सोनम वांगचुक का जंतर मंतर पर आमरण अनशन या युवाओं तथा विद्यार्थियों का विरोध एक बड़ा साहस!

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Sonam Wangchuk

— शंभू नाथ —

सोनम वांगचुक का जंतर मंतर पर आमरण अनशन या युवाओं तथा विद्यार्थियों का विरोध एक बड़ा साहस है और हम इसे दुर्लभ भी कह सकते हैं, क्योंकि पहली बार आंदोलनकारी स्थानीय नहीं एक व्यापक राष्ट्रीय मुद्दे पर सभी दीवारें तोड़कर एक साझी नागरिकता के आधार पर खड़े हुए हैं। वे शिक्षा पद्धति में सुधार को सही ट्रैक पर लाने के लिए यह विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

गांधी के अनशन में ताकत थी क्योंकि अंग्रेज सुनते थे। आज स्थिति विपरीत है। देश में भीषण संवेदनहीनता है और जनहित की जगह पार्टी हित प्रबल है। अब हर मसले पर एक सवाल है, इसमें हमारी पार्टी का क्या फायदा है?

आज के समय में विरोध का दर्शन और विरोध की सामाजिक-राजनीतिक प्रवृत्ति कई कारणों से अपेक्षाकृत कमजोर, बिखरी हुई और खंडित हो गई है। यह स्थिति केवल किसी एक देश की नहीं, बल्कि विश्वव्यापी है।
इसके कुछ प्रमुख कारण हैं—
1) बाज़ार का वर्चस्व बढ़ा है। जब व्यक्ति का ध्यान मुख्यतः मनोरंजन, उपभोग और व्यक्तिगत सफलता पर केंद्रित हो जाता है, सार्वजनिक प्रश्नों पर संगठित प्रतिरोध कमजोर पड़ता है।

2) पिछले कई दशकों से आइडेंटिटी पॉलिटिक्स की इतनी धूम मची हुई है कि जाति, धर्म, नस्ल, लिंग या कोई अन्य खास पहचान-आधारित मुद्दा न हो तो साझा नागरिकता पर व्यापक एकजुटता संभव नहीं हो पाती। न स्त्रियां उससे अपने को आइडेंटिफाई कर पाती हैं, न दलित, न आदिवासी और न पिछड़े। हर जगह सवाल रहता है, इसमें मेरा फायदा क्या है! नेता राष्ट्रीय मानसिकता का इतना ध्वंस कर चुके हैं कि हमारा देश एक नए तंतर–मंतर में फँस गया है!

उपर्युक्त घटना से वैचारिक आधार पर जो भारी क्षय हो रहा है, वह कब रुकेगा और कब क्षतिपूर्ति होगी, और कब सोनम वांगचुक और विद्यार्थियों के इतने जोखिम भरे आंदोलन सुने जाएंगे या कम से कम संवाद संभव होगा, यह कहना मुश्किल है!

3) एक अन्य मामला है, समाज में उच्च आदर्शगत वैचारिक ढाँचे के कमजोर होते जाने से विरोध दीर्घकालिक नहीं हो पाता। अब असंतोष प्रबंधन के नए– नए राजनीतिक, तकनीकी और प्रशासनिक औजार बन गए हैं। खुद सोशल मीडिया में अंधभक्तों और बेशर्मी से भरे पेशेवरों की एक शक्तिशाली फौज है। शक्तिशाली सत्ता पक्ष अब विरोधों की परवाह नहीं करता। उसके लिए दो–चार–दस लोगों का मरना भी कोई खास अर्थ नहीं रखता, इतनी निर्दयता आ गई है।

4) इस युग में विरोध में युवाओं और वरिष्ठ नागरिकों की व्यापक हिस्सेदारी के बावजूद आंदोलन में विस्तार न होने का एक कारण लोगों में आर्थिक असुरक्षा का भय और सुख–सुविधाओं का लोभ है। अस्थायी रोजगार, प्रतिस्पर्धा और आर्थिक अनिश्चितता के कारण बहुत से लोग विरोध की व्यक्तिगत कीमत चुकाने से बचना चाहते हैं। इससे संगठित प्रतिरोध की क्षमता घट जाती है।
यह भी है कि कई विरोध दिखाई देते हैं, पर वे व्यापक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में दीर्घकालिक शक्ति में परिवर्तित नहीं हो पाते।

इन विपरीत स्थितियों में इतने सारे युवाओं और विद्यार्थियों ने तथा सोनम वांगचुक ने न्यायपूर्ण शिक्षा के लिए अपने आंदोलन को अपने त्याग से इतना ’विजिबल’ बना दिया है और सत्ता का बहरापन अब इतने बड़े पैमाने पर एक्सपोज हो रहा है कि बेशरमों को छोड़ कर इस आंदोलन से देश के नागरिकों की सहानुभूति बढ़ती जा रही है।


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