जब ए.के. राय ने जेपी का साथ दिया

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ए.के.राय (15 जून 1935 - 21 जुलाई 2019)


— शिवानंद तिवारी —

हुत ही अनूठा व्यक्तित्व था कॉंमरेड एके राय (अरुण कुमार राय) साहब का। उनसे मेरी पहली मुलाकात साल 1974 में बांकीपुर (पटना) जेल में हुई थी। तब वह जमाना जेपी आंदोलन का था, राय साहब भी मीसा कानून के अंतर्गत नजरबंद थे। भागलपुर जेल से पटना हाइकोर्ट के तीन जजों के एडवाइजरी बोर्ड के सामने पेश होने के लिए भागलपुर जेल से बांकीपुर जेल में भेजे गए थे। लगभग महीना-डेढ़ महीना उनके साथ बांकीपुर जेल में रहने का मौका मिला। इसी बीच उनके साथ मेरा संबंध गहराया। जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे बंदियों को सजा में मिलनेवाली छुट्टी की गिनती में गड़बड़ियों की जाँच का मामला जेल प्रशासन के समक्ष उन्होंने उठाया था। इसी बीच भागलपुर जेल लौटने का उनके लिए आदेश आ गया। भागलपुर जेल जाने के पहले सजायाफ्ता बंदियों का मामला उन्होंने मुझे सौंप दिया।

धनबाद के ही एक दूसरे नेता विनोद तिवारी महतो जी भी भागलपुर जेल से पटना हाइकोर्ट के एडवाइजरी बोर्ड के सामने प्रस्तुत होने के लिए बांकीपुर जेल आनेवाले थे। राय साहब ने मुझसे कहा कि विनोद बाबू तुनकमिजाज आदमी हैं। किसी और के साथ उनका यहाँ पट नहीं पाएगा। अतः उनका अनुरोध था कि विनोद बाबू को वहाँ मैं अपने साथ रखूँ। मैंने राय साहब का दोनों अनुरोध कबूल कर लिया।

गौरतलब है कि बिहार आंदोलन में विधानसभा को भंग कर नया चुनाव कराये जाने की माँग प्रमुख बन गयी थी। इंदिरा गांधी इसके लिए तैयार नहीं थी। माँग के समर्थन में दबाव बनाने के लिए यह तय हुआ कि आंदोलन का समर्थन करनेवाली पार्टियों के विधायक विधानसभा की अपनी सदस्यता त्यागें। त्यागपत्र देने का सिलसिला शुरू हुआ। हालांकि, उन दिनों सीपीआइ हमारे आंदोलन को फासिस्ट आंदोलन करार दे रही थी और इंदिराजी के पक्ष में खड़ी थी। जेपी की दिली इच्छा थी कि कोई मार्क्सवादी विधायक आंदोलन के समर्थन में विधानसभा की अपनी सदस्यता त्यागे।

एक दिन जेपी ने मुझसे पूछा कि किसी मार्क्सवादी विधायक से मेरा संबंध है या नहीं। मैंने उनको बताया एके राय जी से मेरा अच्छा परिचय है। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं जाकर उनसे बात करूँ। राय साहब के नाम उन्होंने एक पत्र दिया और आग्रह किया कि बिहार आंदोलन का वे समर्थन करें। उस पत्र के साथ सिंदरी में मैं राय साहब से मिला। जेपी की चिट्ठी उनके हवाले की और फिर बिहार आंदोलन के बारे में उनके साथ चर्चा हुई। उसके बाद राय साहब ने कहा कि कुछ तय करने से पहले वह जेपी जी से मिलकर ही बात करना चाहेंगे। वहीं से मैंने जेपी के निजी सचिव सच्चिदा जी को तार भेजा और फिर राय साहब को लेकर पटना पहुँचा।

अगले दिन ही उनको अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर जेपी से मिलने के लिए महिला चरखा समिति लेकर गया। चरखा समिति में ऊपरी तल्ले पर जेपी का आवास था। सीढ़ियों  से ऊपर पहुँचते ही बायें हाथ की ओर एक छोटा कमरा था। उसी कमरे में जेपी औपचारिक मुलाकात किया करते थे। उसी कमरे में राय साहब के साथ दाखिल हुआ। राय साहब उत्सुकता के साथ उस कमरे में लगी तस्वीरों और किताबों को देखने लगे। तब तक पीछे से जेपी ने कमरे में प्रवेश किया। राय साहब की पीठ दरवाजे की ओर थी। जेपी को आते हुए उन्होंने उन्हें नहीं देखा। जेपी ने आवाज दी कि राय साहब क्या देख रहे हैं। राय साहब ने जवाब दिया कि देख रहा हूँ कि लेनिन और बुद्ध दोनों इस कमरे में हैं। जेपी ने हँसते हुए जवाब दिया हाँ, मैंने दोनों से सीखा है। उसके बाद बैठकर बात होने लगी।

जयप्रकाश नारायण ने अपने आंदोलन के विषय में राय साहब को विस्तार से बताया। राय साहब ने भी अपनी शंका उनके सामने रखी। जिसका समाधान जेपी ने किया। अगले ही दिन राय साहब के संगठन मार्क्सिस्ट कोऑर्डिनेशन कमिटी (एमसीसी) की मीटिंग हुई और उसमें यह फैसला हुआ कि एमसीसी बिहार आंदोलन का समर्थन करेगी और राय साहब विधानसभा की सदस्यता त्याग देगें। मार्क्सवादी विचारधारा को माननेवाले बिहार विधानसभा के एकमात्र सदस्य राय साहब ही थे, जिन्होंने जेपी आंदोलन के समर्थन में विधानसभा से अपना त्यागपत्र दिया था। ऐसे थे राय साहब।

आपातकाल खत्म होने के बाद साल 1977 में जब लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा हुई, तब राय साहब आंदोलन की ओर से धनबाद क्षेत्र से लोकसभा के उम्मीदवार बनाये गये। इतिहास गवाह है कि उस चुनाव में राय साहब भारी मतों से विजयी हुए।

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