विश्वविद्यालय कैंपसों में घटती बहसें

0
JNU

Parichay Das

— परिचय दास —

भी विश्वविद्यालयों की पहचान केवल उनकी इमारतों, विभागों और परीक्षाओं से नहीं होती थी। उनकी पहचान उन आवाज़ों से होती थी जो पेड़ों की छाया के नीचे, छात्रावासों के बरामदों में, पुस्तकालय की सीढ़ियों पर और चाय की दुकानों के आसपास देर रात तक गूँजती रहती थीं। वे आवाज़ें बहस की थीं। वे जिज्ञासा की थीं। वे अपने समय से जूझते हुए युवा मनों की थीं। किसी भी जीवंत कैंपस का सबसे सुंदर दृश्य उसका परिसर नहीं होता था बल्कि उसके भीतर चलती हुई विचारों की आवाजाही होती थी।

आज जब किसी विश्वविद्यालय~परिसर से होकर गुजरें तो उनमें कभी-कभी एक अजीब-सी खामोशी उतर आती है। इमारतें पहले से अधिक भव्य हैं। सूचनाएँ पहले से अधिक उपलब्ध हैं लेकिन विचारों की वह चहल-पहल जो कभी विश्वविद्यालयों की आत्मा हुआ करती थी, जैसे धीरे-धीरे पीछे हट गई है। ऐसा नहीं कि लोग बोलते नहीं हैं। लोग पहले से अधिक बोलते हैं। मंच अधिक हैं। माध्यम अधिक हैं। स्क्रीन अधिक हैं पर संवाद कम हैं। बहसें कम हैं , विचारों का धैर्य कम है।

कैंपसों में घटती बहसें केवल एक शैक्षणिक घटना नहीं हैं। यह हमारे समय की सांस्कृतिक कथा का एक अध्याय है। बहस का अर्थ केवल किसी विषय पर मतभेद प्रकट करना नहीं होता। बहस मनुष्य को उसके भीतर की सीमाओं से बाहर निकालती है। वह उसे यह सिखाती है कि सत्य एक ही दिशा से दिखाई नहीं देता। वह अनेक खिड़कियों से झाँकता है। बहस वह कला है जिसमें मनुष्य अपने विचारों को दूसरों के विचारों के सामने रखता है और फिर स्वयं को भी नए सिरे से देखने लगता है।

पुराने विश्वविद्यालयों की स्मृतियों में बहसें किसी उत्सव की तरह दर्ज हैं। छात्र राजनीति के अपने पक्ष-विपक्ष रहे होंगे, वैचारिक टकराव भी रहे होंगे, लेकिन उन सबके बीच विचारों के प्रति एक गंभीरता थी। छात्र किसी पुस्तक को पढ़कर मित्रों के बीच घंटों चर्चा करते थे। किसी कविता, किसी उपन्यास, किसी राजनीतिक घटना या किसी दार्शनिक प्रश्न पर लंबी बातचीत होती थी। मतभेद होते थे, कभी-कभी तीखे भी होते थे, पर विचारों का सम्मान बना रहता था।

अब समय बदल गया है। सूचना ने ज्ञान का स्थान लेना शुरू कर दिया है। त्वरित प्रतिक्रियाओं ने चिंतन की जगह घेर ली है। लोग किसी विषय पर विचार करने से पहले उसके बारे में अपनी राय घोषित कर देना चाहते हैं। बहस की प्रक्रिया धैर्य माँगती है। वह सुनने की क्षमता माँगती है। वह यह स्वीकार करने का साहस माँगती है कि संभव है दूसरा व्यक्ति भी आंशिक रूप से सही हो। लेकिन हमारा समय निश्चितताओं का समय है। यहाँ लोग प्रश्नों से अधिक उत्तरों के साथ आते हैं।

विश्वविद्यालयों में यह परिवर्तन और भी स्पष्ट दिखाई देता है। छात्र अब पहले से अधिक व्यस्त हैं। प्रतियोगी परीक्षाएँ हैं। रोजगार की चिंताएँ हैं। प्रमाणपत्रों की दौड़ है। शोध की औपचारिकताएँ हैं। रैंकिंग की संस्कृति है। जीवन एक ऐसी पटरी पर दौड़ रहा है जहाँ ठहरकर बातचीत करने के लिए समय निकालना कठिन होता जा रहा है। चाय की वह छोटी-सी दुकान, जहाँ कभी दुनिया बदलने की योजनाएँ बनती थीं, अब कई बार केवल मोबाइल चार्ज करने और जल्दी-जल्दी चाय पी लेने की जगह बनकर रह जाती है।

मोबाइल फोन ने मनुष्य को संसार से जोड़ा है लेकिन उसने उसके आसपास बैठे मनुष्यों से उसका संबंध कुछ कम भी किया है। एक ही मेज पर बैठे पाँच छात्र पाँच अलग-अलग स्क्रीन में डूबे रहते हैं। वे जुड़े हुए दिखाई देते हैं पर संवादरत नहीं होते। उनकी उँगलियाँ सक्रिय होती हैं पर विचारों का सामूहिक प्रवाह कहीं रुक-सा जाता है। विश्वविद्यालय के गलियारों में अब भी भीड़ है लेकिन भीड़ हमेशा संवाद का पर्याय नहीं होती।

बहसें केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं होतीं। वे लोकतंत्र का अभ्यास भी होती हैं। जो समाज बहस करना भूल जाता है, वह धीरे-धीरे सुनना भी भूल जाता है। और जो सुनना भूल जाता है, वह समझना भी भूल जाता है। विश्वविद्यालय किसी भी समाज के बौद्धिक प्रशिक्षण केंद्र होते हैं। यदि वहाँ बहस की संस्कृति कमजोर पड़ती है, तो उसका प्रभाव केवल कैंपस तक सीमित नहीं रहता। वह समाज की समग्र वैचारिक संरचना को प्रभावित करता है।

विचार~विमर्श ज्ञान-परंपरा की प्रगति से ही संभव होती है। भारतीय चिंतन की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उसका वाद-विवाद का इतिहास रहा है। उपनिषदों से लेकर बौद्ध संघों तक, शंकराचार्य से लेकर मंडन मिश्र तक, भारत का बौद्धिक जीवन संवाद और प्रतिवाद की परंपरा पर विकसित हुआ। प्रश्न पूछना यहाँ ज्ञान का शत्रु नहीं, उसका आरम्भ माना गया।

कैंपसों की बहसें केवल राजनीति तक सीमित नहीं थीं। वे साहित्य, संगीत, सिनेमा, समाज, इतिहास, भाषा और जीवन के अनेक प्रश्नों से जुड़ी होती थीं। एक कविता पर बहस करते-करते लोग मनुष्य की नियति तक पहुँच जाते थे। एक फिल्म पर चर्चा करते-करते समाज की संरचना तक पहुँच जाते थे। विश्वविद्यालय का अर्थ ही था कि वहाँ हर विचार को सुनने और परखने की जगह होगी।

आज कई छात्र पढ़ते बहुत हैं पर बातचीत कम करते हैं। वे सामग्री एकत्र करते हैं लेकिन विचारों का साझा संसार कम बनाते हैं। यह स्थिति किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे समय की है। डिजिटल माध्यमों ने ज्ञान को लोकतांत्रिक बनाया है पर उन्होंने विचारों को कभी-कभी एकांत का कैदी भी बना दिया है। मनुष्य अब अपने जैसे विचारों के बीच अधिक रहता है। विरोधी विचारों से उसका सामना कम होता है। परिणामस्वरूप बहस की जगह पुष्टि का सुख बढ़ता जाता है।

विश्वविद्यालयों में आज भी ऐसे छात्र हैं जो पुस्तकालयों में बैठकर देर रात तक पढ़ते हैं। ऐसे शोधार्थी हैं जो कठिन प्रश्नों से जूझते हैं। ऐसे शिक्षक हैं जो अपने विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करते हैं। ऐसी छोटी-छोटी मंडलियाँ आज भी बनती हैं जहाँ कविता पढ़ी जाती है, किताबों पर चर्चा होती है, समाज और इतिहास पर विचार किया जाता है। शायद इन्हीं छोटे प्रकाश-बिंदुओं में भविष्य की संभावनाएँ छिपी हुई हैं।

बहसों का पुनर्जागरण के लिए जिज्ञासा को पुनर्जीवित करना होगा। विद्यार्थियों को यह विश्वास लौटाना होगा कि प्रश्न पूछना भी एक रचनात्मक कर्म है। विश्वविद्यालयों को फिर से ऐसे खुले बौद्धिक स्थल बनना होगा जहाँ विचारों को भय नहीं, स्वतंत्रता मिले। जहाँ असहमति को दुश्मनी न समझा जाए। जहाँ सुनना और बोलना दोनों बराबर महत्त्व रखते हों।

जब किसी कैंपस में बहसें जीवित होती हैं, तब वहाँ केवल ज्ञान का उत्पादन नहीं होता, वहाँ नागरिकता का निर्माण भी होता है। वहाँ मनुष्य अपने समय को समझना सीखता है। वहाँ वह दूसरों के अनुभवों के प्रति संवेदनशील बनता है। वहाँ वह यह जानता है कि दुनिया को बदलने से पहले उसे समझना आवश्यक है।

कभी-कभी मुझे लगता है कि विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी इमारत पुस्तकालय नहीं, बहस है। सबसे बड़ा विभाग संवाद है। सबसे बड़ी डिग्री जिज्ञासा है। और सबसे बड़ा शोध मनुष्य को समझने का प्रयास है। जब तक ये जीवित हैं, तब तक किसी भी विश्वविद्यालय की आत्मा जीवित है।

कैंपसों में घटती बहसों की चिंता दरअसल शब्दों की चिंता नहीं है। यह उस भविष्य की चिंता है जिसमें मनुष्य प्रश्न पूछने का साहस खो सकता है। बहसें केवल तर्क नहीं रचतीं, वे मनुष्य को विनम्र बनाती हैं। वे बताती हैं कि दुनिया हमारी कल्पना से कहीं अधिक जटिल और कहीं अधिक सुंदर है। इसलिए जब भी किसी विश्वविद्यालय के किसी कोने में कुछ विद्यार्थी किसी पुस्तक, किसी कविता, किसी विचार या किसी स्वप्न पर चर्चा करते दिखाई दें, तो समझ लेना चाहिए कि वहाँ शिक्षा अभी जीवित है, और उसके साथ भविष्य की एक छोटी-सी लौ भी।

एक समय था, जब विश्वविद्यालयों की दीवारों पर केवल सूचनाएँ नहीं चिपकी होती थीं, वहाँ विचारों की गर्मी भी चिपकी होती थी। नोटिस बोर्ड किसी जीवित संवाद की तरह दिखाई देते थे। किसी संगोष्ठी की सूचना , किसी कविता-पाठ का निमंत्रण, किसी पुस्तक-चर्चा की घोषणा आदि सब मिलकर परिसर को एक बौद्धिक उत्सव में बदल देते थे। आज सूचना अधिक है पर वह जीवंत प्रतीक्षा कम है जिसके कारण विद्यार्थी किसी विचार-गोष्ठी के आरम्भ होने से पहले ही वहाँ पहुँच जाते थे। प्रतीक्षा करते थे।

बहसों के क्षीण होने के साथ भाषा का भी एक प्रकार का क्षरण हुआ है। बहसें मनुष्य को शब्दों का संयम सिखाती हैं। वे उसे अपने विचारों को व्यवस्थित करने की कला देती हैं। जब संवाद घटता है तो भाषा भी संक्षिप्त होती जाती है। वह तर्क की जगह संकेतों में, विचार की जगह प्रतिक्रियाओं में बदलने लगती है। विश्वविद्यालयों में बहसों का कम होना इसलिए भी चिंता का विषय है कि इसके साथ अभिव्यक्ति की परिपक्वता भी प्रभावित होती है।

कैंपस का जीवन केवल पाठ्यक्रम से नहीं बनता। उसका एक अनौपचारिक पाठ्यक्रम भी होता है जो मित्रताओं, चर्चाओं, असहमतियों और साझा अनुभवों से निर्मित होता है। अनेक बार विद्यार्थी अपने शिक्षकों से जितना नहीं सीखते, उससे कहीं अधिक अपने सहपाठियों से सीखते हैं। बहसें इसी अनौपचारिक विश्वविद्यालय की कक्षाएँ होती हैं। इनके बिना शिक्षा का अनुभव कहीं अधिक यांत्रिक और अधूरा हो जाता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि बहसों का अभाव केवल विद्यार्थियों की समस्या नहीं है। शिक्षकों की व्यस्तताएँ भी बढ़ी हैं। प्रशासनिक कार्य, रिपोर्टें, मूल्यांकन, ऑनलाइन प्रक्रियाएँ और निरंतर बढ़ती औपचारिकताएँ उन्हें भी उस मुक्त बौद्धिक वातावरण से दूर ले गई हैं जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी एक साथ बैठकर किसी प्रश्न पर विचार कर सकें। विश्वविद्यालय तब सबसे सुंदर होता है जब शिक्षक केवल अध्यापक नही बल्कि सहयात्री की तरह उपस्थित हो।

बहसें कल्पना को भी विस्तृत करती हैं। जब हम किसी भिन्न विचार वाले व्यक्ति को सुनते हैं, तब हम अपने अनुभवों की सीमाओं से बाहर निकलते हैं। विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल विशेषज्ञ तैयार करना नहीं होता, बल्कि ऐसे मनुष्य तैयार करना भी होता है जिनकी दृष्टि व्यापक हो। बहसें इसी व्यापकता का अभ्यास कराती हैं। वे हमें सिखाती हैं कि दुनिया केवल हमारी दृष्टि से नहीं बनी है।

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, एल्गोरिद्म और डिजिटल माध्यमों के समय में विश्वविद्यालयों के सामने एक नई चुनौती है। ज्ञान का बड़ा हिस्सा स्क्रीन पर उपलब्ध है लेकिन विवेक किसी वेबसाइट से डाउनलोड नहीं किया जा सकता। वह संवाद से पैदा होता है। वह प्रश्नों और प्रतिप्रश्नों से विकसित होता है। वह बहस की भट्ठी में पककर परिपक्व होता है। इसलिए भविष्य के विश्वविद्यालयों को तकनीक और संवाद के बीच संतुलन बनाना होगा।

किसी भी कैंपस की वास्तविक समृद्धि उसके भवनों की ऊँचाई से नहीं मापी जा सकती। उसका मूल्य इस बात से तय होता है कि वहाँ कितने प्रश्न जन्म लेते हैं, कितनी जिज्ञासाएँ संरक्षित होती हैं और कितनी असहमतियों को सम्मान मिलता है। जहाँ प्रश्न मर जाते हैं, वहाँ ज्ञान धीरे-धीरे अनुष्ठान में बदलने लगता है। जहाँ बहसें जीवित रहती हैं, वहाँ शिक्षा निरंतर पुनर्जन्म लेती रहती है।

शायद आने वाले समय में विश्वविद्यालयों को फिर से अपने पेड़ों, अपने बरामदों, अपने पुस्तकालयों और अपनी चाय की दुकानों की ओर लौटना होगा। वहीं कहीं संवाद की वह खोई हुई नदी अब भी सूक्ष्म रूप से बह रही है। आवश्यकता केवल उसे सुन पाने की है। जब वह फिर से प्रवाहित होगी, तब कैंपस केवल अध्ययन के स्थल नहीं रहेंगे, वे विचारों के उत्सव और लोकतांत्रिक चेतना के सबसे सुंदर उद्यान बन सकेंगे।


Discover more from समता मार्ग

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Comment