आज दिल्ली जवान हो गई थी। सुबह घर से प्रोटेस्ट के स्थल जंतर मंतर जाने के लिए निकला तब अंदाज़ा नहीं था कि क्या देखने को मिलेगा। मैं और शशि शेखर जी पहले से तय किया था वैसे मेट्रो में ही मिल गये। उतरना था पटेल चौक, लेकिन मेट्रो ने उस स्टेशन की सेवा आज बंद कर दी थी, ताक़ि कोई जंतर मंतर पहुँच न पाए। हम केन्द्रिय टर्मिनल उतरे, बाहर निकले तो पुलिस ने जानना चाहा कि हम कौन हैं, कहाँ जा रहे हैं। शशि जी ने खाकी वर्दी की बखिया उधेड़ के रख दी – तुम होते कौन हो, हमें पूछने वाले….। आख़िर हम पैदल चल पड़े। रास्ते में जवानी ही जवानी दिख रही थी। जहाँ जाओ वहाँ लोगों का हुजूम नारे लगाता हुआ जंतर मंतर की ओर बढ़े जा रहा था। जब जंतर मंतर रोड पर धरने के स्थान पर पहुँचे तो वहाँ भी बैरिकैड लगा था। लेकिन पुलिस ने क्या समझ कर बैरिकैड लगाया होगा यह समझ में नहीं आया. क्योंकि बैरिकैड के बाहर कम-से-कम दो हज़ार की भीड़ थी। बैरिकैड खोल दिया गया तब भी हम zero point तक पहुँच नहीं पाए क्योंकि जहाँ मंच लगा था वह जगह तो कम-से-कम 200 मीटर दूर थी और सिर्फ तिरंगे, बैनर और काले सिर दिख रहे थे। मंच मुझे तो नज़र ही नहीं आया। घर से चलते वक़्त कई साथियों को फोन कर के बताया था कि हम वहाँ किसी ख़ास जगह पर मिलेंगे। लेकिन रास्ते तो सारे बंद थे! कौन कहाँ से पहुँचेगा यह सोचना भी संभव नहीं था।
ईमानदारी से कहूँ तो जब पहली बार मैं शशि शेखर जी के साथ सोनम वांगचुक जी और आईसा के छात्र-छात्राओं को समर्थन और अनशन छोड़ने का अनुरोध पत्र देने गया था तब इतनी भीड़ नहीं थी। लेकिन आज…? मैंने यह दिल्ली पिछले पचास साल में पहली बार देखी।
करीब दो घंटे वहाँ ठहर कर घर जाने की सोची, लेकिन जाएं तो कैसे? मेट्रो के कई स्टेशन बंद कर दिये थे, या वहाँ इतनी लंबी लाइनें थीं कि घंटों तक इंतज़ार करना पड़ सकता था। राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के तो कई दरवाज़े ही बंद कर दिये थे, शायद अंदर इतनी भीड़ हो गई थी कि एक भी व्यक्ति का जाना संभव नहीं रहा था। कनॉट प्लेस तक और बाद में मंडी हाउस तक पैदल मार्च करते हुए पहुँचा, लेकिन रास्ते में चार जगह जुलूस मिले। लोगों ने सेल्फ-डिसीप्लीन से संपूर्ण शांति से अपनी कूच जारी रखी।
एक जगह बहुत बड़ा जुलूस सामने से आ रहा था। मैंने सोचा कि इसे निकल जाने दें, बाद में चलें। लेकिन वह तो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। धीरे धीरे मैं आगे बढ़ता रहा, मेरे रास्ते का अंत आ गया, लेकिन जुलूस ख़त्म नही हुआ। और इसका कोई मार्गदर्शन नहीं कर रहा था। दो-दो की जोड़ी में चलवाने वाला कोई नहीं था, रुकने-बढ़ने के लिए कहने वाला कोई नहीं था। एक चल पड़ा, पीछे दूसरा चल पड़ा, पीछे तीसरा – और कमसे कम दो लाख लोग इस तरह चल पड़े। कोई अपने साथ अपने मेगाफोन लाए थे, तो कोई पूरा साउंड सेट। नारे भी नये मिले – कोई सोनम वांगचुक का या अभिजीत दिप्के का जयजयकार नहीं कर रहा था। नारों में इक्कादुक्का छोड़ कर ज़्यादातर में धर्मेंद्र प्रधान को कोई याद नहीं कर रहा था। प्रमुख नारे थे – “मोदी तेरे राज में हम हुए बर्बाद”, “जब भी मोदी डरता है, पुलिस को आगे करता है”, “मोदी हटाओ, देश बचाओ”… चाहे आंदोलन की शुरुआत में जो भी माँग रही हो, युवा जानता है कि कौन ज़िम्मेदार है, आज के हालात के लिए।
आज दिल्ली ने राजनीति के परम पंडितों को ज्ञान दिया कि “भाईसा’ब, आप व्यक्ति के अनशन पर अटके हो, उसे किसने स्पॉंसर किया यह ढूंढने में लगे हो लेकिन आम आदमी की सोच को नहीं समझ पाए। कोई भी एजिटेशन किसी एक मुद्दे पर शुरु होता है, वह मूवमेंट तब बनता है जब कई जगहों से वैसी ही आवाज़ें उठे और नये नये मुद्दे जुड़ते जाएं। मोदी को हटाना आज के प्रोटेस्ट का मुख्य सुर था। और देश के कई भागों में आज विरोध प्रदर्शन हुए उस पर से मैं मानता हूँ कि यह अब एजिटेशन से आगे बढ़ कर मूवमेंट बनने की राह में है।
प्रोटेस्ट को रोकने में सरकार कितनी कामयाब हुई? सरकार ने तो एक जगह बंद की, लोग तो जहाँ जगह मिली, वहाँ जम कर बैठ गये और प्रोटेस्ट किया! एक जगह लाठी चार्ज भी किया गया, और पुलिस की लाठी से पांच फूट दूरी होने के कारण बच गया। आँसू गैस भी छोड़ी गई, हालांकि उस जगह पर मैं मौजूद नहीं था। मेट्रो बंद करने पर भी तीन लाख लोगों को कनॉट प्लेस पहुँचने से रोकने में भी सरकार कामयाब नहीं हुई।
वापस आते ऑटो में से मैने कनॉट प्लेस में एक बोर्ड देखा – You will see Delhi like never before. यह किस उद्देश्य से लिखा गया यह पता नहीं लेकिन आज मै्ने जो दिल्ली देखी वैसी तो पहले कभी नहीं देखी थी।
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