जलवायु संकट के गुनहगार

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— रामशरण —

विश्व पर्यावरण शिखर सम्मेलन को एक सप्ताह हो गया है। 31 अक्टूबर से ग्लासगो (ग्रेट ब्रिटेन) में COP26 विश्व पर्यावरण सम्मेलन हो रहा है। इसमें चीन को छोड़कर दुनिया के अधिकांश राजप्रमुख शामिल हो रहे हैं। इसे दुनिया को बचाने का आखरी मौका माना जा रहा है। दुनिया में बढ़ते प्रदूषण को लेकर यह छब्बीसवां अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन है, पर इतने वर्षों के प्रयास के बावजूद अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं निकल रहे हैं? उदघाटन भाषण में ही ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जानसन ने सरकारों के अलावा कारपोरेट जगत से भी सहयोग करने की अपील की।

विगत कुछ वर्षों में पूरी दुनिया में एक ओर भारी वर्षा, तूफान और बाढ़ आ रही है वहीं दूसरी ओर गर्मी और लू का प्रकोप भी बढ़ा है। भारत में भी गर्मी बढ़ने के कारण ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार तेज हो गयी है। संभव है कुछ दशक के बाद गंगा और यमुना जैसी नदियों में ग्लेशियरों के समाप्त हो जाने के कारण, पानी आना बंद हो जाए। दूसरी ओर भारी वर्षा और बाढ़ के कारण फसलों का नुकसान काफी बढ़ता जा रहा है। इससे किसान बर्बाद हो रहे हैं। बेरोजगारी और विस्थापन बढ़ रहा है। देश की खाद्य आत्मनिर्भरता संकट में है। चाय आदि का उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है। गर्मी के कारण मजदूरों के लिए काम करना मुश्किल होता जा रहा है। मछुआरे भी तबाह हो रहे हैं। डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारी का खतरा बढ़ता जा रहा है। गर्मी बढ़ने से ग्लेशियर पिघल रहे हैं और समुद्र बढ़कर तट पर मौजूद गांवों और शहरों को निगलता जा रहा है। बिहार ही नहीं, असम, उत्तराखंड से लेकर केरल तक के शहरी इलाके भी बाढ़ से तबाह हो रहे हैं। भारत में गत वर्ष 83 अरब डालर का नुकसान होने का अनुमान है। यही हाल पूरी दुनिया का है। इसके बावजूद जलवायु संरक्षण के ठोस उपाय क्यों नहीं किये जा रहे हैं?

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जानसन ने कबूला है कि इसी ग्लासगो में जब जेम्स वाट ने कोयला से चलनेवाले इंजन का आविष्कार किया था तभी से जलवायु प्रदूषण की समस्या प्रारंभ हुई। पर्यावरण सम्मेलन का प्रमुख लक्ष्य है कि इस औद्योगिक क्रांति के पहले जितनी ठंढक थी उसके करीब ही रहा जाए। ज्यादा  से ज्यादा गर्मी 1.5 डिग्री सेल्सियस पर रोक लग जाए। लेकिन औद्योगीकरण के कारण गर्मी 2.0 डिग्री के आसपास पहुंच रही है, जो बहुत खतरनाक है। औद्योगीकरण का भूत ऊर्जा की खुराक पर ही चलता है। यह ऊर्जा कोयला, तेल और गैस जलाने से ही मिलती है। बांधों और परमाणु संयंत्रों से भी ऊर्जा मिलती है, पर वह और भी ज्यादा खतरनाक है। एकमात्र विकल्प सौर ऊर्जा, वायु ऊर्जा आदि नवीकरणीय ऊर्जा ही हैं। लेकिन खतरे को समझते हुए भी इस ओर कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं?

वास्तविकता यह है कि औद्योगिक लॉबी इसमें आड़े आ रही है। उद्योगपतियों के दबाव में ही ट्रंप ने अमेरिका को इस प्रयास से अलग कर दिया था। लेकिन अमेरिका पर आ रहे प्राकृतिक प्रकोपों से परेशान जनता ने वर्तमान सरकार को फिर से इस अभियान में शामिल होने के लिए बाध्य कर दिया, जो बहुत अच्छी बात है। जन-दबाव के कारण ही यूरोप जलवायु मामले में ज्यादा संवेदनशील है। पर भारत जैसे विकासशील देश अब भी इस समस्या पर उचित कदम नहीं उठा रहे हैं। यह सही है कि आयात खर्च को कम करने के लिए बिजली चालित गाड़ियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। तेल के दाम बढ़ने से ऐसी गाड़ियां लोकप्रिय भी हो रही हैं। इससे प्रदूषण घटेगा पर बिजली उत्पादन तो ज्यादातर कोयला जलाकर ही होता है। लोहा आदि के कारखानों में भी कोयले का भारी उपयोग होता है। चीन, अमेरिका और भारत दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषण फैला रहे हैं। चीन ने घोषणा की है कि वह भविष्य में कोयला आधारित बिजली संयंत्र नहीं लगाएगा। लेकिन भारत अभी भी कोयला आधारित संयंत्रों को और कोयला खदानों को बढ़ाने की कोशिश में है। इससे बड़ी संख्या में जंगलों का और उनपर निर्भर आदिवासियों का विनाश होगा। कोयला चालित बिजलीघर सिर्फ हवा ही नहीं पानी और फसलों को भी प्रभावित करते हैं। इनपर रोक लगना आवश्यक है।

भारत के उद्योगपति भी जलवायु संरक्षण के उपायों के खिलाफ हैं। उन्हें लगता है कि उनकी कारोबारी बढ़ोतरी रुक जाएगी। लेकिन वर्तमान पद्धति से होनेवाला विकास टिकाऊ नहीं होगा। जब कुछ वर्षों में कोयला, तेल और गैस खत्म हो जाएगा तो विकास कैसे होगा? प्रदूषण का प्रभाव अलग से होगा? जलवायु परिवर्तन पर बने अंतरराष्ट्रीय पैनल ( IPCC ) ने इस सम्मेलन के पूर्व सुझाव दिया कि 2050 तक पूरी दुनिया में नेट जीरो प्रदूषण कायम कर दिया जाए। यानी कि जो देश जितना प्रदूषण करे उतना ही उस प्रदूषण को सोखने की भी व्यवस्था करे। भारत का दावा है कि यहां जंगल बढ़े हैं, पर दुनिया भर के विशेषज्ञ मानते हैं कि यहां जंगल घट रहे हैं। खनन और उद्योग लगाने के लिए और भी जंगल काटे जाएंगे। इसलिए यहां के उद्योगपति कार्बन उत्सर्जन घटाने के उपायों का विरोध कर रहे हैं।

हाल ही में एक थिंक टैंक “काउंसिल फॉर इनर्जी, इन्वायर्नमेंट एण्ड वाटर” (SEEW) ने मोदी सरकार से अपील की कि वह 2050 में नेट जीरो स्वीकार नहीं करे। इसे 2070 तक टाल  दिया जाए। मोदीजी ने इसे स्वीकार कर लिया और ग्लासगो में घोषणा कर दी कि भारत 2070 में नेट जीरो जारी करेगा। इसका असर अन्य देशों पर भी पड़ेगा। ध्यान देने की बात है कि इस थिंक टैंक  SEEW के प्रमुख प्रसिद्ध उद्योगपति जमशेद गोदरेज जी हैं। इससे उद्योगपतियों की मंशा स्पष्ट होती है।

इसीलिए यह आवश्यक है कि ऐसे षड्यंत्रों के खिलाफ भारत के पर्यावरणवादी एकजुट हों।

(लेखक जनतंत्र समाज और गंगा मुक्ति आंदोलन से जुड़े हैं)

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