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गर्व से कहो कि मैं हिंन्दू हूँ ! आज शतप्रतिशत यह गर्व की राजनीति चरम सीमा पर जारी है !

by Samta Marg
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इस तरह के स्टिकर, नब्बे के दशक में संघ के लोग हरेक व्यक्ति के घरों में जाकर सव्वा रुपया लेकर चिपका दिया करते थे ! एक दिन सुबह – सुबह ही नवंबर-दिसंबर की ठंड में पांच – छह बुजुर्ग लोग ! संघ शाखा के गणवेश में ! जबकि फुलपॅंट आने के पहले के समय की बात है ! इस कारण सभी वरिष्ठ स्वयंसेवक ! शायद प्रातःकालीन शाखा से ही ! सिधा अपने गर्व से कहो वाले स्टिकर लेकर, हरेक के दरवाजे पर ! हाफ पँट में, और सफेद शर्ट इन किए हुए शाखा के गणवेश में ! आकर हमारा दरवाजाखटखटाया ! तो मैंने दरवाजे को खोल कर ! उन्हें घर के अंदर बैठक के कमरे में बैठा कर, पुछा की कैसे आना हुआ ? तो वह बोलें की

यह हिंदू धर्म की मूलभूत बात ! अहंकार या गर्व से इंसान ने मुक्त होना चाहिए, से मेल नहीं खा रहा है ! इसलिए, और मेरे व्यक्तिगत जीवन पर इन दोनों का प्रभाव होने के कारण ! मुझे तो यह स्टिकर ! आप लोग मुझे पैसे देंगे तो भी मैं, नहीं लगा सकता !


आयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिये कोई पहली बार अपने घर में आएं हैं ! तो मैंने उन्हें कहा “कि आप लोग बैठिए ठंड का समय है ! तो मै अद्रक डालकर चाय बनाता हूँ ! तब तक आप लोग सोच लिजिए ! की आयोध्या में ही राममंदिर क्यों बनाना चाहिए ? और उससे हमारे देश के कौनसे सवाल हल होने में मदद होगी ? या सवाल और भी उलझने की संभावना है ! यह बात मुझे समझाना होगा ! ” और अगर आप लोग मुझे समझाने में यशस्वी रहे ! तो मैं सव्वा रुपया की जगह सव्वासौ रूपये देने के लिए तैयार हूँ !


सभी साठ वर्षों से अधिक उम्र के! और शायद अच्छी – खासी नौकरी-पेशे से सेवानिवृत्त होकर ! इस प्रचार-प्रसार करने के कार्यक्रम में बढ़चढ़कर भाग लेने वाले लोगों में से थे ! अन्यथा नवंबर-दिसंबर की ठंड में इतनी सुबह हाफ पँट पहनकर घर – घर घुमने की क्या जरूरत थी ? मैने उन्हें पुछा की

“आप मे से कौन आयोध्या गया है ?” तो सभी ने कहा कि हम में से कोई नहीं गया ! ” तो मैंने कहा कि ”

मैं अपने कॉलेज के दिनों में, कॉलेज का जीएस था ! और मैंने अपने कॉलेज की एक ट्रिप, एक स्पेशल बस किराए से लेकर ! उत्तर भारत की यात्रा की है ! शायद 1971-72 के समय की बात है ! तो उस समय हम लोग दिल्ली तत्कालीन राष्ट्रपति श्री. व्ही. व्ही. गीरीजीसे भी मिले थे ! और पहली बार लोकसभा में भी देखने के लिए गए थे ! आगरा तथा राजस्थान, मध्य प्रदेश के ! कई धार्मिक और वैज्ञानिक तथा ऐतिहासिक स्थलों को देखने हेतु, जाकर आए हैं ! और उत्तर प्रदेश के कुछ स्थानों पर पर्यटन के उद्देश्य से गए थे ! जिसमें काशी, मथुरा – वृंदावन और आयोध्या भी गए थे ! और आयोध्या के बाबरी मस्जिद के पिछे की दिवार को लगकर ! एक चबूतरे पर राम लक्ष्मण तथा सिता की संयुक्त फोटो थी ! और लोग उसे फूलों की आरती करके, कुछ चढावा चढ़ाते हुए दिखाई दे रहें थे ! उस जगह से निकलने के पहले ही, अचानक पंडो की भीड़ने हमें घेरकर ! हमारे मे से हरेक को हर पंडा अलग – अलग पकडकर दावा करता था !

“कि इस जगहपर रामलला का जन्म नहीं हुआ है”! हमारे साथ चलिए हम आपको बताते हैं ! “कि सही जन्मस्थल कहा है? ” तो उनके साथ जाने पर देखा कि, कोई घर है, शायद उसीका होगा ! और वहाँ भी राम की फोटो अंदर रखी हुई ! और पहले से ही कुछ फुल रखे हुए हैं ! और वह दावा कर रहा है ! ” कि यहाँ पर ही रामलला का जन्म हुआ है !” और लगभग शेकडो पंडे, आयोध्या में आये हुए यात्रियों को जबरन खिंचकर ! अपने – अपने घरों में ले जाकर दावा कर रहे थे ! “कि रामलला यही पैदा हुए थे !” सुना है कि इस तरह हजारों की संख्या में पंडे अपने – अपने घरों का दावा किया करते हैं !” कि रामलला वहां नहीं यही पैदा हुए हैं !”


यह बात यह हमने हमारे उम्र के अठारह – उन्नीसवे साल की उम्र के दौरान ! मतलब 1971 – 72 में अपने खुद के आंखों से देखा है ! और कोई उस समय कोई राममंदिर आंदोलन नही चल रहा था ! उल्टा वह समय देश में महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन शुरू होने के आसपास का समय है ! जैसे गुजरात में युवक-युवतियों के द्वारा ही महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री. चिमणभाई पटेल के सरकार के खिलाफ शुरू हुआ था ! और उसका नाम ‘नवनिर्माण आंदोलन’ था ! ( जिसे जेपी आंदोलन भी बोला जाता है ! ) जो बाद में बिहार में भी शुरू हुआ था ! यह स्वतंत्रता के पच्चिस साल के भीतर की बात है ! 1972 में आजादी के पच्चीस साल पूरे हुए थे ! तो लोग अपने जीवन के रोजमर्रे के सवाल से परेशान थे ! और उसी दौरान, बंगाल में कुछ जगहों पर नक्सल समस्या शुरू हो चुकी थी ! और बाकी देश में लोगों महंगाई, बेरोजगारी तथा भ्रष्टाचार को लेकर काफी गुस्सा फैला हुआ था !

तत्कालीन सरकारों के खिलाफ बढना शुरू हो चुका था ! और उसी कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 के दिन, आपातकाल की घोषणा कर दी थीं ! जेपी से लेकर काफी विरोधी दलों के नेता गिरफ्तार कर लिये थे ! और आपके आर एस एस पर तो बैन लगा दिया था ! और सबसे ज्यादा आर एस एस के लोगों जेलों में बंद कर दिया था ! और उसके बाद ही 1977 में जनता पार्टी की सरकार पहली बार केंद्र में आई थी ! जिसके प्रधानमंत्री श्री. मोरारजी देसाई थे ! और 19 महिने के भीतर आर एस एस के दोहरी सदस्यता तथा विलय को लेकर ही पार्टी टूट गई थी !
और अभी हम लोग आजादी के पचास साल के बाद पहुंच गए हैं ! और आने वाले समय में पचहत्तर ! और शायद हममेसे कोई दिर्घजीवी निकला ! तो सौ साल भी देखने को मिल सकते हैं ! लेकिन आप लोग मेरे पिताजी के उम्र के हो गए हैं ! और शायद आप में से किसिने, अंग्रेजी राज भी देखा होगा ! और अब अपने आजादी के पचास साल पुरे होने के बाद ! क्या हमारे आजादी के सपने पूरे हो गए ? और यह जो भी देश की विभिन्न समस्याओं का अंबार बढते जा रहा है ! इसे कम करने के लिए आयोध्या के राममंदिर बनने से कुछ राहत मिल सकती है ?
देखिए ना हमारे देश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ! श्री. वि. म. दांडेकर और प्रोफेसर निळकंठ रथ ने ! ‘भारतीय गरीबी’ नाम से एक किताब ! हाल ही में प्रकाशित की है ! और उसके अनुसार, हमारे देश के चालीस प्रतिशत की आबादी ! अभिभी गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों की है !

आज भी रोज रात को सोने के पहले कुछ तीस चालिस प्रतिशत आबादी खाली पेट सोने के लिए मजबूर है ! शायद उतनीही आबादी अपने सर के उपर छत के लिए मोहताज़ है ! उन्हे पेटभर खाना या माथे पर छत ढंग से उपलब्ध नहीं है ! और अगर यह सभी सवालों का समाधान, मंदिर के निर्माण से होता होगा ! तो मैं अपनी जितनी अधिक क्षमता होगी ! उसके मुताबिक मंदिर के निर्माण में योगदान देने के लिए तैयार हूँ ! लेकिन आप लोगों को मुझे यह बात समझानी होगी ! तबतक मैंने बोलते – बोलते, बगल में स्थित किचन से अपने हाथों चाय बनाने के साथ-साथ ! कुछ बिस्कुट और चनाचूर भी, एक ट्रे मे लेजाकर ! उनके साथ बातचीत करने के लिए बैठा ! लेकिन वह सिर्फ बाबर ने मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाने की बात करते रहे ! और अब मंदिर वहीं बनाएंगे! जैसे पॉप्युलर बातें करने लगे थे !


तो मैंने कहा कि हमारे देश में शायद दुनिया के सबसे अधिक मंदिर है ! और अकेले आयोध्या, जो एक कस्बे के आकार का है ! वहां के घरों से अधिक मंदिर है ! और एक मंदिर बनने से हमारे देश की कौनसी समस्या हल हो सकती है ? यह सवाल का जवाब नहीं मिला तो मैंने, अपने घर की दस पंद्रह रुपये से अधिक की चाय ! और बिस्कुट खर्च करने का एकमात्र कारण ! आप सभी के सभी बुजुर्ग, और नवंबर-दिसंबर के ठंडी में ! इतनी सुबह मेरे घर में आने के कारण ! मैंने आपको अपने हाथों से बनाकर दिया है ! लेकिन मंदिर – मस्जिदों के मामले में ! मेरी समझ से, सिर्फ कुछ चंद लोगों की ! राजनीति की सिढी बनाने के बाद ! सत्ता की खुर्ची पर चढने का ! साधन के अलावा और कुछ नहीं है ! और मै, ऐसी किसी भी धर्म को लेकर राजनीति करने के खिलाफ हूँ ! धर्म व्यक्तिगत आस्था तक ! वह भी चार दिवारों के भीतर ही रहना चाहिए ! उसे राजनीतिक खिलौने के तौर पर इस्तेमाल करने के सख्त खिलाफ हूँ ! क्योंकि इसी धर्म के आधार ! पर आजसे पचास साल पहले ! हमारे देश का बटवारा हुआ है ! और अब पुनः धर्म की राजनीति से ! और भी बटवारे की नौबत आ सकती है !


क्योंकि आप – हमको मुसलमान अच्छे-बुरे कुछ भी लगे ! लेकिन गुजरात – भागलपुर, भिवंडी, जलगांव, मालेगाव ! कितने भी दंगे कर लिजिए ! कोई भी मुसलमान कहीं भी, नहीं जाने वाला है ! यह बात पक्की ध्यान में रखते हुए ! हमे उनके साथ शांति सद्भावना के साथ जीवन जीने की आदत डालनी पडेगी !


हम लोग रेल की कुछ समय की यात्रा में ! साथवाले प्रवासी के साथ प्रेम और हंसते – खेलते हुए जाते है ! तो हमारी यात्रा अच्छी होती है ! और किसी कारण से, साथवाले प्रवासी के साथ झगड़ा हो गया ! तो पूरी यात्रा में अपनी मनस्थिति खराब हो जाती है ! यह तो शेकडो सालों से साथ-साथ रहते आए हैं ! और आगे भी रहेंगे ! दुनिया के कोई भी मुस्लिम देश इन्हें नहीं लेने वाले ! और न ही यह जानें वाले ! तो एक दूसरे के साथ प्रेम – सद्भावना से रहना ही अच्छा है ! अन्यथा सतत तनाव में रहने से देश की भी ! और हमारे – आपकी भी तबीयत खराब कर लेने से क्या लाभ ?
हां कुछ राजनीतिक दलों को सत्ता की सिढी के लिए ! यह शॉर्टकट लग सकता है ! लेकिन ऐसे दल इतिहास के क्रम में, बहुत आयेंगे और जायेंगे ! लेकिन देश का क्या ? इस लिए आप लोग बताएं “की मंदिर बन जाने से, हमारे देश की कौनसी समस्या हल होने वाली है ? या हमारे देश की समस्या बढने वाली है ?”


लेकिन वह सभी अपने जीवन के आखिरी पारी में ! टाईम पास के लिए, विशेष रूप से ! संघ की शाखा में जाने वाले लोगों में से एक थे ! मैंने उन्हें कहा” कि व्यक्तिगत रूप से मेरा कोई भी राजनीतिक दल के साथ संबंध नहीं है ! और न ही आगे रहने की संभावना है ! क्योंकि राजनीतिक दलों से मनुष्यों का बहुत भला होगा ऐसी मेरी मान्यता नहीं है ! इसलिए मैंने आजतक सिर्फ एक ही बार अपने मताधिकार का उपयोग किया था ! वह 1977 के चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ ! लेकिन वर्तमान समय में भारत के किसी भी दल के बारे में मेरी राय अच्छी नहीं है ! इसलिए मैं दलगत राजनीति से दूर हूँ ! लेकिन समस्त विश्व के लोगों की भलाई हो ! और इस लिऐ जाति-धर्म निरपेक्ष समाज के लिए विशेष रूप से ! होश आया तबसे कोशिश कर रहा हूँ ! इसलिये “गर्व से कहो कि मै हिंदू हूँ !”

यह स्टिकर, मै अपने दरवाजे पर आप लोगों ने विनामूल्य दिया ! या मुझे ही पैसे देकर लगाने के लिए कहा ! तो भी मैं इसे लगाने वाला नहीं हूँ ! सुबह – सुबह आप लोगों को मेरा भाषण सुनना पड़ा ! और इतना समय भी बर्बाद हुआ ! और आप लोग मनहीमनमे सोच रहे होंगे कि कहा आकर फंस गए ? ” तो उन्होंने कहा” कि बिल्कुल भी नहीं ! आप की बात बिल्कुल तटस्थ और किसी के भी खिलाफ नहीं ! उल्टा समष्टि के लिए आप का चिंतन, हमें भी सोचने के लिए विशेष रूप से काम आयेगा ऐसा हमे लगा ! और सबसे बड़ी बात ! आपने खुद अपने हाथों चाय बना कर दिया ! यह बात ज्यादा ध्यान में रहेगी ! तो मैंने उन्हें बताया कि “मेरी पत्नी केंद्रीय विद्यालय में काम करती है !” और वह स्कूल में गई है ! और हमारे दोनों बच्चे भी ! लेकिन वह घर में होते तो भी मै ही घरेलू काम करता हूँ ! क्योंकि मेरी पत्नी को नौकरी और घरेलू कामकाज दोनों करने देना, यह भी शोषण है ! इसलिए मैंने खुद ही ! अपनी इच्छा से, इस काम को करने का निर्णय लिया है ! क्योंकि मैं जयप्रकाश नारायण की ‘संपूर्ण क्रांति’ का एक सिपाही हूँ ! और संपूर्ण क्रांति का मतलब सिर्फ सरकारों को बदलना ही नहीं ! अपने आप को भी बदलना चाहिए ! और वह खुद से ही शुरू करे तो और भी अच्छा है ! अन्यथा सिर्फ वाचालता ही रह जायेगी !


जयप्रकाश का नाम सुनते ही ! उनके चेहरोपर, जबरदस्त हैरानी का भाव दिखाई दे रहा था ! शायद मन-ही-मन में सोचना शुरू किया होगा कि ! कहां आकर फंस गए ? क्योंकि चार अंधो के जैसा हाथी की पहचान करने का मामला शुरू हो गया होगा ! की कौनसा जयप्रकाश ? हमारे नजर में है वह या यह बता रहा था वह !!!!!!!


डॉ. सुरेश खैरनार

डॉ. सुरेश खैरनार

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