जुगल किशोर रायबीर : संघर्ष, प्रेम और सत् का संगम

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जुगल किशोर रायबीर (17 मई 1946 - 6 नवंबर 2007)
अशोक सेकसरिया (16 अगस्त 1934 – 29 नवंबर 2014)

— अशोक सेकसरिया —

(उत्तर बंग तपशीली जाति ओ आदिवासी संगठन तथा समाजवादी जन परिषद के नेता जुगल किशोर रायबीर के बारे में यह लेख उनके निधन के बाद श्रद्धाजंलि के तौर पर लिखा गया था तथा सामयिक वार्ता के दिसंबर 2007 के अंक में प्रकाशित हुआ था।)

जुगल किशोर रायबीर के बारे में लिखना अत्यंत कठिन कार्य है क्योंकि उन्हें बहुत कम लोग जानते हैं। जन आंदोलनों से जुड़े समूहों, समाजवादी जन परिषद के कार्यकर्ताओं और उत्तर बंगाल के दलितों, मुसलमानों व आदिवासियों को छोड़कर उन्हें जाननेवाले लोग नहीं के बराबर हैं। लेकिन वह एक ऐसे राजनैतिक व सामाजिक कार्यकर्ता थे, जिन्हें वर्तमान राजनीति से क्षुब्ध एक नयी सृजनशील और अहिंसक राजनैतिक शक्ति के निर्माण की आकांक्षा रखनेवाले प्रत्येक देशवासी को जानना चाहिए। जिन लोगों को उन्हें जानने का मौका मिला है उनका यह भी कर्तव्य बनता है कि वे उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को बताएं क्योंकि उनका सारा जीवन प्रेरक रहा है। एक ऐसा प्रेरक जीवन, जिससे समतावादी समाज की स्थापना करने को आतुर राजनैतिक-सामाजिक कार्यकर्ता प्रेरणा लेकर अपनी राजनैतिक-सामाजिक समझ बढ़ाने के साथ-साथ प्रतिकूल परिस्थितियों में अडिग रहने और अनवरत संघर्ष करते रहने का जीवन वरण कर सकते हैं।

बंगाल के सामाजिक-राजनैतिक माहौल में हमेशा कोलकातामुखी मध्यवर्गीय राजनीति हावी रही है। ऐसे माहौल में जुगल किशोर रायबीर ने एक विद्वेषहीन दलित, आदिवासी और मुसलमान केंद्रित राजनीति का एकदम अलग, अहिंसक और क्रांतिकारी रास्ता चुना। उनकी मृत्यु के बाद एक मित्र ने स्मरण बही में उन्हें उत्तर बंगाल के गांधी के रूप में याद किया तो एक क्षण भी नहीं लगा कि वह भावुक हो रहे हैं। गांधीजी की राजनीति अंतिम व्यक्ति से शुरू हुई थी और रायबीर की भी वहीं से। कॉलेज जीवन से ही वह समाजवादी राजनीति से जुड़े रहे। यह आश्चर्य की बात है कि तमाम गुटबाजियों और बूढ़े राजनैतिक नेताओं की सत्तालिप्सा के बावजूद 1977 के चुनाव में फालाकाटा निर्वाचन क्षेत्र से युवा रायबीर को विधानसभा के लिए जनता पार्टी का उम्मीदवार मनोनीत किया गया। इसका कारण इमरजेंसी के विरोध में उनकी सक्रिय और जोखिम भरी भूमिका तो थी ही उन्हें एक सत्और आदर्शवादी युवक माना जाना था।सत् राजनीति में अब तक लुप्त शब्द है लेकिन उत्तर बंगाल के लोगों से, यहाँ तक कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थकों से (जिनके शब्दकोश में इस शब्द का अस्तित्व ही नहीं रहा) रायबीर के निधन के बाद उनके बारे में इस शब्द को उच्चरित होते सुनना मनुष्य के चित्र-विचित्र स्वभाव का आभास दिलाता है। ऐसे लोग, जो उन्हें नक्सलवादी, अलगाववादी और न जाने क्या-क्या कहते रहे हैं, उन्हें सत्पुरुष मानें यह कहीं गहराई में सत्य के हर हालत में सत्य बने रहने जैसा भी लगता है।

जनता पार्टी के कलह में जुगल किशोर जैसे व्यक्ति की कोई दिलचस्पी नहीं हो सकती थी। उन्हें 1977-80 के दिनों में मौजूदा राजनैतिक दलों की समाज-परिवर्तन के आंदोलन में कोई भूमिका नहीं नजर आयी और वह सभी उन्हें अप्रासंगिक जान पड़े। ऐसे में वह उत्तर बंग तपशीली जाति ओ आदिवासी संगठन से जुड़े। उत्तर बंगाल के शोषण और दोहन के बारे में, सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े रहने के दौरान भी, रायबीर पूरी तरह सचेत थे। लेकिन तब शायद वह यह मानते रहे थे कि एक लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर इस बात की गुंजाइश बची है कि लोकतंत्र बचाया जा सकता है और उत्तर बंगाल को न्याय मिल सकता है। 1977-80 का समय हमारे देश की राजनीति में एक संधिकाल है, जब अन्याय और शोषण से मुक्त समतावादी समाज-निर्माण के इच्छुक राजनैतिक कार्यकर्ताओं को सभी राजनैतिक दल अप्रासंगिक लगने लगे थे। उन्हें विकास के पूँजीवादी मॉडल को खारिज कर वैकल्पिक विकास की नींव रखने के लिए जन आंदोलनों के माध्यम से एक वैकल्पिक राजनैतिक शक्ति का निर्माण आवश्यक लगने लगा था।

उत्तर बंग तपशीली जाति ओ आदिवासी संगठन, उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय के दलित-आदिवासी छात्र आंदोलन के गर्भ से जन्मा था। अगस्त, 1976 में उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय में सिर्फ 11 छात्र दलित या आदिवासी थे। इन छात्रों को भी विश्वविद्यालय में दाखिला प्राप्त करने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। दाखिले के बाद छात्रवृत्ति नहीं मिलती थी और अपने सहपाठियों से कदम-कदम पर अपमानित होना पड़ता था। इन छात्रों ने उत्तर बंग तपशीली जाति ओ आदिवासी छात्र संगठन की स्थापना कर विश्वविद्यालय के दीक्षांत हॉल में एक सभा की। सभा के दो या तीन दिन बाद विश्वविद्यालय के भोजनालय में संगठन के एक छात्र को अपमानित किया गया। इसके बाद से दलित और आदिवासी छात्र नेताओं ने उत्तर बंगाल के जिलों का दौरा किया। 1976 से 1980 तक दलित तथा आदिवासी छात्रों का आंदोलन अपने चरमोत्कर्ष पर था। यह आंदोलन इस अर्थ में पूरी तरह सफल रहा कि सरकार ने उसकी चार सूत्री माँगें मान ली थीं। यही नहीं, उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय और उसके तहत सभी कॉलेजों में दलित और आदिवासी छात्रों के लिए आरक्षण भी मंजूर किया गया। लेकिन सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने छात्र संगठन के नेताओं पर आक्रमण करना शुरू कर दिया।

ऐसी स्थिति में दलितों और आदिवासियों का एक व्यापक संगठन उत्तर बंग तपशीली जाति ओ आदिवासी संगठन (उत्जास) बनाना तय हुआ और दिसंबर 1978 में तूफानगंज में संगठन का पहला अधिवेशन हुआ। संगठन के निर्देशन में वित्त निगम से ऋण के लिए अधिकारियों को सैकड़ों आवेदन-पत्र पेश किये गये तो प्रशासन ने सत्तारूढ़ दल के नेताओं की मदद से आवेदन पत्र भरने और आवेदनकर्ताओं को दलित-आदिवासी होने का प्रमाण-पत्र देने से रोका। माकपा नेता दिनेश चंद्र डाकुआ ने तो कई सभाओं में कहा कि तपशीली जाति (शेडुल्ड कास्ट) जैसी कोई जाति नहीं है और इसीलिए उनके आंदोलन का कोई आधार ही नहीं है। माकपा का कुत्सापूर्ण प्रचार शुरू हुआ कि संगठन के युवा नेता स्थानीय जोतदारों और जमींदारों के बेटे हैं और उनका मकसद गरीबों को बहकाना है। 1980 में रायबीर संगठन से जुड़े और उसकी नीति निर्धारण कमेटी के सदस्य बनाये गये। इस पद पर वह मृत्युपर्यंत रहे।

1980 से 1990 तक उत्जास इतना मजबूत होने लगा कि उनके धरनों और जुलूसों में 50-60 हजार लोगों की शिरकत होने लगी। कई सभाओं में तो उपस्थिति एक लाख तक पहुँच गयी। उसके जुलूसों पर गोली चलाने की कई घटनाएँ हुईं और उसके कार्यकर्ताओं पर जाली मुकदमे दायर किये गये। 1980-99 तक के पुलिस गोलीकांडों और संगठन के कार्यकर्ताओं पर जुल्म की कहानी इतनी लंबी है कि उसको लिखने के लिए कम से कम दस पृष्ठ चाहिए। संगठन इतना लोकप्रिय हुआ कि वाममोर्चे की सरकार के घटक दलों के नेताओं ने व्यक्तिगत बातचीत में संगठन की माँगों से सहानुभूति जतायी पर माकपा की तानाशाही के आगे कुछ भी करने में अपने को असमर्थ बताया।

29 अक्टूबर 1986 को संगठन ने कोलकाता में धरना दिया। यह एक ऐतिहासिक धरना था जिसमें उत्तर बंगाल के 15000 से भी अधिक लोगों ने जीवन में पहली बार अपने राज्य की राजधानी को देखा। 1987 में अलीपुर दुआर में संगठन का चतुर्थ केंद्रीय सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में लगभग एक लाख लोग शामिल हुए। इस सम्मेलन के मुख्य वक्ता समाजवादी चिंतक किशन पटनायक थे। सम्मेलन को विफल करने के लिए माकपा ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सम्मेलन के बाद जब संगठन का जुलूस निकला तो उस पर माकपा समर्थकों ने रास्ते भर पथराव किया। सम्मेलन में संगठन ने यह ऐतिहासिक निर्णय किया कि वह एक वैकल्पिक राजनैतिक शक्ति का निर्माण करेगा।

उत्तर बंगाल में जब संगठन लगातार धरना, भूख हड़ताल और जुलूसों का आयोजन कर रहा था तब कोलकाता के अखबारों में उसका कोई भी समाचार नहीं दिखाई पड़ता था। लेकिन कामतापुरी पीपुल्स पार्टी के समाचार अवश्य दिखाई पड़ते थे। जबकि उसके पीछे कोई जन-समर्थन नहीं था। यह पार्टी हिंसा और अलगाववाद की राजनीति में विश्वास करती है। अगर भूल से उत्जास का कोई समाचार छपता भी था तो उसे कामतापुरी आंदोलन से जोड़ दिया जाता था। माकपा की  ‘हरमद (जलदस्यु) वाहिनी यानी गुण्डा सेना नंदीग्राम में अचानक सक्रिय नहीं हुई है, वह बंगाल और उत्तर बंगाल के हर जिले और प्रखंड में गत 25 वर्षों से सक्रिय है। समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा ने मुजफ्फरपुर में रायबीर की मृत्यु पर आयोजित शोकसभा में बहुत ही सटीक बात कही कि जुगल जी ने नंदीग्राम के बहुत पहले ही माकपा की असलियत को पहचान लिया था।

(जारी)

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