— रामबाबू अग्रवाल —
अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच जारी युद्ध की आग पश्चिमी एशिया तक फैल चुकी है। यदि यह युद्ध जल्दी नहीं रुका, तो विश्व युद्ध के खतरे की जो आशंका पहले थी, उसके टलने के अब कुछ बेहतर संकेत दिखाई दे रहे हैं। इसका कारण यह है कि 28 फरवरी को ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद से युद्ध को एक माह से अधिक हो गया है, और ईरान के न झुकने से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मकसद पूरे नहीं हो सके हैं। हालांकि, वे कह रहे हैं कि उन्होंने ईरान को तबाह कर दिया और उसके कई बड़े नेताओं को मार गिराया है।
ट्रंप का अमेरिका में ही लाखों लोगों ने विरोध किया है। अमेरिका पर कर्ज का बोझ बढ़ा है और वहां के लोग भी महंगाई से त्रस्त हैं। ट्रंप स्वयं अब इस युद्ध से बाहर निकलना चाहते हैं। नाटो और अन्य देश भी उनका साथ नहीं दे रहे हैं। इधर ब्रिटेन ने भी 35 देशों को साथ लेकर शांति से समाधान निकालने की तैयारी शुरू कर दी है। युद्धविराम की तमाम कोशिशें जारी हैं। ऐसे में अब विश्व युद्ध जैसे खतरे की आशंका पहले जैसी नहीं रह गई है।
मार्च-अप्रैल 2026 की भू-राजनीतिक स्थितियों के अनुसार, ईरान-इज़रायल और अमेरिका के बीच चल रहा संघर्ष विश्व युद्ध के करीब पहुंचने की आशंका पैदा कर रहा था, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह सीधे तौर पर तीसरे विश्व युद्ध में बदलने के बजाय एक “लंबा, भीषण क्षेत्रीय युद्ध” बनने की संभावना अधिक रखता है। हालांकि, परमाणु खतरे और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव बेहद विनाशकारी हो सकते हैं। वर्तमान में बड़ी महाशक्तियां, जैसे रूस और चीन, सीधे तौर पर इस संघर्ष में नहीं उतरी हैं। यह संघर्ष मुख्य रूप से अमेरिका-इज़रायल बनाम ईरान और उसके प्रॉक्सी, जैसे हिज़्बुल्लाह आदि, के बीच है।
क्षेत्रीय विस्तार का खतरा अवश्य बना हुआ है। यह युद्ध क्षेत्रीय स्तर पर बेहद खतरनाक हो गया है, जिसमें ईरान द्वारा बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है। अगर ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को नहीं खोलता, तो यह वैश्विक संकट को जन्म दे सकता है, और अब तो ईरान वहां टोल भी लगा रहा है। वैसे परमाणु और रासायनिक खतरा भी बना हुआ है। विशेषज्ञों ने चेताया है कि अगर इज़रायल ईरान की परमाणु सुविधाओं को निशाना बनाता है, तो यह एक ‘चेरनोबिल’ जैसी स्थिति पैदा कर सकता है, जो पूरे गल्फ क्षेत्र को प्रभावित करेगी।
गुरुवार, 2 अप्रैल को अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के राष्ट्र के नाम संबोधन में भी उन्होंने युद्धविराम पर कोई निश्चित बात नहीं की। उन्होंने केवल यही कहा कि होर्मुज से उन्हें तेल की जरूरत नहीं है, और जिन्हें जरूरत है, वे इसे खुलवाएं। वैसे ईरान के साथ बातचीत की भी खबरें हैं, और ईरान यह गारंटी चाहता है कि उस पर फिर हमले न हों। ऐसे में यदि विभिन्न देश अमेरिका और इज़रायल से ऐसा कराने में सफल होते हैं, तो भी विश्व युद्ध का संभावित संकट टल सकता है।
पर भारत में इसके असर से व्यापारी जगत में परेशानियां बढ़ गई हैं। कई व्यापारियों के माल सिंगापुर पोर्ट पर रोक दिए गए हैं। आगे भेजने के लिए अधिक भाड़ा मांगा जा रहा है, अन्यथा भेजा हुआ माल खराब होने की आशंका है। दाल उद्योग, दवा उद्योग और प्लास्टिक उद्योग पर खतरा बढ़ गया है। इसी तरह आयात की वस्तुएं भी अटकी हुई पड़ी हैं। भविष्य में सही योजना बनाने की आवश्यकता है। हर क्षेत्र के व्यापारियों और उद्योगपतियों के साथ केंद्र सरकार का संवाद ही भारत के उद्योगों को राहत प्रदान कर सकेगा।
इधर गैस की तंगी के कारण हजारों छोटे-मोटे दुकानदार बंद हो गए हैं। कमर्शियल टंकियां भी ठीक तरीके से नहीं मिल रही हैं। ऐसे में यह युद्ध इन समस्याओं को किस स्तर तक ले जाएगा, यह एक विचारणीय विषय है।
Discover more from समता मार्ग
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

















