भारत में समकालीन युवा आंदोलन: परिवर्तन की राजनीति और राजनीति का परिवर्तन

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Sonam Wangchuk

Randhir K Gautam

— Randhir Gautam —

ह संतोष की बात है कि लंबे समय के बाद जन आंदोलनों में युवाओं की भूमिका और महत्त्व को फिर से केंद्रीय स्थान मिला है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1942 के आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1975–77 के लोकतांत्रिक आंदोलन तक युवाओं ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। उसके बाद शायद यह पहला अवसर है जब युवाओं ने शिक्षा के प्रश्न को केंद्र में रखकर इतना व्यापक आंदोलन खड़ा करने का निर्णय लिया है। जब युवाओं की पहचान पर जाति, धर्म और क्षेत्रीय अस्मिताएँ हावी हो जाती हैं तब युवा आंदोलन बिखर जाता है। किंतु शिक्षा और बेरोज़गारी के प्रश्नों ने एक बार फिर युवाओं को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहाँ उनकी शक्ति एक व्यापक जनशक्ति के रूप में उभर सकती है। मंडल और कमंडल की राजनीति ने युवा शक्ति को गहरे स्तर पर विभाजित किया। परिणामस्वरूप, पूरे युवा आंदोलन की ऊर्जा लंबे समय तक खंडित और बिखरी रही। इसके बाद राम मंदिर आंदोलन के दौरान मंदिर और मस्जिद की राजनीति ने भी युवाओं के बीच गहरी खाई पैदा की। अब ‘कॉकरोच आंदोलन’ ने शायद पहली बार ऐसा अवसर प्रदान किया है, जहाँ शिक्षा के व्यवसायीकरण, लगातार महंगी होती शिक्षा, घटते रोजगार के अवसर और राज्य की कमजोर होती भूमिका जैसे प्रश्न एक साझा चिंता के रूप में सामने आए हैं। बाज़ार की बढ़ती शक्ति के सामने संघर्ष कर रहे वंचित और साधनहीन युवाओं का एक बड़ा वर्ग भी इस आंदोलन से स्वयं को जोड़ता हुआ दिखाई दे रहा है।
आज के समय में युवा होना अपने आप में एक बड़ी त्रासदी से गुजरने जैसा अनुभव है। युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीरता से सोचने वाले लोग कम होते जा रहे हैं। संभावनाएँ सिमटती जा रही हैं, जबकि चुनौतियाँ लगातार बढ़ रही हैं। पूरी आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था का बोझ असमान रूप से युवाओं के कंधों पर डाला जा रहा है। ऐसी स्थिति में युवा होना कई बार मानो किसी दोष या दंश की तरह महसूस होने लगा है।

युवाओं के इस उभरते आंदोलन को समझने के लिए कुछ संरचनात्मक कारणों पर भी ध्यान देना आवश्यक है। सबसे पहले, नवउदारवाद की प्रक्रिया ने राज्य की क्षमता को लगातार कमजोर किया है, जबकि बाज़ार की शक्ति को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया है। बाज़ार की इस बढ़ती शक्ति के साथ-साथ युवाओं के बीच असमानता और बेरोज़गारी भी तेज़ी से बढ़ी है। जैसे-जैसे यह आंदोलन गति पकड़ रहा है, वैसे-वैसे केवल शिक्षक और विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि अभिभावक भी इससे जुड़ते जा रहे हैं। धीरे-धीरे यह आंदोलन एक ऐसे सामाजिक गठबंधन का रूप ले रहा है, जिसके आधार पर भविष्य में एक सफल और व्यापक जनांदोलन की संभावना दिखाई देती है। युवा बने रहने की सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि उसका वर्तमान और भविष्य शिक्षा से गहराई से जुड़ा हुआ है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा युवाओं की संभावनाओं का विस्तार करती है, जबकि दोषपूर्ण शिक्षा उनकी संभावनाओं को लंबे समय के लिए कुंठित कर देती है। बेरोज़गारी का समाधान किसी के पास दिखाई नहीं देता, जबकि वस्तुतः उसके समाधान के लिए राज्य, समाज और नीति-निर्माताओं—सभी की जिम्मेदारी है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि शिक्षा के लिए चल रहे इस आंदोलन को किस प्रकार व्यापक युवा चेतना और सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन में बदला जाए। शिक्षा और रोजगार आज युवाओं के जीवन के दो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। परीक्षाओं में अनियमितताओं, पेपर लीक और भर्ती प्रक्रियाओं में लगातार हो रही देरी के कारण लाखों विद्यार्थी वर्षों से रोजगार की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनके साथ-साथ लाखों परिवार भी इस संकट का बोझ उठा रहे हैं। इस स्थिति की जिम्मेदारी सरकार से टाली नहीं जा सकती।

बिहार जैसे राज्यों में तो स्थिति और भी विडंबनापूर्ण है। अनेक मामलों में युवाओं का चयन और नियुक्ति होने के बाद भी उन्हें सेवा से बाहर कर दिया जाता है। सैकड़ों भर्ती मामले न्यायालयों में वर्षों से लंबित हैं। परिणामस्वरूप, हजारों युवा रोजगार प्राप्त करने के बाद भी फिर से बेरोज़गारी का जीवन जीने के लिए विवश हो जाते हैं। इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है?
यहाँ तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े छात्र संगठनों, विशेषकर एबीवीपी तथा अन्य संगठनों के पास भी इन प्रश्नों का कोई ठोस उत्तर दिखाई नहीं देता। वे भी शिक्षा की नीतियों और वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं का प्रभावी बचाव नहीं कर पा रहे हैं। विडंबना यह है कि उन संगठनों के अनेक कार्यकर्ता भी उच्च शिक्षा और डिग्रियाँ प्राप्त करने के बावजूद रोजगार के लिए दर-दर भटकने को विवश हैं।

समकालीन आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके नेतृत्व और कार्यकर्ताओं ने हमेशा गांधी, अंबेडकर, नेहरू और भगत सिंह जैसे महान व्यक्तित्वों को अपनी प्रेरणा का स्रोत माना है। राष्ट्रीय आंदोलन की इन्हीं लोकतांत्रिक और मानवीय परंपराओं से प्रेरित युवाओं का यह विश्वास इस आंदोलन को भटकने नहीं देगा। यही वह बुनियादी अंतर भी है, जो भारत के युवा आंदोलन को नेपाल और बांग्लादेश के हालिया युवा आंदोलनों से अलग करता है। भारतीय युवा आंदोलन अपने स्वतंत्रता संग्राम और उसके सेनानियों के मूल्यों को अपनी वैचारिक विरासत मानता है।

जहाँ तक इस आंदोलन के नेतृत्व का प्रश्न है, अब तक उसके विरुद्ध कोई गंभीर नैतिक या वैचारिक आरोप सामने नहीं आया है। किसान आंदोलन की सफलता ने भी इस संघर्ष को नई आशा और नया आत्मविश्वास प्रदान किया है।

जयप्रकाश नारायण हमेशा कहते थे कि युवाओं को राजनीतिक दलों की सीमाओं से ऊपर उठकर एक व्यापक युवा शक्ति का निर्माण करना चाहिए, जो देश की व्यवस्था-परिवर्तन की वाहक बने। ऐसा प्रतीत होता है कि आज फिर वही दौर लौट रहा है। भले ही जयप्रकाश नारायण आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी दृष्टि और उनकी संभावनाएँ युवाओं की नई चेतना में फिर से साकार होती दिखाई दे रही हैं।

इसी कारण इस आंदोलन में निर्दलीय और जन-आधारित नेतृत्व की जो अवधारणा उभरकर सामने आई है, वह यह संकेत देती है कि इस आंदोलन की गति, ऊर्जा और दिशा—तीनों सही मार्ग पर हैं। जिस प्रकार इसके नेतृत्व ने संयम, सतर्कता, सत्याग्रह और शांति को अपने मूल मूल्य के रूप में स्वीकार किया है, उससे आशा की जा सकती है कि यह आंदोलन आने वाले समय में एक व्यापक जनांदोलन का रूप लेकर भारतीय लोकतंत्र को नई दिशा प्रदान करेगा।

वामपंथी राजनीति के लिए भी यह युवा आंदोलन नई संभावनाएँ लेकर आया है। इस आंदोलन से ही अनेक नए युवा नेतृत्व उभरकर सामने आ रहे हैं। वामपंथी संगठनों ने जिस प्रकार इस आंदोलन को सहयोग और समर्थन दिया है, उससे वाम राजनीति से जुड़े युवाओं के बीच भी एक नया विश्वास पैदा हुआ है।

हर आंदोलन एक नई राजनीतिक शक्ति को जन्म देता है। संघर्ष की प्रक्रिया से निकली यही शक्ति आगे चलकर राजनीति में नए प्रयोगों और नए विकल्पों का आधार बनती है।

कांग्रेस मूलतः आंदोलन की नहीं, बल्कि संगठन और सत्ता की राजनीति की वाहक रही है। वह प्रायः सत्ता परिवर्तन को ही राजनीतिक परिवर्तन का प्रमुख माध्यम मानती है। यही कारण है कि अनेक बड़े युवा आंदोलनों से निकले क्रांतिकारी नेता अंततः सत्ता परिवर्तन की राजनीति तक सीमित होकर रह गए। कन्हैया कुमार से लेकर जिग्नेश मेवाणी तक अनेक उदाहरण इस प्रवृत्ति की ओर संकेत करते हैं। सैद्धांतिक रूप से इसे सत्ता और संघर्ष की राजनीति के बीच मौजूद ऊर्जा और दृष्टि के अंतर के रूप में देखा जा सकता है।

जन आंदोलनों में संप्रभुता का प्रश्न हमेशा केंद्रीय रहा है। जब युवा शक्ति अपनी स्वतंत्र सामाजिक और राजनीतिक संप्रभुता के साथ किसी आंदोलन का निर्माण करती है, तब वह राजनीति को नई दिशा और नए विमर्श प्रदान करती है।

शिक्षकों के इस आंदोलन से जुड़ने के कारण एक नए प्रकार का राजनीतिक समाजीकरण (Political Socialization) भी विकसित हो रहा है। जो युवा अब तक स्वयं को केवल करियर और प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित रखते थे, वे अब सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ व्यवस्था परिवर्तन की बहस में भी भागीदारी कर रहे हैं। यह भारतीय लोकतंत्र और राजनीति के लिए एक शुभ संकेत है।

युवाओं के बीच यह समझ विकसित हो रही है कि राजनीति से दूरी बनाकर अपने भविष्य को सुरक्षित नहीं किया जा सकता। पहले अनेक युवा कहा करते थे कि उन्हें केवल अपने करियर से मतलब है, राजनीति से नहीं। लेकिन अब उन्हें अनुभव हो रहा है कि शिक्षा, रोजगार और करियर का भविष्य अंततः राजनीतिक निर्णयों से ही निर्धारित होता है।
कहा जाता है कि प्रत्येक संकट अपने भीतर एक नई संरचना और नई संभावनाओं के बीज लेकर आता है। वर्तमान युवा आंदोलन ने भी शिक्षा व्यवस्था के पुनर्गठन की आवश्यकता को प्रमुखता से सामने रखा है। अब यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह आंदोलन की लोकतांत्रिक मांगों को स्वीकार कर अपनी साख बचाती है या उन्हें अनसुना कर स्वयं अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता को कमजोर करती है।

निर्दलीय आंदोलनों का प्रभाव प्रायः दूरगामी होता है। जब स्वतंत्र चेतना वाले लोग किसी व्यापक राजनीतिक प्रक्रिया से जुड़ते हैं और आंदोलन का चरित्र निर्दलीय बना रहता है, तब उसकी व्यापकता और स्वीकार्यता दोनों बढ़ जाती हैं। ऐसे आंदोलनों में नए प्रयोग, नई रचनात्मकता और संघर्ष के नए आयाम विकसित होते हैं।

निर्दलीय आंदोलनों से जुड़े लोगों में सामाजिक सरोकार, सार्वजनिक उत्तरदायित्व और सक्रिय नागरिकता की भावना अधिक प्रबल होती है। सामान्यतः निर्दलीय राजनीति को उसकी सत्ता से दूरी के कारण कमजोर समझ लिया जाता है, क्योंकि उसका आग्रह सेवा और लोकशक्ति पर होता है, न कि सत्ता प्राप्ति पर। किंतु इस आंदोलन ने इस धारणा को चुनौती दी है और निर्दलीय राजनीति की संभावनाओं को नए सिरे से सामने रखा है। यही कारण था कि JP भी अपने आंदोलनों में निर्दलीयता पर विशेष बल देते थे।
‘युवा आंदोलन: भविष्य और विरासत’ शीर्षक से लिखे अपने एक लेख में मैंने इन प्रश्नों पर विस्तार से चर्चा की है।
हर आंदोलन अपने पीछे बड़े और दूरगामी परिणाम छोड़ता है। जो लोग संकोचवश इस युवा आंदोलन की तुलना केवल अन्ना आंदोलन से कर रहे हैं, वे शायद यह नहीं देख पा रहे कि आज सैकड़ों ऐसे युवा सामने आए हैं जिनका राजनीतिक समाजीकरण अन्ना आंदोलन से हुआ। वे अपने-अपने स्तर पर सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहे हैं और उनमें से अनेक युवाओं ने किसान आंदोलन जैसे लोकतांत्रिक संघर्षों में भी सक्रिय भागीदारी की है। इसलिए इस आंदोलन को केवल किसी पुराने आंदोलन की पुनरावृत्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक नई ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समझने की आवश्यकता है।

हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि कोई भी आंदोलन स्वर्ग नहीं देता; वह केवल स्वर्ग का सपना दिखाता है और हमें उस दिशा में चलने का मार्ग दिखाकर आगे बढ़ने के लिए छोड़ देता है। चाहे वह लेनिन का आंदोलन हो या गांधी का, कोई भी आंदोलन अंतिम लक्ष्य नहीं होता। वह एक प्रकार से स्वर्ग के द्वार तक पहुँचकर लौट आने की प्रक्रिया है। आंदोलन में सहभागी होने से भविष्य के सपनों का विस्तार होता है, संभावनाओं का आविष्कार होता है, आत्मविश्वास बढ़ता है और उससे भी अधिक परिवर्तन की राजनीति तथा राजनीति के परिवर्तन की दिशा और दृष्टि प्राप्त होती है।

आंदोलन से जुड़े लोगों को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि किसी एक व्यक्ति के रहने या न रहने से आंदोलन समाप्त नहीं होता। नए लोग आएँगे, नए सपनों के साथ आएँगे और अपने पीछे नई विरासत छोड़कर जाएँगे। यही बोध गांधी में था। इसलिए उन्हें कभी इस बात का न उन्माद हुआ कि वे एक महान नेता हैं और न ही इस बात का अवसाद कि उनके बिना परिवर्तन संभव नहीं होगा।
क्रांति जब सफल होती है, तब वह केवल सत्ता परिवर्तन की घटना नहीं रह जाती, बल्कि समाज की नई संरचना का आधार बनती है। इसलिए किसी भी क्रांति का उद्देश्य केवल सफलता प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक बेहतर समाज की सतत साधना होना चाहिए। इसी कारण तपस्या, धैर्य और नैतिक प्रतिबद्धता का महत्व बढ़ जाता है।

जो लोग कभी यह प्रश्न उठाते थे कि युवा कहाँ हैं, आज जब वे युवाओं और दलित नेतृत्व को उभरते हुए देख रहे हैं, तो आंदोलन को समझने के बजाय उसकी आलोचना में लगे हुए हैं। मेरी दृष्टि में आंदोलन का न तो कांग्रेसीकरण होना चाहिए और न ही भाजपाकरण। जनआंदोलन का कार्य सत्ता और विपक्ष—दोनों को लोकशक्ति के प्रति जवाबदेह बनाए रखना है।
कुछ लोग यह प्रश्न भी उठाते हैं कि आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कम क्यों दिखाई देती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम आज भी एक गहरे पितृसत्तात्मक समाज में रहते हैं, जहाँ सार्वजनिक जीवन में आगे आने वाली महिलाओं पर तरह-तरह के व्यक्तिगत और सामाजिक आक्षेप लगाए जाते हैं। कई बार उनके परिवारों को भी निशाना बनाया जाता है। इसके बावजूद जो महिलाएँ इस आंदोलन में आगे आई हैं, वे विशेष सम्मान और अभिनंदन की पात्र हैं।

जिन यूट्यूबर्स और युवाओं को माननीय न्यायाधीश की टिप्पणी के बाद ‘कॉकरोच’ कहा गया, वे वस्तुतः उस युवा चेतना के प्रतीक हैं जो व्यवस्था की विफलताओं के कारण रोजगार से वंचित रही है और अब लोकतांत्रिक ढंग से अपनी आवाज़ बुलंद कर रही है।
जो लोग यह दावा करते हैं कि संगठन के बिना कोई आंदोलन नहीं हो सकता, वे संगठन-केंद्रित सोच के शिकार हैं। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि पहले आंदोलन जन्म लेते हैं और फिर उन्हीं आंदोलनों से संगठन विकसित होते हैं। संगठन आंदोलन के स्वप्न को अधिक व्यापक और स्थायी स्वरूप देते हैं। यदि बिना पूर्व-निर्मित संगठन के मिस्र में जनक्रांति संभव हो सकती है, तो भारत में भी नए लोकतांत्रिक जनआंदोलन अपनी राह बना सकते हैं।

आज मध्यमवर्ग का बड़ा हिस्सा अपने बच्चों की शिक्षा के लिए ऋण ले रहा है, घर बनाने के लिए ऋण ले रहा है और लगभग पूरा जीवन ऋण के सहारे जी रहा है। ऐसे समय में समाज के प्रत्येक संवेदनशील नागरिक को कम-से-कम शिक्षा को ऋण-मुक्त और सबके लिए सुलभ बनाने की माँग का समर्थन करना चाहिए। बेहतर शिक्षा ही बेहतर भविष्य की आधारशिला है।
आज जो युवा वैचारिक लेखन कर रहे हैं, उन्हें भी इस आंदोलन के मूल प्रश्नों के साथ खड़ा होना चाहिए। अन्यथा भविष्य में उन्हें यह आत्मग्लानि हो सकती है कि परिवर्तन के एक ऐतिहासिक अवसर पर वे मौन दर्शक बने रहे।

आंदोलनधर्मिता युवावस्था का स्वाभाविक गुण है। यदि आज समाजवादी चेतना रखने वाले लोग भी आंदोलनों से दूर होते जा रहे हैं, तो उन्हें आत्ममंथन करना चाहिए कि कहीं वे स्वयं यथास्थिति का हिस्सा तो नहीं बन गए हैं।

आंदोलनकारियों को भी यह स्मरण रखना चाहिए कि किसी भी आंदोलन का सबसे बड़ा शत्रु अहंकार होता है। जब किसी पीढ़ी को यह भ्रम हो जाता है कि उससे बड़ा कोई नेतृत्व नहीं हो सकता, तभी आंदोलन की ऊर्जा क्षीण होने लगती है।

आज सरकार के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं। पहली, उसने लोकतांत्रिक संप्रभुता की भावना को कमजोर किया है; और दूसरी, सार्वजनिक उत्तरदायित्व के बोध को क्षीण होने दिया है। यदि विश्वविद्यालयों का लोकतांत्रिक वातावरण और सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था सुरक्षित नहीं रहेगी, तो सामाजिक और आर्थिक असमानता और गहरी होगी। गरीब और अधिक गरीब तथा अमीर और अधिक अमीर होता जाएगा। इसलिए सार्वजनिक शिक्षा की रक्षा का यह संघर्ष केवल शिक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि समानता, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की रक्षा का भी संघर्ष है।

समाजशास्त्रियों ने भी युवाओं को अपेक्षाकृत देर से पहचाना। आधुनिक समाजशास्त्र में युवा एक स्वतंत्र अध्ययन-विषय के रूप में बहुत बाद में उभरकर सामने आए। बीसवीं शताब्दी के छठे दशक में जब अमेरिका और यूरोप में व्यापक छात्र एवं युवा आंदोलन शुरू हुए, तब प्रचलित प्रकार्यवाद (Functionalism) और मार्क्सवाद—दोनों ही इन आंदोलनों की प्रकृति को पूरी तरह समझने में असफल रहे। इन आंदोलनों ने केवल आर्थिक वर्ग (Class) के प्रश्नों तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि लैंगिक समानता, यौनिकता, महिला अधिकार, सांस्कृतिक स्वतंत्रता और जीवन-शैली जैसे नए प्रश्नों को भी सामाजिक विमर्श के केंद्र में स्थापित किया। इस प्रकार एक ऐसा नया बौद्धिक परिदृश्य निर्मित हुआ, जिसने पारंपरिक वर्ग-विश्लेषण से आगे बढ़कर समाजशास्त्र को नई दिशा दी।

धीरे-धीरे इसी पृष्ठभूमि में ‘न्यू सोशियोलॉजी’ और नए सामाजिक आंदोलनों की अवधारणा विकसित हुई। फ्रांस के छात्र आंदोलन ने युवाओं को एक नई राजनीतिक और सामाजिक पहचान प्रदान की। भारत में भी यही वैचारिक पृष्ठभूमि आगे चलकर के नेतृत्व में हुए छात्र-युवा आंदोलन के लिए प्रेरक बनी।

जैसे चिंतकों ने युवाओं के विद्रोह को नई दार्शनिक वैधता प्रदान की, जबकि ने अपनी प्रसिद्ध कृति के माध्यम से विकसित औद्योगिक समाज की आलोचना करते हुए युवाओं को परिवर्तन की एक नई सामाजिक शक्ति के रूप में देखा। इसी प्रकार के वैधता-संकट के सिद्धांत के आलोक में भी वर्तमान युवा आंदोलनों को समझा जा सकता है।

वर्तमान युवा आंदोलन केवल युवाओं की असंतुष्टि का परिणाम नहीं है; यह राज्य की वैधता (Legitimacy Crisis) के संकट का भी द्योतक है। जब सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था बाज़ार की बढ़ती शक्ति के सामने कमजोर होती जाती है, नवउदारवादी नीतियाँ असमानता को संस्थागत रूप देती हैं और रोजगार के अवसर लगातार सिकुड़ते हैं, तब युवाओं की चेतना एक नए समाजशास्त्रीय विमर्श को जन्म देती है। इसलिए समय-समय पर समाजशास्त्र को भी अपने विश्लेषण के नए औजार विकसित करने पड़ते हैं। इतिहास बताता है कि जब पुराने सिद्धांत बदलती सामाजिक वास्तविकताओं को समझने में असफल होने लगते हैं, तब नए सैद्धांतिक प्रतिमान जन्म लेते हैं। इस तरह आंदोलन स्वयं वैधता-संकट (Legitimacy Crisis) का सामाजिक परिणाम होता है।


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