Jawaharlal Nehru University – JNU New Delhi की समाजशास्त्र की प्रख्यात प्रोफेसर नीलिका मेहरोत्रा ने भी अपनी स्नातक शिक्षा वनस्पति विज्ञान (Botany) विषय में प्राप्त की थी। किंतु समाज और सामाजिक समस्याओं को समझने की जिज्ञासा ने नीलिका जी को मानवशास्त्र, सामाजिक मानवशास्त्र (Social Anthropology) और तत्पश्चात समाजशास्त्र में अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया।
भारत में समाजशास्त्र के अध्ययन हेतु दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (DSE) और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) दोनों ही सबसे प्रतिष्ठित अध्ययन केंद्र रहे हैं। नीलिका जी को DSE. में अध्ययन और अध्यापन ; दोनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ, साथ ही जे.एन.यू. में समाजशास्त्र के अध्यापन का गौरव भी।
भारत में बहुत कम समाजशास्त्री ऐसे हैं जिनकी दक्षता मानवशास्त्र, सामाजिक मानवशास्त्र और समाजशास्त्र ; तीनों ही क्षेत्रों में समान रूप से गति रखती हो। उन्हीं में से एक हैं प्रोफेसर नीलिका मेहरोत्रा।
उनका पीएच.डी. शोध विषय था – A Study of Women’s Organizations and Women Activism in Delhi
उन्होंने अपने शैक्षणिक जीवन की शुरुआत Centre for Women’s Development Studies (CWDS) से की। सीडब्ल्यूडीएस एक ऐसा शोध एवं जनपक्षधर संगठन है जो महिलाओं के अधिकारों और महिला अध्ययन/जेंडर अध्ययन की विधा को सुदृढ़ करने के लिए कार्यरत है।
इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन किया और तत्पश्चात जे.एन.यू. में स्थायी रूप से अध्यापिका बनीं। इस प्रकार, नीलिका जी को भारतीय समाजशास्त्र के अध्ययन, अध्यापन और शोध – तीनों ही सर्वोत्तम संस्थानों में कार्य करने का विशिष्ट अनुभव प्राप्त है।
अध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ उनका शोधकार्य भी निरंतर उन्हें एक विशिष्ट विदुषी के रूप में प्रतिष्ठित करता गया।
महिला आंदोलन और जेंडर अध्ययन के क्षेत्र में लंबे समय तक कार्य करने के बाद नीलिका जी की रुचि डिसेबिलिटी स्टडीज (Disability Studies) की ओर बढ़ी, और आज वे इस क्षेत्र की प्रमुख समाजशास्त्रियों में गिनी जाती हैं।
‘Gender and Disability Studies in Haryana’ विषय पर शोध करते हुए उन्होंने यह दृष्टिकोण विकसित किया कि इस सामाजिक समस्या को समझने के लिए केवल मेडिकल मॉडल पर्याप्त नहीं है, क्योंकि यह व्यक्ति को एक पृथक, असंबद्ध इकाई के रूप में प्रस्तुत करता है।
उन्होंने इसके जगह पर सोशल मॉडल ऑफ डिसेबिलिटी (Social Model of Disability) का प्रयोग किया, जिसके माध्यम से उन्होंने परिवार, समुदाय, सहकर्मी समूह (peer group), नातेदारी, गैर-सरकारी संगठन (NGOs) और राज्य – इन सभी की भूमिका को सैद्धांतिक रूप से स्थापित किया।
यह किसी भी समाजवैज्ञानिक की सबसे बड़ी विशेषता होती है कि वह केवल विषय-विमर्श ही नहीं, बल्कि शोध की पद्धति को भी खोजने और विकसित करने की क्षमता रखता हो ;और नीलिका जी ने यह कार्य अत्यंत सृजनात्मक ढंग से किया है।
इसके साथ ही नीलिका जी के कार्यक्षेत्र में महिला आंदोलन, सामाजिक आंदोलन और सांस्कृतिक विमर्श जैसे अनेक विषय भी शामिल हैं।
उनका ‘गोल्ड (सोना)’ पर किया गया शोध भारतीय समाजशास्त्र में एक अनोखी पहल थी, क्योंकि उसमें उन्होंने सोने के आर्थिक मूल्य के बजाय उसके सांस्कृतिक मूल्य को समझने की दृष्टि विकसित की।
उनके इस शोध ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया। दक्षिण अमेरिका के ब्राज़ील और पेरू में इस विषय पर कार्य कर रहे संगठनों ने उन्हें आमंत्रित किया, जहाँ उन्होंने भारत में सोने के सांस्कृतिक अर्थ पर व्याख्यान प्रस्तुत किया।
प्रोफेसर नीलिका मेहरोत्रा के सैद्धांतिक निर्माण (theoretical building) और समाजशास्त्रीय कार्यों में समाजशास्त्रीय सिद्धांतों तथा पद्धतियों का गहरा बोध, विमर्श और दिशा दिखाई देती है। उनके कार्यों में सोशियोलॉजी का अनुशासनात्मक सार (disciplinary essence) स्पष्ट रूप से झलकता है।
प्रख्यात सामाजिक मानवशास्त्री रूथ बेनेडिक्ट (Ruth Benedict) ने कहा था— “The purpose of anthropology is to make the world safe for human differences.”
इस विचार की गूंज प्रोफेसर मेहरोत्रा के पूरे अकादमिक कार्य में निरंतर सुनाई देती है।
यदि prof. Nilika के कार्य का एक सार कहा जाए तो वह है — “विविधता” (Diversity)।
सामाजिक आंदोलनों के अध्ययन में उन्होंने विविधता के विमर्श को अत्यंत महत्त्व के साथ स्वीकारा और स्थापित किया है। उनके अध्ययन में “दूसरे दृष्टिकोण” (other perspective या backstage view) की संवेदना से महसूस की जा सकती है। इसी कारण उनके महिला आंदोलनों के अध्ययन में सामाजिक गतिशीलता (social dynamism) को एक नए दृष्टिकोण और पद्धति से समझने का अवसर मिलता है।
सामाजिक आंदोलन में मास मोबिलाइजेशन अनेक कारणों से जन्म लेते हैं — कभी विचारधारा (ideology) के आधार पर, कभी हितों (interests) या पूंजी (capital) के आधार पर, तो कभी परोपकार (altruism), श्रेणी-व्यवस्था (hierarchy) या समता की खोज (quest for egalitarianism) से प्रेरित होकर।
इसलिए समाजविज्ञानी को चाहिए कि वह विविध दृष्टिकोणों की पद्धति (diversity of perspectives) विकसित करे, ताकि सामाजिक परिवर्तन, संरचना और आंदोलन को समझने में केवल वैचारिक व्याख्याओं तक सीमित न रह जाए, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान की गहराई तक पहुँचे।
नीलिका जी के कार्यों में इमाइल दुर्खीम, मैक्स वेबर, महात्मा गांधी, तथा जेंडर स्टडीज़ की विदुषियों – लीला दुबे, इरावती कर्वे, और शैरी ऑर्टनर (Sherry Ortner) आदि के प्रभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान डिसएबिलिटी स्टडीज़ (Disability Studies) के क्षेत्र में है — जहाँ उन्होंने अध्ययन की पद्धति, विषय-वस्तु और विमर्श — तीनों को नए आयाम दिए।
समाज विज्ञान की वह धारा जो सामाजिक परिवर्तन, पुनर्निर्माण और नवनिर्माण की नींव रखती है, उसे नीलिका जी ने अपने शोधों से सशक्त किया है।
वे नेहरू-फुलब्राइट फैलो के रूप में कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले (University of California, Berkeley) के South Asia Studies Department में अध्ययन हेतु गईं। वहाँ उन्होंने अमेरिका में Disability Studies के सिलेबस, शिक्षण पद्धति (pedagogy) और विषय-वस्तु का गहन अध्ययन किया।
भारत लौटकर उन्होंने इस क्षेत्र की भारतीय सामाजिक संरचना के अनुरूप एक नई पद्धति विकसित की, जिसने Disability Studies के विमर्श को सामाजिक परिवर्तन और पुनर्निर्माण के बड़े विमर्श से जोड़ा।
इसके साथ ही प्रोफेसर नीलिका मेहरोत्रा ने फील्डवर्क और एथनोग्राफिक स्टडीज़ को भी समाजशास्त्रीय शोध-पद्धति के रूप में लोकप्रिय और समृद्ध किया।
“She has extended the frontier of ethnography in a context where we not only study the powerless but also study the powerful.”
इसके साथ ही ,भारतीय सामाजिक मानवशास्त्र के विमर्शों को Indian Anthropologist जर्नल के माध्यम से नीलिका जी ने निरंतर समर्पण (devotion), निष्ठा (dedication) और दृढ़ संकल्प (determination) के साथ एक संपादक के रूप में आगे बढ़ाया है। इस जर्नल की शुरुआत प्रख्यात समाजशास्त्री प्रोफेसर एस. सी. दुबे जी ने 1971 में की थी।
भारतीय समाजशास्त्र की ऐसी विभूति पर हमें गर्व है। हम उनकी शानदार बौद्धिक यात्रा के साथ-साथ स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की कामना करते हैं। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ।
सादर
Randhir Gautam
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