राकेश रफ़ीक़ के बहाने कुछ शब्द – डॉ योगेन्द्र

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A few words on the pretext of Rakesh Rafiq

राकेश रफ़ीक़ को जब मल्टी ऑर्गन फेल्योर के कारण मैक्स हॉस्पिटल से बेलारी ले जाने के लिए एम्बुलेंस पर चढ़ाया जा रहा था, तो मन में हलचल हुई । यह ख़बर सुनने या देखने के लिए तैयार नहीं था। वैसे मुझसे उनका रिश्ता तनातनी का ही था, लेकिन उन्हें लगातार सक्रिय देख कर अच्छा लगता था। अंतिम बार उनसे सर्व सेवासंघ , बनारस में भेंट हुई थी, तब सर्व सेवा संघ मुख्यमंत्री आदित्यनाथ सिंह का कोपभाजन नहीं बना था। राकेश रफ़ीक़ को मैंने ‘ युवा भारत’ के गठन और बिखराव के दौरान जाना। भुवनेश्वर में युवा भारत का जो सम्मेलन हुआ था , उसमें साथियों के गर्माहट के बीच उन्हें थोड़ा बहुत समझा । मैं समझता हूँ कि गांधी, लोहिया, जयप्रकाश की धारा में काम करने वाले लोगों की दो बड़ी असफलताएँ हैं- एक, छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का बिखराव और दूसरे युवा भारत का विलीन होना। अगर दोनों में से कोई एक युवाओं का संगठन रहता तो आज देश की दूसरी परिस्थिति होती। युवाओं के अन्य संगठन पार्टी आधारित हैं, उपरोक्त दोनों संगठन विचारधारा आधारित थे और किसी के नियंत्रण में नहीं था। उसकी बहसों में स्वच्छंता थी। युवा भारत के महत्वपूर्ण साथियों में पहले विलास सोनवणे , फिर राजीव और अब राकेश रफ़ीक़ चले गए । परिवार तो दुखग्रस्त होता ही है, लेकिन साथियों के समूह में भी कचोट- सी उठती है।

मत विभिन्नता भी रहे , लेकिन साथ साथ जीने की ख्वाहिश हो। राकेश रफ़ीक़ दर्शन शास्त्र के ही ज्ञाता थे। मैं नहीं जानता कि उन्होंने क्या क्या लिखा? कितने काम किए? फ़ेसबुक पर उनकी ख़बरें आती रहती थीं । जो भी साथी मौजूद हैं, उनके सामने यक्ष प्रश्न तो है कि कैसे सब में सहकार हो और वक़्त की चुनौतियों से एक साथ जूझ सकें । हमारी आपकी सार्थकता सिर्फ़ इतने में नहीं है कि हम सक्रिय हैं। सक्रियता भी एक मायने रखती है कि कम से कम जीवन में उदासी और हताशा नहीं आती। हमारे सभी वैचारिक पूर्वज आँधियों में खड़े रहे, चाहे गांधी हों, लोहिया हों, जयप्रकाश नारायण हों या विनोबा भावे हों । उन्होंने धरोहर के रूप में बहुत कुछ दिया । हम उन्हें जोगा नहीं सके। आपसी अंतर्कलह में हम लोगों ने बहुत कुछ गँवाया । अवसर अभी भी हैं । अनेक साथियों में जोशोखरोश कायम है। वे कई मोर्चे पर काम कर रहे हैं, लेकिन अभी जो वक्त है, उसमें व्यापक एकजुटता की जरूरत है। जीवन चक्राकर होता है। विवेकानंद कहते हैं कि बीज से वृक्ष बनता है, फिर वृक्ष बीज में समा जाता है। समुद्र से वाष्प , फिर बादल और फिर जल बन कर समुद्र में ही खुद को विलीन हो जाता है। इसी आधार पर विवेकानंद इस निष्कर्ष पर आते है कि जीवन अमर्त्य है। वह रूप और आकार बदलता है, लेकिन मरता नहीं है। क्षय उसके हिस्से में नहीं है। जो भी हो, संसार के एक कोने में जीते हुए हम लोग बहुत कुछ देखने और सहने के लिए अभिशप्त हैं । राकेश रफ़ीक़ की यादें उनके संगी- साथियों और परिवार- जनों में बसी रहेंगी और हम सब अपने अपने राकेश को लेकर जीते रहेंगे । उनके साथ हुई बहसें, उनके कार्यों और उनके रचनात्मक अवदान के साथ । मीनाक्षी सखी और उनकी संतानों को इस बात का गर्व होना चाहिए कि राकेश रफ़ीक़ ने एक सार्थक जीवन जीया । उनके जाने का ग़म तो तमाम दार्शनिक- आध्यात्मिक तथ्यों के बाद भी रहेगा ।


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