युवाओं के प्रेरणा-पुरुष जयप्रकाश – तीसरी किस्त

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जयप्रकाश नारायण (11 अक्टूबर 1902 - 8 अक्टूबर 1979)

— सच्चिदानंद सिन्हा —

विधायिका (लेजिस्लेटिव) हैसियत प्राप्त करने के एक सुगम तरीके के रूप में पार्टी ने आचार्य कृपलानी की किसान मजदूर प्रजा पार्टी और कुछ अन्य छोटी पार्टियों से मिलकर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया। आचार्य कृपलानी इसके अध्यक्ष बनाये गये और डॉ. लोहिया जनरल सेक्रेटरी। हालांकि कुछ समाजवादी विशेषताओं और मान्यताओं को बनाये रखा गया, लेकिन प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के रूप में जो पार्टी बनी, वह एकदम भिन्न किस्म की पार्टी थी। पार्टी के अध्यक्ष आचार्य कृपलानी को कुछ समाजवादी आदर्शों का मजाक उड़ाने में कोई हिचक महसूस नहीं होती थी। निश्चय ही यह पार्टी जेपी के आदर्शों की कसौटियों पर खरी उतर नहीं सकती थी। जेपी एक मार्क्सवादी थे। उनके निकट विधायी (लेजिस्लेटिव) गतिविधियां, सुनिश्चित सामाजिक लक्ष्यों को हासिल करने के समग्र और निरंतर आंदोलन का सिर्फ एक छोटा अंश मात्र ही थीं।

अब नेतृत्व डॉ. लोहिया और अशोक मेहता जैसे यथार्थवादी व्यक्तियों के जिम्मे था। जेपी के विपरीत ये नेता मूल और बुनियादी लक्ष्यों को नजरअंदाज कर जोड़-तोड़, गठबंधनों और सत्ता में साझेदारी के चुनावी राजनीति के करतबों से मेल बैठाने में ज्यादा मुआफिक हो सकते थे। अशोक मेहता अंततोगत्वा कांग्रेस में चले गये; डॉ. लोहिया अपने जीवन के अंतिम दिनों में गैर-कांग्रेसवाद की नीति के जनक बने- ऐसी पार्टियों, जिनमें किसी प्रकार की साझेदारी असंभव जान पड़ती थी, के बीच गठबंधन कायम कर उन्होंने अपनी नीति के बूते पर देश के कई राज्यों में कांग्रेस का आधिपत्य समाप्त कर दिया। उधर जेपी समाज में बुनियादी परिवर्तन के लिए एक नये शक्ति-स्रोत की तलाश में भूदान की तरफ मुखातिब हुए।

इस वक्त विचारधारा (आइडियालॉजी) के बारे में जेपी के दृष्टिकोण में भी कायापलट हुआ। उन्होंने बड़ी शिद्दत से यह महसूस किया कि एक भौतिकवादी विचारधारा अच्छाई और भलाई को प्रोत्साहित नहीं करती; भौतिकवाद मनुष्य को अच्छा और भला होने को प्रेरित नहीं कर सकता। इसके लिए तो ईश्वर जैसी किसी आध्यात्मिक शक्ति में आस्था होना आवश्यक है। जाहिर है कि उन्होंने राजनीति से अपने मोहभंग की अवस्था में इस समस्या पर फुरसत से विचार नहीं किया। उनके सारे अतीत और समाजवादी आंदोलन के आदर्शों के मूल में मनुष्य और समाज में अच्छाई तलाश करनेवाले मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता थी। स्वयं समाजवादी आंदोलन के मूल्यों की कई जड़ें ईसाई धर्म में थीं। नीत्शे ने इस तथ्य को बाकायदा स्वीकार करते हुए इन्हें दास नैतिकता कहा और इनकी भर्त्सना की थी। मानवीय कार्यकलाप और व्यवहार में मूल्य ढूंढ़ने के लिए जेपी को अपने अतीत का परित्याग करने की कोई जरूरत न थी। बहरहाल, सर्वोदय ने उन्हें बहुत आकर्षित किया और उन्हें लगा कि सर्वोदय का आध्यात्मिकता की ओर विशेष रुझान है।

भूदान आंदोलन के प्रति उनका झुकाव देश के विभिन्न राज्यों में भूमि सुधार कानूनों के कारगर न हो पाने के फलस्वरूप पैदा हुआ था। भूमि की अधिकतम सीमा निर्धारित करने वाले (हदबंदी) कानूनों से वास्तव में ज्यादा जमीन हासिल नहीं की जा सकती थी और उसके वितरण का हाल तो और भी बुरा था। इन कानूनों से प्राप्त जमीन की तुलना में भूदान के माध्यम से काफी ज्यादा जमीन प्राप्त की गयी थी।

भूदान का परिणाम काफी प्रभावोत्पादक जान पड़ता था। यह बात दीगर है कि जमीन की मिल्कियत के स्वरूप पर भूदान का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था; पड़ भी नहीं सकता था क्योंकि भूदान का जो आदर्श था उसी में स्वरूप को बदलने की गुंजाइश नहीं थी, वह (भूदान) जमीन के मालिक से उसकी जमीन का सिर्फ 1/6 हिस्सा मांगता था- मालिक के पास जमीन कितनी है, इससे उसका कोई वास्ता नहीं था। लेकिन, चूंकि विभिन्न सरकारों के भूमि सुधार कानूनों ने भी मिल्कियत के स्वरूप पर कोई असर नहीं डाला था, इसलिए जेपी के भूदान आंदोलन से प्रभावित होने के पर्याप्त कारण मौजूद थे। ग्राम दान और ग्राम स्वराज के बारे में किये गये दावों से वह और भी ज्यादा प्रभावित हुए। सिद्धांत रूप में ग्राम दान का मतलब यह होता था कि गांव की जमीनों के सारे मालिक अपनी-अपनी जमीन गांव को सौंप देंगे और वह गांव के नाम हो जाएगी; जमीन का मालिक अपनी जमीन पर खेती करता रहेगा, लेकिन सिद्धांत रूप में गांव की सत्ता (अथॉरिटी) के तहत ही। यह सोचा गया कि इससे ग्रामीणों में गांव की सारी जमीन को अपनी (यानी ग्राम समुदाय की) मानने की मानसिकता पैदा होगी।

जेपी को लगा कि यह तो गांवो में सामुदायिक समाज की स्थापना की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। उन्हें लगा कि चीन में स्थापित कम्यूनों से यह किसी प्रकार भिन्न नहीं होगा और सबकुछ बिना किसी खून-खराबे के हासिल हो जाएगा। ग्राम स्वराज के तहत तो ग्राम समुदाय ही गांव के सारे कामकाज की देखभाल और उसका प्रबंध करेगा। यह सब यूटोपिया के साकार होने जैसी बात लगती थी। ऐसी खबरें भी आ रही थीं कि एक के बाद एक बहुत सारे गांवों में ग्रामदान का लक्ष्य हासिल कर लिया गया है और वहां ग्राम स्वराज कायम भी हो गया है। कुछ राज्यों में तो ग्राम स्वराज की व्यवस्था को प्रशासनिक तंत्र के भीतर समायोजित करने के लिए कानूनी प्रावधान भी बनाये गये। जेपी ने अपने भोलेपन में इन सब दावों को सच माना। उनकी जैसी स्थिति में कोई भी व्यक्ति उल्लसित और प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था।

लेकिन सचाई यह थी कि क्रांति सिर्फ कागज पर ही हुई थी। ग्राम दान या ग्राम स्वराज वाले गांवों और अन्य गांवों में कोई फर्क नजर नहीं आता था। जिन स्थानों पर जेपी स्वयं सक्रिय थे वहीं कुछ गतिविधि देखी जा सकती थी। उनके प्रभाव के चलते कुछ ग्राम परियोजनाओं के लिए पैसे भी प्राप्त हुए। लेकिन जिस समाज-परिवर्तन की उन्होंने आशा की थी, उसने दस्तक भी नहीं दी। भूदान आंदोलन मंद पड़ गया और जेपी के परिदृश्य से हट जाने के बाद पहलेवाली उदासीनता और निष्क्रियता वापस लौट आयी।

बिहार में भूदान के कार्य में शुरू में जो ऊर्जा दिखाई पड़ती थी उसका एक कारण यह भी था कि किसान आंदोलन में सक्रिय बहुत से सोशलिस्ट कार्यकर्ता यह मान कर भूदान आंदोलन में शामिल हो गये थे कि जब जेपी इसमें हैं तो यह निश्चय ही क्रांतिकारी संभावनाओं वाला आंदोलन होगा। पर शुरू के उत्साह के बाद सबकुछ पुरानी लीक पर लौट आया– वही उदासीनता और नेम-धरम का सिलसिला चल पड़ा। जेपी निश्चय ही भूदान और ग्रामदान के एक बंद गली में पहुंच जाने के बारे में अनजान नहीं हो सकते थे।

लेकिन भूदान आंदोलन में सक्रिय रहने के दिनों में भी जेपी ने केवल उसी में अपने को पूरी तरह निमग्न नहीं कर लिया था। उन्होंने नगालैंड में हिंसा को रोकने के लिए एक शांति मिशन गठित किया। पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तान सरकार के दमन और भारत में आश्रय की तलाश में लाखों की संख्या में आए शरणार्थियों की दुर्दशा ने जब उन्हें अत्यंत व्यग्र किया तो इस बारे में दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए उन्होंने विदेश-यात्राएं कीं। 1960 के दशक में यूरोप और अमरीका में हो रहे छात्र आंदोलनों– अमरीका में विएतनाम युद्ध के खिलाफ धरनों (सिट इंस) और फ्रांस के छात्र विद्रोह- को वह बड़े ध्यान से जांच-परख रहे थे। उन्होंने इस बात पर खास तौर से गौर किया कि इन आंदोलनों को किसी राजनैतिक पार्टी का समर्थन प्राप्त नहीं था, इसके बावजूद वे सरकार और व्यवस्था तंत्र की चूलें हिला सके।

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