इस्लाम की ऐतिहासिक भूमिका – एम.एन.राय : सत्रहवीं किस्त

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एम.एन. राय (21 मार्च 1887 - 25 जनवरी 1954)

(भारत में मुसलमानों की बड़ी आबादी होने के बावजूद अन्य धर्मावलंबियों में इस्लाम के प्रति घोर अपरिचय का आलम है। दुष्प्रचार और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति के फलस्वरूप यह स्थिति बैरभाव में भी बदल जाती है। ऐसे में इस्लाम के बारे में ठीक से यानी तथ्यों और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य समेत तथा मानवीय तकाजे से जानना समझना आज कहीं ज्यादा जरूरी है। इसी के मद्देनजर हम रेडिकल ह्यूमनिस्ट विचारक एम.एन. राय की किताब “इस्लाम की ऐतिहासिक भूमिका” को किस्तों में प्रस्तुत कर रहे हैं। आशा है, यह पाठकों को सार्थक जान पड़ेगा।)

बूबकर 12वीं शताब्दी में हुआ जो पहला ज्योतिषविद था, जिसने टोल्मी के दैवी शरीरों की स्थिति संबंधी विचारों को अस्वीकार कर दिया था। उसने अंतरिक्ष के नक्षत्र मंडल की पद्धति का विचार किया और उनकी गति के संबंध में अपने विचार प्रस्तुत किए। जिनकी सहायता से, बाद में जियोडोनो ब्रुनो, गैलीलियो और कॉपरनिकस के युगपरिवर्तनकारी अनुसंधानों को विकसित किया जा सका। उसने लिखा कि ‘उसकी पद्धति में सभी गतियों को प्रयोग-सिद्ध आधार पर प्रमाणित किया जा सकता है अतः उनमें गलती की गुंजाइश नहीं। अबूबकर की मृत्यु उसके सिद्धांतों को पुस्तक के रूप में लिखने के पहले हो गई। उसके शागिर्द अल फेटराजियस ने उसकी शिक्षाओं को लोकप्रिय बनाया और यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि सभी नक्षत्र एक नियमित गति से चलते हैं। मध्ययुग में उसके ज्योतिष संबंधी ज्ञान को आधारभूत माना जाता था। मुसलमान दार्शनिक के विचारों ने बाइबिल के सृष्टि संबंधी विचारों का खण्डन किया था, उनका प्रभाव ईसाई मठों में भी होने लगा। अकेले रोजर बेकन ही नहीं, वरन उसके प्रतिद्वंद्वी अल्बर्ट मैग्नस ने भी अल फेटराजियस की ज्योतिष पुस्तक का आभार स्वीकार किया था जिसने अबूबकर के ज्योतिष सिद्धांतों की व्याख्या की थी।

अबेरोस के दर्शन के मौलिक सिद्धांतों का बाद के अरब दार्शनिकों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा था, उसकी रूपरेखा का उल्लेख किया जा चुका है। इस्लामी संस्कृति के इतिहास के मोड़ के समय वह हुआ था। 12वीं शताब्दी तक उनका चरम उत्कर्ष हो चुका था और प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ अधिक शक्तिशाली हो गई थीं और उन्होंने प्रगति का मार्ग रोक दिया। उसके साथ ही इस्लामी संस्कृति का पतन आरंभ हो गया था।

घुमंतू लोगों के विचारों की स्वतंत्रता साहस के चरम बिंदु पर पहुँची थी, जिनका बाद में ‘धर्म के सेनापतियों से टकराव हुआ। इस्लामी विचार ने पांच सौ वर्षों में प्रगति की और एबेरोस ने क्रांतिकारी सिद्धांत का सारतत्त्व यह कहकर प्रकट किया कि सत्य का एक ही स्रोत – तर्क है, उसके विपरीत कोरडोवा के सुलतान अलमसूर ने मुल्लाओं के प्रभाव में आकर यह फतवा जारी किया कि उक्त कथन धर्म-विरोधी है और वैसे विचारों के लोगों को दोजख की आग में जलना पड़ेगा। इस्लाम की श्रेष्ठ उपलब्धि की निन्दा के साथ मानव-प्रगति के अस्त्र के रूप में उसकी भूमिका समाप्त हो गई और वह प्रतिक्रिया असहिष्णुता, अज्ञान और भेदभाव का अस्त्र बन गई। आरंभ में इतिहास ने प्राचीन संस्कृति की विरासत का, दो साम्राज्यों और दो धर्मों के अंधकूप से उद्धार किया था। लेकिन अपनी ऐतिहासिक भूमिका पूरी करने के बाद इस्लाम ने अपने मौलिक स्वरूप को छोड़ दिया और तुर्की और मंगोल बर्बरता के काले झंडे के नीचे हत्यारों और लुटेरों का गिरोह बन गया।

इस्लाम ने अपनी उपलब्धियों को नकारा। अबेरोस को कोरडोवा के दरबार से खदेड़ दिया गया, जो उसके स्वतंत्र विचारों का सदियों से गढ़ रहा था। उसकी किताबों को जला दिया गया, उन्हें आग में ही  नहीं डाला गया, वरन निर्दयतापूर्ण प्रतिक्रिया की स्थापना की गई। विवेकवाद को धर्म-विरोधी आचरण मान लिया गया। अबेरोस और उसके गुरु आरिस्टॉटिल के नामों से घृणा की जाने लगी। कुछ समय के बाद प्रतिक्रिया की ऐसी विजय हो गई जिससे कट्टर मुसलमानों की दृष्टि में, दर्शन नास्तिकता, अपवित्रता और अनैतिकतासमझा जाने लगा। लेकिन पांच सौ वर्ष तक अरब लोगों ने जो आध्यात्मिक प्रगति की थी, उन्होंने उसके झंडे को ऊँचा रखा और उसे धार्मिकता के निरर्थक क्रोध और इस्लामी असहिष्णुता से भी नीचे नहीं किया जा सका जैसा कि ईसाइयों ने पवित्रता और पाखंड के आधार पर पहले किया था। अबेरोस का साथ उसके अपने लोगों ने छोड़ दिया लेकिन भविष्य में उसको पुनः प्रतिष्ठित किया गया। धर्म और तर्क के भयंकर संघर्ष में निरंकुश अज्ञान और विचार की स्वतंत्रता के संघर्ष ने यूरोप को हिला दिया। कैथोलिक चर्च की नींव को हिला दिया। 12वीं शताब्दी के बाद से अरब दार्शनिकों की शिक्षाओं का प्रसार हुआ। अबेरोस और अबेरोसवाद ने यूरोप के वैज्ञानिक विचारों को चार सौ वर्ष तक अनुप्राणित किया।

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