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हम जान रहे हैं

by Samta Marg
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हम जान रहे हैं कि भारतीय संविधान को अप्रासंगिक बनाने की राजनीति हो रही है। फिर भी हम इस गणतंत्र को थामे रहेंगे।

हम जान रहे हैं कि धर्म को हथियार इसलिए बनाया गया है ताकि लोगों के मन से संविधान का भाव बाहर धकेला जा सके। फिर भी हम इसकी उद्देशिका को थामे रहेंगे।

हम जान रहे हैं कि एक तरफ पूंजी ने लगाम को पकड़ा हुआ है और दूसरी तरफ उपेक्षा ने दबोचा हुआ है। वित्तीय पूंजी ने सामाजिक पूंजी को लाचार बना दिया है। फिर भी हम संवैधानिक कर्तव्यों को संभाले रहेंगे।

हम जान रहे हैं कि आज की राजनीति ने द्वेष, घृणा, क्रूरता और सामाजिक विभाजन को अपने स्तंभ के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। फिर भी हम प्रेम, बंधुता, समता, समानता और स्वतंत्रता का मंत्र दोहराते रहेंगे।

हम जान रहे हैं कि सामाजिक न्याय को सामाजिक दुराचार ने, आर्थिक न्याय को आर्थिक दुराचार ने और राजनैतिक न्याय को राजनैतिक दुराचार ने अपने अधीन कर लिया है। फिर भी हम इंसानियत का रास्ता चुनते रहेंगे।

हम जान रहे हैं कि 26 जनवरी 2024 को, यानी भारतीय गणतंत्र के 75वें वर्ष को अपमान के भाव से संबोधित किया गया है। फिर भी हम संविधान के मान को सर्वोपरि रखेंगे। 

हम जान रहे हैं कि एक इंसान को अवतार के रूप में स्थापित करने का प्रयास जारी है। फिर भी हम भारत की उस संप्रभुता के जीवन को बचाने की कोशिश करते रहेंगे, जिसमें जनता, लोग सर्वोपरि होते हैं।

हम जान रहे हैं कि संविधान को इसलिए नाकाम किया जा रहा है, ताकि सबको मतदान का अधिकार न मिले, सब धर्मों को उनका मान न मिले, ताकि सभी स्त्रियां और सभी दलित स्वतंत्र न रह सकें, ताकि सत्ता से सवाल करने की कोई व्यवस्था न रहे, ताकि पूंजी को कुछ लोगों तक सीमित किया जा सके। ताकि फिर राजा महाराजा सुलतानों का शासन हो और इंसान नागरिक नहीं, बस प्रजा रहे। फिर भी हम संविधान की ही बात करते रहेंगे।

हम सब जान रहे हैं कि एक फौज संविधान के खिलाफ जंग लड़ रही है। भरोसे को तोड़ रही है। फिर भी हम भरोसे को बनाए रखेंगे।

हम जान रहे हैं कि सत्ता ने गणतंत्र को अमृत काल का हिस्सा नहीं बनाया है, लेकिन हम इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं। निःसंदेह अब संदेह नहीं है कि संविधान के मूल तत्वों को संगठित राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक गिरोहबंदी से घेर कर मारने का प्रयास हो रहा है। फिर भी हम संविधान के मूल तत्वों के पक्ष में खड़े रहेंगे।

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