
करीब डेढ़ दशक बाद होने जा रही ‘जनगणना 2027’ में जातियों की बहुप्रचारित मर्दुमशुमारी के अलावा उन असंख्य प्रवासी-मजदूरों का भी महत्व होना चाहिए जो हमारे ‘जीडीपी’ को अनजाने में आसमान तक पहुंचाने में लगे हैं। आखिर किसी भी योजना या नीति में उनकी भागीदारी सर्वाधिक होती है। प्रस्तुत है. इसी की पड़ताल करता अरविन्द मोहन का यह लेख।
संपादक
इस बार के चुनाव में भी मजदूरों के पलायन का सवाल आ ही गया। कैसा भी चुनाव हो, विकसित राज्य का हो या पिछडे राज्य का, पलायन और प्रवासी मजदूर मुद्दा बन ही जाते हैं। पिछड़ा बिहार हो या विकसित पंजाब, यह मुद्दा है। दिल्ली में तो प्रवासियों का वोट निर्णायक ही माना जाने लगा है। इस बार चुनाव न बिहार मैं है, न पंजाब में और न दिल्ली में। केरल में चुनाव है तो वह भी खाली होने लगा है। प्रवासी मजदूर सिर्फ रसोई गैस की तंगी से ही नहीं, वोट देने के लिए भी अपने देस बंगाल और असम लौट रहे हैं। तमिलनाडु में बहुत बिहारी मजदूर हैं तो उनका लौटना खास चर्चा में नहीं है क्योंकि अभी वे वहां के वोटर नहीं हैं।
केरल में आर्थिक जीवन ही नहीं, हर तरफ प्रवासी बिहारी, झारखंडी, बंगाली और असमिया या ओडिया मजदूरों का ‘राज’ है। उनके हिसाब से सस्ते होटलों का खाना बनता है, सिनेमा दिखाया जाता है, बसी पर हिन्दी और बांग्ला में तख्तियां लगाकर उनके आने-जाने के स्थान की सूचना दी जाती है, कमरों का किराया तय होता है। उनके बंगाल और असल लौटने की वजह मतदाता सूचियों का बृहद संशोधन और उस नाम पर लोगों के नाम काटने-जोडने का खेल भी एक वजह है। कई तो अपने अपूर्ण या विवादित दस्तावेज की गवाही के लिए पहले आ गए हैं, लेकिन ज्यादातर को लगता है कि वोट गिराने से उनकी नागरिकता पुख्ता होगी। इस बार प्रवासी मतदाताओं की उस तरह लल्लो-चप्पो नहीं हो रही है जैसा अक्सर बिहार, दिल्ली या फिर पंजाब चुनाव में दिखाई देता है।
अब तो मुंबई और सूरत वगैरह में भी चुनाव के समय प्रवासियों की आवाजाही और वोट का सवाल प्रमुख बनता है। पार्टियां खास तौर से उन राज्यों के नेताओं को जिम्मा सौंपती हैं। मोटा फंड़ भी दिया जाने लगा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लोग भी पेड़-लीव और रिटर्न प्लेन टिकट के साथ भेजे जाते हैं। मजदूरों को साड़ी-बिंदी समेत छुट्टी के साथ घर भेजा जाता है। पिछले बिहार चुनाव में दिल्ली और हरियाणा से स्पेशल रेलगाड़ियां चलाई गई और मजदूरों को मुफ्त लाया, ले जाया गया। भाजपा ने यह काम किया तो विपक्ष को इसे मुद्दा बनाने का मौका मिला। इस बार न पक्ष सक्रिय है, न विपक्ष। सारा जतन प्रवासियों को खुद करना है। हां, इतना जरूर हुआ है कि बार-बार दिखने वाली दुर्दशा के चलते इस बार मीडिया, खासकर सोशल मीडिया में मजदूरों की घर-वापसी एक मुद्दा बनकर सामने आई है। इसमें मुख्य मसला रसोई गैस के संकट का है, पर किसी बहाने अगर समाज को इनकी सुध आने लगी है तो यह शुभ लक्षण है।
बीते वर्षों से इन अभागे मजदूरों के हिस्से जो जलालत और परेशानी की जिंदगी रही है, उसमें ऐसे मौके-कुमौके की चर्चा से ज्यादा बदलाव नहीं आना है। उससे न तो अमीर और गरीब इलाकों के विकास का क्रम उलटेगा और न इस फासले से पैदा होने वाले पलायन के हालात। हमारा विकास ऐसे ही आड़ा-तिरछा बढ़ता रहा है और उसी क्रम में मजदूरों का पलायन भी। समाजवादी इस क्रम को इंटरनल कालोनी वाले तर्क से समझाने की कोशिश करते थे। चुनाव के वक्त नेताओं और भाग्य विधाताओं को इन मजदूरों की याद इसलिए आती है, क्योंकि इनका वोट है।
चुनावी लोकतंत्र में वोट इतना बड़ा है कि आसानी से कल्पना नहीं होती, हालांकि इसी वोट को संदेहास्पद बनाने का जतन भी हो रहा है। कल्पना कीजिए, अगर यह अधिकार न होता तो इन मजदूरी की सुध लेने का होश किस नेता और अधिकारी को रहता। वर्षों पहले राजीव गांधी की सरकार ने एक ‘अंतर राज्य प्रवासी मजदूर कानून बनाकर कुछ चीजे व्यवस्थित करने का प्रयास किया था। वह बात जाने कहां पीछे छूट गई है। इसमें अपने प्रांत से बाहर जाने वाले मजदूरों के पंजीकरण की बात थी। अगर सही संख्या सामने आ जाए तो कोई भी सरकार और नेता इनकी उपेक्षा करने का साहस नहीं कर सकता। करोना की तालाबंदी में इन लाखों मजदूरों की जो दुर्गति हुई थी, वह भी यमती।
इस लेख का प्रयोजन चुनाव और मजदूरों की आवाजाही बढ़ाने या तकलीफों को बताने का नहीं है। हम जानते हैं कि लंबे इंतजार और सात-आठ साल की देरी से अभी जनगणना का काम शुरू हुआ है। घर गिनती से शुरुआत हुई है। अभी तक अपने यहां मजदूरों के पलायन का कोई ढंग का या अधिकृत आंकड़ा नहीं है। जब घर-घर जाकर सबको गिनने का क्रम चल रहा है तो इस श्रेणी को भी पर्याप्त महत्व देकर अलग स्थान दिया जाए। यह काम किसी ‘आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से नहीं होगा, घर-घर जाकर ही होगा। अपने यहां जनगणना लगातार दस साल पर हुई है, सिर्फ इसी बार क्रम तोड़ा गया है
उन कारणों में न भी जाएं और मोदी सरकार को आंकड़ों से डरने वाला न भी बताएं, तो यह कहना जरूरी है कि जब पचीसों पैमाने वाले आँकड़े जुटाए जा रहे हैं तो यह आंकड़ा भी जुटाया जाए, मजदूरों से संबंधित आँकड़े भी लिए जाएं। इन दो मामलों में काफी घालमेल है। मजदूरों के आंकड़ों में ‘नेशनल सैंपल सर्वे और जनगणना के आंकड़ों में भारी अंतर है और सरकार भी ‘पीएफ’ के खातों की संख्या देखकर मजदूरों की संख्या बताने का हास्यास्पद प्रयास करती है। प्रवासी मजदूरों के मामले में तो पूरा डिब्बा गोल है। सिर्फ अटकलों के आधार पर और वोट देखकर इनकी संख्या के बारे में अंदाजा लगाया जाता है।
संख्या जाने बगैर आर्थिक योजनाओं में प्रवासियों को उचित या अनुचित स्थान या महत्व की बात कैसे सोची जा सकती है? उनके मरने और जन्म लेने वालों तक के ऑकडे उपलब्ध नहीं हैं। उनकी कमाई को वापस घर तक पहुंचाना आज के युग में भी इतनी नाटकीयता और लूट से भरा है कि उस पर पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है। न्यूनतम मजदूरी कानून से लेकर परदेश की जमीन और भाषा से भिन्न इलाके के जीवन में क्या कुछ मुश्किलें आती हैं, उनका हिसाब लगाना मुश्किल है। इस बीच हम ये किस्से भी चटखारे लेकर छापते हैं कि केरल में मलयालम की परीक्षा में एक बिहारी मजदूर की बेटी टाप करती है। सिर्फ प्रवासी बन जाने से वहाँ रहना, खाना, पहनना, ओढना से लेकर पढ़ाई तक का काम कितना मुश्किल हो गया है इसकी कल्पना मुश्किल है। लोकतंत्र है तो संख्या और अब यह दूसरी ताकत भी तभी हासिल होगी जब पहला काम हो जाएगा। इसलिए इस जनगणना में प्रवासी मजदूरों की गिनती जरूर होनी चाहिए। लोकतान्त्रिक शासन हो तो संगठित जमातों की ‘बारगेनिंग पावर’ को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है।
आभार ; सर्वोदय प्रेस
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