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हिंदू और मुसलमान – राममनोहर लोहिया : पाँचवीं किस्त

by Rajendra Rajan
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(देश में इस वक्त जो हालात हैं और जो राजनीतिक-सामाजिक चुनौतियां दरपेश हैं उनके मद्देनजर सभी संजीदा एवं संवेदनशील लोग हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास की खाई पाटने तथा सौहार्द का रिश्ता मजबूत व जनव्यापी बनाने की जरूरत शिद्दत से महसूस करते हैं। इस तकाजे की एक समझ और दृष्टि बने, इस मकसद से डॉ राममनोहर लोहिया का 3 अक्टूबर 1963 को हैदराबाद में दिया गया भाषण बहुत मौजूं है। यह भाषण हिंदू और मुसलमान शीर्षक से छपता रहा है। हमने इसे आईटीएम यूनिवर्सिटी, ग्वालियर से प्रकाशित पुस्तिका से लिया है, जिसमें लोहिया का एक और प्रसिद्ध प्रतिपादन हिंदू बनाम हिंदू भी संकलित है।)

गर हिंदुस्तान-पाकिस्तान का महासंघ बनता है तो जब तक मुसलमानों को या पाकिस्तानियों को तसल्ली नहीं हो जाती, तब तक के लिए संविधान में कलम रख दी जाए कि इस महासंघ का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, दो में से एक पाकिस्तानी रहेगा। इसपर से लोग कह सकते हैं कि तुम अंदर-अंदर रगड़ क्यों पैदा करना चाहते हो? जिस चीज को पुराने जमाने में कांग्रेस और मुस्लिम लीग वाले नहीं कर पाए, कभी-कभी कोशिश करते थे, रगड़ पैदा होती थी। अब तुम फिर से रगड़ पैदा करना चाहते हो? इसका और कोई अगर जवाब नहीं तो मैं एक सीधा-सा जवाब दूंगा कि 1 वर्ष हमने यह बाहरवाली रगड़ करके देख लिया, अब फिर अंदर की रगड़ कैसी भी हो, इनसे तो कम से कम ज्यादा अच्छी ही होगी।

यह बाहरवाली पाकिस्तान-हिंदुस्तान की रगड़ है, उसको हम निभा नहीं सकते। इसके चलते तो हम दुनिया में हमेशा मोहताज रहेंगे। हमेशा किसी न किसी के मोहताज या शिकार बनते रह जाएंगे। इसी तरह से और भी नए ढंग की बातें सोच सकते हो।

हो सकता है कि लोग काश्मीर वाला सवाल उठाएं कि अब तक तो तुमने आसान-आसान बातें कर लीं, लेकिन जो मामला झगड़े का है, उसपर तो कुछ कहो। तो, काश्मीर का सवाल अलग से हल करने की जब बात चलती है, तो मैं कुछ भी लेने-देने को तैयार नहीं हूं।

मेरा बस चले तो मैं काश्मीर का मामला बिना इस महासंघ के हल नहीं करूंगा। आजकल जो बातें चलती हैं उनमें सिलसिला नहीं है।

प्रधानमंत्री साहब तो बड़े मजे के आदमी हैं। सुबह कुछ बोलते हैं, शाम को कुछ। लोग सुनकर खुश हो जाते हैं। पर मेरा तो वह तरीका है नहीं, मैं उसे अख्तियार करने लग जाऊं तो हिंदुस्तान की जनता दूसरे ही दिन कहने लगेगी कि यह तो पागल आदमी है। लेकिन प्रधानमंत्री के लिए तो यह आसान बात है कि सुबह वे कह देते हैं कि हम तो काश्मीर के बारे में कोई बात करेंगे ही नहीं पाकिस्तान से और शाम को कह देते हैं कि बातें होती हैं तो सभी चीजों पर होती हैं। देने को तैयार हैं, लेने को तैयार रहते हैं। कभी कहते हैं कि जो मामला इस वक्त तक का है, उसमें कुछ थोड़ा-बहुत हेर-फेर करके सुलह हो सकती है। उनकी दो क्या, कितनी जीभें हैं। उनकी बात छोड़ दो। लेकिन मैं इतना कहना चाहूंगा कि अगर कोई एक मामला अलग से करने जाएंगे तो हिंदुस्तान-पाकिस्तान का मामला कभी भी हल नहीं हो सकता।

अगर नहरी पानी का अलग से करो तो फिर दूसरा कोई सवाल खड़ा हो जाएगा। मान लो काश्मीर का किसी तरह से हल हो, फिर तीसरा कोई सवाल खड़ा हो जाएगा, पूर्वी पाकिस्तान के हिंदुओं का, या पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान आने जाने के रास्ते का। इसलिए मैं साफ बोलना चाहता हूं कि अगर हिंदुस्तान-पाकिस्तान का महासंघ बनता है, तब मैं काश्मीर के बारे में कोई भी बात सोचने को तैयार हो जाता हूं, चाहे काश्मीर हिंदुस्तान के साथ रहे, चाहे काश्मीर पाकिस्तान के साथ रहे, चाहे काश्मीर एक अलग इकाई बनकर इस हिंदुस्तान-पाकिस्तान के महासंघ में आए।

पर महासंघ बने कि जिससे हम सब लोग फिर से एक ही खानदान के अंदर बने रहें। इस महासंघ के तरीके पर बुनियादी तौर पर हिंदुस्तान-पाकिस्तान की जनता सोचना शुरू करे।

फिर से मैं कहे देता हूं कि यह सब सोचना बेमतलब होगा, जब तक कि किसी इलाके के हिंदू और मुसलमान जानदार बनकर एक नई पलटन नहीं तैयार करते इसीलिए मैंने हैदराबाद और लखनऊ की बात कही। हैदराबाद और लखनऊ में हिंदू और मुसलमान जानदार बनकर एक ताकत बनें और अपनी सभाओं से, अपने प्रचार से, अपने प्रदर्शन से दिखाएं कि एक नई लहर अब इस देश में उठी है तब अलबत्ता इन चीजों में कोई ताकत आए।

इसी सिलसिले में एक सवाल थोड़ा-सा उठा है शेख अब्दुल्ला का। आज से नहीं कई वर्ष से मैंने कहा है कि शेख अब्दुल्ला को जेल में नहीं रखना चाहिए, लेकिन आजकल जब मैं कोई बात कह देता हूं, तो यह जरा ज्यादा फैल जाती है। अखबारवालों की थोड़ी-बहुत मेहरबानी है। पूरी तो नहीं फैलती। पूरी बात देने लगें तब तो मजा आ ही जाए। खैर, यह बात फैली तो कुछ लोगों को अच्छा लगा और कुछ लोगों को बुरा लगा। मुझसे एकाध जगह लोगों ने कहा, तुम इस देशद्रोही की रिहाई की बात करते हो? देशद्रोही! इस बात को पूरी तरह समझ लेना चाहिए कि आखिर यह बात है क्या। मैंने क्यों रिहाई की बात की है। उसका सबसे बड़ा सबब है कि मैं चाहता हूं कि हिंदुस्तान में कायदे-कानून की सरकार चले, मनमानी सरकार न चले।

थोड़ी देर के लिए आप शेख अब्दुल्ला को भूल जाओ। मान लो हम लोगों के बीच कोई चोर है, मैं चोर हूं या आप चोर हैं। आप गिरफ्तार होते हैं। चोरों के साथ कैसा बर्ताव होना चाहिए, इसके कुछ कायदे-कानून हैं। आप क्या चाहेंगे कि कायदे-कानून का बर्ताव हो या चोर को बस मारना-पीटना शुरू कर दिया जाए और अगर कोई गहरी चोरी हुई तो इतना मारा जाए कि नौबत ही न आए मुकदमे की। वह फिर मनमानी सरकार हो जाएगी।

एक होती है कायदे-कानून की सरकार, एक होती है मनमानी सरकार। मुझे इस बात का जबरदस्त खतरा दिखायी दिया कि हिंदुस्तान में, और पाकिस्तान में तो खैर साफ ही सी बात है कि 10-15 वर्ष में मनमानी सरकार चली है, कायदे-कानून की सरकार नहीं।

कदम-कदम पर आप देख सकते हो। मैं खुद आपको एक किस्सा बताता हूं। मेरा एक मुकदमा मामूली नहीं था। उसमें इलाहाबाद वाले उच्च न्यायालय में हम जीते थे। तीन हजार आदमी जेल से एकसाथ छूटे थे। वह दुनिया में एक अजीब घटना हुई थी। आज से 7-8 वर्ष पहले की बात है। हम लोग मुकदमा जीते, कानून टूट गया और कानून टूटते ही एक दिन में एकसाथ हजार आदमी जेल से छूटे थे। फिर उत्तर प्रदेश की सरकार ने उसकी अपील की। अपील की चिट्ठी मेरे पास आयी। एक बार आयी तब मैं दिल्ली की सबसे बड़ी अदालत में गया। वहां पता लगा कि अभी तो वह मुकदमा नहीं आएगा। सोचा, कोई बात नहीं, हिंदुस्तानी आलसी भी होता है, मैं भी आखिर हिंदुस्तानी हूं, सह लेता हूं, नहीं तो मुझे गुस्सा आ जाना चाहिए था कि तुमने चिट्ठी भेजी, बुलाया, अब कहते हो मुकदमा नहीं करेंगे।

फिर दुबारा चिट्ठी आयी, दुबारा भी चले गए। तब भी हमने सह लिया। ऐसा मत समझना कि बड़ा आदमी हूं। मैं बड़ा नरम और ठंडा और कुछ-कुछ मानी में दब्बू आदमी हूं। दो बार सह लिया फिर तिबारा चिट्ठी आयी कि एकदम बुलाया है, अदालत में गया, फिर सुनता हूं कि मुकदमा नहीं है। तब थोड़ा-सा हमको भी लगा कि यह क्या मामला है।

जज क्या समझते हैं कि हम नागरिक, हिंदुस्तान के शहरी, हमारी कोई इज्जत नहीं। जज जब चाहे बुलाएं, जब चाहे वापस करें। आखिर शहरी की कोई इज्जत तो होनी चाहिए। अगर जज को काम है, तो शहरी को भी तो काम है।

जज ही खाली अपने दिमाग में सोचे बैठा रहता है कि हमको ही काम है और जब चाहे पेशी करे, जब चाहे मुल्तवी करे। आज हिंदुस्तान में करोड़ो रुपया बरबाद हो रहा है, क्योंकि मजिस्टर और जज दोनों को गुमान हो गया है कि जब चाहे पेशी कर सकते हैं और जब चाहे मुल्तवी कर सकते हैं। तो खैर, फिर मैं गया अदालत में।

फिर सवाल उठ गया था अंग्रेजी वाला। कुछ वकीलों से पूछा। हमने कहा, हम तो अंग्रेजी बोलनेवाला वकील नहीं रखेंगे तो सब घबरा गये। हमने सुना था कि कुछ ऐसा वक्त आता है कि खुद खड़े होकर बोल सकते हो। तब हमने कहा, जज साहब, यह हमारा मामला है, दो बार हम बुलाए गये, तीसरी बार भी बुलाये गये, अब भी मुकदमा नहीं ले रहे हैं आप। तो पहले तो उसने शराफत से बातचीत की। बड़ा जज था। अच्छी तरह से बात की, जी हां, आपका मुकदमा वक्त पर आएगा। फिर मैंने कहा, जज साहब, इसपर भी आप गौर करें कि दो बार मैं पहले आ चुका हूं, यह तीसरी बार है, अब बार-बार मुझे आप बुलाते हैं। तो न जाने क्यों उन्हें गुस्सा आ गया, और वे बोल पड़े कि आपको बीस बार आना पड़ेगा।

हमारे मन में जो बात आयी थी उसे, अच्छा हुआ, हमने कही नहीं। लेकिन हमने कहा, जज साहब, आपको एकतरफा फैसला करना पड़ेगा और हम चले आए। आखिर जज में और शहरी में ऐसा रिश्ता होना चाहिए कि जज को शहरी की इज्जत करनी चाहिए तभी तो शहरी जज की इज्जत करेगा। ऐसा तो नहीं कि जब चाहे बुलाओ।

वैसे, आजकल प्रताप सिंह कैरों साहब पंजाब वाले हैं। खाली वही नहीं हैं, ऐसा मत समझना, वह प्रताप सिंह कैरों साहब और यहां संजीव रेड्डी साहब, ये जितने साहब हैं, एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। किसी की पोल खुल जाती है, किसी की रह जाती है। उनका मामला मैं इसलिए बता रहा हूं कि जो मैं अभी बात कर रहा था कि कायदे-कानून की सरकार और मनमानी सरकार, दोनों में फर्क होना चाहिए।

वहां कोई सिविल सर्जन साहब थे। उनका तबादला करने के लिए पंजाब के मुख्यमंत्री ने कुछ हुकुम निकाले, क्योंकि सिविल सर्जन साहब, उनके लिए, उनकी बीवी के लिए और उऩके बच्चों के लिए कुछ कर-करा दिया करते थे। कभी तो सिलाई वाली मशीन देते थे, कभी दवाइयां पहुंचा देते थे, कभी किसी मरीज की बिना फीस के देखभाल किया करते थे, कभी उनके आदमी को अपने मकान में रख लिया करते थे, खिला देते थे लगातार तीन-तीन, चार-चार महीने। फिर इसमें उन्होंने जरा आनाकानी की, तो मुख्यमंत्री साहब नाराज हो गए और उनके खिलाफ कार्रवाई कर डाली।

अब यह सोचने की बात है कि क्या कोई मंत्री, मंत्री होने के नाते इतनी ताकत पा जाता है कि वह अपने कागज पर हुकुम निकाले, इस नीयत से नहीं कि सूबे का सरकारी इंतजाम अच्छा होता है या बुरा होता है, बल्कि इस नीयत से कि मेरी बीवी को या मेरे बच्चों को ठीक-ठीक दवा नहीं दिया, तब वह मनमानी हुकूमत हो जाया करती है। हुकुम, फैसले कायदे के मुताबिक होने चाहिए।

और जहां मनमानी चलेगी वहां तो व्यापार और गद्दी में ऐसा संबंध हो जाएगा कि गद्दी पर बैठा हुआ हमेशा मदद करता रहेगा व्यापार वाले को और दोनों एक-दूसरे की मदद से खूब लूटते रहेंगे। दोनों का रिश्ता खूब बढ़िया चलता रहेगा। यह तो यहां भी चलता होगा। मुझे बताने की कोई जरूरत नहीं।

( कल अगली किस्त )

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