जसवंत खालड़ा की याद – अरविंद मोहन

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Jaswant Khalda


फिल्म ‘सतलज’ पर प्रतिबंध के बाद मानवाधिकार कार्यकर्त्ता जसवंत सिंह खालड़ा आज फिर चर्चा में हैं तो रह रहकर उनसे जुड़ी यादें जोर मार रही हैं। स्वर्ण मंदिर पर सैनिक कार्रवाई को गलत मानने और तब उससे हुए नुकसान को लेकर बेचैन अपने जैसे करीब सात आठ साथियों के साथ मैं जब अमृतसर गया था तब उनसे पहली मुलाकात हुई। मैं उन दिनों जनसत्ता में ट्रेनी था और बिना बताए भागकर गया था। ट्रेनी को छुट्टी मिलती न थी और इस काम के लिए छुट्टी मांगने का सवाल न था। उन दिनों समता संगठन का काम करता था और हमारे समेत कुछ नक्सल जमात ही खुलकर इस कार्रवाई के खिलाफ बोल रहे थे। अमृतसर जाने के पहले कुलदीप नैयर और प्रो. रणधीर सिंह से कुछ मददगार नाम पूछे थे तो नाटककार गुरशरन सिंह का नाम बार बार आया। उन्होंने हमें रेलवे स्टेशन के बाहर स्थित सराय में रुकने और सरदार मोता सिंह जी से मिलने को कहा। मोता सिंह कभी कम्युनिष्ट पार्टी के जिला सचिव रहे थे और तब राईस मिल लगाकर व्यवसायी बन चुके थे। लेकिन उनकी सक्रियता और पहचान बहुत थी और सारे अखबार वालों के लिए उनका घर एक बड़ा केंद्र था। उनकी शिकायत टाइम्स आफ इंडिया के सुभाष किरपेकर को लेकर बहुत थी क्योंकि वे बात करके कोई जाते थे और अखबार में छपता उल्टा था। जनसता नया था लेकिन उसका नाम बहुत हो गया था।

मोता सिंह जी के यहां ही हमारी मुलाकात जसवंत खालड़ा और गोपाल सिंह जैसे दो बहुत ही मददगार कार्यकर्त्ताओं से हुई जो दोनों तक एमएल विचारधारा वाले थे लेकिन उनका समूह स्पष्ट न था। गोपाल सिंह ने बाल कटा लिए थे लेकिन उन दिनों पाग से सिर ढके रहते थे। उनका बाद का पता नहीं रहा लेकिन जसवंत खालड़ा से की मुलाकातें अगले कई वर्षों में हुईं जो तब आर् पी सर्राफ गुट में सक्रिय हो गए थे-प्रोलीतेरियत पार्टी के नाम से। इन दोनों लोगों ने हमें अमृतसर घुमाया, भिंडरांवाले की मौत संबंधी अफवाहों की सच्चाई परखने का स्थान दिखाया, स्वर्णमन्दिर दिखाया, श्मसान दिखाया, पंजाब घुमाया। हम आम सिख में हुई प्रतिक्रिया जानने के लिए गाँव जाना चाहते थे तो जसवंत हमें अपने खालड़ा गाँव भी ले गए जिसके तब वे संभवत: प्रधान थे।

हम दसेक लोग अमृतसर से उनके गाँव चले तो बार बार चेकिंग से गुजरना पड़ा और उनका साथ होने से सुविधा हुई। उनकी शादी कुछ समय पहले ही हुई थी और उनकी पत्नी गुरु नानकदेव विश्वविद्यालय में लाइब्रेरी में लग गई थीं। वे भी हमारे साथ आईं। घर में वही दो थे लेकिन शादी का नया घर होने से नए गद्दे रजाई की भरमार थी और हमें सोने में कोई तकलीफ नहीं हुई। जब हम खालड़ा बार्डर देखने और गाँव वालों से बात करने गए तो भाभी एकाध पड़ोसियों और हमारे साथ गई दीप्ति मल्होत्रा जैसे कुछ लोगों के सहयोग से पराँठे बनाती रही। दीप्ति बाद में काफी नाराज भी रही कि हम मर्दों को इस तरह की तकलीफ का ध्यान ही नहीं रहता। खैर हम लौटे और प्रतिपक्ष में रिपोर्ट लिखी। मंगलेश जी ने जनसत्ता के लिए लिखवाया पर जाने क्यों नहीं छापा।

फिर मैं इंडिया टुडे हिन्दी में आ गया। एक दिन अपने नेता किशन पटनायक के निर्देश पर मुझे जयपुर में होने वाले प्रोलीतेरियत पार्टी के अधिवेशन में समता संगठन या तब तक बन गए समाजवादी जन परिषद का प्रतिनिधि बनकर जाना पड़ा। वहां जसवंत खालड़ा से भेंट हुई और फिर दुनिया भर के विषयों पर खूब चर्चा हुई। उनके नेता सर्राफ साहब से हमारा एक रिश्ता यह भी था की उनके पुत्र हमारे साथ इंडिया टुडे में काम करते थे और उनसे काफी बातचीत ऑम् प्रकाश के घर पर भी हुई थी। वे पहुंचे हुए चिंतक थे।

जसवंत खालड़ा एक बार हमारे इंडिया टुडे दफ्तर भी आए-दिल्ली आने पर मिलने की इच्छा हुई और आ गए। तब वे पुलिस द्वारा झूठे इंकाउंटर और गुम हुए लोगों की संख्या को लेकर काफी चिंता दिखाते रहे। वे इस काम को इतना जुनून से करेंगे यह तब अंदाजा न हुआ था। लेकिन जिन लोगों द्वारा काम करने का जिक्र उन्होंने किया उसमें एक आदमी की पृष्ठभूमि को लेकर मैं काफी शक सुबहे में रहा। खैर। बाद में खुद उनके ही गुम होने की खबर आई। उनकी पत्नी ने जब सुप्रीम कोर्ट में अर्जी डाली तब यह मामला चर्चा में आया।

अपने लिए आधी सक्रियता और आधी ईमानदारी के काम का जो रास्ता चुना है उसे लेकर कई बार अफसोस रहा-कैरियर के हिसाब से नहीं, राजनैतिक सक्रियता के मौकों पर चुप रहने की मजबूरी के चलते। कह नहीं सकता कि जसवंत का मामला भी वैसा ही था क्योंकि उनसे मतभेद के काफी मुद्दे थे-जुड़ाव के तो थे ही। लेकिन इस बड़े मुद्दे पर यह आदमी अपनी जान की बाजी लगाने जा रहा है इसका जरा भी अंदाजा न था। उनकी स्मृति को नमन।


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