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आँचल को परचम तो बनाना ही होगा

by Rajendra Rajan
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राजेंद्र भट्ट

ये बात मैं अपने युवा, प्रतिभाशाली और संवेदनशील मित्रों से कर रहा था।

“मैं पूरी विनम्रता से खुद को आधुनिक, वैज्ञानिक और प्रगतिशील सोच का पाता हूँ। पर उम्र के साथ पुरानी  पीढ़ी का तो हो ही गया हूँ। मुझे हमेशा लगता रहा कि भाषा, व्याकरण, शब्द  और अभिव्यक्ति के तरीके –  विचार के  वाहक तो होते हैं (उनके सिवा कोई विकल्प भी नहीं है); पर कई बार – या तो उनकी अपनी सीमा होती है और वे भाव, विचार और अभिव्यक्ति को पूरी गहराई में, सभी आयामों में व्यक्त करने में असमर्थ होते हैं। इससे भी खतरनाक बात यह होती है कि पीढ़ियों के पूर्वाग्रह और अवैज्ञानिकताओं की वजह से वे गलत और उलटे अर्थ – बल्कि अनर्थ देने लग जाते हैं। सच्चे, वैज्ञानिक-विवेकपूर्ण अभिव्यक्ति से जुड़े हर कवि-लेखक, कलाकार, नाटककार, फ़िल्मकार आदि को सही अभिव्यक्ति न हो पाने और गलत अभिव्यक्ति हो जाने के खतरों के प्रति सदा सजग – और इन सीमाओं को तोड़ने के लिए सतत प्रयत्नशील होना चाहिए।

“पुराने जमाने से ही, सजग रचनाकारों ने शब्दों-मुहावरों-प्रस्तुतियों की इन हदों और खतरों को काटने के लिए अभिव्यक्ति के नए उपकरण तलाशे। कविता में लक्षणा और व्यंजना उनमें एक है, जब हम उपलब्ध शब्दों और बिंबों की ही मदद से, उनकी सीमाएं लांघते हुए, नया, गहरा और अंदर तक बस जानेवाला अर्थ और संस्कार संप्रेषित कर पाते हैं। उदाहरण के तौर पर मज़ाज की ये पंक्तियाँ –

तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन
तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।

ये है – स्त्री-विमर्श का वह शानदार परचम, जो शब्दों की सीमा तोड़ कर लहराया है।”

मेरे युवा मित्र थोड़ा असहज और ‘बोर’ हो रहे थे। उनका कहना था कि ये रास्ता थोड़ा अभिजात किस्म का, ज्यादा मेहनत और सीमित असर वाला है। बेशक, उन्होंने माना कि असर पड़े तो गहरा और जीवन भर आंदोलित करनेवाला पड़ता है। फिर भी, उनका कहना था –

“आप ओटीटी प्लेटफॉर्म वाली नई फिल्में देखिए। जमीनी, गली-मुहल्ले की गाली-गलौज वाली भाषा, बड़ी से बड़ी बात को चुटकुलेबाज़ी में दो टूक कह देना – कोई परहेज नहीं। इससे मनोरंजन भी होता है, पैसा वसूल भी, और ‘मेसेज’ भी सीधा पहुंचता है। और हाँ, अब हम लिजलिजी शालीनता की भी परवाह नहीं करते। हमने ‘जेंडर सेंसिटाइजेशन’ कर दिया है। यहाँ लड़कियां भी गालियां देती हैं और मर्दानगी का सारा हिसाब बराबर कर देती हैं – बिंदास।”

एक महिला युवा मित्र ने फक्र से एक प्रसंग पेश किया – “एक बदतमीज़ ‘मर्द बच्चा’ कह रहा था – ‘मुझसे पंगे मत ले, मैं शेर का बच्चा हूँ।’ मैंने तड़ाक से कहा – ‘पहले ये बता कि शेर तेरे घर आया था, या तेरी माँ –’

मैंने मित्र को टोका – “पहली बात, दक़ियानूसी ‘महान संस्कृति’ वालों के ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ के पूर्वाग्रहों की तरह, यह भी पूर्वाग्रहों का दूसरा छोर है कि हर बात पर (लाफ़्टर ट्रेक की मदद से) द्विअर्थी चुटकुलेबाज़ी और गालियों की भाषा गली-मुहल्लों की असली भाषा है और उसका कुल कथ्य और सीमा यही है। वे लोग बोल-चाल में गालियां देते हैं लेकिन वहाँ गहरा दुख-दर्द, अपनों की चिंता-बलिदान, सामाजिक अन्याय, छले जाने का भाव – पर साथ ही संघर्ष में, जीवन में अटूट विश्वास जैसे अनेक गहरे भाव हैं जो सतही चुटकुलेबाजी में नहीं सिमट सकती। उस दुख-दर्द, अनुराग-विराग और पीढ़ियों के अनुभव-विरासत को पंडिताऊ श्लोकों में समेटना जितना अश्लील और छिछोरा है, उतना ही हल्का इस अति-चुटकुलेबाज़ी में उड़ा देना भी है। यह ट्रेंड भी कला के ‘ट्रिविलाइज़ेशन’ का है जिससे लेखक-रंगकर्मी-फ़िल्मकार को सावधान रहना है।”

दूसरी बात ज्यादा खतरनाक है। ये सच है कि ‘मर्द शेर बच्चे’ को आपने जोरदार ‘फेमिनिस्ट’ पंच मारा और एकदम (शाब्दिक अर्थों में भी) ‘बिलो दि बेल्ट’ (पेट के एकदम नीचे) लगा भी होगा क्योंकि जिस अबला नारी से उसने वेदना से आँखें भर आने की उम्मीद की होगी, उसने बगैर भावुक हुए (जो वाकई ‘एमपावरमेंट’ है) यह पलट-पंच मारा जिसकी बेचारे ने उम्मीद नहीं की होगी।

लेकिन अगर मेरी ‘अभावुक’ लेकिन विवेकशील-संवेदनशील ‘फेमिनिस्ट’ योद्धा इस गाली के साथ इस ‘मर्द शेर बच्चे’ की माँ की कल्पना करे तो वह दृश्य उसे कैसा लगेगा? क्या उस माँ की मौजूदगी में वह यह गाली दे पाती? हम सभी स्त्री-पुरुषों को गरिमायुक्त मनुष्य मानते हैं। हम स्त्री को ब्राह्मणी-क्षत्राणी-शेरनी कह कर उसे ‘वस्तु’ बनाने के षड्यंत्र में यकीन नहीं करते। यह चुटकुले-नुमा गाली सीधे-सीधे स्त्री को मात्र योनि बना देने वाली – एकतरफा शारीरिक संबंध और उसे किसी की संपत्ति की तरह बच्चे जननेवाली वस्तु बतानेवाली गंभीर गाली है जो ‘मर्द शेर बच्चे’ को नहीं, उसकी माँ को दी गई। शायद मेरी फेमिनिस्ट मित्र भी यह नहीं चाहती होगी कि अपनी हमजात औरत को यह गाली दे।

अगर हम गहराई से सोचें तो चुटकुलों में, या गंभीरता से दी गई सारी गालियां स्त्रियों की यौनिकता के जरिए उनके स्त्रीत्व पर हमला करनेवाली गालियां हैं। युद्धों में ‘सॉफ्ट टारगेट्स’ पर हमला करने की रणनीति रही है। स्त्रियों की तन की यौनिकता (सेक्सुएलिटी) पर नियंत्रण कर, उसे मन का ‘नारीत्व’ बना देने की ‘कन्डीशनिंग’ पितृ-सत्ता वाले समाज ने पीढ़ियों से कर दी है और इसे स्त्रियों के मन-मस्तिष्क में भर भी दिया है। हर समाज-पंथ-समुदाय में कोई ‘मर्द बच्चा’ किसी स्त्री का ‘मालिक’ है। चाहे बचपन में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापे में पति द्वारा बेलगाम होने को तैयार स्त्री की रक्षा की सलाह हो, चाहे ‘औरतें खेतियाँ हों’, चाहे ‘बीज बड़ा या खेत’ जैसी वाहियात बातें हों – ये परम्पराएँ और पूर्वाग्रह समाज में गहरे बसे हैं।

डीएनए टेस्ट से सदियों पहले से, मर्द की एक ही बड़ी चिंता है कि मेरी ‘(स्त्री-)संपत्ति’ पर मेरी मुहर है या नहीं। ये भरोसा उसे मरने के बाद भी चाहिए। हमारे यहाँ पौराणिक कथाएँ हैं जिसमें मृत्यु के बाद पिंडदान के समय तीन-तीन हाथों का नदी के जल के ऊपर आ जाने और फिर “कौन असली पिता” के कथित ‘गंभीर’ विमर्श हैं। (हालांकि न तब, न अब, कोई मुर्दा पिंड लेने नहीं आया, बस पंडितजी दक्षिणा ले गए।) गीता जैसे गंभीर चिंतन के ग्रंथ के शुरू में भी अर्जुन को रिश्तेदारों के मरने के ‘विषाद’ से बड़ी चिंता ये खाये जा रही थी कि कुल के सारे पुरुष अगर लड़ाई में मर जाएंगे – ‘कुलक्षय’ होगा तो ‘कुलस्त्रियाँ प्रदूषित’ हो जाएंगी। ऐसा होगा तो ‘पिंडोदक क्रिया’ लुप्त को जाएगी – यानी सही बाप तक पिंड नहीं पहुंचेगा। (भगवद्गीता, प्रथम अध्याय, श्लोक 39-44) । बहरहाल, कृष्ण भगवान ने ज्ञान-भक्ति-कर्म के चिंतन की तरफ ‘ट्रैक’ मोड़ दिया और हमें पंडिताऊ व्रत-कथा की जगह चिंतन का श्रेष्ठ ग्रंथ मिला।

इस तरह, ‘मर्द’ का बड़ा काम, ‘पुरुषार्थ’ (ध्यान दीजिए भाषा में – इसके समानान्तर ‘स्त्री-अर्थ’ जैसा शब्द नहीं है) अपने कब्जे वाली स्त्री की यौनिकता से जुड़े नारीत्व की रक्षा करना है – अगर नहीं कर पाता तो उसकी मर्दानगी पर हमला है, उसे धिक्कार है। और जब भी ‘मर्दों’ में कोई लड़ाई होती है तो दूसरा मर्द कमजोर लक्ष्य – ‘सॉफ्ट टार्गेट’ पर हमले की तर्ज पर उसके आसपास की महिला के सेक्स और संतान जनने के अंगों पर हमला करता है। यह ‘मर्द’ की अस्मिता – ‘आइडेंटिटी’ पर हमला है। ‘मर्द’ जब औरत पर हमला करता है, तब भी वह इसी यौनिकता पर हमला कर उसका ‘गुरूर’ तोड़ता है। हर बार तो ऐसा सीधा हमला संभव नहीं होता, इसलिए गालियों – जो सारी की सारी स्त्री-शरीर और उससे संतान के जन्म से जुड़ी हैं – के प्रक्षेपास्त्र चलाए जाते हैं। ‘हरामी’, ‘दोगला’ से लेकर अधिक गंभीर गालियों तक यही भावना काम करती है। धीरे-धीरे, इन गालियों के दाल-भात की तरह इस्तेमाल से हम सभी (दुखद है कि स्त्रियाँ भी), अभ्यस्त – ‘ईम्यून’ हो जाती हैं। उन्हें ये चुभनी बंद हो जाती हैं। यही गालियों की रणनीति, समाजशास्त्र और (अ)नीतिशस्त्र है। 

जाहिर है, भाषा में गालियों का सभी प्रगतिशील तत्त्वों को, खासतौर से स्त्रियों को, सजग प्रतिकार करना चाहिए। यथार्थ-वर्णन करते समय भी हमेशा सजग रहना चाहिए कि क्या वाकई हम सही सम्प्रेषण के लिए गाली का इस्तेमाल कर रहे हैं या (पीढ़ियों के संस्कारों की वजह से) जाने-अनजाने ‘रस’ लेने लगे हैं, या सतही ‘चमत्कार’ दिखा रहे हैं। साथ ही, उन मुहावरों, शब्दों को भी सजग तरीके से भाषा से बाहर का रास्ता दिखाना होगा (भले पचास-सौ साल लगें) जो स्त्री की स्वतंत्र अस्मिता के विरोधी हैं (‘इज्जत लुट गई’, ‘चूड़ियाँ पहन लेनी चाहिए’, ‘कन्यादान’ किस्म के) और शताब्दियों के पूर्वाग्रह की वजह से भाषा में घुस गए हैं और गलत अर्थ देने लगे हैं। जैसा इस लेख के शुरू में कहा कि भाषा अभिव्यक्त कर पाने में छोटी पड़ जाए, यह खतरा बड़ा नहीं है। बड़ा खतरा यह है कि भाषा के हमारे उपकरण, हमारे अनजाने में हमें ऐसे गलत अर्थ, पूर्वाग्रह और संदेश देने लगें जिनसे सदियों की कुरूपताएँ और अन्याय फिर मजबूत हों।

और दूसरी बात, कला के किसी भी रूप से जुड़े कवि, लेखक, रंगकर्मी, सिनेमा से जुड़े व्यक्तियों को यह हमेशा ध्यान में रखना होगा कि कहीं ‘शॉर्ट कट’ और ‘वाह-वाह-चमत्कार’ रचने में अर्थ हल्का न पड़ जाए। अभिव्यक्ति को ‘सर्व-सुलभ’ बनाने के चक्कर में ‘ट्रिविलाइज़’ न करें। नहीं तो आपका उद्देश्य ही उलटा हो जाएगा।

उदाहरण के तौर पर, कुछ समय पूर्व स्त्री-अस्मिता पर एक गहरे अर्थों वाली फिल्म आई थी – ‘स्त्री’। बढ़िया अभिनय और कसे निर्देशन और ‘पेस’ के बावजूद, कहीं चुट्कुले-नुमा संवादों की वजह से इस फिल्म की संजीदगी और धार प्रभावित हुई और आम दर्शक केवल हल्की ‘कॉमेडी’ का संदेश लेकर गए होंगे। अर्थ की गहराई ने उन्हें कम आंदोलित किया होगा। दूसरी ओर, शायद 1980 के दशक की फिल्म ‘अर्थ’ या ‘उमराव जान’ देखें जो दर्शक को स्त्री-विमर्श और स्त्री-भावना के प्रति सम्मान से गहरे तक समृद्ध करती हैं, उसे बेहतर और संवेदनशील बनाने में मदद करती हैं और लंबे समय तक झकझोरती हैं। ये चंद उदाहरण हैं। ऐसी अनेक फिल्मों और कलात्मक अभिव्यक्तियों के उदाहरण दिए जा सकते हैं।

कविता में मज़ाज-दुष्यंत, नाटक में विजय तेंदुलकर, सिनेमा में श्याम बेनेगल-बिमल रॉय-सत्यजित रॉय होना बहुत कठिन है, पर टिकेंगे तो वही। आँचल को परचम बना लेने की बात पीढ़ियों को महज मनोरंजन नहीं देगी – समृद्ध यानी ‘एनरिच’ करेगी – संवेदनाओं को सिंचित करेगी। ऐसा भी नहीं कि इन लोगों की मूर्ति बना ली जाए। वक्त के अनुरूप उनसे आगे भी निकल सकते हैं – पर मन के किसी ईमानदार कोने में – ‘बैक ऑफ दि माइंड’ यह तो रहना ही चाहिए कि ‘सरल अभिव्यक्ति’ और ‘हल्की अभिव्यक्ति’ में, कलात्मकता के साथ ज्यादा लोगों तक पहुँचने और मदारी वाले मजमे में फर्क है। हमें सम्प्रेषण और मनोरंजन के साथ, सम्प्रेषण-मनोरंजन के साथ अपने दर्शक-पाठक को भाव-समृद्ध और बेहतर-गहरा इंसान भी बनाना है। 

वैसे ये अच्छे-अच्छे शब्द कितने भी लिख दें, अधूरे ही लगेंगे। असली अर्थ तो आपके मन में होता है और कसौटी आपका मन ही तो है कि आपने खूब अध्ययन, सजगता और बिना किसी समझौते के काम किया है या तात्कालिक लाभ अथवा चमक-दमक के लिए मन को ‘चुप’ रहने को कह दिया है। वैसे, लंबे दौर में आदर्श ही नहीं, व्यावहारिक भी यही होगा कि मन को ज्यादा समय ‘चुप’ रहने को न कहें। एक समय, जब आप कुछ करने लायक नहीं रहेंगे, और पीछे आपका अपना किया कुछ भी आपको याद रखने लायक नहीं लगेगा तो बड़ी असहाय घुटन होगी।

(और, इस डिस्क्लेमर की जरूरत नहीं है कि इस लेख में वर्णित संवाद हुआ नहीं, महज लेख को लिखने का ‘स्ट्रक्चर’ है – पर ऐसा संवाद मन में हमेशा चलते रहना चाहिए। )

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