— गौतम कुमार —
उत्तर भारत गंगा, यमुना, घाघरा, गंडक, कोसी और ब्रह्मपुत्र जैसी महान नदियों का बसेरा है। इन नदियों से करोड़ों लोगों की स्मृतियाँ, सभ्यताएँ, संस्कृतियाँ और परंपराएँ जुड़ी हुई हैं। इनके किनारों पर मानव सभ्यता ने आकार लिया, कृषि फली-फूली और जीवन की अनगिनत धाराएँ विकसित हुईं। केवल मनुष्य ही नहीं, असंख्य जीव-जंतुओं और वनस्पतियों का जीवन भी इन नदियों पर निर्भर रहा है।
विडंबना यह है कि जीवनदायिनी ये नदियाँ आज स्वयं अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए मानो गुहार लगा रही हैं। लेकिन हम अपने स्वार्थ और अंधे विकास की दौड़ में उनकी कराह को अनसुना करते जा रहे हैं। विकास के नाम पर नदियों के प्राकृतिक मार्गों को बाधित किया गया, बाढ़ के मैदानों पर अतिक्रमण हुआ और जलधाराओं को संकुचित कर दिया गया। परिणामस्वरूप, बाढ़ जैसी स्वाभाविक प्राकृतिक प्रक्रिया को हमने एक भयावह आपदा में बदल दिया।
हजारों वर्षों तक नदियाँ अपनी स्वाभाविक गति और मार्ग से बहती रहीं। वे जीवन, उर्वरता और समृद्धि का आधार थीं; बाढ़ भी प्रकृति के संतुलन का हिस्सा थी, अभिशाप नहीं। किंतु आज हमने उनकी राहों को अवरुद्ध कर, उनके प्रवाह को बाँधकर और उनके प्राकृतिक विस्तार को सीमित कर उन्हें विनाशकारी बनने के लिए विवश कर दिया है।
इन्हीं नदियों ने लाखों लेखकों, कवियों और कलाकारों की कल्पना को प्रेरित किया है। करोड़ों लोगों ने इनके तटों पर अपने सुख-दुख साझा किए, गीत गाए, आस्था व्यक्त की और जीवन के उत्सव मनाए। नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं हैं; वे हमारी सभ्यता की स्मृति, संस्कृति की वाहक और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की आधारशिला हैं।
लेकिन आज जिस विकास मॉडल को आधुनिकता का पर्याय बताया जा रहा है, वह नदियों को जीवित पारिस्थितिकी तंत्र के बजाय केवल जल संसाधन या निर्माण योग्य भूमि के रूप में देखने लगा है। नदियों के बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन) पर शहर बसाए जा रहे हैं, तटबंधों को ही स्थायी समाधान मान लिया गया है, अनियंत्रित बालू खनन से नदी तल का स्वरूप बदल रहा है, आर्द्रभूमियाँ (वेटलैंड) समाप्त हो रही हैं और सहायक नदियों तथा प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को पाटकर सड़कें, कॉलोनियाँ और औद्योगिक परियोजनाएँ खड़ी की जा रही हैं। इसका सीधा प्रभाव यह होता है कि नदी के पास फैलने की स्वाभाविक जगह नहीं बचती और बाढ़ का पानी सीमित क्षेत्र में अधिक विनाशकारी रूप ले लेता है।
विशेषज्ञ लंबे समय से यह बताते रहे हैं कि केवल तटबंध बनाना बाढ़ का स्थायी समाधान नहीं है। अनेक अध्ययनों में पाया गया है कि तटबंधों के भीतर गाद (सिल्ट) जमा होने से नदी तल धीरे-धीरे ऊँचा होता जाता है। जब अत्यधिक वर्षा या अधिक जल प्रवाह होता है, तो तटबंध टूटने या ऊपर से पानी बहने की स्थिति में तबाही पहले से कहीं अधिक होती है। दूसरी ओर, जहाँ नदी को उसका प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र उपलब्ध रहता है, वहाँ जल का दबाव अपेक्षाकृत कम होता है और भूजल का पुनर्भरण भी बेहतर ढंग से होता है।
हिमालयी नदियों के संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वे बड़ी मात्रा में गाद लेकर आती हैं। यह गाद उत्तर भारत के मैदानी इलाकों की उर्वरता का आधार रही है। किंतु जब नदी के प्रवाह को कृत्रिम रूप से सीमित कर दिया जाता है, तो यही गाद नदी के भीतर जमा होने लगती है, जिससे जलधारण क्षमता घटती है और बाढ़ का जोखिम बढ़ जाता है। इसलिए केवल नदी को नियंत्रित करने की सोच पर्याप्त नहीं है; उसके पूरे जलग्रहण क्षेत्र, सहायक नदियों, जंगलों और आर्द्रभूमियों को एक साथ समझना आवश्यक है।
जलवायु परिवर्तन ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है। कम समय में अत्यधिक वर्षा, अनियमित मानसून और हिमालयी क्षेत्रों में बदलते मौसम के कारण नदियों के प्रवाह का स्वरूप बदल रहा है। यदि ऐसे समय में हम नदियों के प्राकृतिक मार्ग और बाढ़ क्षेत्रों को और अधिक बाधित करेंगे, तो आपदाओं की तीव्रता बढ़ने की आशंका भी बढ़ेगी।
समाधान नदियों से लड़ने में नहीं, उनके साथ जीने की संस्कृति को पुनर्जीवित करने में है। इसके लिए आवश्यक है कि बाढ़ क्षेत्रों पर अनियंत्रित निर्माण रोका जाए, आर्द्रभूमियों और प्राकृतिक जल निकासी तंत्र का संरक्षण किया जाए, अवैध बालू खनन पर प्रभावी रोक लगे, नदी तटों पर स्थानीय वनस्पतियों का पुनरोपण हो, नदी बेसिन स्तर पर वैज्ञानिक योजना बनाई जाए और स्थानीय समुदायों, किसानों तथा मछुआरों को नदी प्रबंधन में भागीदार बनाया जाए।
नदी को केवल इंजीनियरिंग परियोजना नहीं, बल्कि एक जीवित पारिस्थितिक तंत्र मानना होगा। जब तक विकास का अर्थ केवल कंक्रीट, तटबंध और निर्माण रहेगा, तब तक बाढ़ को पूरी तरह नियंत्रित करना संभव नहीं होगा। विकास का वास्तविक अर्थ यह होना चाहिए कि मनुष्य, नदी और प्रकृति—तीनों के बीच संतुलन बना रहे।
यदि हम नदियों को उनका स्वाभाविक प्रवाह, उनका बाढ़ क्षेत्र और उनका सम्मान लौटा सकें, तो बाढ़ भी विनाश का नहीं, जीवन के पुनर्निर्माण का माध्यम बन सकती है। नदियों को बचाना केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं है; यह कृषि, अर्थव्यवस्था, संस्कृति, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व का प्रश्न है। सभ्यताएँ नदियों के किनारे जन्म लेती हैं, लेकिन जब नदियाँ संकट में पड़ती हैं, तो सभ्यताएँ भी सुरक्षित नहीं रह पातीं।
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