— सूर्यकुमार —
चन्द्रशेखर मानवीय संबंधों के आधार पर नेताओं एवं कार्यकर्ताओं के मध्य स्वाभाविक, जीवंत संबंध स्थापित करने वाली भारतीय राजनीति की समृद्ध परंपरा को संजीवनी प्रदान करने वाले निर्विवाद रूप से वर्तमान भारत के अकेले ऐसे राजनेता थे, जो देश के हर कोने के जमीनी कार्यकर्ताओं को भली-भांति जानते थे, उन्हें स्नेहपूर्ण नाम से पुकारते थे तथा संकट की घड़ी में हर स्तर पर उनका सहयोग करते थे। यही कारण है कि हर दल में उनके मित्रों एवं प्रशंसकों की एक अच्छी-खासी संख्या है।
वह केवल नेता नहीं, राजनेता थे। भीड़ की गलत मानसिकता और रुझान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए उन्हें साहस बटोरने की आवश्यकता नहीं होती थी, क्योंकि वह प्रतिक्रिया स्वाभाविक होती थी। उसमें उनकी दूरगामी दृष्टि तथा मन के सच्चे उद्गार होते थे, जो छवि बिगड़ने के डर और अलोकप्रिय होने के भय से पूर्णतः मुक्त होते थे।
व्यावहारिक चिंतन, विषय की गहरी समझ, वाद-विवाद के क्षणों में तथ्यों की तर्कसंगत व्याख्या करने की क्षमता, समस्याओं के विश्लेषण की योग्यता, वस्तुनिष्ठता के कारण विचारों का संतुलन, दूसरों के विचारों को खुले मन से ग्रहण करने की प्रवृत्ति तथा वैचारिक क्षितिज की व्यापकता उनके व्यक्तित्व के ऐसे महत्वपूर्ण पहलू थे, जिनके कारण विचार-विनिमय के दौरान मतभेद होने पर भी कोई उनके उद्देश्य की पवित्रता पर प्रश्नचिह्न नहीं लगा सका।
चन्द्रशेखर का मानना था कि असहमति एवं असंतोष को गलत ढंग से प्रस्तुत करना तथा उसे दबाने का प्रयास लोकतंत्र में ठहराव तो पैदा करता ही है, साथ ही समाज को एक निश्चित मृत्यु की ओर भी ले जाता है। यह लोकतंत्र में उनकी प्रबल आस्था तथा अपने आदर्शों के प्रति निष्ठा का परिचायक था।
चन्द्रशेखर, चन्द्रशेखर इसलिए बन सके क्योंकि उन्होंने सहमति से अधिक उठती हुई आवाज़ों की पहचान प्राप्त की। यह उनका अपना चयन था और उनकी राजनीतिक शैली इसी बुनियाद पर विकसित हुई। वे हमेशा अपने उस पहले क्षण तक लौटने को तैयार रहते थे, जब वह कुछ नहीं थे। गांधी, डॉ. लोहिया तथा जयप्रकाश की पीढ़ी के बाद शायद चन्द्रशेखर ही ऐसे नेता थे, जिनके बारे में सभी विचारधाराओं के अग्रणी लोगों ने सृजनात्मक राय व्यक्त की।
विख्यात साहित्यकार नामवर सिंह उन्हें “शाश्वत विद्रोही” मानते थे, जबकि केदारनाथ सिंह उन्हें “राजनीति का कबीर” बताते थे। मृणाल पाण्डेय ने उनके अनूठे व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा कि चन्द्रशेखर उस पीढ़ी और मानसिकता के नेता थे, जो राजनीति को केवल व्यवहारिक शैली नहीं, बल्कि व्यापक नैतिक एवं दार्शनिक दायरों से जोड़कर देखते थे।
तात्कालिक घटनाएँ चाहे जितनी नाटकीय क्यों न हों, उनके लिए राजनीति के केंद्र में प्रदर्शन नहीं, बल्कि मानवीय सरोकार बने रहना ही आवश्यक था। यही कारण था कि उन्होंने कांग्रेस के युवा तुर्क के रूप में सिंडिकेट की ज्यादतियों की जितनी भर्त्सना की, उतनी ही तीखी आलोचना बाद में श्रीमती इन्दिरा गांधी के व्यक्तित्व में उभरते एकाधिकारवादी तेवरों की भी की। दोनों ही मौकों पर यथास्थितिवादियों ने उनकी कटु आलोचना की।
सत्ता, पद एवं भौतिक उपलब्धियों और सच कहने के बीच चुनाव की कठिन घड़ी में उन्होंने हमेशा सहजता से दूसरे पक्ष का चयन किया। वे व्यक्तिगत व्यवहार में अत्यंत मृदुल तथा सैद्धांतिक प्रश्नों पर अत्यंत कठोर थे। उनके व्यक्तित्व में आई इस निस्पृहता, सैद्धांतिक आग्रह तथा दार्शनिक दृष्टि के विकास में आचार्य नरेन्द्र देव तथा लोकनायक जयप्रकाश नारायण के स्नेहपूर्ण संबंधों का विशेष योगदान रहा।
जेपी की यह टिप्पणी—“मुझे कोई संदेह नहीं कि चन्द्रशेखर नियति-निर्धारित व्यक्ति हैं और वे नये भारत के निर्माता बनेंगे”—उनके व्यक्तित्व की उत्कृष्टता को स्वयं सिद्ध करती है।
अनुभव एवं सृजन-बोध से छनकर निकली हुई उनकी बातों में बहुत दम होता था तथा बड़े-बड़े राजनीतिक दलों के लिए एक सीमा के बाद उनकी सृजनशीलता के प्रतिमानों से सामंजस्य बैठा पाना कठिन होता था। इसलिए वे उन्हें आत्मसात न कर सके।
आज चन्द्रशेखर स्थूल रूप में हमारे बीच नहीं हैं, किंतु उनकी सृजनशीलता आज भी हमें प्रेरणा देती है और भविष्य में भी देती रहेगी।
आज देश की राजनीति से विचार, गरीबी के सवाल, बेरोजगारी का मुद्दा, विकास के यक्ष प्रश्न तथा देशी-विदेशी पूँजी से जुड़े बहुराष्ट्रीय निगमों के क्रियाकलाप जैसे निर्णायक विषय राष्ट्रीय बहस से गायब हैं। इन प्रश्नों से निपटने की क्षमता केवल सृजनात्मक व्यक्तित्व में ही संभव है। आज के नेतृत्व की सीमाएँ स्पष्ट हैं, इसलिए लगभग सभी दलों ने इन प्रश्नों पर चर्चा बंद कर दी है। राजनीतिज्ञों के मन-मस्तिष्क में अब यह स्थान नहीं बचा कि राजनीति एक गंभीर विषय है। ऐसी परिस्थिति में चन्द्रशेखर की स्मृति का ताज़ा हो जाना स्वाभाविक है।
चन्द्रशेखर एक प्रयोगधर्मी की तरह आजीवन राजनीति में उच्च मानक स्थापित करने हेतु कुछ मूलभूत सिद्धांतों को समाहित करने का प्रयास करते रहे। उन्होंने राजनीति को एक ऐसी कला के रूप में विकसित करने का प्रयास किया, जिसमें आदर्श रूप में हर समस्या का समाधान खोजा जा सके। उन्होंने कोशिश की कि राजनीति मात्र तुच्छ लक्ष्यों की प्राप्ति का साधन बनकर न रह जाए।
उन्होंने अपनी आत्मा की आवाज़ के अनुरूप सीधी, सच्ची और खरी बातें कहने में कभी कोताही नहीं बरती। एक ही मुद्दे पर हर जगह बयान बदलने की कला उनमें नहीं थी।
अपने संसदीय जीवन की शुरुआत में ही उन्होंने प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू पर प्रताप सिंह कैरों के मामले में संसद में गलतबयानी करने का आरोप लगाकर सनसनी पैदा कर दी। तब पंडित नेहरू को यह कहना पड़ा कि “मैं अपने नौजवान दोस्त को बताना चाहता हूँ कि यह गलतबयानी मैंने जानबूझकर नहीं की है।”
समाजवादी नीतियों को लेकर लाल बहादुर शास्त्री, आर्थिक नीतियों को लेकर मोरारजी देसाई तथा बिरला के संरक्षण के मामले में श्रीमती इन्दिरा गांधी का उनके द्वारा प्रबल विरोध जगजाहिर है। कांग्रेस में शामिल होने के बाद श्रीमती गांधी ने जब पूछा कि आप कांग्रेस में क्यों शामिल हुए हैं, तो उनका उत्तर था—“कांग्रेस को समाजवादी बनाने के लिए आया हूँ।” जब श्रीमती गांधी ने पूछा कि यदि कांग्रेस समाजवादी नहीं बनी तो क्या करेंगे, तो उन्होंने उत्तर दिया—“इसे तोड़ने का प्रयास करूंगा।” यह उनकी सैद्धांतिक प्रतिबद्धता का साहसिक उदाहरण है।
बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद संसद में हुई बहस के दौरान उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी तथा लालकृष्ण आडवाणी से पूछा कि उस दिन क्या आप भारतीय शालीनता, सौजन्यता, संवेदनशीलता, परंपरा, सभ्यता, संस्कृति और तहज़ीब सब कुछ भूल गए थे? दूसरी ओर शरद पवार से यह कहकर प्रश्न किया कि जब आप बोल रहे थे तो मुझे अभिमान हो रहा था कि भारत का रक्षामंत्री बोल रहा है, पर वह वीरता और पराक्रम 6 दिसंबर को कहाँ चला गया था? इस प्रकार उन्होंने संसद में सच्ची बातें कहकर इतिहास रचा।
वे जो कुछ थे, अपनी कमाई से थे। उनके पूरे राजनीतिक जीवन में कहीं भी अपनी ओर से कुछ बनने या पाने का सचेतन प्रयास दिखाई नहीं देता।
उन्होंने अपनी जेल डायरी में 13 नवम्बर 1975 को लिखा था कि हमने अब तक जो भूमिका भारतीय राजनीति में अदा की है, उससे समझौता करके हम कितनी दूर जा सकते हैं, यह बड़ा प्रश्न है। फिर कांग्रेस में बहुत सारे साथी हैं, जिनसे पूरी तरह संबंध तोड़ लेना भी आसान नहीं होगा। यह परेशानी तब समाप्त हुई, जब उन्हें कांग्रेस से निष्कासित किए जाने का समाचार मिला।
जयप्रकाश जी द्वारा विरोधी दलों को मिलाकर एक पार्टी बनाने के विचार पर उनकी प्रतिक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण थी—“जेपी के विचार जानकर आज दुविधा में पड़ गया। ना कहना आसान नहीं जान पड़ता और हाँ कहने का अर्थ बहुत दूरगामी हो सकता है…” यह पंक्तियाँ उनके जीवनानुभवों तथा दार्शनिक पक्ष का सुंदर परिचय देती हैं।
आगरा के अतिथि गृह के बाहर वरिष्ठ नेता श्री ओमप्रकाश श्रीवास्तव जी द्वारा मेरा नाम लेकर बुलाने पर चन्द्रशेखर जी ने विस्मय से पूछा—“तुम ही सूर्य कुमार हो?” मेरे हाँ कहने पर उन्होंने कहा—“मैं तुमको भी जानता था और सूर्य कुमार को भी, पर तुम ही सूर्य कुमार हो, यह नहीं जानता था।” फिर सबको छोड़कर मेरे मित्र द्वारा लाई गई पुरानी एम्बेसडर कार में मेरे साथ बैठकर राज्य कार्यकारिणी की बैठक में चल पड़े। यह मेरे लिए सुखद आश्चर्य था।
उन्होंने मुझे इतना निकट बना लिया कि मैं उनके साथ जुड़ा रहा तथा उन्होंने अपने जीवन की अंतिम साँस तक अपने साथ रहने का अवसर दिया। अपने विचारों एवं सृजनात्मक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने हेतु अपनी पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव एवं भारत यात्रा ट्रस्ट का ट्रस्टी मनोनीत कर मुझ पर गुरुत्तर भार सौंपा। चन्द्रशेखर के व्यक्तित्व के बारे में जितनी भी चर्चा की जाए, यदि उसमें पदयात्राओं का उल्लेख न आए तो वह पूर्ण नहीं हो सकती।
मेरा सौभाग्य है कि उनकी सभी पदयात्राओं में मैं सहयात्री रहा। चाहे वह भितिहरवा (चम्पारण) महात्मा गांधी आश्रम से बेतिया तक की पदयात्रा हो, या जयप्रकाश नगर बलिया से पटना तक की क्रांति यात्रा, अथवा सबसे बड़ी भारत यात्रा—कन्याकुमारी के गांधी मंडपम से गांधी समाधि राजघाट, नई दिल्ली तक (4260 किमी., अवधि 5 महीने 20 दिन, प्रारम्भ 6 जनवरी 1983, समापन 25 जून 1983)—या अन्य पदयात्राएँ रही हों।
तत्पश्चात भारत यात्रा ट्रस्ट का गठन हुआ तथा पूरे भारत के कोने-कोने में भारत यात्रा केंद्रों की स्थापना हुई, जो आज भी राजनीतिक पुनर्जागरण के केंद्र के रूप में कार्यरत हैं। मुझे उनके सहयोगी के रूप में कार्य करने का सुअवसर मिला। मैंने देखा कि चन्द्रशेखर जी किसी भी साथी से विचार-विमर्श के दौरान स्वयं को उसके स्तर पर लाकर खड़ा कर देते थे, ताकि वह निःसंकोच अपनी बात कह सके और वे भी उससे सामंजस्य स्थापित कर सकें। यह उनका सबसे बड़ा मानवीय गुण था।
एक बार की घटना है कि साथियों के समर्थन एवं प्रेरणा से मेरे अंतर्मन में पार्टी के युवा संगठन युवा जनता का प्रांतीय अध्यक्ष बनने की ललक पैदा हुई। परंतु चन्द्रशेखर जी अपने संसदीय क्षेत्र के साथी भाई राजधारी सिंह जी को प्रांतीय अध्यक्ष मनोनीत करवाना चाहते थे। ऐसा हुआ भी।
तत्पश्चात जब मैं चन्द्रशेखर जी से मिलने गया, तो उनके मुखारविंद से यह सुनकर आश्चर्य हुआ कि “मैं जानता हूँ, तुम्हें सभी साथियों का समर्थन प्राप्त है, पर मैं नहीं चाहता कि तुम युवा जनता के प्रदेश अध्यक्ष बनो।”
मेरे इस प्रश्न पर कि तब तो आपको अपनी इच्छा से मुझे पहले ही अवगत कराना चाहिए था, उनका उत्तर था—“जब मैं स्वयं
जनता पार्टी का अध्यक्ष बना रहना चाहता हूँ, तो तुम्हें कैसे मना करता?”
फिर उन्होंने कहा कि आज से कुछ दिनों तक भारत यात्रा आंदोलन के सृजनात्मक कार्यों में अपने आपको लगाओ, और उन्होंने मुझे भारत यात्रा ट्रस्ट का ट्रस्टी मनोनीत कर दिया। यह उनके बड़प्पन, साफगोई तथा साथियों के बीच पारदर्शिता का अनुपम उदाहरण है।
आज वर्तमान भारतीय जनमानस युवा पीढ़ी से अपेक्षा के साथ प्रश्न करता दिखाई दे रहा है कि क्या वह गांधी, आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश और लोहिया द्वारा स्थापित राजनीतिक मापदंडों को अंगीकार कर राजनीति को सेवार्थ त्यागमयी साधना का रूप प्रदान करेगी? क्या वह उसकी विश्वसनीयता में आई गिरावट को सुधारने हेतु अपनी लिप्सा और लालसा को नियंत्रित करेगी तथा उसमें समाहित स्वार्थपरता, ऐन-केन-प्रकारेण सत्तासीन होने की भावना को दरकिनार कर राजनीति को पुनः मर्यादित करने का कार्य करेगी?
आइए, चन्द्रशेखर जी को सामने रखकर कुछ सोचने और करने का प्रयास करें।
संदर्भ – पुस्तक समाजवाद के प्रकाश पुंज
















