भारत की विदेश एवं व्यापार नीति तथा ऊर्जा-कृषि-खाद्यान्न संकट

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India's Foreign and Trade Policy, and the Energy, Agriculture, and Food Crises

दुनिया आज गहरे संकट के दौर से गुजर रही है। यूक्रेन और ईरान से जुड़े युद्धों में बड़ी शक्तियों की भागीदारी ने वैश्विक अस्थिरता को तेज कर दिया है। ये संघर्ष अलग-थलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि नव-औपनिवेशिक संकट की गहराती प्रवृत्तियों का परिणाम हैं, जहाँ शक्तिशाली देश संसाधनों और रणनीतिक क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे परिप्रेक्ष्य में ईरान का इन दबावों के बीच टिके रहना वैश्विक दक्षिण के सभी राष्ट्र-राज्यों, विशेषकर भारत, के लिए महत्वपूर्ण महत्व रखता है। इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा और उर्वरक संकट पैदा हुआ है, जिससे कृषि प्रभावित हो रही है और खाद्य संकट की स्थिति बन रही है, साथ ही आवश्यक वस्तुओं की कमी बढ़ रही है।

महंगाई, बेरोजगारी और आजीविका का संकट तेजी से गहरा रहा है, जिसका सबसे अधिक असर मजदूरों, किसानों और हाशिये के वर्गों पर पड़ रहा है। युद्ध समाप्त होने के बाद भी यह संकट बना रहेगा क्योंकि वैश्विक उत्पादन, आपूर्ति और व्यापार में संरचनात्मक बाधाएँ उत्पन्न हो चुकी हैं।

इसी के साथ केंद्र सरकार की वर्तमान नीतियाँ—विशेषकर विदेश और व्यापार नीतियाँ—इस संकट को और बढ़ा रही हैं तथा देश की आर्थिक संप्रभुता को कमजोर कर रही हैं। इस पूरी स्थिति का बोझ समाज के सबसे कमजोर वर्गों पर डाला जा रहा है।
इस परिस्थिति में युद्ध और उसके आर्थिक प्रभावों के खिलाफ व्यापक जन-जागरूकता और प्रतिरोध खड़ा करना आवश्यक है।

प्रस्ताव:
1- यह सम्मेलन अमेरिका–इज़राइल गठजोड़ द्वारा संप्रभु राष्ट्र ईरान पर किए गए अवैध और अकारण आक्रमण की कड़ी निंदा करता है, जिसने वैश्विक अस्थिरता और जन-पीड़ा को बढ़ाया है। सम्मेलन भारत सरकार से मांग करता है कि वह इस आक्रमण के खिलाफ स्पष्ट, स्वतंत्र और सिद्धांत आधारित रुख अपनाए तथा राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा हो।

2- सम्मेलन यह रेखांकित करता है कि युद्ध समाप्त होने के बाद भी ऊर्जा और उर्वरक संकट जारी रहेगा, जिससे कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, खाद्य संकट गहराएगा, और महंगाई, मुद्रास्फीति व बेरोजगारी में वृद्धि होगी।

3- सम्मेलन यह संकल्प लेता है कि देशभर में अभियान चलाकर जनता को जागरूक किया जाएगा कि केंद्र सरकार की वर्तमान नीतियाँ—विशेषकर विदेश और व्यापार नीतियाँ—कैसे इस संकट को बढ़ा रही हैं और देश की आर्थिक संप्रभुता को कमजोर कर रही हैं।
रोजगार और सामाजिक अधिकार अभियान इस मुद्दे को अपने व्यापक आंदोलन का अभिन्न हिस्सा बनाएगा, जो युद्ध, आर्थिक संकट और मजदूरों, किसानों तथा हाशिये के वर्गों के अधिकारों को जोड़ता है।

रोजगार और सामाजिक अधिकार अभियान

आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट, राष्ट्रीय किसान मंच, राष्ट्र उदय पार्टी, राज्याधिकार पार्टी, इंडियन प्रजा कांग्रेस,नवनिर्माण कृषक संगठन, भारतीय मानव समाज पार्टी,उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी, कर्नाटक जनशक्ति, संपूर्ण भारत क्रांति पार्टी ।


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