वर्ष 1980 में राजनीति विज्ञानी लैंगडन विनर ने प्रभावशाली पत्रिका डैडलस में ‘तकनीक की राजनीति’ पर केंद्रित पर एक विचारोत्तेजक लेख लिखा था। दिलचस्प है कि डैडलस का वह पूरा अंक ही ‘आधुनिक प्रौद्योगिकी’ पर केंद्रित था। विनर के उस लेख का शीर्षक था : ‘डु आर्टीफ़ैक्ट्स हैव पॉलिटिक्स’?
आज जब तकनीकी राजनीति की दिशा निर्धारित कर रही है, विनर का वह लेख और प्रासंगिक हो उठा है। विनर का मुख्य तर्क था कि तकनीकी उपकरणों के अपने राजनीतिक गुण होते हैं और उन मशीनों की संरचना, उनकी प्रणाली सत्ता और प्राधिकार के स्वरूपों से न सिर्फ सीधे जुड़ी होती है, बल्कि कई बार उन्हें गढ़ती भी है। विनर का यह तर्क लुई ममफोर्ड जैसे उन विचारकों से अलग था जो प्रौद्योगिकी को लोकतांत्रिक और प्राधिकारवादी प्रौद्योगिकी जैसे दो सरलीकृत खाँचों में बांटने के हिमायती थे।
प्रौद्योगिकी को समाज, अर्थतंत्र और राजनीति से मुख्तलिफ इदारे के रूप में देखने वाले विद्वानों और तकनीकी को केवल सामाजिक और आर्थिक संदर्भ में ही समझने की वकालत करने वाले विद्वानों से हटकर विनर का तर्क था कि तकनीकी वस्तुओं के अपने राजनीतिक गुणधर्म होते हैं, पहले इसे हमें समझना होगा।
वे ऐतिहासिक उदाहरण के साथ यह बताते हैं कि कैसे कुछ आविष्कारों, डिजाइनों या तकनीकी उपकरणों की व्यवस्था के जरिए कुछ खास समूहों को फायदा पहुंचा तो कुछ खास समूहों को समाज के चुनिंदा दायरों से ही बहिष्कृत कर दिया गया। मसलन, मशहूर योजनाकार रॉबर्ट मोजेज द्वारा न्यूयॉर्क के लॉन्ग आइलैंड में बनाई गए सड़कों, पार्कों और पुलों के अध्ययन के हवाले से विनर दर्शाते हैं कि कैसे इन संरचनाओं में रॉबर्ट मोजेज का वर्ग आधारित पूर्वाग्रह और नस्ली पूर्वाग्रह दिखाई पड़ता है।
राजमार्गों को पार्कों से जोड़ने वाले पुलों की ऊंचाई मोजेज ने इतनी कम (9 फ़ीट) रखी थी कि उसमें सार्वजनिक वाहन प्रवेश ही नहीं कर सकते थे, केवल निजी वाहनों से ही वहां तक पहुंचना संभव था। अधिकांश काले लोगों द्वारा तब सार्वजनिक परिवहन का ही इस्तेमाल किया जाता था, उनके पास निजी वाहन नहीं थे। इस तरह काले लोगों के लिए पार्कों तक पहुंचना नामुमकिन-सा हो गया।
इसी तरह 19वीं सदी में शिकागो की फैक्टरियों में लोहा और इस्पात ढालने वाली मशीनों के इस्तेमाल के संदर्भ में विनर ने लिखा है कि उन शुरुआती सालों में इन मशीनों के कारखाने में आने से उत्पादकता तो नहीं बढ़ी। लेकिन कारखाने के श्रमिकों का यूनियन महज़ तीन साल के भीतर टूट गया, जो उन मशीनों को कारख़ाने में लाने का असली उद्देश्य था। इसके बाद बड़े पैमाने पर कारखाना मालिकों द्वारा बग़ैर विरोध का सामना किए हुए श्रमिकों की छँटनी करना आसान हो गया।
इन उदाहरणों को वे ऐसी सामाजिक प्रक्रिया के रूप में देखते हैं जहां वैज्ञानिक ज्ञान, प्रौद्योगिकी संबंधी आविष्कार और कॉर्पोरेट का मुनाफा एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़ जाते हैं। इस प्रक्रिया में विरोधियों को ‘तकनीकी विरोधी’ या ‘प्रगति विरोधी’ करार दे देना भी शामिल है। यह सब कुछ उस पैटर्न की ओर इशारा करता है जिस पर राजनीति और आर्थिक सत्ता की स्पष्ट छाप दिखती है।
विनर यह भी बताते हैं कि रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले कुछ तकनीकी औजारों और उपकरणों में भिन्न-भिन्न ढंग से इस्तेमाल किए जाने की संभावना निहित होती है। उन उपलब्ध संभावनाओं और विकल्पों में से समाज क्या चुनता है, यह निर्णय आने वाली कई पीढ़ियों तक को प्रभावित करता है। तकनीकी के इस्तेमाल से जुड़ा यह फैसला समाज के अलग-अलग तबकों के बीच एक शक्ति समीकरण भी बनाता है, जिसमें कुछ सामाजिक वर्ग पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली तो कुछ शक्तिहीन बन जाते हैं।
तकनीकी और प्रौद्योगिकी का सर्वव्यापी प्रभाव वाले इस दौर में विनर का लेख फिर से पढ़े जाने की माँग करता है।
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