नलिन विलोचन शर्मा का महत्त्व

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नलिन विलोचन शर्मा (18 फरवरी 1916 - 12 सितंबर 1961)

— गोपेश्वर सिंह —

चार्य नलिन विलोचन शर्मा का जन्म 18 फरवरी 1916 को पटना में हुआ था और मृत्यु मात्र साढ़े पैंतालीस साल की उम्र में 12 सितम्बर 1961 को पटना में ही हुई। वे दर्शन और संस्कृत के महान विद्वान महामहोपाध्याय पं. रामावतार शर्मा के ज्येष्ठ पुत्र थे। कहावत है कि बरगद की छाया में उगा हुआ पौधा बड़ा वृक्ष नहीं बनता, लेकिन नलिन जी इसके अपवाद सिद्ध हुए। वे स्वनामधन्य पिता के स्वनाम धन्य पुत्र थे। उनके व्यक्तित्व-निर्माण में पिता के पांडित्य और उनकी प्रगतिशील दृष्टि की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। रामावतार शर्मा संस्कृत और दर्शन के ख्यातिप्राप्त विद्वान तो थे ही, अंग्रेजी, लैटिन, फ्रेंच, जर्मन आदि भाषाओं पर भी अधिकार रखते थे। नलिन जी को पिता का भाषा-ज्ञान विरासत में मिला। संस्कृत, अंग्रेजी और हिंदी तीनों भाषाओं पर उनका एक-सा अधिकार था। कामचलाऊ ज्ञान जर्मन और फ्रेंच का भी था। लेकिन उनके व्यक्तित्व-निर्माण में पिता की पदार्थवादी दृष्टि की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। यूँ तो रामावतार शर्मा संस्कृत वांग्मय के प्रकांड पंडित थे, लेकिन अन्य पंडितों की तरह वे दकियानूस और पोंगापंथी नहीं थे। वे पदार्थवादी थे और शास्त्र के नाम पर पोंगापंथ और अंधविश्वास का प्रचार करनेवाले पंडितों से बराबर लोहा लिया करते थे। वे हिंदी नवजागरण के अग्रदूतों में से एक थे और 1916 में जबलपुर में संपन्न हिंदी साहित्य सम्मलेन के 16वें अधिवेशन की उन्होंने अध्यक्षता की थी। नलिन जी के व्यक्तित्व-निर्माण में उनके विद्वान पिता की पदार्थवादी और प्रगतिशील दृष्टि की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।

नलिन जी ने पहले संस्कृत में एम.ए. किया और जैन कॉलेज, आरा में संस्कृत के प्राध्यापक हो गए। बाद में उन्होंने हिंदी से एम. ए. किया और उनकी नियुक्ति पटना विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में हो गयी, जहाँ वे प्रोफेसर और अध्यक्ष हुए। आमतौर से हिंदी अध्यापकों की अंग्रेजी और संस्कृत में स्थिति अधिक मजबूत नहीं होती, लेकिन नलिन जी इसके अपवाद थे। हिंदी के साथ उनका समान अधिकार संस्कृत और अंग्रेजी भाषा पर भी था। यही कारण है कि युवा-काल में ही उनके नाम में आचार्य विशेषण लगाकर लोग संबोधित करने लगे।

संस्कृत भाषा पर अधिकार होने के कारण नलिन जी भारतीय वांग्मय की प्राणधारा का संधान करने में सहज ही सक्षम थे। इसलिए उनके चिंतन और लेखन में भारतीय वांग्मय की पदार्थवादी परंपरा का प्रवाह है। अंग्रेजी ज्ञान के कारण पश्चिम के साहित्य और वहाँ साहित्य-दृष्टि में आ रहे बदलावों का उन्हें अच्छा ज्ञान था। इस कारण उनकी रचना और आलोचना में विलक्षण नवीनता और मौलिकता प्रकट हुई, जिसे न तब ठीक-ठीक समझा गया और अब भी कम ही समझा जाता है।

नलिन विलोचन शर्मा को बहुत कम उम्र मिली। मात्र साढ़े पैंतालीस साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गयी, लेकिन कम उम्र के बावजूद कविता, कहानी, आलोचना, निबंध, जीवनी आदि विधाओं में उन्होंने भरपूर लेखन किया। उनके जीवन-काल में‘दृष्टिकोण’, ‘साहित्य का इतिहास-दर्शन’ शीर्षक पुस्तकें आलोचना और इतिहास की प्रकाशित हुईं। ‘नकेन के प्रपद्य’ शीर्षक से प्रपद्यवादी कविताओं का समवेत संग्रह प्रकाशित हुआ। ‘विष के दांत’ तथा ‘सत्रह  अप्रकाशित पूर्व छोटी कहानियाँ’ नामक कहानी संकलन प्रकाशित हुए। अंग्रेजी में लिखी जगजीवन राम की जीवनी भी उनके जीवन-काल में प्रकाशित हुई। उनके निधन के बाद ‘मानदंड’, ‘हिंदी उपन्यास- विशेषतः प्रेमचंद’, ‘साहित्य तत्त्व और आलोचना’ तथा ‘नलिन विलोचन शर्मा : संकलित निबंध’ नामक आलोचना पुस्तकें प्रकाशित हुईं। ‘नकेन-2’ शीर्षक से प्रपद्यवादी कविताओं का संग्रह भी छपा, लेकिन ये सारी किताबें भी आज ठीक से पाठकों के लिए उपलब्ध नहीं हैं।

उनकी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी पड़ी हैं जिन्हें संग्रहित करना एक बड़ा काम है। उनकी पत्नी कुमुद शर्मा ने छह खण्डों में उनकी रचनावली तैयार की थी और एक प्रकाशक को प्रकाशनार्थ सौंपा भी था, लेकिन उस प्रकाशक की लापरवाही और एक विश्वविद्यालय की कृपा से वह पांडुलिपि गायब हो गयी। इस तरह हिंदी का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण आलोचक और रचनाकार अपनी सम्पूर्णता में हिंदी जगत के सामने नहीं आ सका। नलिन विलोचन शर्मा के मूल्यांकन में उनके साहित्य की अनुपलब्धता एक बड़ी चुनौती है।

नलिन विलोचन शर्मा ने अनेक विधाओं में लिखा है, लेकिन मुझे लगता है कि हिंदी साहित्य को उनकी सबसे बड़ी देन आलोचना के क्षेत्र में है। मौलिक दृष्टि, दुर्लभ वैदुष्य और चिंतनपूर्ण लेखन के द्वारा उन्होंने आलोचना का नया मानदंड निर्मित किया। अपने चिंतनपूर्ण और बहसतलब आलोचनात्मक लेखों, साहित्यिक टिप्पणियों और पुस्तक समीक्षाओं के द्वारा वे हिंदी संसार को नए ढंग से आंदोलित करते रहे। वे नए-पुराने सभी लेखकों के बीच आलोचक-रूप में समान रूप से प्रतिष्ठित थे। पुराने साहित्य पर यदि उनकी राय सुनी जाती थी तो नए साहित्य पर भी।

उनकी दूसरी देन कहानीकार के रूप में है। नलिन विलोचन शर्मा हिंदी के विलक्षण कहानीकार थे। उनका रचनाकार व्यक्तित्व कविता के साथ कहानी लेखन के क्षेत्र में भी समान रूप से सक्रिय था। उनकी साहित्यिक देन का तीसरा क्षेत्र कविता है, जिसमें उन्हें ज्यादा प्रसिद्धि मिली। प्रपद्यवाद के प्रवर्तकों में पहला नाम उन्हीं का आता है। नलिन विलोचन शर्मा की चौथी देन निबंधों के क्षेत्र में है जहाँ उनकी आधुनिक दृष्टि के दर्शन होते हैं। लेकिन आइए सबसे पहले प्रपद्यवादी कवि के रूप में उनका परिचय प्राप्त करें।

प्रपद्यवाद को नकेनवाद भी कहा जाता है। प्रपद्यवादी कविताओं का पहला संकलन ‘नकेन के प्रपद्य’ शीर्षक से 1956 में प्रकाशित हुआ जिसमें नलिन विलोचन शर्मा, केसरी कुमार और नरेश की कविताएँ संकलित थीं। नकेन इन तीनों कवियों के नामों के प्रथमाक्षरों को मिलाने से बना था। इसलिए इनकी कविताएँ प्रपद्यवाद और नकेनवाद दोनों नामों से पुकारी जाती हैं। पद्य में ‘प्र’ उपसर्ग लगाने से प्रपद्य बना है जिसका अर्थ किया गया है- प्रयोगवादी पद्य। प्रपद्यवादी अपने को वास्तविक प्रयोगवादी और अज्ञेय आदि को प्रयोगशील कवि मानते थे। प्रपद्यवादियों के अनुसार प्रयोग उनका साध्य है, जबकि अज्ञेय आदि के लिए साधन।

प्रपद्यवाद छायावाद की तरह कोई स्वतःस्फूर्त आन्दोलन नहीं था। यह एक संगठित और सुविचारित काव्यान्दोलन था। यह संगठन मात्र तीन कवियों का था और ये तीनों कवि एक ही नगर पटना में रहते थे। तीनों सुशिक्षित थे और देश-विदेश के काव्यान्दोलनों के गहरे अध्येता थे।  

उन्होंने प्रपद्यवाद नाम से जिस काव्यान्दोलन का सूत्रपात किया उसका एक-एक शब्द और सिद्धांत सुविचारित था। वे सचेत ढंग से हिंदी कविता को अपनी प्रपद्यवादी कविताओं के जरिए विश्व कविता के बौद्धिक धरातल तक ले जाना चाहते थे। वे कविता में भावुकता के विरोधी थे और उसमें बौद्धिकता तथा वैज्ञानिकता के योग से नयापन पैदा करने के पक्षधर थे। नलिन विलोचन शर्मा ने विनोद-भाव से एक द्विपदी लिखी थी जो प्रपद्यवादी कविता के नए मिजाज की सूचना देती थी-

दिल तो अब बेकार हुआ जो कुछ है सो ब्रेन, गाय हुई बकेन है, कविता हुई नकेन।

तात्पर्य यह कि कविता बौद्धिक रूप से सघन और गाढ़ी होनी चाहिए, उसमें भावुकता की मिलावट बिलकुल नहीं होनी चाहिए।

प्रपद्यवाद की काव्य-पूँजी थोड़ी है। नलिन विलोचन शर्मा की भी काव्य-पूँजी मात्रा रूप में कम ही है। प्रपद्यवादी काव्यधारा में दूसरे कवि शामिल नहीं हुए। वह इन्हीं तीन कवियों तक सीमित रही। कोई भी आन्दोलन तभी विस्तार और दीर्घ जीवन पाता है, जब उसमें अधिक से अधिक लोगों की समाई होती है। हिंदी कविता के इतिहास में जगह बनाने के लिए जिस मात्रा की आवश्यकता होती है, वह मात्रा न तो प्रपद्यवाद के पास है, न नलिन जी के पास। लेकिन अल्पमात्रा के बावजूद अपनी विशिष्ट भंगिमा के कारण प्रपद्यवादी कविताओं ने 1960 के दशक में हिंदी कविता को नयी चमक से भर दिया था।

यह कविता की नयी भंगिमा और नयी जमीन थी। अज्ञेय ने नलिन विलोचन शर्मा और केसरी कुमार की काव्य-नवीनता को रेखांकित करते हुए लिखा है- “वैसी कविताएँ जैसी केसरी कुमार की ‘साँझ’ अथवा नलिन विलोचन शर्मा की ‘सागर संध्या’ है, ऐसे बिम्ब उपस्थित करती हैं, जिनके लिए परंपरा ने हमें तैयार नहीं किया है और जो उस अनुभव के सत्य को उपस्थित करना चाहते हैं, जो उसी अर्थ में अनन्य है, जिस अर्थ में एक व्यक्ति अनन्य होता है।” नलिन जी की ‘सागर संध्या’ शीर्षक कविता को उनके काव्य-उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है-

बालू के ढूह हैं जैसे बिल्लियाँ सोयी हुई,

उनके पंजों से लहरें दौड़ भागतीं।

सूरज की खेती चर रहे मेघ मेमने

विश्रब्ध, अचकित।

 

मैं महाशून्य में चल रहा-

पीली बालू पर जंगम बिंदु एक-

तट-रहित सागर एवं अंबर और धरती के

काल-प्रत्न त्रयी-मध्य से हो कर।

 

मेरी गति के अवशेष एकमात्र

लक्षित ये होते  :

सिगरेट का धुआँ वायु पर;

पैरों के अंक बालू पर

टंकित, जिन्हें ज्वार-भर देगा आ कर।

कविता के अलावा लगभग चार दर्जन कहानियाँ नलिन जी की लिखी हुई मिलती हैं। कविता के क्षेत्र में उन्होंने जिस तरह मौलिक और विशिष्ट प्रयोग किये, उसी तरह कहानी के क्षेत्र में भी किये। उनकी कहानियों में सामाजिकता और मनोवैज्ञानिकता का बड़ा ही सफल गुम्फन हुआ है। भाषा, भाव और शिल्प हर स्तर पर उनकी कहानियाँ उनकी कविताओं की ही तरह ठोस स्थापत्य की हैं। ‘विष के दांत तथा अन्य कहानियाँ’ और ‘सत्रह असंग्रहित पूर्व छोटी कहानियाँ’ नामक संग्रहों में लगभग तीस कहानियाँ मिलती हैं, जबकि शेष कहानियाँ अभी भी पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी पड़ी हैं। उन्होंने कुल 55 कहानियाँ लिखी थीं।

नलिन जी कहानी में सामाजिक सत्य को मनोवैज्ञानिक सत्य के साथ प्रतिष्ठित करना चाहते थे। केसरी कुमार ने लिखा है- “वे विज्ञान और दर्शन के मिलन-बिंदु के विरल कवि तथा दुर्लभ मनोवैज्ञानिक उपलब्धियों के कहानीकार थे।” विषय के आधार पर उनकी कहानियों को तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है- 1. सामाजिक विषयों से संबंधित कहानियाँ, 2. मनोग्रंथि से संबंधित कहानियाँ, 3. प्रेम कहानियाँ। वैसे यह विभाजन ऊपरी है। कहानियों के भीतर व्याप्त कथा-चेतना एक-सी है। वह चेतना है मानव-मनोविज्ञान के अध्ययन की। इसकी कमी नलिन जी हिंदी कहानी में महसूस करते हैं। विष के दांत, ये बीमार लोग, बरसाने की राधा और रोबोट जैसी अमर कहानियाँ लिखने का श्रेय नलिन विलोचन शर्मा को ही जाता है। मेरा अनुमान है कि इनको शामिल किये बिना हिंदी कहानी का इतिहास पूरा नहीं होगा।

नलिन विलोचन शर्मा की वास्तविक देन आलोचना के क्षेत्र में है। उसी के साथ उन्होंने महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप साहित्य के इतिहास-दर्शन के क्षेत्र में भी किया। प्रगतिवादी और गैर-प्रगतिवादी आलोचना शिविर से अलग उन्होंने हिंदी आलोचना की नयी जमीन तैयार की। शीतयुद्धकालीन राजनीतिक शब्दावली का इस्तेमाल करें तो कह सकते हैं कि नलिन विलोचन शर्मा का हिंदी आलोचना में वही स्थान और महत्त्व है जो शीतयुद्ध काल में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का था।

नलिन विलोचन शर्मा आलोचना लिखते समय भारतीय साहित्य की पाँच महान परम्पराओं की चर्चा करते हैं। उन्होंने भौतिकता को भारतीय साहित्य की पहली विशेषता घोषित किया। उनके अनुसार दूसरी परंपरा यथार्थता की है। मानवता यानी ह्यूमनिज्म, नलिन जी के अनुसार भारतीय साहित्य की तीसरी परंपरा है। मानववाद यानी ह्यूमेनिटेरियनिज्म को वे हिंदी साहित्य की चौथी महान परंपरा मानते हैं। धार्मिकता, नलिन जी के अनुसार भारतीय साहित्य की पाँचवीं विशेषता है।

भौतिकता को प्रथम और धार्मिकता को भारतीय साहित्य की अंतिम विशेषता माननेवाले नलिन विलोचन शर्मा की आलोचना-दृष्टि को अलग से समझने की जरूरत है। वे प्रगतिवादी और आधुनिकतावादी आलोचनात्मक प्रत्ययों से भिन्न नए मानदंड का निर्माण करते हैं।

नलिन जी की आलोचनात्मक कसौटी के मुख्य आधार हैं- मुक्ति और स्वच्छंदता। इन दोनों में भी मुक्ति को वे मुख्य आलोचनात्मक कसौटी मानते हैं। उनके अनुसार पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ और बर्नार्ड शॉ में स्वच्छंदता के गुण हैं, जबकि निराला और वाल्ट व्हिटमैन में मुक्ति के। रचना में विषयगत नवीनता को नलिन जी स्वच्छंदता का गुण मानते हैं, जबकि विषयगत और रूपगत नवीनता को वे रचना की मुक्ति से जोड़कर देखते हैं। स्वच्छंदता और मुक्ति की अपनी आलोचनात्मक कसौटी पर वे निराला को आधुनिक युग का सबसे बड़ा कवि और प्रेमचंद को आधुनिक युग का सबसे बड़ा कथाकार घोषित करते हैं।

नलिन विलोचन शर्मा की वास्तविक देन उपन्यास की आलोचना के क्षेत्र में है। उन्होंने अपने चिंतनपरक आलोचनात्मक लेखों के जरिए हिंदी उपन्यास का शास्त्र विकसित करने की कोशिश की। वे मानते थे कि उपन्यास साहित्य की ‘अन्त्यज विधा’ है।

अन्त्यज शब्द से ही उनकी साहित्यिक और सामाजिक दृष्टि की नवीनता का पता चलता है। प्रेमचंद को उपन्यास के कलाकार के रूप में प्रतिष्ठित करने का अथक संघर्ष नलिन विलोचन शर्मा ने हिंदी आलोचना में किया। वे मानते थे कि प्रेमचंद ने हिंदी उपन्यास की दुनिया में अहिंसक क्रांति के जरिए उसके पूरे स्थापत्य को बदलकर रख दिया। मुझे लगता है कि प्रेमचंद की कला का नलिन विलोचन शर्मा जैसा पारखी आलोचक हिंदी में दूसरा नहीं हुआ।

उपन्यास का शास्त्र तैयार करते हुए नलिन जी ने कथा-भूमि की सभ्यता और संस्कृति से जोड़कर उसे देखा है। उन्होंने लिखा है-“हिंदी उपन्यास का इतिहास, किसी भी देश के इतिहास की तरह हिंदी-भाषी क्षेत्र की सभ्यता और संस्कृति के नवीन रूप के विकास का साहित्यिक प्रतिफलन है। समृद्धि और ऐश्वर्य की सभ्यता महाकाव्य में अभिव्यंजना पाती है, जटिलता, वैषम्य और संघर्ष की सभ्यता उपन्यास में………हमारे उपन्यास यदि आज पश्चिमी उपन्यासों के समकक्ष सिद्ध नहीं होते तो मुख्यतः इसलिए कि हमारी वर्तमान सभ्यता अपेक्षतया आज भी कम जटिल, कम उलझी हुई और कहीं ज्यादा सीधी-सादी है।” नलिन जी उपन्यास को अन्त्यज कहते हैं। अन्त्यज का अर्थ सबसे अंत में पैदा हुआ तो होता ही है, उसका अर्थ यह भी है कि उसका गहरा सम्बन्ध हाशिए पर रहनेवाले समाज से है।

मुक्ति और स्वच्छंदता की कसौटी पर नलिन विलोचन शर्मा का सारा आलोचना-साहित्य टिका हुआ है। इसीलिए वे साहित्य में किसी भी तरह की विषयगत और रूपगत रूढ़ि को स्वीकार नहीं करते। वे नवीनता के आग्रही आलोचक थे। यही कारण है कि यदि उन्होंने अज्ञेय आदि के आधुनिकतावादी आग्रहों की आलोचना की तो प्रगतिवादी मान्यताओं पर भी प्रहार करने में वे पीछे नहीं रहे।

उन्होंने साहित्य और समाज की रूढ़ियाँ तोड़ने के लिए और परंपरा का मूल्यांकन करने के लिए प्रगतिवादियों की प्रशंसा की तो उनकी निषेधकारी और एकांगी दृष्टि की कड़ी आलोचना भी की। ‘प्रगतिवाद की मान्यताएँ’ शीर्षक उनका एक प्रसिद्ध निबंध है, जिसमें उन्होंने प्रगतिवादियों की आलोचना करते हुए लिखा है- “उन्होंने पुरानी जंजीरें तोड़ फेंकी हैं, लेकिन उन्होंने जिसे गले का हार समझकर प्रसन्नतापूर्वक पहना है, वह हाथ-पैर का नहीं, हृदय और मस्तिष्क का बंधन बन गया है। उन्होंने गुरु-पूजा का त्याग किया है, पर वीर-पूजा अपनाने के लिए,मूर्ति-पूजा से छुटकारा पाया है, किन्तु जन-पूजा के कर्मकांड में फँसने के लिए, और शास्त्र की संकीर्णता के विरुद्ध सफल विद्रोह किया है, लेकिन सिद्धांत की चारदीवारी में कैद हो जाने के लिए।” इस टिप्पणी के साथ नलिन जी ने प्रगतिवादी लेखक पर चार आरोप लगाए- 1. वह वीर-पूजा करता है, 2. वह जन-पूजा में अन्धविश्वास रखता है, 3. वह कुछ सुचिन्तित सिद्धांतों में बँधा हुआ है और  4. वह घृणा करता है | प्रगतिवाद के बारे में अपने इस निष्कर्ष के बाद उन्होंने सोवियत-व्यवस्था की आलोचना की, जहाँ नात्सी जर्मनी की तरह लेखकों को यातना दी जा रही थी।

इस तरह नलिन विलोचन शर्मा हिंदी आलोचना में प्रगतिवादी और आधुनिकतावादी कसौटियों से भिन्न आलोचना का नया मानदंड निर्मित करते हैं। इस कसौटी पर वे रामचंद्र शुक्ल, प्रेमचंद और निराला को क्रमशः आलोचना, कथा-साहित्य और कविता का शिखर रचनाकार घोषित करते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि रामचंद्र शुक्ल, प्रेमचंद और निराला के बारे में यही निष्कर्ष प्रगतिवादी आलोचक रामविलास शर्मा के भी हैं। लेकिन उसमें मुक्ति के अभाव के कारण रामविलास जी जहाँ‘मैला आँचल’ का महत्त्व पहचानने से चूक जाते हैं, वहीं नलिन जी उसे ‘गोदान’ के बाद हिंदी उपन्यास में आए गत्यवरोध को दूर करनेवाला मानते हैं। लेकिन जब विषय और रूप का दुहराव वे उसी फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की ‘परती परिकथा’ में पाते हैं, तो उसकी कड़ी आलोचना भी करते हैं। ऐसा इसलिए कि नलिन जी आलोचना को ‘सृजन’ मानते थे, ऐसा सृजन जो किसी‘कृति का निर्माण’ करे। आलोचना को परिभाषित करते हुए उन्होंने यह भी कहा है कि ‘आलोचना कला का शेषांश’ है। यही कारण है कि उनकी आलोचना में भाषा-शिल्प आदि पर जितना जोर है, उतना विषयवस्तु पर नहीं। वे ‘कला के धरातल पर उन्नीत’ हो जाने वाली आलोचना के समर्थक थे।

नलिन जी की महत्त्वपूर्ण देन साहित्य के इतिहास-दर्शन के क्षेत्र में भी है। जब हिंदी में इतिहास-दर्शन की चर्चा से प्रायः लोग अनजान थे, तब उन्होंने ‘साहित्य का इतिहास-दर्शन’ जैसी महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखकर इतिहास-लेखन की आधारभूमि को मजबूती दी थी।

वे मानते हैं कि साहित्य का इतिहास वस्तुतः गौण लेखकों का इतिहास है। बड़े-बड़े लेखकों के आधार पर साहित्य का इतिहास लिखनेवाले इतिहास-दृष्टि से भिन्न यह नयी इतिहास-दृष्टि थी। समाज या राष्ट्र का इतिहास राजाओं का इतिहास नहीं बल्कि जनता का इतिहास है, इस कथन से नलिन जी के कथन को मिलाकर देखना चाहिए, तब उनकी इतिहास-दृष्टि की सामाजिकता और व्यापकता दिखाई देगी।

इतिहासकार के रूप में अपने प्रिय आलोचक आचार्य शुक्ल को नलिन जी वह महत्व नहीं देते जो हजारीप्रसाद द्विवेदी को देते हैं। इसका कारण यह है कि नलिन जी शुक्ल जी में विधेयवाद और पश्चिमी इतिहास-दृष्टि का आभास पाते हैं। जबकि हजारीप्रसाद द्विवेदी की दृष्टि उन्हें ज्यादा भारतीय लगती है, क्योंकि उसमें मिथकों, पुराकथाओं, किम्वदंतियों का आधार है, जो नलिन जी के अनुसार साहित्य के इतिहास-लेखन की जरूरी सामग्री है।

कोई कह सकता है कि नलिन जी रूपवादी थे, हालाँकि ऐसा कहना उनके साथ किंचित ज्यादती होगी। रूपवादी लेखक जहाँ भाववादी और प्रायः अवैज्ञानिक तर्कों के कायल होते हैं, वहीं नलिन विलोचन शर्मा विज्ञान के समर्थक और किसी भी अलौकिक शक्ति में न विश्वास करनेवाले अनीश्वरवादी थे। उनका विश्वास समाजवाद में था और वे एम.एन. राय के रेडिकल ह्यूमनिस्ट आन्दोलन को पसंद करते थे।

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