भारतीय मुद्रा

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— राजेंद्र राजन —

मुद्राएँ असंख्य प्रकार की होती हैं। किसी भी चीज के इतने प्रकार नहीं होते जितने मुद्राओं के। पर मौलिक विभाजन की दृष्टि से वे दो प्रकार की होती हैं। एक मुद्रा वह होती है जो प्रत्यक्ष अर्थात मुख पर होती है। दूसरी मुद्रा अप्रत्यक्ष होने के कारण जेब में या अन्यत्र होती है। मुख वाली मुद्रा मुख के द्वारा बनायी जाती है इसलिए उसे मुखमुद्रा और जेब वाली मुद्रा सरकार के द्वारा बनायी जाती है इसलिए उसे सरकारी या राष्ट्रीय मुद्रा कहते हैं। जिस प्रकार मुख वाली मुद्रा से मुख का भाव मालूम होता है उसी प्रकार राष्ट्रीय मुद्रा से राष्ट्र का। जैसे डॉलर से अमरीका का भाव मालूम होता है, पौंड से इंग्लैंड का और रुपये से भारत का। आजकल भारत की मुखमुद्रा और उसकी राष्ट्रीय मुद्रा में एक उल्लेखनीय समानता यह है कि दोनों अपनी भारतीयता पर काँप रही हैं और इसलिए बनायी जा रही हैं कि कुछ विदेशी मुद्राएँ अपनी हो जाएँ। विदेशी मुद्राओं की खूबी यह होती है कि वह देशी मुद्रा से अधिक रहस्यपूर्ण और प्रसन्नता का भाव लिये होती है। वह देशी मुद्रा का भाव तय करती है और देश की अर्थव्यवस्था का संकट दूर करती है।

भारतीय मुद्रा क्या है? इसका सीधा जवाब तो यही है कि रुपया जो है वही भारतीय मुद्रा है। रुपया उसे इसलिए कहते हैं कि यह जिसके पास बहुत होता है वह बहुरूपिया होता है। रुपये के भारतीय मुद्रा होने के कारण भारतीयों के लिए इसकी महिमा अपरंपार है। आदमी, आदमी को नहीं, रुपये को पहचानता है। कोई हिंदुस्तानी चेहरा ऐसा नहीं मिलेगा जिसकी मुद्रा पर रुपये का भाव या अभाव या प्रभाव न हो। हर हिंदुस्तानी रुपये को सलाम करता है। उसके आगे नतमस्तक होता है। रुपये के आगे तमाम चीजों की बलि चढ़ाता है। उसकी स्तुति करता है। रुपये की आरती उतारता है और गाता है : ‘ना बाप बड़ा ना भइया, सबसे बड़ा रुपइया।’ और इस प्रकार सबसे बड़ा रुपइया ही हमारी भारतीय मुद्रा है। मगर इसके सबसे बड़े होने का गाना हम चाहे जितना गाएँ, इसकी कीमत गिर रही है। हम या तो इसकी कीमत गिरने का रोना रो सकते हैं या इसे आवश्यक और स्वाभाविक बता सकते हैं। हम जो भी करें, भारतीय मुद्रा के मूल्य पतन को रोक नहीं सकते, क्योंकि इसका मूल्य हम नहीं आँकते।

अपनी किसी भी चीज का मूल्य आँकने के काबिल हम नहीं रहे। योग का महत्त्व हमसे नहीं, विदेशियों के योगा से स्थापित होता है। मगर रुपया योगा की तरह कोई प्राचीन भारतीय मुद्रा नहीं है जिसकी विदेशियों को जरूरत हो। यह तो हमारे जमाने की भारतीय मुद्रा है जो दुनिया की निगाह में प्रतिक्षण गिर रही है, फिर भी प्रतिक्षण हमें खींच रही है। भारी चीजें हल्की चीजों को अपनी ओर खींचती हैं। हिंदुस्तानी आदमी के आगे रुपया बहुत भारी है, इसलिए वह रुपये की ओर खिंचता जाता है। मगर हिंदुस्तानी रुपया विदेशी रुपये के आगे बहुत हल्का है, इसलिए देश के बाहर खिंचते जाने का उसका प्रवाह बराबर बना रहता है।

इस देश के इतिहास में एक जमाना था जिसे स्वर्णयुग के नाम से जाना जाता है, क्योंकि उस जमाने में मुद्राएँ जो थीं वे स्वर्ण की बनायी जाती थीं। मुद्रा की खूबी के आधार पर किसी जमाने का नामकरण करने की हमारे देश में परंपरा रही है। इस परंपरा के अनुसार भारत का वर्तमान युग अवमूल्यन का युग है, क्योंकि भारतीय मुद्रा की इस वक्त सबसे बड़ी खूबी यह है कि उसका अवमूल्यन हो रहा है। उसका पतन हो रहा है। वह गिर रही है। वह काँप रही है। वह लड़खड़ा रही है। वह लुंजपुंज हो रही है। हालांकि भारत का काफी विकास हुआ है। पाँच सितारा होटल बने हैं। अँग्रेजी स्कूलों का प्रसाद मिला है। सरकारों और कारों का लोकतंत्र मजबूत हुआ है। फिर भी भारतीय मुद्रा जो है वह दिन पर दिन कमजोर हो रही है। भारत के विकास और मजबूती के बारे में भारतीयों को आश्वस्त करने वाली सरकार खुद भारतीय मुद्रा के अवमूल्यन की घोषणा करते वक्त तनिक भी अपने को लज्जित महसूस नहीं करती। इस घोषणा का अर्थ होता है कि देखो, हालाँकि हम काफी विकास कर रहे हैं और मजबूत होते जा रहे हैं, मगर दुनिया की निगाह में, अमरीका और यूरोप की निगाह में, हम वही नहीं रहे, बल्कि हमारा मूल्य पहले से भी कम हो गया है। हमारी मुद्रा कुछ और गिरी हुई हो गयी है। हम कुछ और असमर्थ हो गये हैं। देशवासी इसे अन्यथा न लें। हमें आगे बढ़ने के लिए गिरना पड़ रहा है। हम थोड़ा और गिर जाएँ तो थोड़ा और सँभल जाएँगे। इस अवमूल्यन के बावजूद, बल्कि उसी वजह से दुनिया के बहुत से देशों से हम आगे हो गये हैं। यह है भारतीय मुद्रा। दैन्य की मुद्रा के ऊपर एक बेहयाई की मुद्रा। सरकार कोई भी हो, भारत की मुद्रा वही रहती है : दुनिया के आईने में अपना मूल्य खोती हुई, गिरती हुई, लड़खड़ाती हुई, डगमगाती हुई, काँपती हुई दुख और दरिद्रता की मुद्रा। और विदेशी मुद्रा के पीछे भागती हुई मुद्रा।

भारतीय मुद्रा की एक बड़ी असलियत का पता तब चलता है जब यह कहा जाता है कि देखो, भारत के सारे जरूरी काम रुके हुए हैं तो भारतीय मुद्रा के अवमूल्यन और कमजोरी के कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि हमारे पास विदेशी मुद्रा का अभाव है। देश को विदेशी मुद्राएँ चाहिए ताकि वह गतिमान हो सके। चाटुकारिता और मिन्नते करो उन प्रवासियों की, जो देश छोड़कर चले गये हैं, जो भारतीय मुद्रा को भूल गये हैं और तुम्हें विदेशी मुद्राएँ भेजते हैं। यह देश अपने वासियों की मेहनत और अक्ल से नहीं, विदेशी मुद्राओं से चलता है।

भारतीय मुद्रा आत्मसम्मान की मुद्रा नहीं है। यह एक पतनशील मुद्रा है। इसका लगातार अवमूल्यन अस्वाभाविक नहीं है। यह विदेशी कोष के सामने याचक के रूप में खड़े होने की मुद्रा है। यह घर में अकड़ने और बाहर सहमने की मुद्रा है। दुनिया के आईने में यह एक पिटी हुई मुद्रा है, एक चोट खायी हुई मुद्रा। इसके गिरने और लुढ़कने का क्रम जारी है। इसके सँभलने या उठने का कोई लक्षण दिखता नहीं है।

भारतीय मुद्रा का अवमूल्यन कहाँ तक होगा? क्या इसकी पतनशीलता को रोकने का कोई उपाय है? मगर पतनशीलता को जब जरूरी और स्वाभाविक मान लिया जाए तो उठने का सवाल वहीं खत्म हो जाता है। अपनी वास्तविक हालत से चिंतित होना भारतीय मुद्रा को शोभा नहीं देता। हमें चिंता तो विदेशी मुद्रा की है। हमारा संकट भारतीय मुद्रा के अवमूल्यन का नहीं है, विदेशी मुद्रा के अभाव का है। भारतीय मुद्रा गिर रही है तो गिरने दो। एक दिन हमारी राष्ट्रीय मुद्रा इतनी गिरी हुई हो जाएगी कि उठने का सवाल ही खत्म हो जाएगा।

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