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मंजुल के कार्टून से किसे डर लगता है

by Rajendra Rajan
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— सविता गणेश —

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार पर सामयिक, धारदार कार्टून बनाने के लिए मशहूर कार्टूनिस्ट मंजुल को नेटवर्क-18 समूह से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। ‘द वायर’ की रपट के अनुसार मंजुल पिछले छह वर्ष से संविदा के आधार पर इस समूह में कार्य कर रहे थे। बताने की जरूरत नहीं कि इस समूह पर रिलायंस इंडस्ट्रीज का स्वामित्व है।

मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद यह एक चलन सा बन गया है। जो पत्रकार मोदी और केंद्र सरकार पर सवाल उठाते है, उन्हें सरकार के कॉरपोरट मित्रों द्वारा चैनल से ही बाहर कर दिया जाता है। इस कड़ी में पुण्य प्रसून वाजपेयी, अभिसार शर्मा, पंकज श्रीवास्तव आदि का नाम उल्लेखनीय हैं। कार्टूनिस्ट मंजुल हाल ही में इसके शिकार हुए हैं।

कार्टूनिस्ट मंजुल को ट्विटर से एक ई-मेल प्राप्त होने के चार दिन के अंदर ही निलंबित कर दिया गया। इस ई-मेल में बताया गया कि उनके ट्वीट से ‘भारतीय कानूनों का उल्लंघन’ हुआ है।

ट्विटर के ई-मेल में यह नहीं बताया गया कि किस खास कार्टून से ‘भारतीय कानूनों का उल्लंघन’ हुआ है। कार्टूनिस्ट ने ट्वीट करके पूछा कि किस कार्टून या ट्वीट से इस तरह का उल्लंघन हुआ है।

ट्विटर से प्राप्त ई-मेल में कहा गया कि कार्टूनिस्ट के पास इस आरोप का जवाब देने के लिए तीन उपाय हैं- वह कानूनी सलाह प्राप्त करे और न्यायालय में आरोप को चुनौती दे, संबंधित पोस्ट अथवा एकाउंट हटा दे अथवा इस मामले को लेकर  सिविल सोसायटी या संबंधित गैर-सरकारी संगठन के पास जाए।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मंजुल का ट्विटर एकाउंट कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान बदइंतजामी की आलोचना करनेवालों में से एक है। उनके अनुसार यह ई-मेल उन्हें ‘शुद्ध रूप से डराने के लिए’ है। ट्विटर ने ई-मेल भेजकर अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया है, ताकि कल यदि कोई दूसरा नोटिस जारी होता है तो उसका धक्का मुझे ही सहना पड़े।

यह एकमात्र केस नहीं है। पिछले दिनों की घटनाओं से जाहिर है कि भारत सरकार ने सोशल मीडिया पर व्यक्त की गई असहमतियों को दबाने के लिए नया रास्ता निकाला है। 

10 जून को वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को ट्विटर की तरफ से कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य के कार्टून को साझा करने के कारण नोटिस प्राप्त हुआ। उनके अनुसार सोशल मीडिया कंपनी द्वारा यह सूचित किया गया कि यह ट्वीट ‘भारत के कानून का उल्लंघन’ है।

पिछले कुछ महीनों में ट्विटर ने अनेक एकाउंट ब्लॉक किए हैं और उन ट्वीट्स को प्रतिबंधित किया है जिनमें केंद्र सरकार की, खासतौर से कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान प्रबंधन के मोर्चे पर दिखी नाकामी को लेकर आलोचना है। ये एकाउंट भारत सरकार के कहने पर ब्लॉक किए गए हैं।

आक्सीजन सिलिंडर और बेड की कमी की चर्चा करने तथा अंतिम संस्कार के दृश्य दिखानेवाले 52 ट्वीट्स को भारत सरकार के अनुरोध पर प्रतिबंधित कर दिया गया। इसके अलावा 250 ऐसे एकाउंट्स को ट्विटर द्वारा बंद कर दिया गया, जो किसान आंदोलन से संबंधित सूचनाएं ट्वीट कर रहे थे।

सरकार सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के अनुच्छेद 69(क) के कारण इतने बड़े पैमाने पर ट्वीट्स को प्रतिबंधित करने में सक्षम है। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के अनुसार अनुच्छेद 69(क) में एक ओर  ‘गुप्त प्रतिबंध’ की अनुमति है, दूसरी ओर ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम एकाउंट ब्लॉक करने अथवा प्रतिबंधित करने का कारण बताने के लिए बाध्य नहीं हैं।

फरवरी में जब किसानों के प्रतिरोध को मीडिया में बहुत ज्यादा जगह मिल रही थी, सरकार द्वारा एक आदेश पारित कर माइक्रोब्लागिंग साइट को हैशटैग, “#modiplanningfarmersgenocide” ब्लॉक करने के लिए निर्देशित किया गया। आदेश में कहा गया कि इस हैशटैग को “सार्वजनिक व्यवस्था और राज्य की सुरक्षा के खिलाफ जनता को संज्ञेय अपराध करने के लिए उकसाने वाला पाया गया”। की गई कार्रवाई से यह स्पष्ट हो जाता है कि साइट को- कौन सी सामग्री उपयुक्त है और क्या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा पहुँचा सकती है- के संबंध में प्राधिकारियों के निर्देश को मानने के लिए कैसे बाध्य होना पड़ा।

मंजुल को अपनी जीविका की चिंता है, क्योंकि इससे उनके बहुत से ग्राहक टूट जाएंगे और उनके साथ जुड़ने से बचेंगे। फिर भी उन्होंने डराने की नीति का प्रतिरोध करने और कार्टून बनाते रहने का निर्णय लिया है, “मैं इस कृत्य से जरा भी परेशान नहीं हूँ, जब तक मेरे ग्राहक अनुमति देंगे, मैं कार्टून बनाता रहूँगा।”

 

मंजुल ने ‘न्यूजलांड्री’ को दिए साक्षात्कार में यह बताया कि कैसे सरकार अपनी छवि बचाने के लिए सभी तरह की आलोचनात्मक आवाजों को दबा देना चाहती है। उन्होंने उदाहरण के रूप में दिशा रवि और सिद्दीकी कप्पन की गिरफ्तारी का उल्लेख किया। हाल में कामेडियन भी सरकार के निशाने पर आए हैं। मुनव्वर फारूकी और चार अन्य लोगों को अमित शाह तथा हिंदू देवताओं पर ‘अमर्यादित टिप्पणी’ करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। नए अभियान के तहत ऐसे हर साक्ष्य और आलोचना को खत्म किया जा रहा है जो महामारी की दूसरी लहर के कुप्रबंधन को दिखाती है।

फरवरी में 2014 के चुनावों के बाद से देशद्रोह के मामलों को दर्शाने वाला एक डाटाबेस ‘आर्टिकल14’ द्वारा जारी किया गया है। डाटा से इस बात का पता चलता है कि कैसे सरकार सार्वजनिक आलोचना और प्रतिरोध के समय रणनीति के रूप में देशद्रोह का आरोप लगाती है।

फरवरी के आँकड़ों के अनुसार किसानों के प्रतिरोध के समय 6, हाथरस गैंगरेप कांड के समय 22, नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के प्रतिरोध के समय 25 पुलवामा आतंकी हमले के समय 27 देशद्रोह के मामले दर्ज किए गए। दर्ज किए गए ज्यादातर मामले प्रदर्शनकारियों, एक्टीविस्टों, ट्रेड यूनियन नेताओं, पत्रकारों तथा बुद्धिजीवियों के खिलाफ थे।

‘आर्टिकल14’ ने पाया कि इन मामलों में ज्यादातर देशद्रोह के आरोप पोस्टर चिपकाने, सोशल मीडिया पर पोस्ट करने, नारा लगाने, यहाँ तक कि व्यक्तिगत बातचीत के आधार पर लगाए गए। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान कुप्रबंधन की भी व्यापक आलोचना हो रही है। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि सरकार ने पूरी तरह से आलोचना से बचने के लिए ट्विटर की ओर ध्यान दिया है और अपनी मीडिया नीति को इस तरह से ढाल रही है कि ताकि नागरिकों पर निगरानी और पुलिस का पहरा और सख्त किया जा सके।

( gaurilankeshnews.com से साभार )

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