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किसान आन्दोलन के मद्देनजर ज्ञान पंचायत

by Rajendra Rajan
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2 अगस्त। 1 अगस्त को दोपहर में विद्या आश्रम सारनाथ (वाराणसी) में आश्रम का स्थापना दिवस मनाया गया। आश्रम से नजदीक से जुड़े करीब 25 लोग उपस्थित थे। ज्ञान पंचायत का मुख्य विषय किसान आन्दोलन, स्वराज व न्याय, त्याग और भाईचारा के बिन्दुओं के इर्द-गिर्द वर्तमान परिस्थितियों में अपनी बात रखने का था।

शुरू में आश्रम की स्थापना के बारे में बताया गया, फिर आश्रम की समन्वयक चित्रा सहस्रबुद्धे ने विषय को सामान्य आदमी विशेषकर किसान के ज्ञान के दावे के सम्बन्ध में रखा। वरिष्ठ समाजवादी विजय नारायण ने कहा कि किसान आन्दोलन एक नए सिरे से और जबरदस्त ढंग से लोक-संस्कृति, लोकज्ञान, लोकभाषा, लोकस्मृति, लोकहित और लोकनीति जैसे विचारों को सार्वजनिक पटल पर ला रहा है। यह आन्दोलन लम्बे समय बाद शासन और पूंजीपतियों की व्यवस्था को बड़ी चुनौती पेश कर रहा है और एक नई राजनीति की ओर बढ़ने का आग्रह कर रहा है। रामजनम ने स्वराज के साथ इन नए तिहरे मूल्यों ‘न्याय, त्याग और भाईचारा’ को जोड़ा और किसान आन्दोलन में एक नये युग के उद्घाटन की संभावना बतायी। प्रेमलता सिंह ने कहा कि लोकविद्या के दृष्टिकोण से देखने पर आसानी से देखा जा सकता है कि यह लड़ाई लम्बी है। ज्ञान के दावे के बगैर हमारे कदम सुदृढ़ नहीं हो पाते और यह दावा किसान आन्दोलन पेश कर रहा है। कह रहा है कि ‘रोटी तो हम तिजोरी में नहीं बंद होने देंगे’, ‘संसद चलाना हमें भी आता है’ और खेती-किसानी और अपने समाज के हमारे ज्ञान पर संदेह की तो कोई गुंजाइश ही नहीं है। इस अवसर पर लक्ष्मण प्रसाद, एहसान अली, विनोद कुमार, शिवमूरत मास्टर साहब, पारमिता, प्रोफ़ेसर रमण पन्त, प्रवाल कुमार सिंह, मोहमद अहमद, फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, अभिषेक और युद्धेश ने भी विचार व्यक्त किये।

अंत में सुनील सहस्रबुद्धे ने न्याय, त्याग और भाईचारा के मूल्यों के भौतिक व्यवस्थाओं के साथ आवश्यक संबंधों की व्याख्या करते हुए कहा कि स्वदेशी परंपरा में न्याय में न्याय और तर्क दोनों समाहित होता है। जिस तर्क में न्याय नहीं है उसे हमारा जनमानस स्वीकार नहीं करता, पढ़े-लिखे लोगों की बात अलग है। पढ़े-लिखे लोग दोनों को अलग-अलग करके देखते हैं, किसान नहीं। त्याग का सामान्य  अर्थ यह है कि आप जितना समाज से लेते हैं उससे अधिक  समाज को वापस देते हैं। इसी में खुशहाली और प्रगति दोनों के सूत्र हैं। भाईचारा केवल मनोभाव की बात नहीं है, समाज की व्यवस्थाओं में यह एकीकृत होना चाहिए। संपत्ति का मालिकाना, संपत्ति के सम्बन्ध, शिक्षा, स्वास्थ्य, मेरिट, आरक्षण हर क्षेत्र में भाईचारे का एक अर्थ होता है जिसके हिसाब से नीतियां बननी चाहिए। किसान आन्दोलन जो इबारत लिख रहा है उसे पढ़ने का प्रयास करना होगा। ये तीन मूल्य वहां दिखायी देंगे- न्याय, त्याग और भाईचारा।

वरिष्ठ सर्वोदयी अरुण कुमार के अध्यक्षीय संबोधन के साथ ज्ञान पंचायत का समापन हुआ।

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