एपस्टीन फाइल्स यानी पूंजीवाद का घिनौना चेहरा – अरुण कुमार त्रिपाठी

0
The Epstein Files: The ugly face of capitalism.

Arun Kumar Tripathi
जिन्हें पूंजीवाद से प्रेम है और जो मानवता का भविष्य इसी व्यवस्था में देखते हैं उन्हें एपेस्टीन फाइल्स की रोशनी में अपनी मान्यताओं पर नए सिरे से विचार करना चाहिए। जेफरी एपेस्टीन नाम के इस अमेरिकी फाइनेंसर ने अपने एक स्वतंत्र द्वीप पर छोटी बच्चियों से यौन दुराचार का जो विश्व कीर्तमान कायम किया है उसने मानवता के मेरुदंड में सिहरन पैदा कर दी है। बच्चों से बलात्कार, दुराचार और उसमें दुनिया को चलाने वाली कई हस्तियों की भागीदारी ने यह साबित कर दिया है कि पूंजीवाद एक वासना है जिसके लिए किसी नैतिकता और मानवता का कोई मूल्य नहीं है। उनके लिए यौनिक नैतिकता और सुचिता का कोई मूल्य नहीं है। उसे संचालित करने वाले बेहद भ्रष्ट, पतित और गलीज हैं। वे भयानक रूप से झूठे और हिंसक हैं और इस संसार को उनके भरोसे छोड़ा नहीं जा सकता।

पूंजीवाद के इस घिनौने चेहरे की कथा बहुत विस्तृत है। इसमें 60 लाख पेज के दस्तावेज हैं, तमाम ईमेल हैं और लाखों वीडियो हैं। अमेरिकी संसद से नवंबर 2025 में एपेस्टीन फाइल्स ट्रांसपैरेंसी एक्ट पास होने के बाद भी अभी तक इस कहानी का पूरा ब्योरा उजागर नहीं हुआ है। पर इन कहानियों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, पूंजीपति एलेन मस्क, पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, पूंजीपति बिल गेट्स, आध्यात्मिक मामलों के विशेषज्ञ और गुरु दीपक चोपड़ा, भाषाविद् और राजनीतिशास्त्री नोम चोमस्की, ब्रिटिश राजघरानों के राजकुमारों का चेहरा झांक रहा है। जेफरी एपेस्टीन से संपर्क रखने वालों में भारत की भी कुछ विभूतियों के नाम आ रहे हैं। लेकिन उनकी भागीदारी किस हद तक है यह अभी साफ नहीं है। क्योंकि सिर्फ ईमेल के आदान प्रदान और एकाध बार मिल लेने से कोई यौन अपराध में शामिल है यह सिद्ध नहीं हो जाता।

लंका का वर्णन करते हुए तुलसी दास ने लिखा है—कहिं महिष मानुष धेनु अज, खर खल निसाचर भक्षहिं। यहि लागि तुलसीदास इनकी कथा संक्षेपहिं कहीं। उसी लंका के वैभव और वासनामयी संसार का वर्णन वाल्मीकि ने विस्तार से किया है और बताया है कि जब हनुमान सीता को ढूंढते हुए महलों में जाते हैं तो वहां की विलासमयी रात्रि का क्या दृश्य है। हालांकि जेफरी एपेस्टीन के लिटल सेंट आइलैंड या एपस्टीन आइलैंड की तरह ही लंका भी एक वैभवशाली और चारों ओर से सुरक्षित द्वीप ही था, लेकिन इस तरह के व्याभिचार का दृश्य वहां भी नहीं है और न ही किसी कवि ने इसकी कल्पना की है जो कि ग्रीनलैंड से सटे उस द्वीप पर उजागर हो रहा है। विडंबना यह है कि इस तरह के द्वीपों या उन पर उन्मुक्त आचरण करने वालों से निजात पाने के लिए इस सभ्यता में न तो किसी राम की कल्पना है और न ही किसी विभाषण की, न ही किसी वैकल्पिक सभ्यता की।

उल्टे इस आधुनिक समाज के बौद्धिक और विचारक उसी अमेरिकी जीवनशैली और राज्यव्यवस्था में इन प्रवृत्तियों का समाधान देख रहे हैं। यानी सारा समाधान उसी लंका में देखा जा रहा है, जो सोने की है जिसके पास तमाम चमत्कारी यंत्र हैं जिसने सूरज, चंद्र, शनि और तमाम दूसरे नक्षत्रों को कैद कर रखा है और जो कभी भी किसी का अपहरण करके अपने यहां बंदी बना सकता है। इतना कुछ होने के बावजूद भारत में तमाम बौद्धिक अमेरिका की इस बात के लिए तारीफ कर रहे हैं कि देखो ना वहां कैसा लोकतंत्र है कि वहां की संसद ने बाकायदा कानून पास किया कि एपस्टीन फाइलों को सार्वजनिक किया जाए। कहीं भारत में भी ऐसा हो सकता है? वे यह भी कहते हैं कि भारत तो अभी देवदासी प्रथा, जाति प्रथा जैसी तमाम बुराइयों में उलझा हुआ है, इसलिए उसे अमेरिका और उस आधुनिकता को नसीहत देने का कोई हक नहीं है जो सभ्यता के विकास का इंजन है।

यह कुछ वैसा ही तर्क है जैसा तर्क अमेरिकी लेखिका कैथरीन मेओ की किताब ‘ मदर इंडिया’ आने के बाद साम्राज्यवादी दे रहे थे। यानी शैतानी सभ्यता को कोसने के लिए तुम्हारे पास कोई नैतिक आधार नहीं है। क्योंकि वे इसी आधुनिक सभ्यता को सारे संसार का अभीष्ट मानते थे। इस आधुनिक सभ्यता की आलोचना उस समय एडवर्ड कारपेंटर ने ‘सिविलाइजेशन इट्स काज एंड क्योर’ लिखकर की थी। रस्किन ने ‘अनटू दिस लास्ट’ लिखकर की थी। थामस टेलर ने ‘फैलेसी आफ स्पीड’ लिखकर की थी। लेवो तालस्ताय ने ‘किंग्डम आफ गॉड इज विथिन यू’ और ‘लॉ आफ लव एंड ला आफ वायलेंस’ लिखकर की थी। गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ लिखकर की थी। गांधी ने तो इसे शैतानी सभ्यता कहा था जिसका यूरोप के कई लोगों ने विरोध किया था।

बीसवीं सदी के आखिर में अमेरिकी अर्थशास्त्री रेमंड डबल्यू बेकर ने अपनी किताब ‘कैपिटलिज्म एकलीज हील’ में इस बात का विस्तार से वर्णन किया है कि पूंजीवाद की तरक्की कितने बड़े पैमाने पर काले धन, खून से सने उत्पाद और आतंकवाद व हथियारों के व्यापार से माध्यम से होती है। उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर पूंजीवाद ने नैतिक मार्ग नहीं अपनाया तो उसका विनाश निश्चित है। हालांकि पूंजीवाद हमारी जीवन शैली में इस प्रकार समा गया है कि वह अकेले नहीं मरेगा बल्कि अपने साथ हमें भी ले जाएगा, अगर हमने समय रहते अपने को उससे अलग नहीं किया। पर क्या उतना समय बचा है?

हमने नियम कानूनों से सुसज्जित जो दुनिया बनाई है उसमें अगर इस तरह की अनैतिकता और अपराधों की अगर सजा है तो शक्ति संपन्न लोगों ने उससे बचने के लिए निरापद द्वीप खऱीद लिए हैं। कुछ लोग उसे विलासिता के द्वीप कह सकते हैं। लेकिन वे द्वीप अंडमान निकोबार और ग्वेंतनामो की श्रेणी में ही आते हैं जहां पर राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार में बने मानवाधिकार और यौन अपराध के नियम नहीं लागू होते हैं। लेकिन वहां जाकर नियम और नैतिकता तोड़ने वाले शासक इन्हीं राष्ट्रीय भूभागों पर राज करते हैं। इसलिए ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी जगह पर शैतानियत करने वाला व्यक्ति दूसरी जगह पर इंसानियत करे। दरअसल वह इंसानियत के द्वीपों, प्रायद्वीपों और महाद्वीपों को भी शैतानियत में ही बदल रहा है। इस चीज को गौर से देखने और संवेदनापूर्ण दृष्टि से महसूस करने की जरूरत है।

यह सही है कि हमने उन्नीसवीं सदी में ही ईश्वर को मार दिया था। हालांकि कई प्राचीन सभ्यताओं और धर्मों में तो ईश्वर की अवधारणा ही नहीं थी। उसकी जगह पर नैतिकता को स्थापित किया गया था। आधुनिक विचारधाराओं ने नैतिकता की उस आवश्यकता को कहीं तो आदर्शवाद से जोड़ दिया और कहीं पर संक्रमणकालीन मान लिया। पिछले पैंतीस सालों से उदारीकऱण, निजीकरण और वैश्वीकरण ने आर्थिक नीतियों को जिस ढंग से संचालित किया है उसमें हर चीज का वस्तुकरण कर दिया गया है। उस प्रणाली में धर्म, विज्ञान और नैतिकता यह सब विपणन की वस्तुएं हो गई हैं। यह बाजार की अदृश्य भुजा का चमत्कार है। शमशेर बहादुर सिंह ने कभी कहा भी था किः—इल्मो हिकमत दीनो ईमां हुश्नो इश्क, आप को बाजार से जो कहिए अभी ला देता हूं मैं। वस्तुकरण के इस अभियान में बचपन, यौवन और बुढ़ापा सभी विपणन की सामग्री हैं। या तो वे स्वयं विपणन के योग्य हैं या उनकी मदद से विपणन को गति दी जाती है। विपणन का उद्देश्य आखिरकार वासना की पूर्ति और ऐंद्रिक उपभोग ही होकर रह जाता है। एक लेखक ने कहा भी है कि एपेस्टीन की फाइलों में दिखने वाले दुर्दांत चेहरे अगर बच गए तो जान लीजिए कि हमारी यह सभ्यता अनैतिकता के अंधकूप में डूबने को तैयार है।

रोचक तथ्य यह है कि इस समय दुनिया में पक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर वही शैतानी सभ्यताएं खड़ी हैं। नैतिकता के आग्रही मनुष्यों के समक्ष कोई विकल्प ही नहीं है। लेकिन मनुष्य की प्रगति दैवी चमत्कारों और धर्मों के दायरे से बाहर निकल कर हुई है और उसने अपनी तर्क बुद्धि से अपने मूल्यों का विकास किया है। मनुष्य में विकल्प ढूंढने की क्षमताएं हैं। सवाल यह है कि क्या वह इस पूंजीवादी सभ्यता को बदल कर कोई विकल्प लाने की तैयारी कर रहा है? क्योंकि पूंजीवाद ने लोकतंत्र का आहार कर लिया है। मानवाधिकार को लील लिया है। अब वह सामंती अत्याचारों का हवाला देकर अपने अस्तित्व का नैतिक आधार सिद्ध नहीं कर सकता। इसलिए अगर हमारी सभ्यता को इंसानी सभ्यता के रूप में बचना है तो निस्संदेह पूंजीवाद की शैतानी सभ्यता से निकलना ही होगा।


Discover more from समता मार्ग

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Comment