जब गांधी ने अपनी ही जाति से कहा – “इन बाड़ों को स्वाहा कर दो!”

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Mahatma Gadhi

24 जनवरी, 1928: मोरबी की वह ऐतिहासिक घटना, जिसने जाति-व्यवस्था की जड़ों को हिला दिया। आज जब हम सामाजिक समरसता और जातिवाद पर बहस करते हैं, तो हमें महात्मा गांधी के उस कड़े संदेश को याद करना चाहिए जो उन्होंने आज से लगभग 98 साल पहले अपनी ही जाति के लोगों को दिया था। यह कहानी है साहस की, प्रायश्चित की और एक महान दूरदर्शी के ‘रामराज्य’ की कल्पना की।

बहिष्कार से सम्मान तक का सफर-

​किस्सा शुरू होता है 1888 में, जब मोहनदास करमचंद गांधी ने बैरिस्टर बनने के लिए लंदन जाने का फैसला किया। तब ‘मोढ़ बनिया’ जाति के पंचायत ने इसे धर्म के विरुद्ध माना और गांधी को ‘जाति से बाहर’ (बहिष्कृत) कर दिया। लेकिन समय का चक्र घूमा। वही मोहनदास जब ‘महात्मा’ बनकर 1928 में सौराष्ट्र के मोरबी पहुंचे, तो उसी मोढ़ बनिया समाज के लोग उनके स्वागत में ‘मानपत्र’ लेकर खड़े थे।

​मानपत्र लिया, पर कड़वा सच भी बोला-

​गांधीजी ने मानपत्र स्वीकार किया, लेकिन औपचारिकता में नहीं डूबे। मोरबी रियासत के राजा की मौजूदगी में उन्होंने जो कहा, वह आज भी हमारे समाज के लिए एक ‘कड़वी दवा’ की तरह है। गांधी ने स्पष्ट कहा ​‘मैं यह माननेवाला रहा हूं कि जाति के इन छोटे-छोटे बाड़ों का नाश होना चाहिए। मुझे इस बारे में कोई शक नहीं कि हिन्दू-धर्म के भीतर जातियों के लिए कोई जगह नहीं है। और यह मैं मोढ़ या दूसरी जो भी जातियां यहां पर हों उन्हें ध्यान में रखकर कहता हूं। आप सबसे मोढ़ जाति के निमित्त मैं यह कहना चाहता हूं कि जाति के बाड़ों को भूल जाइये। आज जो जातियां हैं उनको यज्ञ की आहूति के रूप में उपयोग कर स्वाहा कीजिए और नई जाति न बनने दीजिए।’

​गांधी के भाषण के 3 बड़े सबक-

​1. जाति एक ‘सड़ा हुआ गड्ढा’ है-

गांधीजी ने एक अद्भुत उपमा दी। उन्होंने कहा कि जैसे डॉक्टर ठहरे हुए गंदे गड्ढों को मिट्टी से भर देने की सलाह देते हैं ताकि बदबू और बीमारी न फैले, वैसे ही जाति के ये ‘बाड़े’ भी समाज के लिए घातक हैं। इनमें पड़े रहने से वैचारिक और सामाजिक दुर्गंध पैदा होती है।

​2. यज्ञ की आहुति और ‘स्वाहा’-

उन्होंने अपनी जाति के लोगों से आह्वान किया कि वे अपनी जातिगत पहचान को एक ‘यज्ञ’ की तरह इस्तेमाल करें। उन्होंने कहा— “आज जो जातियां हैं, उन्हें यज्ञ की आहुति के रूप में उपयोग कर स्वाहा कीजिए और नई जाति न बनने दीजिए।” यानी, अपनी पुरानी पहचान को समाज के कल्याण के लिए होम कर दो, न कि उसे अहंकार का साधन बनाओ।

​3. रामराज्य के मार्ग का कांटा-

गांधी के लिए ‘रामराज्य’ का अर्थ केवल सुशासन नहीं, बल्कि एक ऐसा समाज था जहाँ कोई ऊंच-नीच न हो। उन्होंने दोटूक कहा कि ये जातियां हमारी तरक्की, हमारे वास्तविक धर्म और हमारे स्वराज्य के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा हैं।

​कथनी और करनी का संगम-

​भाषण के अंत में गांधी ने एक ऐसी बात कही जिसने रूढ़िवादियों को चौंका दिया। उन्होंने गर्व से बताया कि उन्होंने खुद जाति के इन बंधनों को तोड़ दिया है। उन्होंने अपने पुत्र का विवाह जाति से बाहर तय करके यह सिद्ध किया कि वे केवल उपदेश नहीं देते, बल्कि उसे जीते भी हैं।

​आज के संदर्भ में यह क्यों जरूरी है?

​आज हम 21वीं सदी में हैं, लेकिन आज भी हम ‘जाति के बाड़ों’ में सिमटे हुए हैं। गांधीजी का वह भाषण हमें याद दिलाता है कि जब तक हम इन छोटे-छोटे गड्ढों से बाहर निकलकर एक विशाल महासागर (मानवता) का हिस्सा नहीं बनेंगे, तब तक वास्तविक ‘रामराज्य’ या ‘स्वराज्य’ का सपना अधूरा ही रहेगा।इसलिए आज हम गांधी के उस आह्वान को याद करें— जाति के बाड़ों को भूल जाएं और मनुष्यता को चुनें

स्त्रोत -संपूर्ण गांधी वाङ्मय


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