Citizens for Democracy का राष्ट्रीय अधिवेशन संपन्न।

0
The national convention of Citizens for Democracy has concluded.

Ketan Kumar

— केतन कुमार —

Citizens for Democracy का राष्ट्रीय अधिवेशन महाराष्ट्र के पुणे स्थित एस. एम. जोशी फाउंडेशन में 12 और 13 सितंबर 2026 को संपन्न हुआ। इससे पहले 11 सितंबर 2026 को देश भर से आए सैकड़ों युवाओं की सहभागिता के साथ एक दिवसीय Youth For Democracy का सफलतापूर्वक आयोजन हुआ। मंच पर प्रोफेसर आनंद कुमार, प्रोफेसर आशीष कोठारी, दीपक ढोलकिया और प्रोफेसर शशि शेखर मंचासीन थे। भारतीय संविधान की प्रस्तावना के सामूहिक वाचन के साथ Youth for Democracy का राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू हुआ। महाराष्ट्र के साथी अविनाश पाटील जी के संयोजकत्व में पूरे दिन का सम्मेलन सहभागिता के साथ चला।

लोकतंत्र और युवाओं की भूमिका-

पहले सत्र की शुरुआत दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल तू जिंदा है तो ज़िंदगी की जीत में यक़ीन कर…. यह ना तो गजल है और ना ही दुष्यंत कुमार का लिखा हुआ है। यह गीतकार शैलेन्द्र का लिखा गैैर फिल्मी गीत है जो आज़ादी की लड़ाई के जमाने से ही जन आंदोलनों में गाया जाता रहा है। के सामूहिक गायन के साथ शुरु हुआ। संगीत के माध्यम से सभी सहभागियों में परिवर्तन के लिए उमंग और उत्साह का संचार हुआ। प्रोफेसर शशि शेखर जी ने Citizens for Democracy की विरासत को बताते हुए युवाओं की भूमिका और लोकतांत्रिक कर्तव्यों के बारे में अपने विचार रखे।

Ashish Kothari in dialogue with a CJP activists-
प्रोफेसर आशीष कोठारी जी ने देश भर में हो रहे युवा आंदोलनों और उसके प्रभावों को सामने रखा। साथ ही, इन आंदोलनों के सिविल सोसायटी मूवमेंट पर पड़े असर को भी रेखांकित किया। उन्होंने लोकतांत्रिक सुधारों में CFD के योगदान को सामने रखते हुए लोगों को इसकी विरासत से परिचित कराया।

State reports on the protests and open debates with Q&A

आशीष कोठारी जी ने Gen Z आंदोलन के महत्व और उसके प्रभावों को लोकतांत्रिक सुधार की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण योगदान के रूप में प्रस्तुत किया। इसके साथ ही सभा में मौजूद Gen Z आंदोलन के कार्यकर्ताओं और CFD के आंदोलन में शामिल हुए युवाओं से संवाद किया। इससे सभा धीरे-धीरे और अधिक रोचक बनता गया।

आशीष कोठारी जी ने केवल एक व्याख्यान देने के बजाय युवाओं के साथ संवाद किया। उन्होंने हाल के युवा आंदोलनों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में युवाओं की भूमिका सुनिश्चित करने और पारंपरिक लोकतांत्रिक प्रणाली के भीतर वैकल्पिक राजनीतिक परिवर्तन की संभावनाओं को तलाशने के प्रयास के रूप में देखा।

पिछली कई वर्षों में छात्र आंदोलनों से हुए परिवर्तनों और उससे उत्पन्न परिस्थितियों को एक नई तरह की लोकतांत्रिक परिस्थिति के निर्माण की दिशा में लोकशक्ति के निर्माण के रूप में देखा जा सकता है। लोकतांत्रिक चेतना जनता के अंदर के डर के माहौल को समाप्त करती है, सरकार की नीतियों को जनपक्ष में लाने की कोशिश करती है और दमनकारी नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध का स्वर उत्पन्न करती है।

इसके साथ ही, दक्षिण एशिया में हो रहे युवा आंदोलनों की चुनौतियों और कमियों को भी कोठारी जी ने अपने उद्बोधन में शामिल किया। उन्होंने संघर्ष और रचना, दोनों के महत्व को आंदोलन के आचरण में शामिल करने की बात कही।
उन्होंने नई शिक्षा नीति के ऊपर भी कुछ महत्वपूर्ण स्थापनाएँ रखीं और उसमें सुधार की संभावनाओं तथा दृष्टि को सामने रखा।
इसके साथ ही कोठारी जी ने महाराष्ट्र के अनेक स्थानों, खासकर गढ़चिरौली के गाँवों का उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह लोगों ने सामूहिक प्रयास से लोकतंत्र की व्यवस्था स्थापित की है। वहाँ यह कहा जाता है कि सरकार को तो हम देश के लिए चुनते हैं, लेकिन गाँव में हमारी अपनी सरकार होगी और हम अपनी नीतियों के साथ सरकार चलाएँगे।
धीरे-धीरे उन्होंने लोकतंत्र को पर्यावरण और प्रकृति को बचाने की दिशा में एक उन्मुक्त चेतना के रूप में देखने की दृष्टि भी सामने रखी।

इसके साथ ही राजनीतिक दलों की चुनौतियों और निर्दलीय राजनीति की प्रासंगिकता को भी विस्तार से बताया गया।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि विद्यार्थी आंदोलन बाकी जन आंदोलनों को ऊर्जा और गति कैसे दे सकते हैं।
शंकर गुहा नियोगी की बात करते हुए उन्होंने संघर्ष और रचना, दोनों को साथ लेकर चलने तथा जन आंदोलनों की रचनात्मक भूमिका के विस्तार की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके साथ ही जन आंदोलनों के माध्यम से वैकल्पिक राजनीति के निर्माण की संकल्पना को भी लोगों के सामने रखने के महत्व को रेखांकित किया।
उन्होंने सभा में मौजूद युवाओं और वरिष्ठ साथियों के बीच intergenerational dialogue की भूमिका पर भी जोर दिया।

रणधीर कुमार गौतम का समाजशास्त्रीय विश्लेषण:

रणधीर कुमार गौतम जी ने दिल्ली में हुए युवा आंदोलन को करीब से देखा है और इस आंदोलन के कई साथियों के साथ उनका संबंध रहा है। इसका लाभ उठाते हुए उन्होंने समाजशास्त्र की दृष्टि से इस आंदोलन की dynamics को बहुत सरल तरीके से लोगों के सामने रखा।

उन्होंने कहा कि यह युवा आंदोलन सामाजिक ऊर्जा से निकला हुआ आंदोलन है। उन्होंने इस युवा आंदोलन को व्यापक आंदोलन के संदर्भ में स्थापित करने की कोशिश की और यह भी कहा कि यह आंदोलन सिर्फ युवाओं के प्रश्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के प्रश्न को भी अपनी praxis में उपस्थित रखता है। इस अर्थ में यह आंदोलन उस मौलिक विचार को सामने रखता है, जहाँ वैकल्पिक राजनीति की उपस्थिति साफ-साफ दिखाई देती है।
गौतम जी ने यह भी बताया कि आंदोलन ने लोगों को agency देने का काम किया है और जब भी किसी आंदोलन में नई agency का निर्माण होता है, तो उसकी ऊर्जा रचनात्मक ढंग से बढ़ती है।
इसके साथ ही उन्होंने गांधी, विनोबा, जयप्रकाश और एम. एन. राय की धारा में उपस्थित लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को भी इस आंदोलन में address करने की कोशिश की।
उन्होंने बताया कि जब गांधी राजनीतिक दलों की चुनौतियों की बात कर रहे थे, तब वह एक अलग समय था, लेकिन अब सात दशक के बाद हम उन सवालों को फिर से समझ रहे हैं। लोकशक्ति के निर्माण की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है।
अपनी प्रस्तुति में उन्होंने बताया कि जब तक सिविल सोसायटी को एक independent space नहीं मिलेगा, तब तक लोकशक्ति निर्माण की संकल्पना पूरी नहीं हो सकती। उन्होंने तीन तरह की separation की बात कही—Political Party, Government और Civil Society। इनके separation के बिना हम परिवर्तन की संभावनाओं का विस्तार नहीं कर सकते।
Open sovereignty इसी तीन इकाइयों के separation से सुनिश्चित हो सकती है। अगर हम बार-बार binary politics में जाकर इस separation को dilute करेंगे, तो लोकशक्ति निर्माण की चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं।
रणधीर गौतम जी ने संघर्ष और रचना की प्रक्रियाओं के साथ चरित्र निर्माण की संकल्पना को भी महत्वपूर्ण माना। उन्होंने बताया कि अपने अध्ययन में उन्होंने इस महत्वपूर्ण आयाम को अनेक grassroots democracy की सफलता और असफलता के कारणों में देखा है।

युवाओं की भागीदारी और आंदोलन का अनुभव
दिल्ली से आए छात्र केतन ने अपनी बात सामने रखी। केतन ने बताया कि “Cockroach” शब्द एक तरह से humiliation करने का कार्य करता था, लेकिन इसके प्रति उत्तर में resistance की दृष्टि से सोचने वाली बात यह है कि उसी शब्द को एक दलित व्यक्ति अभिजीत ने अपने आंदोलन का शब्द बनाया और धीरे-धीरे वह युवाओं के anger का एक लोकतांत्रिक स्वर बन गया। उन्होंने बताया कि “Cockroach” शब्द की ताप और अपमान को वही व्यक्ति समझ सकता है, जिसका सामाजिक humiliation के अनुभव से उसका संबंध रहा हो।

उन्होंने आगे बात को विस्तार देते हुए कहा कि इस लोकतंत्र में लोग कमजोर होते जा रहे थे और तंत्र मजबूत होता जा रहा था। लोगों को मजबूत करने की दिशा में इस आंदोलन की दिशा को देखा जा सकता है। Hopelessness के दौर में इस आंदोलन ने एक नई तरह की hope दी। इस युवा आंदोलन ने JP आंदोलन के विमर्श को एक बार फिर, लगभग 50 साल बाद, भारतीय राजनीति में स्थापित किया। इसके साथ ही आज जिस तरह सरकार सिविल सोसायटी की politics को criminalize कर रही है, वह एक नए तरह की चिंता पैदा कर रहा है। सिविल सोसायटी की ऊर्जा समाप्त हो रही है।

इसके बाद जेनयू के प्रोफेसर मनिंद्र ठाकुर के एक लेख के हवाले से केतन ने शिक्षा के प्रश्न पर भी अपनी बात रखी। शिक्षा के सार्वजनिक खर्च को जिस तरह सरकार एक liability मान रही है, वह अपने आप में चिंताजनक बात है।
विश्वविद्यालय जो समाज के आत्मचिंतन का केंद्र होना चाहिए, उसे अब सरकार के माध्यम से एक labour skill निर्माण के केंद्र के रूप में बनाया जा रहा है। जहाँ न्याय के प्रश्न पूछे जाते हैं, वहाँ विश्वविद्यालय की भूमिका और लोकतंत्र के सवाल सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं।

उन्होंने विश्वविद्यालय की लोकतांत्रिक भूमिका और शिक्षा के महत्व को समझने की दृष्टि भी सामने रखी।

कश्मीर से युवाओं की आवाज़ युवा साथी Dania Wani ने कश्मीर की समस्याओं को रेखांकित करते हुए कहा कि किस तरह वहाँ लोकतांत्रिक स्वरों को दबाया जा रहा है और एक तरह से शासक और शोषक की भूमिका सरकार निभा रही है।
उन्होंने बताया कि केवल चुनावों के अलावा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना ही सच्चे लोकतंत्र को स्थापित करने का रास्ता है।
माँ और रोटी पर हो रहे संघर्ष को उन्होंने लोकतंत्र की चिंता के रूप में बताया और लोगों से आह्वान किया कि संविधान के मूल्यों का पालन करते हुए लोकतंत्र की रक्षा करें।
उन्होंने कहा कि जिस तरह युवा आंदोलन में पहली बार देश के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया, इसका मतलब है कि युवा भविष्य में भी public leadership की accountability तय कर सकते हैं और लोकतंत्र को सुनिश्चित कर सकते हैं।
इसके बाद अन्य युवाओं ने भी अपनी-अपनी बात रखी। कश्मीर से सलीम ने अपनी बात रखते हुए एक बार फिर minorities पर हो रहे हमलों और देश की संवैधानिक व्यवस्था का प्रश्न सामने रखा। उन्होंने बताया कि किस तरह इस आंदोलन में एक बार फिर minority को space देने का काम किया गया।

आंदोलनों की विरासत और आगे की राह:

इसके बाद कोठारी जी ने कहा कि हालाँकि कुछ पुराने सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा यह सवाल उठाया गया कि हम कामयाब नहीं हो सके और ये युवा कामयाब हो गए, लेकिन उन्होंने कहा कि हर आंदोलन कुछ न कुछ कामयाबी लेकर आता है।
इसी तरह पुराने आंदोलनों, RTI activism और Right to Information के प्रयासों से निकली ऊर्जा और अनुभव भी लोगों को आगे बढ़ा सकते हैं। इसलिए पिछली पीढ़ियों को reject करना सही नहीं है। हर पीढ़ी अपने संघर्ष और अनुभव से अगली पीढ़ी के लिए रास्ता तैयार करती है।

टी ब्रेक के दौरान भी सभी सहभागी एक-दूसरे से परिचित होते हुए अपने-अपने क्षेत्र की समस्याओं पर चर्चा कर रहे थे।
टी ब्रेक के बाद एक बार फिर विचारों और चर्चा का सिलसिला शुरू हो गया। इस बार महात्मा गांधी के प्रपौत्र और गांधी विचार के अध्येता तुषार गांधी जी मंचासीन थे। महाराष्ट्र में लोकतांत्रिक विकास योजना अभियान के संयोजक भी इस अवसर पर उपस्थित थे।
गुजरात से आए साथी रोहित चौहान ने भी अपनी बात रखी।
इसके बाद तीसरे सेशन के पुनः आरंभ होने के बाद महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी जी द्वारा लोकतंत्र की स्थापना में लोगों की भूमिका के ऊपर बहुत ही विचारोत्तेजक चर्चा हुई। उन्होंने Restoring Democracy और आज हो रहे परिवर्तनों को सामने रखा।
तुषार गांधी जी ने सड़क की आवाज़ को लोकतंत्र की सबसे मजबूत आवाज़ मानते हुए कहा कि देश के लोगों को आंदोलन करना चाहिए और सत्ता तथा शोषण के खिलाफ संघर्ष करते हुए लोकतंत्र की आवाज़ को बुलंद करना चाहिए।
नागरिकों की कमजोर होती प्रक्रिया में देश के लोगों पर एक खास तरह की जिम्मेदारी है। गांधी जी के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि लोकतंत्र में सिर्फ वोट देने के अलावा नागरिकों से यह पूछा जाना चाहिए कि सरकार की निर्णय-प्रणाली में उनकी और क्या भूमिका है।
कई बार सरकार अध्यादेश लाकर नागरिकों की शक्ति को कमजोर कर देती है और लोगों को इसकी जानकारी भी नहीं मिल पाती। लेकिन इस तरह की जागरूकता और सक्रियता से हम सरकार पर दबाव बनाकर इस तरह के कानूनों का विरोध करने के लिए आंदोलन खड़ा कर सकते हैं। इतिहास में ऐसे आंदोलन हुए हैं, जिसके बाद सरकार ने जनहित के कानून भी बनाए और शोषण आधारित कानूनों को वापस लिया।
गांधी के अनेक संस्मरणों ने युवाओं को सिर्फ गांधी को पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं किया, बल्कि एक ऐसी मानवीय दृष्टि विकसित की, जिसमें प्रेम और कर्म की उपस्थिति जरूरी होती है।
गांधी जी के एक चित्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि किस प्रकार एक बच्चे के मन में गांधी जी की एक विशेष छवि और प्रतीक बनता है। इसी तरह का प्रतीक इस आंदोलन में भी हमारे अंदर उत्पन्न हुआ है, जो आज एक तरह के लोकतांत्रिक आंदोलन का स्वरूप और मार्गदर्शक बन गया है।
आज जिस तरह लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार को गिराकर पैसे और धन के आधार पर दूसरी सरकार बना ली जाती है, तो जनता को भी पूछने का अधिकार होना चाहिए कि जब हमने आपको मत नहीं दिया था, तो आपने सरकार कैसे बना ली?
इस तरह के प्रयासों में CFD जैसी संस्थाओं का योगदान होना चाहिए। और इस तरह के जवाब के लिए लोगों को सड़कों पर उतरना पड़ेगा। जब तक लोगों में subject के बजाय citizen बनने की प्रवृत्ति विकसित नहीं होगी, तब तक लोकतांत्रिक व्यवस्था सुरक्षित और उपयोगी नहीं हो सकती।
इसीलिए उन्होंने सवाल करने, reason करने और retrospecting democracy को लोकतंत्र को मजबूत करने की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया बताया।
इसके बाद उपस्थित लोगों ने उनके वक्तव्य पर अपने reflections सामने रखे।

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले से नीतू कुमारी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में नागरिकों में कर्तव्य-बोध होना चाहिए।
नीतू कुमारी ने कहा कि अगर हमने सरकार बनाई है, तो हमारा यह कर्तव्य है कि हम सरकार की निगरानी करें। लोकतंत्र में जनता को भी सरकार के विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए। CFD अधिवेशन में भी public accountability सुनिश्चित करने की बात बार-बार सामने आई।
आशीष कुमार जी ने लोकतंत्र को राजधानियों के बजाय लोगों और गाँवों से चलाने की बात रखी। उन्होंने कहा कि पूरे देश के युवाओं में वह चेतना जागृत हो रही है, जिससे देश में परिवर्तन, संघर्ष और आंदोलन की ऊर्जा मजबूत होगी।
संविधान की प्रस्तावना में मौजूद मूल्यों को धरातल पर पुष्पित-पल्लवित करने के लिए इस तरह के जन आंदोलनों की आवश्यकता होती है। युवाओं में भी इन मूल्यों की उपस्थिति देखी जा रही है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आए साथी हासमी ने संघर्ष की प्रक्रियाओं की तो तारीफ की, लेकिन उन्होंने कहा कि निर्माण की प्रक्रिया और खासकर सिस्टम विकसित करने की भी जरूरत है। उन्होंने कहा कि State की जिम्मेदारी है कि quality और justice, दोनों को actualize करे। बिना justice को ठीक किए कोई भी व्यवस्था पूरी नहीं हो सकती।
इसके बाद दर्जनों विद्यार्थियों और वरिष्ठ साथियों ने अपने सवाल और जिज्ञासाएँ सामने रखीं।

जारी है


Discover more from समता मार्ग

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Comment