रश्न किए अदृश्य और अवैतनिक श्रम करती हैं। एफ. स्कॉट फिट्ज़गेराल्ड के उपन्यास द ग्रेट गैट्सबी में डेज़ी बुकानन अपनी बेटी के बारे में कहती है “काश वह मूर्ख ही रहे, इस दुनिया में लड़की के लिए सबसे अच्छी बात यही हो सकती है।” पुरुष-प्रधान समाज में बुद्धिमान और जागरूक महिलाओं को अधिक कष्ट सहना पड़ता है। समाज पितृसत्ता और पूंजीवादी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कई भावनात्मक तरीके निकालता है तथा मिथकों और महाख्यानों का भी सहारा लेता है। “और अगर तुम उससे ये सब करवाते हो, तो यह प्रेम का प्रकार नहीं है बल्कि तुम मुझसे बहुत अधिक श्रम करवाते हो।” यह गीत मार्क्सवादी नारीवादियों द्वारा सामाजिक पुनरुत्पादन कही जाने वाली प्रक्रिया को उजागर करता है।
दशकों से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में घरेलू और देखभाल संबंधी कार्यों को लगातार कम महत्व दिया गया है या अदृश्य समझा गया है। लेकिन मार्क्सवादी नारीवादियों ने यह प्रश्न उठाया है कि श्रमिक वर्ग का पुनरुत्पादन कैसे होता है और पूंजीवादी व्यवस्था स्वयं को कैसे बनाए रखती है। गीत में आगे कहा गया है “बागों की देखभाल कौन करता है, छतों की मरम्मत कौन करता है, चट्टानी पहाड़ी झरने से पानी कौन लाता है, और फिर वापस नीचे आकर तुम्हारे शब्दों और उनकी तीखी चुभन को महसूस करना और मैं बहुत थक रही हूँ और मेरी आँखों की नसें फट रही हैं।” ये पंक्तियाँ भी प्रजनन श्रम के इस असमान वितरण से उत्पन्न थकावट का प्रतीक हैं। सिल्विया फेडेरिची के अनुसार, सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरुत्पादन का क्षेत्र घरों में अंतर्निहित अवैतनिक श्रम खाना पकाना, सफाई करना, बच्चों की देखभाल आदि को सम्मिलित करता है, जो श्रम-विभाजन और श्रम-शक्ति की असमानता को बनाए रखता है तथा उसका पुनरुत्पादन करता है। इसी कारण इसे औपचारिक मान्यता और आर्थिक मूल्यांकन से वंचित रखा जाता है।
श्रम के संदर्भ में सामाजिक असमानता और सामाजिक श्रम-विभाजन का पुनरुत्पादन घरों के भीतर भी समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से होता है, जो पितृसत्ता और पूंजीवाद दोनों के हितों के लिए कार्य करता है। गीत की पंक्तियाँ “अगर हमारी बेटी होती, तो मैं उसे बचा नहीं पाती; तुम्हारे यानी घर के मुखिया द्वारा ऊँचे दर्जे की मेज़ पर दी गई यातना, वह वही करती जो तुमने उसे सिखाया है, उसका भी वही क्रूर भाग्य होता” इस बात को स्पष्ट करती हैं कि लैंगिक असमानता केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी समाजीकरण के माध्यम से आगे बढ़ाई जाती है। इस प्रकार, गीत यह दर्शाता है कि परिवार जैसी सामाजिक संस्था के भीतर कैसे पितृसत्तात्मक मूल्यों का संचार होता है, जो स्त्रियों के जीवन को नियंत्रित और सीमित करता है।
श्रम का यह लैंगिक विभाजन वैश्विक रूप में व्याप्त है। प्रायः विकसित देशों में घरेलू कार्यों के लिए गरीब देशों की प्रवासी महिलाओं को रखा जाता है जिससे वैश्विक देखभाल वाली श्रृखंला व्यवस्था बनती जाती है। प्रवासी महिलाएं आया, नैनी, देखभालकर्ता और सफाई कर्मी के रूप में काम करती है और असुरक्षित और शोषणकारी परिस्थितियों में अदृश्य श्रम कार्यों में भी संलगन रहती है। इस प्रकार वैश्विक पूंजीवाद न केवल बाजार में वेतनभोगी श्रम पर निर्भर करता है बल्कि सीमाओं के पार महिलाओं द्वारा किए जाने वाले अवैतानिक और कम वेतन वाले श्रम पर भी निर्भर करता है। इसलिए “लेबर” गीत मे व्यक्त क्रोध केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि पूंजीवाद और पितृसत्ता के हित किस प्रकार परस्पर जुडें हुए है और दोनो के हित महिलाओं के अदृश्य श्रम पर निर्भर करते है। श्रमिक वर्ग का पुनरूत्पादन केवल कारखनों और कार्यालयों में नही होता है बल्कि यह घरों के अन्दर और सामाजिक संरचना में अन्तर्निहित है।
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