भारतीय जनता के नाम एक पत्र

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A Letter to the People of India

प्रिय देशवासियों,
हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह स्वतंत्रतापूर्वक किसी भी राजनीतिक विचारधारा को अपना सकता है। आपके परिवार में, आपके पड़ोस में और आपके मित्रों में भी ऐसे लोग होंगे जिनकी राजनीतिक विचारधारा आपसे भिन्न होगी। यहाँ तक कि आपका जीवनसाथी या प्रिय व्यक्ति भी आपसे अलग राजनीतिक विचार रख सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि आप उसे अपमानजनक माने । किसी दूसरे व्यक्ति की राजनीतिक विचारधारा से आपको अपमानबोध नहीं होना चाहिए, जब तक कि वह हिंसा, मानव गरिमा के उल्लंघन या अत्याचार का समर्थन न करती हो।

याद रखिए, जिस बच्चे का आप पालन-पोषण कर रहे हैं, हो सकता है की वह भी एक उम्र के बाद आपसे अलग राजनीतिक राय रख सकता है। कहीं ऐसा न हो कि राजनीतिक नफरत करते-करते आप अपने ही बच्चों से दूरी बनाने लगें। जिस संयम और सम्मान के साथ आप अपने परिवार के सदस्यों के राजनीतिक मतो को स्वीकार करते हैं, उसी प्रकार राजनीतिक मतभेदों को भी स्वीकार करना चाहिए।

जहाँ तक किसी भी राजनीतिक विषय पर अभिव्यक्ति का प्रश्न है, वह उतनी ही आवश्यक है जितना मतदान करके सरकार चुनना। लोकतंत्र में सरकार जनता के अधीन होती है, न कि जनता सरकार के अधीन। यदि हम किसी सरकार के अधीन होने को गौरव मानकर उसके आलोचकों से नफरत करने लगें, तो हम एक प्रकार से अपने नागरिक धर्म का अपमान करते हैं। लोकतंत्र संवाद, असहमति (Dissent) और विचार-विमर्श से ही पल्लवित और पुष्पित होता है।

मुझे याद है कि जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तब हमें अलग-अलग विचारधाराओं वाले शिक्षकों ने पढ़ाया। यह हमारे विवेक और राजनीतिक चेतना के स्तर पर निर्भर करता है कि हम किस विचारधारा को स्वीकार करते हैं। मैंने आज दलीय राजनीति से अधिक जनआंदोलनों की राजनीति को राष्ट्र-निर्माण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना है और दशकों से ऐसे लोगों के बीच रहा हूँ जो किसी राजनीतिक दल से जुड़े बिना समाज सेवा का कार्य कर रहे हैं।

अभी कल ही एक संवाद में हमने युवा आंदोलन के बारे में कहा कि इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में सामाजिक ऊर्जा है। प्रतीक कोई भी हो सकता था; सोनम वांगचुक केवल एक नाम हैं। हमारे जैसे लाखों युवाओं ने सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त की है। आज जब मैं परिवारों को अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए महँगी फीस भरते, रिश्तेदारों को कर्ज लेकर निजी विश्वविद्यालयों में बच्चों को पढ़ाते देखता हूँ, तो मन में पीड़ा होती है कि हमने कैसी व्यवस्था बना दी है, जिसमें गरीब के लिए शिक्षा प्राप्त करना कठिन हो गया है।

शिक्षा, जो मनुष्य को आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता की ओर ले जाती है, आज आर्थिक असमानता के कारण वह न्याय पूर्ण नहीं बची है । एक अर्थ में शिक्षा का भी वर्गीकरण हो गया है, जहाँ गरीबों को गुणवत्ताहीन संस्थानों तक सीमित कर दिया गया है। उदारवादी आर्थिक व्यवस्था ने गरीबों के लिए शिक्षा को सामाजिक वंचना का माध्यम बना दिया है।

मैंने अनेक ऐसे युवाओं को देखा है जो वर्षों से नौकरी की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन पिछले एक दशक में सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार के अवसर लगातार घटे हैं। अग्निवीर योजना हो, या ज़ोमैटो, ब्लिंकिट और अन्य गिग इकोनॉमी के प्लेटफ़ॉर्म—मैं ऐसे अनेक युवाओं को जानता हूँ जो स्नातक और परास्नातक हैं, फिर भी असुरक्षित और कम वेतन वाले कार्य करने के लिए विवश हैं, जबकि वे बेहतर सामाजिक सुरक्षा वाली नौकरियों के हकदार थे।

आपमें से कितने माता-पिता ऐसे होंगे जो अपने स्नातक या परास्नातक बच्चों को गिग इकोनॉमी में अस्थायी और असुरक्षित काम करते हुए देखना चाहेंगे? हम सब अपना पूरा जीवन अपने बच्चों का भविष्य बनाने में लगा देते हैं। आज यह आंदोलन उसी प्रश्न को फिर से हमारे सामने खड़ा कर रहा है।

हाँ, इस आंदोलन के मंच पर ऐसे लोग भी आते हैं जिनसे आप वैचारिक रूप से सहमत न हों। वे कभी-कभी आपकी राजनीतिक मान्यताओं को ठेस भी पहुँचा सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आंदोलन की मूल माँगें अनुचित या अपवित्र हो जाती हैं।
आज सरकार उन्हीं युवाओं पर लाठियाँ बरसा रही है जो पिछले बारह वर्षों से इस आशा में हैं कि शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था बेहतर होगी और उनके सपने पूरे होंगे।

याद रखिए, जनता का संघर्ष हमेशा सत्ता से होता है। जब सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह होती है, तब वह लोकोन्मुख होती है। लेकिन जिस दिन सत्ता जनता से संघर्ष करने का रास्ता चुन लेती है, उसी दिन अन्याय और असंवेदनशीलता की संस्कृति की शुरुआत हो जाती है। जब जनआंदोलन मजबूत होते हैं, तब सत्ता लोकशक्ति के प्रति उत्तरदायी बनती है। इसी से लोकतंत्र में मर्यादा, सम्मान और विश्वास कायम रहता है।

आरटीआई कार्यकर्ताओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक, अनेक लोगों को इस युवा आंदोलन से नई उम्मीद, ऊर्जा और प्रेरणा मिली है। आज विभिन्न विपक्षी दल भी इस आंदोलन में शामिल हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें यह समझ में आ गया है कि युवाओं ने ऐसा मुद्दा उठाया है जिसका प्रभाव हर घर पर पड़ता है। शिक्षा और बेरोजगारी का प्रश्न ऐसा है जिससे हर परिवार जुड़ा हुआ है।
राजनीतिक दलों के नेता केवल भाषण देकर चले जाएँ, उससे राजनीतिक चेतना का निर्माण नहीं होता। राजनीतिक चेतना त्याग, संघर्ष और समाज के बीच निरंतर उपस्थित रहने से पैदा होती है। हमें इन युवाओं से सीखना चाहिए। कई दिनों तक तपस्या और अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक ने पूरे देश का ध्यान इन प्रश्नों की ओर आकर्षित किया। व्यवस्था की चुनौतियाँ पहले भी थीं, लेकिन इस आंदोलन ने उन्हें एक नई दृष्टि और दिशा दी।

आंदोलन में संघर्ष और त्याग दोनों का महत्व होता है। इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अनेक विद्यार्थी देश-विदेश के प्रतिष्ठित संस्थानों जैसे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और बोस्टन विश्वविद्यालय में पढ़ चुके हैं। दर्जनों विद्यार्थियों ने भी लगभग 20 दिनों तक अनशन किया है। वे कई दिनों से दिन-रात एक ही स्थान पर बैठकर सरकार और समाज की संवेदना जगाने का प्रयास कर रहे हैं।

आइए, हम उनके मुद्दों का स्वागत और सम्मान करें और राजनीतिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर लोकतंत्र में स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय के मूल्यों को मजबूत करें।

  • Randhir Gautam

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