— प्रिया कुमारी —
समता मार्ग एवं न्यूज़ लेंस इंडिया के तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय गोष्ठी में प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार, वरिष्ठ पत्रकार प्रोफेसर अरुण कुमार त्रिपाठी, युवा आंदोलन के मंच ‘युवा हल्ला बोल’ के संस्थापक एवं राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रवक्ता अनुपम तथा इस गोष्ठी के संचालक प्रोफेसर सुखदेव सिंह जी ने कल शाम, 28 अगस्त 2026 को एक शानदार कार्यक्रम का आयोजन किया।
राष्ट्रीय स्तर पर प्रवेश और भर्ती परीक्षाओं में लगातार सामने आ रही गड़बड़ियों, पेपर लीक, परीक्षा में देरी और नौकरियों के लिए भ्रष्टाचार ने देश के युवाओं के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। इन समस्याओं का असर केवल विद्यार्थियों के भविष्य पर ही नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था ,लोकतांत्रिक संस्थाओं और युवाओं के भरोसे पर भी पड़ रहा है।
न्यूज़ लेंस इंडिया के कार्यक्रम ‘मुद्दे की बात’ में इस विषय पर चर्चा करते हुए कार्यक्रम के संचालक प्रोफेसर सुखदेव सिंह ने कहा कि लगातार परीक्षाओं के विफल होने के मामले सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रवेश परीक्षाओं की आवश्यकता मुख्य रूप से इसलिए पैदा हुई है क्योंकि उच्च गुणवत्ता वाले संस्थानों और उपलब्ध सीटों की तुलना में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या बहुत अधिक है। इसी अंतर ने देश में कोचिंग उद्योग को एक बड़े व्यवसाय के रूप में विकसित कर दिया है।
चर्चा में युवा नेता अनुपम ने कहा कि भारत की बड़ी युवा आबादी को सामान्यतः देश का ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ माना जाता है, लेकिन यदि इस आबादी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं कराए गए तो यही जनसांख्यिकीय लाभ ‘डेमोग्राफिक डिजास्टर’ में बदल सकता है। उनके अनुसार, परीक्षा व्यवस्था को लेकर युवाओं में गहरा अविश्वास पैदा हो रहा है और परीक्षा प्रणाली उनके लिए सरकारी व्यवस्था से सीधे जुड़ने का प्रमुख माध्यम है।
अनुपम ने कहा कि देश में भर्ती परीक्षाओं की सबसे बड़ी समस्याओं में रिक्त पदों पर समय पर विज्ञापन जारी न होना और परीक्षाओं के आयोजन में अत्यधिक देरी शामिल है। कई बार स्वीकृत पद खाली रहने के बावजूद भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं होती। युवाओं को भर्ती परीक्षाएं आयोजित कराने के लिए आंदोलन और प्रदर्शन तक करना पड़ता है। उन्होंने रेलवे भर्ती का उदाहरण देते हुए कहा कि 2019 में निकली कुछ भर्तियों को पूरा होने में कई वर्ष लग गए।
उन्होंने पेपर लीक को परीक्षा व्यवस्था के प्रति अविश्वास का एक गंभीर कारण बताया। उनके अनुसार, पेपर लीक की घटनाओं के बाद कठोर कानून और नई समितियां बनाने की घोषणाएं तो होती हैं, लेकिन वास्तविक दोषियों को सजा दिलाने और ऐसी घटनाओं को रोकने की प्रभावी व्यवस्था पर गंभीर सवाल बने हुए हैं। उन्होंने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) से जुड़ी परीक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि बार-बार पेपर लीक के बाद कानून और समितियां बनाने के बावजूद समस्या दोहराई जाती रही है।
चर्चा में परीक्षा प्रणाली में होने वाली अन्य अनियमितताओं का भी उल्लेख किया गया। इनमें अभ्यर्थी की जगह किसी अन्य व्यक्ति का परीक्षा देना, कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं में स्क्रीन शेयरिंग जैसी गड़बड़ियां और परीक्षा कराने वाली निजी एजेंसियों से जुड़ी कथित अनियमितताएं शामिल हैं। यह सवाल भी उठाया गया कि किसी कंपनी को एक राज्य में ब्लैकलिस्ट किए जाने के बाद वही कंपनी या उससे जुड़े लोग दूसरे राज्य में अलग नाम से परीक्षा का ठेका कैसे हासिल कर लेते हैं।
उन्होंने कहा कि परीक्षा व्यवस्था में पैदा हुए अविश्वास को दूर करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति आवश्यक है। उनके अनुसार, युवाओं में बढ़ता गुस्सा भविष्य में बड़े सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन का रूप ले सकता है। उन्होंने रोजगार और परीक्षा संबंधी समस्याओं को युवाओं के बढ़ते असंतोष से जोड़ते हुए कहा कि आने वाले समय में यह मुद्दा देश की राजनीति को प्रभावित कर सकता है।
इसके बाद प्रोफेसर अरुण कुमार से परीक्षा व्यवस्था और राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल किया गया।
अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार ने परीक्षा संकट को केवल परीक्षा व्यवस्था की समस्या न मानकर व्यापक सामाजिक और आर्थिक संकट से जोड़कर देखा। उन्होंने कहा कि शिक्षा के प्रति समाज का दृष्टिकोण बदल गया है और इसके पीछे शिक्षा के बढ़ते बाजारीकरण और व्यावसायीकरण की महत्वपूर्ण भूमिका है। उनके अनुसार, शिक्षा व्यवस्था में बाजार का प्रभाव बढ़ने के साथ शिक्षकों, नीति-निर्माताओं और राजनीतिक व्यवस्था के दृष्टिकोण में भी बदलाव आया है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थानों और व्यावसायिक हितों के बढ़ते प्रभाव के कारण विद्यार्थियों और अभिभावकों का शोषण संभव हुआ है। शिक्षा में मौजूद सूचना की असमानता के कारण विद्यार्थी और अभिभावक यह तय करने की स्थिति में नहीं होते कि किसी शिक्षा या संस्थान से वास्तविक लाभ क्या मिलेगा, जबकि संस्थान इन परिस्थितियों का लाभ उठा सकते हैं। इससे शिक्षा में भ्रष्टाचार और बाजार-आधारित प्रवृत्तियां बढ़ती हैं।
उनके अनुसार सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के कमजोर होने और निजीकरण के बढ़ने के साथ कोचिंग उद्योग भी तेजी से विस्तारित हुआ। सामान्य शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थियों को परीक्षा-केंद्रित प्रतिस्पर्धा के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं कर पाती, इसलिए कोचिंग संस्थान विशेष रूप से परीक्षा पास करने की तकनीक पर केंद्रित प्रशिक्षण उपलब्ध कराते हैं। इससे शिक्षा के नागरिक निर्माण वाले मूल उद्देश्य को नुकसान पहुंचता है और शिक्षा का उद्देश्य रोजगार तथा बाजार की जरूरतों तक सीमित होता जाता है।
उन्होंने रोजगार की सीमित उपलब्धता को भी परीक्षा व्यवस्था में बढ़ते भ्रष्टाचार का महत्वपूर्ण कारण बताया। बड़ी संख्या में युवा हर वर्ष रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं, जबकि संगठित क्षेत्र में अवसर अपेक्षाकृत सीमित हैं। ऐसे में सरकारी और अन्य सुरक्षित नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा अत्यधिक बढ़ जाती है। इसके परिणामस्वरूप प्रश्नपत्र लीक, फर्जी डिग्री और परीक्षा संबंधी अन्य अनियमितताओं जैसी समस्याओं को बढ़ावा मिलता है।
प्रोफेसर अरुण कुमार ने अंततः शिक्षा के अत्यधिक व्यावसायीकरण और निजीकरण को वर्तमान संकट की प्रमुख पृष्ठभूमि में रखा। उनका कहना था कि शिक्षा को केवल नौकरी प्राप्त करने का माध्यम नहीं माना जाना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य नागरिकता का निर्माण, व्यक्ति को स्वतंत्र चिंतन के योग्य बनाना और समाज के प्रति जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है। यदि शिक्षा को केवल व्यवसाय बना दिया जाएगा तो उसकी व्यापक सामाजिक और मानवीय भूमिका कमजोर होती जाएगी।
शिक्षा में बढ़ता बाजारीकरण, काली अर्थव्यवस्था और परीक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल-
राष्ट्रीय स्तर पर प्रवेश और भर्ती परीक्षाओं में लगातार सामने आ रही अनियमितताओं को लेकर जारी चर्चा के दूसरे भाग में शिक्षा के बढ़ते बाजारीकरण, काली अर्थव्यवस्था, कोचिंग उद्योग और परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता के सवालों पर विस्तार से विचार किया गया। चर्चा में वक्ताओं ने कहा कि परीक्षा संबंधी संकट को केवल पेपर लीक या परीक्षा केंद्रों की गड़बड़ी तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसके पीछे शिक्षा, रोजगार और अर्थव्यवस्था से जुड़ी व्यापक संरचनात्मक समस्याएं हैं।
चर्चा में कहा गया कि Black economy के विस्तार में राजनीतिक और व्यावसायिक हितों की भूमिका होने से शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था भी प्रभावित होती है। इसका सबसे अधिक नुकसान गरीब और वंचित परिवारों के विद्यार्थियों को उठाना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार अपने बच्चों को महंगी कोचिंग या परीक्षा संबंधी अन्य संसाधन उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं होते, जिससे अवसरों की असमानता और बढ़ती है।
कोचिंग उद्योग और शिक्षा व्यवस्था-
चर्चा में कोचिंग संस्थानों के तेजी से विस्तार को शिक्षा व्यवस्था के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में रखा गया। सवाल उठाया गया कि क्या कोचिंग संस्थान समानांतर शिक्षा उद्योग का रूप ले चुके हैं और क्या इसका प्रभाव पारंपरिक स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों की शिक्षा पर पड़ रहा है। साथ ही यह भी पूछा गया कि कोचिंग उद्योग सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को किस तरह प्रभावित करता है।
प्रोफेसर अरुण कुमार की बातों से सहमति जताते हुए प्रोफेसर अरुण कुमार त्रिपाठी ने कहा कि 1991 के बाद उदारीकरण की प्रक्रिया के साथ शिक्षा और रोजगार को देखने के नजरिए में महत्वपूर्ण बदलाव आया। उनके अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य देशसेवा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अनुशासन, विकास और कल्याण जैसे व्यापक उद्देश्यों से हटकर पद, पैसा और शक्ति हासिल करने की ओर बढ़ गया है।
उन्होंने इसे राष्ट्रीय चरित्र में आए बदलाव से भी जोड़ा। उनका कहना था कि पहले भी नकल और पेपर लीक जैसी घटनाएं होती थीं, लेकिन वर्तमान समय में इनकी प्रवृत्ति बहुत बढ़ गई है। चर्चा में पिछले वर्षों में बड़ी संख्या में पेपर लीक होने का उल्लेख करते हुए इसे गंभीर चिंता का विषय बताया गया।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल-
चर्चा के दौरान शिक्षा और शासन व्यवस्था में पारदर्शिता तथा जवाबदेही को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए। वक्ता ने एक बड़े सामाजिक संगठन के शिक्षा और सरकार पर कथित प्रभाव का उल्लेख करते हुए पूछा कि जब किसी संस्था की जवाबदेही और पारदर्शिता पर सवाल हों तो वह शिक्षा व्यवस्था में किस प्रकार की नैतिकता और उत्तरदायित्व स्थापित कर सकती है।
उन्होंने राजनीतिक व्यवस्था में नैतिकता के सवाल को भी परीक्षा व्यवस्था से जोड़ते हुए कहा कि समाज में नैतिक मूल्यों के कमजोर होने का प्रभाव शिक्षा पर भी पड़ता है। महात्मा गांधी के जीवन का उदाहरण देते हुए उन्होंने ईमानदारी और नकल से इनकार करने जैसी नैतिक प्रवृत्तियों की आवश्यकता पर जोर दिया।
भर्ती प्रक्रिया में देरी पर गंभीर आरोप-
चर्चा में भर्ती प्रक्रिया में होने वाली देरी को भी युवाओं की परेशानी का बड़ा कारण बताया गया। Prof. Tripathi के अनुसार, कई बार रिक्तियों के विज्ञापन जारी होने के बाद परीक्षा में देरी होती है, परीक्षा के बाद पेपर लीक या कानूनी विवाद के कारण प्रक्रिया लंबी खिंचती है और अंततः नियुक्तियों में वर्षों लग जाते हैं।
इस दौरान यह आरोप भी लगाया गया कि राजनीतिक दल चुनावी लाभ को ध्यान में रखते हुए भर्ती प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि ये वक्ता के आरोप और राजनीतिक विश्लेषण के रूप में सामने आए, चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि भर्ती प्रक्रिया में अनिश्चितता युवाओं के असंतोष को बढ़ाती है।
बाजार, कोचिंग और शिक्षा पर नियंत्रण-
चर्चा में कहा गया कि परीक्षा व्यवस्था में केवल सरकारी तंत्र ही नहीं, बल्कि बाजार से जुड़े विभिन्न हित भी सक्रिय हैं। कोचिंग एजेंसियों और परीक्षा संबंधी गतिविधियों में अनियमितताओं की आशंका का उल्लेख करते हुए शिक्षा व्यवस्था पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण के सवाल उठाए गए।
Prof.Tripathi ने यह भी आरोप लगाया कि शिक्षा, सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र में एक विशेष विचारधारा के प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश हो रही है। उनके अनुसार, कोचिंग संस्थानों के माध्यम से प्रतियोगी परीक्षाओं और साक्षात्कार की तैयारी कराने की प्रक्रिया भी इस व्यापक बदलाव का हिस्सा हो सकती है। इन दावों को चर्चा में व्यक्त विचारों के रूप में देखा जाना चाहिए।
रोजगार की परिभाषा पर बहस-
चर्चा में रोजगार की बदलती परिभाषा को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया। वक्ता ने एक अर्थशास्त्री के उस दृष्टिकोण का उल्लेख किया जिसमें युवाओं की बेरोजगारी और असंतोष के संदर्भ में रोजगार की परिभाषा को बदलने तथा स्थायी सरकारी नौकरी की अपेक्षा को कम करने की बात कही गई थी। इस दृष्टिकोण के अनुसार, रोजगार का अर्थ केवल स्थायी नौकरी नहीं बल्कि ऐसी आय भी हो सकती है जिससे व्यक्ति अपना खर्च चला सके।
इसके विपरीत चर्चा में यह सवाल भी निहित था कि क्या युवाओं की वास्तविक रोजगार संबंधी समस्याओं का समाधान केवल रोजगार की परिभाषा बदल देने से हो सकता है। इस मुद्दे को रोजगार, शिक्षा और सरकारी नीतियों के व्यापक संदर्भ से जोड़कर देखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
NTA की जवाबदेही और परीक्षा की विश्वसनीयता-
चर्चा के अगले चरण में राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर सीधे सवाल उठाए गए। प्रश्न किया गया कि यदि लगातार परीक्षा संबंधी गड़बड़ियों के लिए कभी बाहरी विशेषज्ञों और कभी परीक्षा केंद्रों को जिम्मेदार ठहराया जाता है, तो क्या पूरी व्यवस्था की जवाबदेही केवल बाहरी पक्षों पर डालकर समाप्त की जा सकती है।
NTA की आर्थिक संरचना और परीक्षा से जुड़े विद्यार्थियों पर पड़ने वाले मानसिक दबाव का भी उल्लेख हुआ। वक्ता ने कहा कि परीक्षा दोबारा आयोजित होने पर केवल फीस वापस करने से समस्या समाप्त नहीं होती। विद्यार्थियों ने जिस मानसिक तनाव, समय और तैयारी का सामना किया है, उसकी भरपाई संभव नहीं होती। साथ ही बार-बार होने वाली गड़बड़ियों से परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न खड़ा होता है।
क्या प्रवेश परीक्षाएं वास्तव में योग्यता और अभिरुचि मापती हैं?
चर्चा के अंत में परीक्षा प्रणाली की बुनियादी प्रकृति पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया गया—क्या बहुविकल्पीय परीक्षाएं वास्तव में किसी विद्यार्थी की विषयगत योग्यता और अभिरुचि को मापने में सक्षम हैं?
सवाल उठाया गया कि किसी परीक्षा में सही उत्तर देने की क्षमता और किसी विषय में वास्तविक रुचि या योग्यता दो अलग-अलग चीजें हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, इंजीनियरिंग या चिकित्सा के क्षेत्र में किसी विद्यार्थी की वास्तविक अभिरुचि और विषय की गहरी समझ को केवल बहुविकल्पीय प्रश्नों के माध्यम से किस हद तक परखा जा सकता है, यह विचारणीय है।
इसी तरह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से संबंधित परीक्षाओं के संदर्भ में भी यह प्रश्न उठाया गया कि क्या परीक्षा प्रणाली विद्यार्थियों के विषयगत ज्ञान को पर्याप्त रूप से जांचती है। चर्चा का उद्देश्य केवल परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी की पहचान करना नहीं, बल्कि यह भी समझना था कि वर्तमान परीक्षा प्रणाली वास्तव में किस प्रकार की योग्यता को माप रही है।
राष्ट्रीय स्तर पर प्रवेश और भर्ती परीक्षाओं की लगातार बिगड़ती व्यवस्था पर आयोजित चर्चा के तीसरे भाग में शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण, परीक्षा प्रणाली में रटंत शिक्षा, रोजगार के संकट, राजनीतिक अर्थव्यवस्था, संस्थागत जवाबदेही तथा शिक्षा के बढ़ते केंद्रीकरण जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।
चर्चा की शुरुआत इस सवाल से हुई कि यदि शिक्षा को व्यवसाय बना दिया जाए तो उसकी वास्तविक सामाजिक उपयोगिता और मूल्य का आकलन किस आधार पर किया जाएगा। प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि जब शिक्षा का संचालन लाभ कमाने के उद्देश्य से होने लगता है तो नागरिक निर्माण और अच्छे व्यक्तित्व के विकास जैसे शिक्षा के मूल उद्देश्यों की जगह प्रॉफिट मैक्सिमाइजेशन प्रमुख हो जाता है। उन्होंने शिक्षा को एक ऐसे क्षेत्र के रूप में बताया जिसमें बाजार की विफलता की कई स्थितियां मौजूद हैं।
उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में सूचना की असमानता भी एक महत्वपूर्ण समस्या है। विद्यार्थी और अभिभावक यह पूरी तरह नहीं जान पाते कि उन्हें शिक्षा के बदले वास्तविक रूप से क्या प्राप्त होगा, जबकि संस्थान और शिक्षा प्रदाता इस बारे में अधिक जानकारी रखते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है, विशेषकर गरीब परिवारों के लिए, क्योंकि अत्यधिक व्यावसायीकरण का सबसे अधिक नुकसान आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को उठाना पड़ता है।
कोचिंग उद्योग और परीक्षा का बाजार-
प्रोफेसर अरुण कुमार ने कोचिंग संस्थानों के बढ़ते व्यावसायीकरण पर भी चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार, जब कोचिंग शिक्षा को एक व्यवसाय के रूप में देखने लगती है तो संस्थानों के लिए परीक्षा परिणाम उनके प्रचार का प्रमुख साधन बन जाते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि परीक्षा में सफलता के आंकड़ों को विज्ञापन के रूप में इस्तेमाल करने की प्रतिस्पर्धा शिक्षा के मूल उद्देश्य को प्रभावित करती है।
उनके अनुसार, परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था में विद्यार्थियों को वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने की बजाय परीक्षा में अधिक अंक हासिल करने के लिए तैयार किया जाता है। बहुविकल्पीय प्रश्नों और रटंत पद्धति के कारण विद्यार्थी किसी विषय को गहराई से समझने की बजाय सही उत्तर याद करने पर अधिक ध्यान देते हैं। इससे उनकी तार्किक क्षमता, अभिव्यक्ति और समस्या के प्रति स्वतंत्र दृष्टिकोण विकसित होने में बाधा आती है।
रटंत शिक्षा से कमजोर होता ज्ञान का आधार
चर्चा में कहा गया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं होना चाहिए। वास्तविक शिक्षा वह है जिसमें विद्यार्थी पहले से उपलब्ध ज्ञान पर नया ज्ञान निर्मित करे और आगे चलकर सामाजिक समस्याओं के समाधान में योगदान दे।
प्रोफेसर अरुण कुमार ने भाषा कौशल की कमजोरी को भी उच्च शिक्षा के लिए बड़ी चुनौती बताया। उनके अनुसार, यदि विद्यार्थियों की भाषा और बुनियादी समझ कमजोर है तो वे उच्च स्तर के ज्ञान को प्रभावी ढंग से ग्रहण और आगे विकसित नहीं कर पाएंगे। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को अभी भी काफी हद तक ऊपर से नीचे की ओर चलने वाली व्यवस्था बताया और कहा कि इससे शोध का वातावरण भी प्रभावित होता है।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि Annual Status of Education Report के आंकड़े बुनियादी पढ़ाई और गणितीय क्षमता से जुड़ी गंभीर चुनौतियों की ओर संकेत करते हैं। ऐसी स्थिति में परीक्षा प्रणाली यदि केवल यह मापे कि विद्यार्थी परीक्षा की तकनीक के जरिए कितने अंक प्राप्त कर सकता है, तो वह वास्तविक ज्ञान और समझ का सही मूल्यांकन नहीं कर पाएगी।
रोजगार संकट और राजनीतिक अर्थव्यवस्था-
चर्चा में शिक्षा के संकट को रोजगार की स्थिति से भी जोड़ा गया। प्रोफेसर अरुण कुमार के अनुसार, देश में संगठित क्षेत्र में पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं हो रहा है, जबकि बड़ी संख्या में युवा हर वर्ष रोजगार बाजार में प्रवेश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि स्वचालन और मशीनीकरण के कारण भी रोजगार के अवसरों पर दबाव बढ़ रहा है।
उन्होंने भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विस्तार से रोजगार संबंधी चुनौती और बढ़ने की आशंका व्यक्त की। उनके अनुसार, यदि पर्याप्त काम और रोजगार के अवसर नहीं होंगे तो प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल करने का दबाव और बढ़ेगा तथा इससे परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा मिल सकता है।
चर्चा में यह विचार भी सामने आया कि आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में प्रभावशाली वर्गों के हित शिक्षा और रोजगार की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं। वक्ताओं ने शिक्षा को केवल बाजार की जरूरतों के अनुसार संचालित करने के बजाय व्यापक सामाजिक हित से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।
दोहरी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल-
चर्चा में क्रिटिकल पेडागॉजी के संदर्भ में यह सवाल उठाया गया कि क्या मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था में अलग-अलग स्तर के श्रम के लिए अलग-अलग प्रकार की शिक्षा की आवश्यकता के अनुसार व्यवस्था विकसित की जा रही है। पाउलो फ्रेरे की ‘बैंकिंग सिस्टम ऑफ एजुकेशन’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा गया कि ऐसी शिक्षा पद्धति में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच संवाद तथा आलोचनात्मक चिंतन की जगह विद्यार्थी को तैयार ज्ञान ग्रहण करने वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। वक्ताओं ने परीक्षा में बहुविकल्पीय प्रश्नों और रटंत पद्धति को इसी व्यापक समस्या के संदर्भ में देखा।
परीक्षा सुधार और सरकारी नीतियों पर सवाल-
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ियों को रोकना शिक्षा सुधार का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। चर्चा में 2024 में पेपर लीक और नकल जैसी घटनाओं के खिलाफ कानून तथा कठोर दंड की व्यवस्था का उल्लेख किया गया। साथ ही यह सवाल उठाया गया कि यदि सरकार बार-बार नए कानून और कठोर दंड की घोषणा करती है, लेकिन परीक्षा में गड़बड़ियां दोहराती रहती हैं, तो वास्तविक रोकथाम की नीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
शिक्षा और आलोचनात्मक सोच-
चर्चा का एक महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा और आलोचनात्मक सोच के संबंध से जुड़ा रहा। वक्ताओं ने कहा कि यदि शिक्षा विद्यार्थियों में प्रश्न पूछने, विश्लेषण करने और स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता विकसित करती है तो वे सरकार और समाज की नीतियों पर भी सवाल उठाएंगे।
इसी संदर्भ में चर्चा में यह आरोप भी व्यक्त किया गया कि शिक्षा व्यवस्था को इस प्रकार ढालने की कोशिश हो रही है जिससे आज्ञापालक समाज तैयार हो। साथ ही कोचिंग संस्थानों और कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों के शिक्षा पर प्रभाव की बात कही गई। ये वक्ताओं द्वारा व्यक्त राजनीतिक और वैचारिक विश्लेषण थे।
युवा आंदोलन में संभावनाएं-
चर्चा में युवाओं के आंदोलन को भी सकारात्मक संभावना के रूप में देखा गया। वक्ताओं ने कहा कि परीक्षा और शिक्षा व्यवस्था में गड़बड़ियों के खिलाफ युवाओं में वास्तविक असंतोष दिखाई देता है। इस असंतोष को केवल राजनीतिक प्रायोजित आंदोलन मानने के बजाय इसे शिक्षा और रोजगार से जुड़े वास्तविक सवालों से उत्पन्न सामाजिक प्रतिक्रिया के रूप में देखने की बात कही गई।
वक्ताओं ने कहा कि यदि युवा शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा में पारदर्शिता और समान अवसर की मांग को लेकर आगे बढ़ते हैं तो यह व्यापक सामाजिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। साथ ही आरक्षण और शिक्षा से जुड़े जातीय तथा सामुदायिक प्रश्नों को भी व्यापक सामाजिक संदर्भ में हल करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
NTA और केंद्रीकरण पर बहस-
चर्चा के अंतिम चरण में राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) की तुलना दूसरे देशों की परीक्षा प्रणालियों से करते हुए संस्थागत जवाबदेही और स्वायत्तता का प्रश्न उठाया गया। सवाल किया गया कि क्या किसी केंद्रीयकृत परीक्षा प्रणाली के माध्यम से पूरे देश के लिए एक समान परीक्षा लागू करने से संस्थागत स्वायत्तता और क्षेत्रीय स्तर पर समान अवसर प्रभावित नहीं होते।
प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि किसी भी परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण तत्वों में से एक है। उनके अनुसार, जहां संस्थागत जवाबदेही कमजोर होती है, वहां अनियमितताओं और धांधली की संभावना बढ़ती है। उन्होंने परीक्षा व्यवस्था की समस्या को व्यापक संस्थागत जवाबदेही से जोड़ते हुए कहा कि राजनीतिक व्यवस्था, प्रशासन, पुलिस और व्यापार सहित सभी क्षेत्रों में उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जाना जरूरी है।
केंद्रीकरण बनाम विकेंद्रीकरण
चर्चा में भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में अत्यधिक केंद्रीकरण को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई। प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि भारत के अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक आवश्यकताएं एक जैसी नहीं हैं। इसलिए शिक्षा और रोजगार से जुड़ी नीतियों में विकेंद्रीकरण की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के संदर्भ में उच्च शिक्षा के अधिक केंद्रीकरण की प्रवृत्ति पर विचार करने की जरूरत है। भारत की विविध भाषाओं, संस्कृतियों और क्षेत्रीय आवश्यकताओं को देखते हुए सभी क्षेत्रों के लिए एक ही तरह की व्यवस्था लागू करना उचित नहीं हो सकता।
प्रवेश और भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं से शुरू हुई विचार-चर्चा के अंतिम भाग में शिक्षा के केंद्रीकरण, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, पाठ्यक्रम में बदलाव, स्वतंत्र चिंतन और आलोचनात्मक क्षमता के विकास जैसे व्यापक सवालों पर गंभीर विमर्श हुआ। वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा का संकट केवल परीक्षा की पारदर्शिता और जवाबदेही तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात से भी जुड़ा है कि देश के विद्यार्थी क्या पढ़ रहे हैं और शिक्षा व्यवस्था किस प्रकार के नागरिक तैयार कर रही है।
चर्चा में कहा गया कि स्वतंत्रता के बाद विकसित हुई लोकतांत्रिक और सामाजिक समझ धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। वक्ताओं के अनुसार, सत्ता के अधिक केंद्रीकृत और केंद्रीयकृत होते जाने के साथ आम जनता की समस्याएं भी बढ़ रही हैं। ऐसी स्थिति में विविधताओं वाले देश को चलाने के लिए विकेंद्रीकरण और स्थानीय स्तर पर समस्याओं के समाधान की दिशा में गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
केंद्रीकरण से बढ़ी परीक्षा संबंधी समस्याएं-
युवा नेता अनुपम ने कहा कि 2017 से पहले जब परीक्षाएं वर्तमान स्तर पर केंद्रीयकृत नहीं थीं, तब गड़बड़ियां होती तो थीं, लेकिन उनकी संख्या और व्यापकता आज की तुलना में कम थी। उन्होंने विशेष रूप से केंद्रीयकरण के बाद तमिलनाडु जैसे राज्यों से सामने आई शिकायतों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, केंद्रीयकृत परीक्षा व्यवस्था का प्रभाव कुछ राज्यों के युवाओं के चयन और उच्च शिक्षा में प्रवेश के अवसरों पर पड़ा है।
उन्होंने कहा कि परीक्षा व्यवस्था की समस्याओं का एक संभावित समाधान विकेंद्रीकरण है, क्योंकि यह पहले से आजमाया हुआ मॉडल रहा है। साथ ही उन्होंने शिक्षा से व्यावसायिक हितों को अलग रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं
चर्चा में शिक्षा के व्यापक उद्देश्य पर भी विचार किया गया। वक्ताओं ने महात्मा गांधी के शिक्षा संबंधी विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा को केवल परीक्षा पास करने अथवा रोजगार हासिल करने के साधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। शिक्षा मनुष्य के सर्वांगीण विकास, सांस्कृतिक उन्नति और आध्यात्मिक विकास से भी जुड़ी है।
वक्ताओं ने कहा कि दुनिया के कई देशों में लंबे समय से विभिन्न प्रकार की केंद्रीय परीक्षाओं की व्यवस्था रही है। ऐसे में भारत में परीक्षा व्यवस्था को विश्वसनीय और पारदर्शी बनाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंतन और मंथन की आवश्यकता है। सवाल यह है कि ऐसी व्यवस्था कैसे बनाई जाए जिसमें परीक्षा की विश्वसनीयता भी बनी रहे और देश की विविधता तथा क्षेत्रीय आवश्यकताओं का भी सम्मान हो।
विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और स्वतंत्र चिंतन-
चर्चा में विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र चिंतन और अकादमिक स्वतंत्रता के प्रश्न को विशेष महत्व दिया गया। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालयों में सेमिनार, वर्कशॉप, बहस और संवाद की स्वतंत्रता सीमित हुई है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में कौन-से विचार सुने जा रहे हैं, किन लोगों को आमंत्रित किया जा रहा है और किन विषयों पर चर्चा हो रही है—इन सब पर बढ़ते नियंत्रण से अकादमिक वातावरण प्रभावित हो सकता है। उनके अनुसार, किसी भी विश्वविद्यालय की पहचान केवल उसकी इमारतों और संसाधनों से नहीं बल्कि वहां मौजूद स्वतंत्र बहस, प्रश्न पूछने और नए विचार विकसित करने की क्षमता से होती है।
वक्ताओं ने चिंता व्यक्त की कि अब यह भी देखा जाने लगा है कि कोई प्रोफेसर किस सेमिनार में भाग ले रहा है और किस विचारधारा से जुड़े व्यक्ति को विश्वविद्यालय में आमंत्रित किया जा रहा है। उनके अनुसार, ऐसी प्रवृत्ति अकादमिक स्वतंत्रता के लिए चुनौती है।
पाठ्यक्रम में बदलाव पर सवाल-
चर्चा में शिक्षा के ‘हार्डवेयर’ के साथ-साथ उसके ‘सॉफ्टवेयर’ यानी पाठ्यक्रम और विषय-वस्तु में हो रहे बदलावों पर भी गंभीर सवाल उठाए गए। वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में बदलाव का अर्थ केवल परीक्षा केंद्रों, तकनीक या संस्थागत ढांचे को बदलना नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि विद्यार्थियों को पढ़ाया क्या जा रहा है।
उन्होंने पाठ्यक्रम में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों की बढ़ती उपस्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की। वक्ताओं के अनुसार, यदि भूगोल और वैज्ञानिक तथा सामाजिक ज्ञान की जगह धार्मिक स्थलों और धार्मिक विषयों को अधिक महत्व दिया जाने लगे तो यह सवाल उठता है कि इससे किस प्रकार के नागरिक तैयार होंगे।
इस संदर्भ में उन्होंने आशंका व्यक्त की कि शिक्षा व्यवस्था कहीं ऐसे आज्ञाकारी नागरिक तो तैयार नहीं कर रही जो सवाल पूछने के बजाय केवल निर्देशों का पालन करें। उनके अनुसार, लोकतांत्रिक समाज में विद्यार्थियों के दिमाग की खिड़कियां दुनिया के ज्ञान के लिए खुली रहनी चाहिए और उनमें प्रश्न पूछने तथा असहमति व्यक्त करने की क्षमता विकसित होनी चाहिए।
आलोचनात्मक सोच शिक्षा का आधार-
वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि युवाओं से जुड़ा शिक्षा संकट केवल परीक्षा की अकाउंटेबिलिटी और ट्रांसपेरेंसी का प्रश्न नहीं है। यह पाठ्यक्रम, ज्ञान के विकास, आलोचनात्मक क्षमता, स्वतंत्र चिंतन और संस्थागत जवाबदेही का भी प्रश्न है।
उनके अनुसार, यदि शिक्षा विद्यार्थियों में विश्लेषण करने, तर्क करने और सवाल पूछने की क्षमता विकसित नहीं करती तो वह समाज के दीर्घकालिक विकास में अपेक्षित भूमिका नहीं निभा पाएगी। शिक्षा का उद्देश्य केवल निर्धारित उत्तर याद करवाना नहीं बल्कि विद्यार्थियों को नए प्रश्नों और समस्याओं के समाधान के लिए सक्षम बनाना होना चाहिए।
व्यावसायीकरण से गुणवत्ता पर असर-
चर्चा में एक बार फिर शिक्षा के व्यावसायीकरण को मौजूदा संकट के केंद्र में रखा गया। वक्ताओं ने कहा कि जब तक शिक्षा को पूरी तरह व्यावसायिक हितों से मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य पेशेवर तैयार करने की चुनौती बनी रहेगी।
उन्होंने कहा कि शिक्षा में गुणवत्ता का प्रश्न केवल संस्थानों और परीक्षाओं का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह समाज के भविष्य का प्रश्न है। यदि शिक्षा का उद्देश्य मुनाफा कमाना बन जाएगा तो विद्यार्थियों के समग्र विकास, स्वतंत्र सोच और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे उद्देश्यों को नुकसान पहुंच सकता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और भविष्य की चुनौती
चर्चा के अंतिम हिस्से में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी भविष्य की संभावनाओं पर सवाल उठाया गया। वक्ताओं ने कहा कि यदि आने वाले समय में यह मान लिया जाए कि AI शिक्षकों, डॉक्टरों, वकीलों और इंजीनियरों की भूमिका को बड़े पैमाने पर प्रतिस्थापित कर सकता है, तो शिक्षा और रोजगार की पूरी संरचना पर नए सिरे से विचार करना पड़ेगा।
हालांकि इस संभावना को लेकर कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं दिया गया, लेकिन यह स्पष्ट किया गया कि तकनीकी बदलाव शिक्षा और रोजगार की वर्तमान अवधारणाओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर सकते हैं।
विविधता वाले देश में विकेंद्रीकरण की आवश्यकता
चर्चा के अंतिम चरण में भारत की विविधता को ध्यान में रखते हुए विकेंद्रीकरण को महत्वपूर्ण बताया गया। वक्ताओं के अनुसार, देश के अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों की सामाजिक, भाषाई और आर्थिक परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए शिक्षा और परीक्षा की एकरूप व्यवस्था लागू करते समय इन क्षेत्रीय विविधताओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थानीय स्तर पर समस्याओं को समझने और उनके समाधान विकसित करने की क्षमता आवश्यक है। अत्यधिक केंद्रीकरण से स्थानीय जरूरतों और आकांक्षाओं के लिए जगह कम हो सकती है।
——
पूरी विचार-चर्चा के अंतिम भाग में यह निष्कर्ष उभरकर आया कि भारत की शिक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती केवल परीक्षाओं में पेपर लीक, नकल या प्रशासनिक अनियमितताओं की नहीं है। इसके साथ शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम की दिशा, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, स्वतंत्र चिंतन, आलोचनात्मक क्षमता, व्यावसायीकरण, रोजगार और तकनीकी बदलाव जैसे प्रश्न भी जुड़े हुए हैं।
वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा को बाजार और राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त रखते हुए स्वतंत्र चिंतन, लोकतांत्रिक नागरिकता, ज्ञान निर्माण और सामाजिक जिम्मेदारी का माध्यम बनाना आवश्यक है। इसके लिए परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ-साथ पाठ्यक्रम, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और शिक्षा के व्यापक उद्देश्य पर भी राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर बहस की आवश्यकता है।
इसी संदेश के साथ कार्यक्रम की विचार-चर्चा समाप्त हुई और दर्शकों तथा श्रोताओं से उम्मीद व्यक्त की गई कि यह विमर्श उन्हें शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े इन महत्वपूर्ण सवालों को समझने में मदद करेगा।
Discover more from समता मार्ग
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


















