शिक्षा के लिए संघर्ष करता समाज – अमन नम्र

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म अपने बच्चों से बहुत उम्मीदें रखते हैं। हम चाहते हैं कि वे दुनिया की बड़ी-से-बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से मुकाबला करें, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की लड़ाई सबसे आगे रहे, चांद पर जाएं, दुनिया की बड़ी कंपनियों के सीईओ बने और भारत को विकसित देश बनाएं, लेकिन इस पूरी उम्मीद की शुरुआत आखिर होती कहां से है? एक छोटे से स्कूल की शुरुआती कक्षा से। उस कक्षा में रखी एक साफ-सुथरी बैच से। एक बेहतरीन शिक्षक से। एक ब्लैकबोर्ड से। साफ पीने के पानी और साफ शौचालय से। उस किताब से, जिसे बच्चा पढ़ सके और समझ भी सके। यही हमारी सबसे बड़ी विडंबना है। हम भविष्य की इमारत बहुत ऊंची बनाना चाहते हैं, लेकिन उसकी नींव को लेकर उतने बेचैन नहीं है।

हाल में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्न बी, वराले ने नासिक में अपने पुराने स्कूल के कार्यक्रम में जो बात कही, वह इसी बेचैनी को सामने लाती है। उन्होंने महाराष्ट्र में मराठी माध्यम के स्कूलों की स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि सरकार कुभ के लिए हजारों करोड़ रुपए खर्च कर रही है और अगर उसमें से सिर्फ 0.1 प्रतिशत, यानी करीब 32 करोड रुपए, शिक्षा पर खर्च होते तो 100-150 मराठी स्कूल बंद होने से बच सकते थे।

अगर हम दुनिया के बेहतरीन एयरपोर्ट और एक्सप्रेसवे बनाने की महत्वाकांक्षा रखते हैं तो बच्चों के लिए एक वल्र्ड-क्लास स्कूल बनाने की महत्वाकांक्षा क्यों नहीं रखते? यही वह सवाल है जिसे आज राजस्थान से लेकर उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र तक अलग-अलग रूपों में बच्चे, अभिभावक और शिक्षक उठा रहे हैं।

मध्यप्रदेश में सरकारी स्कूलों के विलय और ‘वन स्कूल-वन कैंपस’ जैसी कवायद के खिलाफ वि‌द्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों का विरोध इसी बेचैनी की एक ताजा अभिव्यक्ति है। महाराष्ट्र में बंद होते मराठी माध्यम स्कूलों को लेकर जस्टिस वराले की चिंता सामने आई है। दूसरी तरफ देश के कई हिस्सों में सरकारी स्कूलों की इमारत, शिक्षक, पन्नीचर और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। यह केवल विपक्ष, किसी राजनीतिक दल या किसी आदोलन का बनाया हुआ मु‌द्दा नहीं है।
कहीं बच्चे फर्श पर बैठते हैं, तो कहीं पेड़ों के नीचे ही पढ़ाई करने पर मजबूर हैं। कहीं एक शिक्षक कई कक्षाओं को सभालता है। कही स्कूल की इमारत है, लेकिन प्रयोगशाला नहीं। कहीं कंप्यूटर हैं, तो चलाने वाला नहीं। कहीं शिक्षक है, तो उसे पढ़ाने के बजाय दर्जनों दूसरे सरकारी कामों में लगा दिया जाता है। और फिर हम उसी बच्चे से कहते है-प्रतिस्पर्धा करो। दुनिया से प्रतिस्पर्धा करो। असल सवाल यह है कि हमने उसे प्रतिस्पर्धा करने के लिए दिया क्या?

शिक्षा की समस्या केवल स्कूल-बिल्डिंग की नहीं है। स्कूल की दीवार के भीतर होने वाली पढ़ाई उससे भी ज्यादा जरूरी है। यही हमे जेन अल्फा की पीढ़ी को समझना होगा। जिस बच्चे के हाथ में घर पहुंचते ही स्मार्टफोन है, जो ‘यू ट्यूब पर दुनिया के किसी भी शिक्षक को सुन सकता है, जो गेमिंग, ‘एआई’ और डिजिटल दुनिया के बीच बड़ा हो रहा है, उसे अगर स्कूल में टूट्टी बेच, पुराने तरीके की रटंत पढ़ाई और संसाधनों की कमी मिलेगी तो उसके और स्कूल के बीच दूरी बढ़ना स्वाभाविक है। यह केवल शिक्षा की समस्या नही है। यह आने वाले भारत की समस्या है।

इसीलिए ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसे आंदोलनों या सोशल मीडिया पर सरकारी स्कूलों की बदहाली दिखाने वाले अभियानों को केवल मजाक, स्टंट या राजनीतिक विरोध कहकर खारिज कर देना आसान नहीं है। अगर कोई संगठन तरकार से पूछता है कि कितने स्कूलों की मरम्मत हुई, कितने स्कूलों में शिक्षक है, कितने पद खाली है. कितना पैसा आवंटित हुआ और कितना खर्च हुआ, कितने स्कूलों में कंप्यूटर, साफ शौचालय और खेल की सुविधा है तो इन सवालों का जवाब मिलना चाहिए।

यह लड़ाई किसी धर्म या सरकार के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस सोच के खिलाफ है जिसमें स्कूल को खर्च और बच्चे को लाभाथी समझा जाता है। बच्चा लाभार्थी नहीं है। बच्चा देश की सबसे बड़ी पूंजी है। ऐसे में हमारी प्राथमिकता यह क्यों न हो कि देश का हर सरकारी स्कूल ‘अच्छा स्कूल’ नहीं, बल्कि सबसे अच्छा स्कूल बने? अगर शिक्षक सबसे महत्वपूर्ण है तो उसे सबसे बेहतर प्रशिक्षण और सम्मानजनक वेतन देने में हमें संकोच क्यों होना चाहिए? क्यों न स्कूलों के लिए भी वही महत्वाकांक्षा रखी जाए जो हम बड़े शहरों, एक्सप्रेसवे और औ‌द्योगिक कॉरिडोर के लिए रखते हैं?

शिक्षा का असली सुधार भवन बनाने से शुरू होगा, लेकिन वहीं खत्म नहीं होगा। हमें यह भी तय करना होगा कि बच्चे क्या पढ़ें. क्यों पढ़े और कैसे पढ़े। पाठ्यक्रम ऐसा हो जो केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं, जीवन समझने के लिए तैयार करे। शिक्षक केवल पाठ पूरा न करे, यह देखे कि बच्चा समझ भी रहा है या नहीं। बच्चे की सफलता केवल उसके नंबर से नहीं, उसकी जिज्ञासा, सोचने की क्षमता, समस्या हल करने की क्षमता और आत्मविश्वास से भी मापी जाए।

यह काम अकेले सरकार नहीं कर सकती। सरकार को पैसा और व्यवस्था देनी होगी। निजी क्षेत्र और ‘सीएसआर’ को स्कूलों को गोद लेने से आगे बढ़कर दीर्घकालीन शैक्षिक साझेदारी करनी होगी। समाज को भी यह समझना होगा कि अपने आसपास के स्कूल को बेहतर बनाना किसी ‘गरीब बच्चे’ पर दया करना नहीं, अपने ही देश के भविष्य में निवेश करना है। और सबसे जरूरी बात-इसमें राजनीतिक दलों को भी अपनी प्राथमिकताएं बदलनी होंगी। चुनाव के समय मुफ्त बिजली, मुफ्त सामान, बड़ी घोषणाएं और बड़े आयोजन राजनीतिक बहस का हिस्सा बनते हैं। क्यों न कभी चुनाव का सबसे बड़ा सवाल यह हो कि राज्य के सरकारी स्कूल कितने अच्छे हैं?
मंदिर की भव्यता हमे हमारी आस्था की ताकत बताती है। एक्सप्रेसवे हमारी आर्थिक क्षमता की, लेकिन एक सरकारी स्कूल की गुणवत्ता हमें बताती है कि हम अपने भविष्य को कितनी गंभीरता से लेते हैं। हम भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाना चाहते हैं, लेकिन उस भारत की नींव आज जिस कक्षा में रखी जा रही है, वहां बच्चे फर्श पर बैठे हो. शिक्षक कम हो और बुनियादी सुविधाएं अधूरी हो, तो हमें एक बार रुककर पूछना चाहिए-हम जिस विकसित भारत का सपना देख रहे हैं, उसके नागरिक तैयार कहां हो रहे हैं?

(सप्रेस)


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