गांधीजी भारत के लोगों के अंतर्मन को छूने वाले अद्भुत फकीर
महात्मा गांधी हजार साल के भारतीय काल की ऐसी महान विभूति थे जिनमें अद्भुत चुम्बकीय आकर्षण था । वे अपने अनुयायियों के लिये मसीहा और अंग्रेजों के लिए एक ऐसे ढोंगी महात्मा थे जिसके हर अहिंसात्मक आन्दोलन का अंत हिंसा से ही होता था और जिसके आमरण अनशन हमेशा यमराज के दरवाजे तक पहुंचते पहुंचते आश्चर्यजनक रूप से सफल हो जाते थे।
नोआखाली में वे 116 मील पैदल चलकर 47 गांवों में घूम घूमकर वहां रहने वाले व्यक्तियों से बातें कर उनके दुखदर्द व कष्टों का निवारण करते रहे । उनके साथ हमेशा एक थैला रहता था जिसमें एक कलम और कागज , सुई धागा, एक मिट्टी का प्याला, लकड़ी का चम्मच, हाथी दांत की बनी तीन बंदरों की छोटी छोटी आकृतियां इसके अलावा कुछ पुस्तकें – भगवतगीता, कुरान, ईसा मसीह का आचरण और उनके सिद्धांत और यहूदी विचारों की एक पुस्तक।
जंगलों में भटकने वाला यह उदार राही कोई मामूली व्यक्ति नहीं था क्योंकि आधी दुनिया उसे राष्ट्रपिता कहती थी। जब दंगों से तहस नहस नोआखाली के जंगलों में गांधीजी के पीछे पीछे उनकी टोली धूल भरी कच्ची पगडंडियों के रास्ते सुपारी तथा नारियल के पेड़ों के पास से गुजरती हुई श्रीरामपुर गांव में पहुंची तो गांव वाले झुकी कमर के 77 वर्षीय उस वृद्ध के दर्शनों के लिए टूट पड़े, जो अपने खोए हुए सपने की खोज में बांस की लंबी लाठी के सहारे लंबे लंबे डग भरता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था।
जब माउंटबेटन ने वाइसराय के रूप में दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर अपने कदम रखे उस समय वह दुर्बल शरीर वाला कृषकाय महात्मा बंगाल के छोटे से गांव श्रीरामपुर में भरी दोपहर में अपनी चारपाई पर लेटे अपने शरीर पर मिट्टी का लेप लगाए पड़ा हुआ था। श्रीरामपुर एक ऐसा गांव था जहां रेडियो ,बिजली व टेलीफोन की सुविधा के लिए 30 मील पैदल जाना पड़ता था और वाइसराय माउंटबेटन के लिए इस गांव का उच्चारण भी कठिन था।
गांधीजी से भयभीत जितने भी अंग्रेजों ने उनसे बातचीत की उनमें शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने गांधीजी को ठीक से समझा होगा। माउंटबेटन जानते थे कि अकेले गांधी पूरी कांग्रेस के एकछत्र नेता हैं। कांग्रेस का चवन्नी का एक कार्यकता से लेकर गांव गांव में उनके अनुयायी मौजूद हैं।
जब वाइसराय ने अपने दूत के माध्यम से गांधीजी से मिलने की इच्छा जाहिर करते हुए श्रीरामपुर एक चिट्ठी भिजवाई तो गांधीजी ने उसके जवाब में उन्हें चिट्ठी लिखी और चारपाई पर लेटे लेटे उन्होंने अपने एक अनुयायी को इशारे से बुलाया और कहा कि इस चिट्ठी को 3 दिन बाद लेटर बक्स में डालना वरना वाइसराय यह समझेंगे कि मैं उनसे मिलने को ज्यादा आतुर हूँ।
अपने अनुयायियों के साथ संचार और संवाद स्थापित करने के गांधीजी के साधन और तरीके बहुत प्राचीन थे। वे ऐसी किसी तकनीक का सहारा नहीं लेते थे जिसके सहारे कोरी लफ्फाजी और लंबे चौड़े सिद्धांत की दुहाई देने वाले लोग अपनी कृत्रिम छवि निर्मित करते हैं। गांधीजी में सीधे साधे संकेतों के माध्यम से अपनी बात देश के कोने कोने तक पहुंचाने की विलक्षण क्षमता थी। इस क्षमता से वे लोगों के अंतर्मन को छू लेते थे। भारत ने उस कृषकाय महात्मा के दुर्बल शरीर की छाया में एक सहज प्रतिभा के व्यक्ति में अपना कल्याण देखा। वे जहां भी गए सारा देश उनके पीछे चल पड़ा।
उन्होंने हरिजन समाचार पत्र में लिखा-
मैं अपने करोड़ो देशवासियोंको पहचानने का दावा करता हूँ। चौबीसों घंटे मैं उनके साथ रहता हूँ। उनकी हिमायत करना मेरा पहला और आखिरी काम है, क्योंकि मैं और किसी ईश्वरको नहीं, सिर्फ उस ईश्वर को मानता हूँ जिसका निवास करोड़ों के मूक हृदयों में है। वे लोग ईश्वर की मौजूदगी नहीं पहचानते; मैं पहचानता हूँ। और मैं इन करोड़ों की सेवा द्वारा सत्यरूपी ईश्वर की या ईश्वररूपी सत्य की पूजा करता हूँ।
गांधीजी ने लिखा ‘मैं सत्य का विनम्र सेवक हूँ। मैं आत्मज्ञान प्राप्त करने को अधीर हूँ। मेरी राष्ट्र सेवा ही मेरी आध्यात्मिक साधना है। अपने ध्येय को प्राप्त करने के लिए मुझे किसी गुफा में जाने की जरूरत नहीं क्योंकि वह मेरे भीतर मौजूद है। शरीर गुफा में और मन संसार में रहे तो मन को शांति नहीं मिल सकती।
योग और प्राणायाम , पूजा और होम, यज्ञ और तपस्या तथा एकांत साधना द्वारा धर्म और अपनी मुक्ति खोजने की परंपरा सारे संसार में देखने को मिलेगी। गांधीजी ने इस सीमा रेखा को मिटा दिया। उन्होंने अपने आचरण से सिद्ध कर दिया कि धर्म किसी खास दिन , खास लग्न, खास चौघड़िया का कृत्य नहीं अपितु वह मनुष्य के प्रत्येक कार्य में विद्यमान रहता है। यहां तक कि राजनीति भी धर्म की अभिव्यक्ति का उचित माध्यम हो सकती है। ऐसे बहुत से राजनेता हुए हैं जो राजनीति के लिए धर्म का चोला ओढ़कर चलते हैं गांधीजी विशुद्ध धार्मिक व्यक्ति थे जिन्होंने देश की मुक्ति के लिए खादी परिधान को अपनाया।
अंग्रेजों के खिलाफ उन्होंने सबसे बड़ी ऐसी लड़ाई छेड़ी जिस लड़ाई का नतीजा केवल हिंदुस्तान की आजादी में नहीं हुआ अपितु पूरी दुनिया से अंग्रेजी हुकूमत के ढह जाने में हुआ। उस हुकूमत जिसके बारे में यह कहा जाता था कि उनके साम्राज्य में सूरज डूबता ही नहीं ।
गांधीजी ने उस देश में भूख और उपवास को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया जिसमें शताब्दियों से सूखा और अकाल पड़ना सामान्य बात थी। उन्होंने भूखे रहकर गंगा और यमुना का पानी पीकर कोकाकोला पीने वाले इंग्लैंड को घुटनों के बल खड़े कर दिया।
















