बद्री विशाल पित्ती – विवेक मेहता

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Badrivishal pitti

द्री विशाल पित्ती हैदराबाद के एक संपन्न परिवार से थे, परंतु वे पूरी तरह लोहिया को समर्पित व्यक्ति थे। लोहिया जी की तेल-मालिश से लेकर उनके कार्यक्रमों में टेप-रिकॉर्डर लेकर उपस्थित हो जाने तक, उन्होंने अपने को उनकी सेवा और कार्य में अर्पित कर दिया था। बहुत हद तक उन्हीं के कारण लोहिया साहित्य तैयार हो पाया, सुरक्षित रह पाया और जन-जन तक पहुँच सका। कल्पना का संपादन और न जाने कितने अन्य कार्य—अब कौन सब जानता है!

पित्ती जी एक अच्छे कला-समीक्षक भी थे। मई 1965 में हुए रविशंकर और बिस्मिल्ला ख़ाँ के कार्यक्रम की समीक्षा उन्होंने धर्मयुग के लिए लिखी थी। इस समीक्षा में समय-बोध, अंग्रेज़ी, कलाकारों की गरिमा, समर्पण और सार्वजनिक संस्कृति जैसे अनेक प्रश्न शामिल हैं। यह उनके बहुमुखी व्यक्तित्व का एक ऐसा पक्ष है, जिसे देखा ही नहीं, परखा भी जाना चाहिए। विवेक मेहता के सौजन्य से वह समीक्षा यहाँ प्रस्तुत है।

रविशंकर और बिस्मिल्ला ख़ाँ: स्तरीयता और सार्वजनिक संदर्भ
— बद्री विशाल पित्ती

जहाँ तक साहित्य, संगीत और कला के प्रदर्शन—शायद रचना—का सवाल है, शहर हैदराबाद कुछ सूखा-सूखा-सा लगता है। सचमुच अच्छे आयोजन यहाँ कभी-कभी ही होते हैं। 103-104 डिग्री के तापमान में, 21 मई को बिस्मिल्ला ख़ाँ की शहनाई और 23 मई को रविशंकर का सितार सुनने का यहाँ अवसर मिला।

बिस्मिल्ला ख़ाँ और रविशंकर—दोनों के कार्यक्रमों के शुरू होने का समय रात 9 बजे घोषित था। दोनों कार्यक्रम रात साढ़े 9 बजे के बाद शुरू हुए, यानी आधा घंटा देर से। यह बुरी बात है, और प्रायः हर जगह सभी कार्यक्रम देर से शुरू होते हैं; सिनेमा की बात अलग है। सिनेमा में लोग समय पर, बल्कि समय से पहले भी क्यों पहुँच जाते हैं? क्योंकि उन्हें पता है कि वहाँ उनका इंतज़ार नहीं किया जाएगा। क्या ऐसी स्थिति दूसरे कार्यक्रमों के लिए नहीं बनाई जा सकती? बनाई जा सकती है, और यह काम कार्यक्रम देने वालों को करना होगा, फिर आयोजक भी समय की पाबंदी के लिए मुस्तैद हो जाएँगे और लोग भी समय पर आएँगे।
रविशंकर ने अभी हाल में कहीं कहा था कि हिंदुस्तान में सभी चीजें देर से शुरू होती हैं। विदेशों में ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन की तुलना करते हुए उन्होंने कहा था कि वहाँ लोग समय पर आते हैं और कार्यक्रम के बीच में चहल-कदमी नहीं करते। ऐसी बात यहाँ भी होनी चाहिए। घोषित समय पर कार्यक्रम शुरू हो जाए और जो लोग देर से आएँ, उन्हें तब तक हॉल में न घुसने दिया जाए जब तक कार्यक्रम का एक अंश समाप्त न हो जाए। लेकिन इसकी पहल लोगों की तरफ़ से नहीं, कार्यक्रम देने वालों की ओर से होनी चाहिए।

बिस्मिल्ला ख़ाँ के कार्यक्रम में तो नहीं, लेकिन रविशंकर के कार्यक्रम में अंग्रेज़ी की गुलामी सहनी पड़ी। परदा उठने के पहले ही किसी काले अंग्रेज़ ने परदे के पीछे से अंग्रेज़ी में एक ऐलान किया, जिसका मतलब था कि अब आप रविशंकर का सितारवादन सुनेंगे। उसने रविशंकर के सुंदर नाम का उच्चारण भी बिगाड़ दिया—आख़िरी अक्षर “र” उड़ गया और उससे पहले का “क” कुछ लंबा खिंच गया, जैसे “रविशंका…”। फिर परदा खुला। रविशंकर मंच पर थे, बायीँ ओर अल्लारखा अपने तबले के साथ बैठे थे और इन दोनों के पीछे एक-एक तानपूरा वादक।

तालियाँ बजीं और रविशंकर तथा अल्लारखा ने बड़ी प्यारी अदा से अपने-अपने दोनों हाथ जोड़े। सितार के कानों को उमेठ-उमेठकर सितार मिलाया गया और तबले को सितार की संगत करने की तैयारी में हथौड़ी की चोटें और धौल खाने पड़े। जब यह सब हो गया तो रविशंकर ने माइक के पास जाकर अंग्रेज़ी में ऐलान किया कि अब आप राग हंसध्वनि सुनेंगे।
फिर हंसध्वनि सुनी गई। जब कार्यक्रम का दूसरा अंश शुरू होने लगा, तो ओमप्रकाश निर्मल ने मंच पर जाकर एक पुर्जी उनके सामने रखी।

पुर्जी में लिखा था:
“पंडितजी, आप हिंदुस्तान में हैं। यहाँ प्रायः सभी हिंदी समझते हैं, इसलिए कृपया हिंदी में बोलिए।”

रविशंकर ने सितार के कान उमेठते-उमेठते उस पुर्जी को आँखें फाड़-फाड़कर देखा। उनके तेवर बदले। कई भाव झलके—कुछ परेशानी के, कुछ गुस्से के, और शायद कुछ लज्जा के भी। लेकिन हम लोग अपनी गलती को झट से सुधार लेने के आदी नहीं हैं। अक्सर सवाल यह आ जाता है—ये कौन हैं हमें सिखाने वाले?—और इसी कारण हम उसी में पड़े सड़ते रहते हैं। सितार मिला लेने के बाद रविशंकर ने फिर अंग्रेज़ी में ही ऐलान किया कि अब आप मारु बिहाग सुनेंगे।

मारु बिहाग सुना। इसके बाद दस मिनट का अंतराल हुआ, जो खिंचते-खिंचते पंद्रह मिनट से भी आगे चला गया।
अंतराल में कल्पना के व्यवस्थापक भागीरथ शर्मा से किसी ने कहा कि देखिए, इस कवि महाराज ने जो पुर्जी पंडितजी को दी, वह अच्छा नहीं किया; पंडितजी बहुत नाराज़ हुए। और यह भी कि यहाँ कुछ अंग्रेज़ भी थे, जो हिंदी नहीं समझते, इसलिए अंग्रेज़ी में बोलना पड़ा। जहाँ तक पुर्जी देने का सवाल है, मैं समझता हूँ कि अपने-आप में यह एक साहसी काम की शुरुआत है। इसी तरह हम लोगों को इतना साहस जुटा लेना चाहिए कि किसी हिंदुस्तानी को किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में अंग्रेज़ी बोलने ही न दी जाए। उससे निवेदन किया जाए कि वह अंग्रेज़ी न बोले, उसे रोका जाए, टोका जाए; और फिर भी अगर वह अड़ जाए, तो हमें भी अड़ जाना चाहिए।

आज सिर्फ़ अंग्रेज़ी वाले मुखर हैं, बाकी मूक हैं; जबकि जो मूक हैं, वे जबरदस्त बहुमत में हैं। इस कार्यक्रम में जहाँ तक अंग्रेज़ों की उपस्थिति का सवाल है, तो शायद इन हज़रात को इस बात का पता नहीं था कि गोरी चमड़ी वाले सब अंग्रेज़ नहीं होते; और दरअसल वहाँ उपस्थित गोरी चमड़ी वाले लोग अंग्रेज़ नहीं थे।

समय की पाबंदी न करने की बुरी आदत और अंग्रेज़ी की गुलामी की अपमानजनक बात के अलावा अखरने वाली एक बात और थी। क्या यह ज़रूरी है कि हर कार्यक्रम किसी न किसी के—चाहे वह मंत्री ही क्यों न हो—सरपरस्ती में किया जाए? बिस्मिल्ला ख़ाँ के कार्यक्रम में आंध्र प्रदेश के एक मंत्री बैठे थे। अंतराल के बाद उनके कर-कमलों से बिस्मिल्ला ख़ाँ के गले में फूलों की माला डलवाई गई और फिर वे चले गए। उनकी रसज्ञता और कलामर्मज्ञता शायद इतनी ही थी।

रविशंकर के कार्यक्रम में वे आख़िर तक तो बैठे रहे, पर अपने पड़ोसी के साथ प्रायः लगातार चटर-पटर करते रहे। आंध्र प्रदेश नाट्य संघम के उपाध्यक्ष होने के नाते, जिसके तत्वावधान में रविशंकर का कार्यक्रम आयोजित किया गया था, उन्होंने रविशंकर, अल्लारखा और दोनों तानपूरा वादकों को पुष्पमालाएँ पहनाईं।

हिंदुस्तान में अब तक राजा और राजसत्ता के सामने कलाकार झुकता आया है। इस जनतंत्र में भी यह प्रथा चलती रही है और मंत्री, सत्ताधारी आदि के सामने कलाकार झुकता रहा है। जो जितना बड़ा मंत्री होता है, उसके सामने बड़े से बड़े कलाकार की कमर उतनी ही अधिक कमान बन जाती है। यह अशोभनीय है। इस बार बिस्मिल्ला ख़ाँ और रविशंकर—दोनों ने मंत्री के सामने अपनी कमर सीधी रखी और एक आदमी दूसरे को जो सहज सम्मान देता है, उतना ही सम्मान मंत्री को मिला; यही सर्वथा उचित और शोभनीय है।

फिर मंत्री-वंत्री व्यक्ति लोग हैं; बिस्मिल्ला ख़ाँ और रविशंकर जैसे लोग काल की सीमा तोड़कर रहने वाले लोग हैं। मुझे बहुत खुशी है कि झुकी हुई कमर की सामंती प्रथा को बिस्मिल्ला और रविशंकर ने तोड़ा। यही लोग उसे तोड़ सकते हैं।
अब शहनाई और सितार की बात।

बिस्मिल्ला ने यमन, पूर्वी और अंत में एक धुन सुनाई। बिस्मिल्ला के कार्यक्रम में लोग कम थे—शायद प्रचार ठीक से न हुआ, इसलिए—लेकिन जितने भी थे, वे शहनाई के रस में खूब भीगे। बिस्मिल्ला ने प्रत्येक राग का चरित्र, रूप, रंग और भाव खूब निखारा, सँवारा, और उसके स्वरों की अदा, भाव-भंगिमा और रस जिस तरह सहज खुलते हैं, उसी तरह उन्हें प्रस्तुत किया। राग और स्वर सशरीर, अपने पूरे शबाब के साथ आपके सामने ऐसे खड़े थे कि आप उन्हें निहारें, सराहें और आनंद लें।

अहा! कितना चैन था उन सबमें, कितनी अभिभूत कर देने वाली शक्ति थी उनमें कि भोंडे रविन्द्र भारती की तकलीफ़देह कुर्सियों और 103-104 डिग्री के तापमान की पीड़ा का भी रत्तीभर अनुभव नहीं हुआ। बिस्मिल्ला ख़ाँ और उनके साथियों ने जन-रंजन के लिए अपनी कला से कोई समझौता नहीं किया। जन-रुचि को परिष्कृत करने के उत्तरदायित्व के एहसास के साथ उन्होंने उच्च स्तर कायम रखा और उसी स्तर पर वे श्रोताओं को भी अपने साथ ले गए—इसमें दो राय नहीं हो सकतीं।

जिस तरह शहनाई और बिस्मिल्ला एक-दूसरे के पर्याय हैं, उसी तरह रविशंकर और सितार भी एक-दूसरे के पर्याय हैं। दोनों मेधावी हैं और दोनों ने ऐसी महान साधना की है कि संगीत को उनकी देन अपना विशिष्ट स्थान रखेगी। रविशंकर ने अपना कार्यक्रम हंसध्वनि से शुरू किया—एक-आध मिनट में अलाप, फिर जोड़, और फिर झट से गत। अफ़सोस हुआ कि इतना बड़ा कलाकार, शायद जन-रंजन के नाम पर, अपने स्तर से क्यों उतरा। इससे बेहतर हंसध्वनि तो उनकी रिकॉर्ड (ए.एल.पी. 1893) पर सुनी जा सकती है।

खैर, यह गिरावट यहीं नहीं रुकी। हंसध्वनि के बाद मारु बिहाग उन्होंने जो सुनाया, उसमें अलाप नदारद था; वे झट से गत पर आ गए। अलाप से राग का रूप, उसकी आत्मा, उसका रंग और उसके भाव प्रकट होते हैं, और तभी उसका वातावरण बनता है। जब यह सब नहीं था, तो जाहिर है बाकी बातें भी नहीं थीं। हंसध्वनि में कुछ कम, किन्तु मारु बिहाग सुनते समय ऐसा लगा कि कोई सुंदर मशीन चल रही है; फिर लगा जैसे कोई सार्वजनिक बस काला, बदबूदार धुआँ उड़ाती हुई निकल गई हो और वातावरण में धुआँ ठहर गया हो, घुटन होने लगी हो।

रविन्द्र भारती का भौड़ापन आँखों में किरकिरी पैदा करने लगा, वहाँ की तकलीफ़देह कुर्सियाँ पीड़ा देने लगीं और पीठ पर पसीने की धार बहने लगी। तबले की आवाज़ में हंसध्वनि और मारु बिहाग के स्वर डूब गए। लगा कि सितार बज ही नहीं रहा है, और सामने बैठा एक आदमी किसी चौड़ी पट्टी पर अपना बाँया हाथ ऊपर-नीचे नचा रहा है। यह सितार नहीं था, यह आदमी रविशंकर नहीं था। इसी से पीछे बैठे कुछ विदेशियों में से एक ने कहा कि “रविशंकर अब चुक गए हैं।” अंतराल के बाद उनकी कुर्सियाँ खाली थीं। तबले की आवाज़ में और सितार के इस सरकस में, अलबत्ता सामने बैठे मंत्रियों की घुसुर-पुसुर नहीं सुनाई दे रही थी।
अंतराल के बाद अल्लारखा ने अकेले तबला बजाया और रविशंकर ने हाथ से ताल दी। अच्छा था। फिर रविशंकर ने सोलहवीं सदी का एक राग—जोग—में अलाप और झाला बजाया, और इसके बाद पहाड़ी धुन। इन दोनों में रविशंकर ने चरित्र, रूप, रंग और भाव को खूब निखारा, विशेष रूप से जोग में। श्रोताओं को वे अपने साथ संगीत के मनोरम साम्राज्य में ले गए।

जोग में अलाप के समय वातावरण इतना निःशब्द था कि यदि ध्यान दें तो अपने दाएँ-बाएँ और आगे-पीछे बैठे लोगों की साँसों की आवाज़ भी सुनाई पड़ जाए। मंत्रियों की घुसुर-पुसुर, जो अब कुछ कम हो गई थी, कभी-कभी फिर सुनाई पड़ जाती थी। पहाड़ी धुन बजाते समय तबले की ताल और सितार के स्वरों में तालमेल था; ताल और स्वर का व्यक्तित्व अलग-अलग दिखाई दे रहा था। रविशंकर ने जोग और पहाड़ी धुन खूब डूबकर, बड़े चैन से बजाया और श्रोताओं को गहराई तक अपने साथ ले गए।
अंत में एक बात और। बढ़त में झटके लग रहे थे, क्रमिक बढ़त नहीं थी। यानी ऐसा नहीं लगता था कि आप एक लहर के बाद दूसरी तेज़ लहर में पहुँचे हैं; बल्कि ऐसा लगता था कि एक लहर के बाद चौथी या पाँचवीं तेज़ लहर में झटके से पहुँचा दिया गया है। समय की सीमा शायद इसका कारण हो।


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