नागरिक से अनुयाई बनने की यात्रा – परिचय दास

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Parichay Das

भी नागरिक होना एक ठोस अनुभूति थी। उसमें अधिकारों की गर्मी थी, असहमति की धड़कन थी और प्रश्न करने की वह सहज आदत थी जो मनुष्य को भीड़ से अलग करती है। नागरिक होना केवल पहचान नहीं था, वह एक उत्तरदायित्व था—संविधान के प्रति, समाज के प्रति, और सबसे अधिक अपने विवेक के प्रति। आज वही नागरिक धीरे-धीरे अनुयायी में बदलता हुआ दिखाई देता है। यह कोई अचानक घटित हुई घटना नहीं है बल्कि एक लम्बी, चुपचाप चलती यात्रा है, जिसमें लोकतंत्र का रास्ता कम और आस्था का पगडंडी ज़्यादा नज़र आने लगी है।

इस यात्रा की शुरुआत भाषा से होती है। जब राजनीति संवाद छोड़कर उद् घोष में बदल जाती है, तब नागरिक श्रोता नहीं रहता, वह अनुयायी बन जाता है। प्रश्न पूछना संदेह समझा जाने लगता है और संदेह को देशद्रोह की छाया में खड़ा कर दिया जाता है। यहाँ तर्क के स्थान पर नारे आ जाते हैं, और नारे धीरे-धीरे सोच की जगह लेने लगते हैं। नागरिक की भाषा जहाँ “क्यों” से शुरू होती थी, अनुयायी की भाषा “क्यों नहीं” पर आकर रुक जाती है।

लोकतंत्र मूलतः बहुवचन में सोचने की व्यवस्था है लेकिन अनुयायित्व एकवचन में जीता है। उसे एक चेहरा चाहिए, एक आवाज़, एक कथा। नागरिक अपने प्रतिनिधि से जवाब माँगता है; अनुयायी अपने नायक के लिए बहाने खोजता है। सत्ता की आलोचना जहाँ नागरिक का स्वभाव थी, वहीं अनुयायी उसे अपवित्रता मानने लगता है। इस बिंदु पर राजनीति, धर्म की तरह व्यवहार करने लगती है—असहमति पाप बन जाती है और विश्वास सबसे बड़ा गुण।

मीडिया इस यात्रा का सबसे तेज़ वाहन बन चुका है। चौबीसों घंटे चलने वाली बहसें दरअसल बहस नहीं, आस्था-प्रदर्शन हैं। स्क्रीन पर नागरिक नहीं, अनुयायी बैठते हैं—जो पहले से तय निष्कर्ष लेकर आते हैं और उसी निष्कर्ष के पक्ष में चीखते हैं। यहाँ सूचना का उद्देश्य समझाना नहीं, उत्तेजित करना होता है। जैसे-जैसे आवाज़ ऊँची होती जाती है, विचार उतना ही छोटा होता चला जाता है।

अनुयायी बनने की प्रक्रिया में डर एक आवश्यक तत्व है। नागरिक डरता भी है तो सवाल पूछता है; अनुयायी डरकर चुप हो जाता है या डर को हथियार बना लेता है। उसे बताया जाता है कि कोई अदृश्य शत्रु है—देश के भीतर भी और बाहर भी। इस भय के बीच सत्ता सुरक्षा का वादा करती है, और बदले में विवेक माँग लेती है। यह सौदा धीरे-धीरे इतना सामान्य हो जाता है कि स्वतंत्रता बोझ लगने लगती है।

शिक्षा, जो नागरिक गढ़ने की प्रयोगशाला थी, अब अनुयायी तैयार करने का कारख़ाना बनती जा रही है। पाठ्यक्रम में प्रश्नों की जगह उत्तर रख दिए जाते हैं, और इतिहास को जिज्ञासा नहीं, गौरव-गाथा की तरह पढ़ाया जाता है। विद्यार्थी को सिखाया जाता है कि सही होना ज़रूरी है, सत्य की खोज नहीं। इस तरह सोचने की प्रक्रिया कमज़ोर होती है और मानने की आदत मज़बूत।

इस यात्रा में सोशल मीडिया एक विचित्र भूमिका निभाता है। वह नागरिक को बोलने का मंच देता है, लेकिन सुनने की क्षमता छीन लेता है। एल्गोरिदम हमें वही दिखाता है जो हम पहले से मानते हैं। असहमति सामने आती भी है तो अपमान के रूप में। यहाँ संवाद नहीं, पक्षधरता पनपती है। हर व्यक्ति अपना छोटा-सा झंडा लेकर खड़ा है, और राष्ट्र एक साझा विचार नहीं, अलग-अलग गुटों का शोर बन जाता है।

अनुयायी को नीतियों से अधिक प्रतीकों से प्रेम होता है। झंडा, नारा, उत्सव, उत्सर्ग—ये सब उसके भावनात्मक भोजन हैं। नागरिक बजट, रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य पर सवाल करता है; अनुयायी भावनात्मक विजय में संतोष खोज लेता है। वास्तविक समस्याएँ स्थगित कर दी जाती हैं, क्योंकि प्रतीक तत्काल आनंद देते हैं और प्रश्न असुविधा।

यह यात्रा सबसे अधिक खतरनाक तब होती है जब नागरिक स्वयं इस परिवर्तन को उपलब्धि समझने लगता है। उसे लगता है कि किसी शक्तिशाली कथा का हिस्सा होना ही पर्याप्त है। व्यक्तिगत विवेक की जगह सामूहिक उन्माद ले लेता है। यहाँ व्यक्ति भीड़ में सुरक्षित महसूस करता है, क्योंकि सोचने की ज़िम्मेदारी किसी और की हो जाती है।

फिर भी यह यात्रा एकतरफ़ा नहीं है। नागरिक पूरी तरह मरा नहीं है; वह थका हुआ है, भ्रमित है, कभी-कभी भयभीत है। इतिहास बताता है कि जब भी अनुयायित्व अपने चरम पर पहुँचा है, किसी न किसी कोने से नागरिक की आवाज़ लौटी है—धीमी, अकेली लेकिन ज़िद्दी। वही आवाज़ याद दिलाती है कि लोकतंत्र श्रद्धा से नहीं, विवेक से चलता है।

नागरिक से अनुयायी बनने की यह यात्रा दरअसल सत्ता की नहीं, समाज की परीक्षा है। सवाल यह नहीं कि कौन हमें नेतृत्व दे रहा है बल्कि यह है कि हम स्वयं क्या बनना चुन रहे हैं। नागरिक होना कठिन है—उसमें असहमति का साहस चाहिए, अकेले खड़े होने की ताक़त चाहिए। अनुयायी होना आसान है—वह आपको सोचने से मुक्त कर देता है। शायद आज का सबसे राजनीतिक प्रश्न यही है कि हम सुविधा चुनेंगे या विवेक।

इस प्रश्न के साथ ही नागरिक की आख़िरी कसौटी शुरू होती है। क्योंकि सुविधा केवल आराम नहीं देती, वह स्मृति भी छीन लेती है। अनुयायी को इतिहास याद नहीं रखना पड़ता; उसे केवल वर्तमान के उत्सव में डूबे रहना होता है। नागरिक स्मृति के बोझ के साथ जीता है—उसे पता होता है कि सत्ता का स्वभाव बदलता नहीं, केवल उसके चेहरे बदलते हैं। इसीलिए स्मृति का क्षरण लोकतंत्र का सबसे सूक्ष्म, पर सबसे प्रभावी हथियार बन जाता है।

जब स्मृति धुँधली होती है, तब नैतिकता भी धुँधली हो जाती है। जो कल गलत था, आज ‘ज़रूरी’ कहा जाने लगता है। नागरिक इस फिसलन को पहचानता है; अनुयायी उसे रणनीति मानकर स्वीकार कर लेता है। यहाँ राजनीति अपने नैतिक आधार से खिसककर उपयोगिता के धरातल पर आ जाती है—जो जीत दिलाए, वही सही। इस बिंदु पर लोकतंत्र प्रक्रिया नहीं, परिणाम बन जाता है।

अनुयायित्व की सबसे बड़ी सफलता यह है कि वह आत्मालोचना को विलास घोषित कर देता है। नागरिक अपने पक्ष की भी जाँच करता है; अनुयायी केवल विरोधी की ग़लतियाँ गिनता है। भीतर झाँकने की जगह उँगली बाहर उठी रहती है। धीरे-धीरे समाज में एक अजीब-सी नैतिक असमानता पैदा होती है—मेरे पक्ष की हर भूल परिस्थिति है, और दूसरे पक्ष की हर भूल अपराध।

इस यात्रा में कानून भी प्रतीक बन जाता है। नागरिक के लिए कानून संरक्षण है; अनुयायी के लिए वह शस्त्र है। नियम तब तक प्रिय हैं, जब तक वे ‘हमारे’ ख़िलाफ़ न जाएँ। जैसे ही वही नियम अपने लोगों पर लागू होते हैं, उन्हें विदेशी, औपनिवेशिक या बाधक बताया जाने लगता है। यहाँ संवैधानिकता भावनाओं से हारने लगती है।

अनुयायी बनने की प्रक्रिया में करुणा भी चुनिंदा हो जाती है। नागरिक पीड़ा को मनुष्य के रूप में देखता है; अनुयायी पहचान के चश्मे से। किसकी पीड़ा दिखेगी, किसकी नहीं—यह तय कर लिया जाता है। इस चयनात्मक संवेदना में समाज भीतर से टूटता है, लेकिन बाहर से एकजुट दिखता है। यह एकता की सबसे खतरनाक शक्ल है—जिसमें मानवता मौन रहती है।

फिर धीरे-धीरे राजनीति जीवन के हर कोने में घुस आती है। भोजन, वस्त्र, भाषा, प्रेम—सब पर विचारधारा का लेबल लगने लगता है। नागरिक इन क्षेत्रों को निजी मानता था; अनुयायी इन्हें भी राजनीतिक युद्धभूमि बना देता है। जीवन सिमटता जाता है और राजनीति फैलती जाती है। अंततः व्यक्ति स्वयं को नागरिक नहीं, पक्ष के प्रतिनिधि के रूप में देखने लगता है।

इस बिंदु पर हास्य भी संदिग्ध हो जाता है। व्यंग्य, जो लोकतंत्र की साँस था, अब अपमान कहलाता है। नागरिक हँसकर सवाल करता था; अनुयायी क्रोध से उत्तर देता है। जहाँ हँसी ख़त्म होती है, वहाँ डर शुरू होता है। और डर लोकतंत्र का सबसे विश्वसनीय शत्रु है।

हर समय में कुछ लोग होते हैं जो इस यात्रा से उतरने की कोशिश करते हैं। वे सवाल पूछते हैं, भले ही उनकी आवाज़ काँपती हो। वे जानते हैं कि अनुयायित्व सामूहिक लगता है लेकिन अकेलेपन से पैदा होता है—अपने विवेक से दूरी का अकेलापन। नागरिक होना भी अकेला करता है पर वह अकेलापन रचनात्मक होता है।

शायद नागरिक से अनुयायी बनने की यह यात्रा अपरिवर्तनीय नहीं है। इसकी वापसी की सड़क कठिन है, पर मौजूद है। वह सड़क शिक्षा से, संवाद से, और सबसे अधिक आत्मस्मरण से होकर जाती है। यह याद रखने से कि लोकतंत्र किसी नेता का उपहार नहीं, नागरिक का अभ्यास है—रोज़ का, थकाने वाला, लेकिन अनिवार्य।

यह स्वीकार करना चाहिए कि नागरिक होना कोई पहचान-पत्र नहीं, एक सतत संघर्ष है। अनुयायी बनना विश्राम है; नागरिक बने रहना श्रम पर लोकतंत्र श्रम से ही जीवित रहता है, विश्राम से नहीं।

यह श्रम केवल बाहरी सत्ता से नहीं, अपने भीतर की आलस्यपूर्ण इच्छाओं से भी है। नागरिक बनने का संघर्ष दरअसल स्वयं से लगातार मुठभेड़ है—अपने पूर्वग्रहों से, अपनी सुविधाओं से, अपने डर से। अनुयायी बनने में सबसे बड़ा आकर्षण यही है कि वह इस आंतरिक संघर्ष से मुक्ति का वादा करता है। वह कहता है—सोचो मत, भरोसा करो; जाँचो मत, मान लो; सवाल मत उठाओ, साथ खड़े हो जाओ। यह वाक्य-रचना जितनी सरल है, उतनी ही घातक।

अनुयायित्व व्यक्ति को एक स्थायी भावनात्मक अवस्था में बाँध देता है—या तो गर्व में या आक्रोश में। नागरिक इन दोनों भावों से बाहर निकलकर विवेक की शीतल, पर कठिन भूमि पर खड़ा होता है। गर्व सवाल नहीं करने देता, आक्रोश सुनने नहीं देता। इसीलिए अनुयायी को लगातार उत्तेजना चाहिए—नई विजय, नया अपमान, नया शत्रु। बिना इसके उसका राजनीतिक जीवन शिथिल पड़ जाता है। नागरिक का जीवन उतना रोमांचक नहीं होता, पर अधिक टिकाऊ होता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि अनुयायित्व हमेशा आदेश से नहीं आता; अक्सर वह प्रेम की भाषा में आता है। नेता को पिता, रक्षक, अवतार या अंतिम आशा की तरह प्रस्तुत किया जाता है। यहाँ आलोचना कृतघ्नता बन जाती है। नागरिक इस भावनात्मक जाल को पहचानता है; अनुयायी उसमें सुरक्षा महसूस करता है।

लोकतंत्र के लिए यह क्षण सबसे नाज़ुक होता है क्योंकि सत्ता को चुनौती देने की जगह लोग उसे अपनापन सौंप देते हैं। धीरे-धीरे नैतिक साहस का अवमूल्यन होने लगता है। जो बोलता है, वह ‘नकारात्मक’ कहलाता है; जो चुप रहता है, वह ‘परिपक्व’। नागरिक की बेचैनी को अस्थिरता कहा जाता है और अनुयायी की चुप्पी को अनुशासन। इस उलटफेर में लोकतंत्र अपनी आत्मा खो देता है, जबकि उसका शरीर—चुनाव, संस्थाएँ, भाषण—अब भी मौजूद रहता है। यह एक जीवित-सा दिखने वाला लोकतंत्र होता है, जिसकी चेतना अनुपस्थित होती है।

अनुयायी को बहुमत की ढाल मिल जाती है। उसे लगता है कि संख्या ही सत्य है। नागरिक जानता है कि इतिहास में सत्य अक्सर अल्पसंख्यक रहा है—कभी एक व्यक्ति में, कभी कुछ आवाज़ों में। इसीलिए नागरिक संख्या से नहीं, तर्क से अपनी शक्ति ग्रहण करता है। पर तर्क समय लेता है, धैर्य माँगता है और असुविधाजनक होता है। अनुयायित्व त्वरित समाधान देता है—सीधे, सरल, भावनात्मक।

जब नागरिक घटता है, तब लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदलने लगता है। यहाँ निर्णय विवेक से नहीं, आवेग से लिए जाते हैं। संस्थाएँ औपचारिक रह जाती हैं और शक्ति अनौपचारिक केंद्रों में सिमट जाती है।

नागरिक संस्थाओं पर भरोसा करता है; अनुयायी व्यक्तियों पर। यही वह मोड़ है जहाँ संविधान धीरे-धीरे पोस्टर बन जाता है—दीवार पर टँगा हुआ, पर जीवन में अनुपस्थित। फिर भी नागरिक की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती। वह कभी साहित्य में लौटता है, कभी कविता में, कभी किसी अकेले शिक्षक के कक्ष में, कभी किसी छात्र के सवाल में। नागरिकता अक्सर राजनीति के बाहर शरण लेती है ताकि राजनीति को भीतर से बदल सके। यही कारण है कि सत्ताएँ सबसे पहले कला, हास्य और प्रश्नों से असहज होती हैं—क्योंकि वहीं नागरिक जीवित रहता है।

शायद आज नागरिक होना पहले से अधिक कठिन है क्योंकि अनुयायित्व को कई बार देशभक्ति, नैतिकता और सुरक्षा के आवरण में प्रस्तुत किया जा जाता है लेकिन कठिन समय ही नागरिक की असली पहचान रचता है। आसान समय में तो हर कोई नागरिक लगता है; कठिन समय में ही पता चलता है कि कौन अनुयायी है और कौन प्रश्नकर्ता।

नागरिक से अनुयायी बनने की यात्रा कोई मजबूरी नहीं, एक चुनाव है—अक्सर अनजाने में किया गया, पर फिर भी चुनाव। हर दिन, हर खबर, हर बहस में यह चुनाव दोहराया जाता है। हम या तो अपनी असुविधा स्वीकार करते हैं, या अपनी स्वतंत्रता गिरवी रखते हैं। लोकतंत्र इसी छोटे, रोज़मर्रा के चुनावों में बनता और बिगड़ता है। नागरिक बने रहना शायद सबसे कठिन राजनीतिक क्रिया है—और आज सबसे ज़रूरी भी।


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