स्वतंत्रता आंदोलन की विचारधारा – मधु लिमये : 55वीं किस्त

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मधु लिमये (1 मई 1922 - 8 जनवरी 1995)

कांग्रेस के अधिवेशनों में 1920 तक सामाजिक प्रश्नों पर न कभी विचार हुआ न उनके ऊपर किसी तरह का प्रस्ताव कांग्रेस ने पास किया। यह स्थिति गांधीजी के आगमन तक रही। 1919 में रौलेट एक्ट विरोधी आंदोलन को लेकर गांधीजी ने अखिल भारतीय राजनीति के मंच पर पहली बार अपना कदम रखा। उनके असहयोग के अभिनव विचार और कार्यक्रम ने कांग्रेसजनों तथा साधारण लोगों को आकर्षित किया और गांधीजी का नेतृत्व 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन तक सुप्रतिष्ठित हो गया। नागपुर के इस अधिवेशन में असहयोग संबंधी कार्यक्रम बाकायदा अपनाया गया। इस मुख्य प्रस्ताव में पहली बार कांग्रेस ने सामाजिक प्रश्नों का उल्लेख किया। इससे पहले कांग्रेस ने ऐसे विषयों को छुआ तक नहीं था।

गांधीजी के नेतृत्व में अब कांग्रेस सामाजिक प्रश्नों को अपने आंदोलनों का प्रबल हथियार बनाने लगी। असहयोग के प्रस्ताव में (हिंदू-प्रतिनिधियों की ओर से) प्रमुख नेताओं से अपील की गयी कि वे ब्राह्मण और अब्राह्मण के बीच विवादों को सुलझाएं और हिंदू समाज के ऊपर अस्पृश्यता या छुआछूत का जो कलंक लगा हुआ है उसको विशेष प्रयास कर धो डालें एवं हिंदू समाज में सुधार की जो तीव्र इच्छा है, उसको धार्मिक प्रमुखों की मदद से अभिव्यक्त होने का अवसर दें। प्रस्ताव में हिंदू समाज के अंदर दबे हुए वर्गों के साथ अच्छा व्यवहार करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया था। यहाँ तक अंतर देखने काबिल है कि पच्चीस वर्ष पहले सामाजिक सम्मेलन के लिए पंडाल तक का इस्तेमाल जहाँ तिलक जी ने बर्दाश्त नहीं किया था, वहाँ अब इन विषयों को कांग्रेस के मुख्य प्रस्ताव में जगह मिल रही थी। कहने का मतलब यह है कि वातावरण तेजी से बदल रहा था।

गांधीजी जहाँ शुरू से ही अस्पृश्यता की कुप्रथा को पाप समझते थे वहाँ अपने प्रारंभिक राजनैतिक जीवन में वे वर्ण-व्यवस्था को बुरा नहीं समझते थे। उस समय उनका कहना था कि वर्ण-व्यवस्था विशुद्ध रूप में श्रम विभाजन व्यवस्था है जिसमें ऊँच तथा नीच की कोई गुंजाइश नहीं है। उन दिनों गांधीजी न अंतरजातीय विवाहों के समर्थक थे न अंतर्धर्मी के। लेकिन अपने संवेदनशील व्यक्तित्व के कारण परिस्थितियों के साथ-साथ वे भी बदलते गए। हाँ, पश्चिमी सभ्यता और विचारों से प्रभावित कुछ कांग्रेसी नेता जरूर ऐसे थे तो जात-पाँत और छुआछूत जैसे भेदभाव को नहीं मानते थे। किंतु उनके ऐसे विचार मात्र अपने जीवन तक ही सीमित थे। रानाडे और तेलंग जैसे सुधारवादी भी अपनी उक्ति और कृति से सामंजस्य नहीं बिठा पाते थे।

सामाजिक विचारों वाले नेताओं ने भी समाज की सड़ी-गली मान्यताओं को बदलने की आवश्यकता कभी महसूस नहीं की। बल्कि कहना तो यह चाहिए कि इनको बदलने की जो तीव्र चाह उनमें होनी चाहिए थी, उसका उनके पास बिल्कुल अभाव था। न उनके पास समाज को झकझोरने के लिए आवश्यक कौशल, त्याग और चरित्र ही था। जबकि गांधीजी में समाज को बदलने की टीस भी थी, समाज को प्रभावित करने के लिए आवश्यक चरित्र और त्याग भी।

1932 में रामसे मैक्डोनेल्ड ने जब कम्युनल अवार्ड जारी किया और कथित अस्पृश्यों के लिए न केवल आरक्षित जगह, स्वतंत्र प्रतिनिधित्व और स्वतंत्र मतदाता सूची भी बहाल की, तब गांधीजी चिंताग्रस्त हो गए। उन्होंने समझ लिया कि पहले से ही बिखरे हिंदू समाज को तितर-बितर करने की यह अंग्रेजों की चाल है। लेकिन साथ ही गांधीजी यह भी अच्छी तरह समझते थे कि अंग्रेज यह अलगाव पैदा करने के दाँव-पेच राष्ट्रीय आंदोलन को पंगु बनाने के लिए अपना रहे हैं। वे यह भी समझते थे कि अंग्रेजों को यह चाल खेलने का मौका हिंदू समाज स्वयं दे रहा है जो अस्पृश्यता जैसी बुराइयाँ अपने में समेटे हुए हैं अतः उन्होंने इसका मुकाबला करने के लिए येरवडा जेल में आमरण अनशन करने का निश्चय किया।

गांधीजी एक ओर अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति को परास्त करना चाहते थे, तो दूसरी ओर हिंदू समाज की सदियों से सोयी हुई न्यायप्रियता को जगाना चाहते थे। उसके अंदर की दुष्प्रवृत्तियाँ कुछ हद तक दब गयीं और दबी हुई सुप्रवृत्तियाँ उभर आयीं। पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधि डॉ. आंबेडकर आदि नेताओं से लंबी बातचीत चली जिसके फलस्वरूप पूना करार नाम से विख्यात एक समझौता हुआ। इस करार के अंतर्गत हरिजनों का विधानमंडलों में आरक्षण बरकरार रखा गया। इतना ही नहीं, आरक्षित स्थानों में बहुत वृद्धि भी की गयी जिसके एवज में डॉ. आंबेडकर ने स्वतंत्र मतदाता सूची की अपनी माँग को त्याग दिया। इस करार में यह तय पाया गया कि हरिजन मतदाता वोट के जरिए अपने बीच में चार उम्मीदवारों का चयन करेंगे और फिर साधारण मतदाता सूची के आधार पर इन चार में से एक उम्मीदवार हरिजन प्रतिनिधि के रूप में विधानमंडलों के लिए चुना जाएगा।

इस प्रकार महात्मा गांधी के आमरण अनशन से हिंदू समाज से कथित अस्पृश्यों को अलग करने की अंग्रेजों की कुचाल जहाँ विफल सिद्ध हो गयी, वहाँ हिंदू समाज के ऊपर भी यह दायित्व आ गया कि वह जल्दी से जल्दी अस्पृश्यता के अमानवीय व्यवहार को अपने समाज–जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से समाप्त कर दे। उसके बाद हरिजन सेवक संघ की स्थापना कर संगठित ढंग से अस्पृश्यता निराकरण का आंदोलन गांधीजी द्वारा प्रारंभ किया गया।

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