— कुमार सिद्धार्थ —
देश के सामाजिक और नैतिक इतिहास में ऐसे कुछ आंदोलन हुए हैं, जिन्होंने बिना हिंसा, बिना सत्ता और बिना संसाधनों के भी समाज की आत्मा को झकझोर दिया है। आचार्य विनोबा भावे का भूदान आंदोलन ऐसा ही एक अद्वितीय प्रयोग था, जिसने न केवल भूमि के पुनर्वितरण का प्रश्न उठाया, बल्कि समाज के नैतिक पुनर्निर्माण की दिशा भी दिखाई। 18 अप्रैल को मनाया जाने वाला ‘भूदान दिवस उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाता है, जब 1951 में तेलंगाना के पोचमपल्ली गाँव से इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी। अब, जब इस आंदोलन के लगभग 75 वर्ष पूर्ण होने को है, इसके महत्व और वर्तमान संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है।
भूदान आंदोलन की शुरुआत एक साधारण, लेकिन गहरे सामाजिक प्रश्न से हुई थी क्या समाज अपने ही भूमिहीन लोगों के लिए स्वेच्छा से संसाधन साझा कर सकता है? पोचमपल्ली में जब भूमिहीन परिवारों ने विनोबा भावे से भूमि की मांग की, तब एक जमींदार द्वारा स्वेच्छा से भूमि-दान की घोषणा ने इस आंदोलन को जन्म दिया। विनोबा भावे ने इसे केवल भूमि-दान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे ‘सर्वोदय याने सभी के उत्थान के व्यापक दर्शन से जोड़ा।
भूदान आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाने के लिए विनोबा भावे ने व्यापक पदयात्राएँ कीं, जो इस आंदोलन की आत्मा बन गई। उन्होंने लगभग 13 वर्षों (1951 से 1964 के बीच) लगातार देशभर में पदयात्रा की और करीब 58,000 से अधिक किलोमीटर पैदल चलकर देश के लगभग 16 से अधिक राज्यों का भ्रमण किया और हजारों गाँवों में पहुँचकर सीधे लोगों से संवाद किया। इन पदयात्राओं के माध्यम से उन्होंने न केवल भूमि-दान का आह्वान किया, बल्कि समाज में समानता, सहयोग और अहिंसक परिवर्तन की भावना को भी गहराई से स्थापित किया। आगे चलकर यह आंदोलन ‘ग्रामदान’ की अवधारणा तक विस्तारित हुआ, जिसमें पूरे गाँव की भूमि को सामूहिक स्वामित्व और उपयोग के लिए समर्पित करने का विचार सामने आया।
विनोबा मानते थे कि भूमि प्रकृति की देन है और उस पर किसी एक व्यक्ति का पूर्ण स्वामित्व नैतिक रूप से उचित नहीं हो सकता। इसी कारण उन्होंने समाज के संपन्न वर्ग से अपील की कि वे अपनी भूमि का एक हिस्सा भूमिहीनों को दें, ताकि समाज में संतुलन और समानता स्थापित हो सके। विनोबा के विचार में यह केवल आर्थिक सुधार का उपाय नहीं, बल्कि ‘हृदय परिवर्तन’ की प्रक्रिया थी, जिसमें दान देने वाला और प्राप्त करने वाला, दोनों एक नए सामाजिक संबंध में जुड़ते हैं। उनका यह भी विश्वास था कि यदि परिवर्तन स्वेच्छा और अहिंसा के आधार पर होगा, तो वह अधिक स्थायी और मानवीय होगा।
भूदान आंदोलन के दौरान प्राप्त जमीनों के वितरण के लिए विभिन्न राज्यों में ‘भूदान-यज बोर्डो की स्थापना की गई जो दान में प्राप्त भूमि का अभिलेखीकरण, सत्यापन और वितरण सुनिश्चित करते थे। बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और उड़ीसा जैसे राज्यों में लंबे समय तक ‘भूदान-यज बोर्ड’ सक्रिय रहे। इनकी जिम्मेदारी थी कि वे दान की गई भूमि का कानूनी हस्तांतरण कर उसे भूमिहीन परिवारों तक पहुँचाएं। कुछ राज्यों में इन ‘बोर्डो’ ने उल्लेखनीय कार्य किए, जहां हजारों परिवारों को भूमि का स्वामित्व मिला। हालांकि, कई स्थानों पर इन ‘बोर्डी’ को प्रशासनिक जटिलताओं, सीमित संसाधनों और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कई राज्यों में ‘भूदान बोर्डों के पास भूमि का रिकॉर्ड तो था, लेकिन उसका वास्तविक वितरण नहीं हो सका। कुछ स्थानों पर तो भूमि पर कब्जा दिलाने में भी कठिनाइयों आई। इसके बावजूद, यह संस्थागत प्रयास इस बाल का प्रमाण है कि भूदान आंदोलन केवल नैतिक अपील तक सीमित नहीं था, बल्कि उसे प्रशासनिक ढांचे में ढालने की भी कोशिश की गई।
वर्तमान समय में भूमि असमानता का प्रश्न नए रूप में सामने आ रहा है। एक और बड़े कॉरपोरेट और उद्द्योग समूह विशाल भूमि पर अधिकार रखते हैं, वहीं दूसरी ओर लाखौ किसान और आदिवासी समुदाय भूमि से वंचित या विस्थापन के खतरे में हैं। शहरीकरण और औद्योगीकरण के बढ़ते दबाव ने भूमि को केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि एक ‘वस्तु’ में बदल दिया है, जिसका मूल्य बाजार तय करता है, जिससे सामाजिक असमानता और गहरी होती जा रही है।
ऐसे में भूदान आंदोलन याद दिलाता है कि भूमि केवल आर्थिक संपत्ति नहीं है, बल्कि यह जीवन, संस्कृति और अस्तित्व का आधार है। विनोबा भावे का दृष्टिकोण सिखाता है कि विकास का मॉडल केवल आर्थिक लाभ पर आधारित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें सामाजिक न्याय और नैतिकता का भी समावेश होना चाहिए। आज जरूरत इस बात की है कि भूदान की भावना को समकालीन संदर्भ में पुनर्परिभाषित किया जाए। यह जरूरी नहीं कि लोग अपनी भूमि दान करें, लेकिन यह आवश्यक है कि समाज और सरकार मिलकर ऐसी नीतियाँ बनाएं, जो भूमि के न्यायपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करें। भूमि सुधार, वन अधिकार कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन और विस्थापित समुदायों के पुनर्वास जैसे मुद्दे इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
इसके अलावा, भूदान आंदोलन हमें सामुदायिक भावना और साझेदारी की संस्कृति को पुनर्जीवित करने की प्रेरणा भी देता है। आज जब समाज तेजी से व्यक्तिवादी होता जा रहा है, तब ‘साझा संसाधन’ और ‘साझी जिम्मेदारी’ की अवधारणा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ग्राम स्तर पर सामूहिक निर्णय, संसाधनों का साझा उपयोग और स्थानीय स्वशासन की मजबूत व्यवस्था आदि सभी पहलू भूदान के मूल विचार से जुड़े हुए हैं। शिक्षा और जागरुकता के माध्यम से भी भूदान की भावना को आगे बढ़ाया जा सकता है। नई पीढ़ी को यह समझाना जरूरी है कि सामाजिक परिवर्तन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हरेक नागरिक की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण है। यदि समाज के सक्षम वर्ग स्वेच्छा से कमजोर वर्गों के लिए आगे आएँ, तो असमानता को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
‘भूदान आंदोलन’ के 75 वर्षों की यात्रा केवल अतीत को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने का भी समय है। यदि हम विनोबा भावे के विचारों को आज के संदर्भ में समझकर उन्हें व्यवहार में लाने का प्रयास करें, तो यह आंदोलन एक बार फिर समाज में नई ऊर्जा और दिशा प्रदान कर सकता है। ‘भूदान दिवस’ पर यह संकल्प लेना सार्थक होगा कि हम अपने-अपने स्तर पर समानता, न्याय और साझेदारी की भावना को मजबूत करें। यही इस ऐतिहासिक आंदोलन और उसके प्रणेता विनोबा भावे के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
(सप्रेस)
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