महापंडित राहुल सांकृत्यायन को जो नहीं समझ सकता, वह भारत को कैसे समझ सकता है?

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How can someone who cannot understand Mahapandit Rahul Sankrityayan understand India?

– डॉक्टर राजेंद्र रंजन चतुर्वेदी —

कोई बालबुद्धि व्यक्ति भारत ब्रांड की टॉफी चूस लेता है, फिर उसे अपनी जेब में रख लेता है, फिर निकालकर दोबारा चूसता है और फिर जेब में रख देता है। वह मन ही मन प्रसन्न है कि मेरी जेब में जो रखा है, वही भारत है। बालक भगवान है, उसकी अपनी समझ है।

आज कितनी ही कंपनियाँ अपने उत्पादों के ब्रांड के रूप में भारत नाम का उपयोग करती हैं। उनके लिए उनका उत्पाद ही भारत है। अनेक अखबारों के नाम में भारत शब्द है; उनके लिए वही भारत है। बहुत से व्यक्तियों का नाम भी भारत है, और उनके परिवेश में वही व्यक्ति भारत का प्रतीक बन जाता है। कृष्ण द्वैपायन व्यास ने जिस महाकाव्य की रचना की, उसका एक नाम भी भारत है। किसी के लिए धरती के एक भूखंड का नाम भारत है। भारत शब्द सुनते ही वह केवल धरती, उसकी मिट्टी, भौगोलिक नक्शे और राजनीतिक सीमाओं को ही भारत मान लेता है।

कोई भी माता तभी माता होती है, जब उसकी संतान हो। संतान के बिना माता की कल्पना ही बाँझ है। भारत माता केवल भूमि नहीं है; उस भूमि पर जीने वाले करोड़ों-करोड़ों जन ही भारत हैं। वे घोषणा करते हैं— “पुत्रोऽहम् पृथिव्याः”। वे असंख्य जन अपनी धरती के साथ मिलकर भारत का निर्माण करते हैं।

लेकिन यह बात भी तब तक अधूरी है, जब तक उन करोड़ों लोगों के जीवन की निरंतरता उसमें उपस्थित न हो। इस जीवन-निरंतरता में ज्ञान, विज्ञान, कला, संस्कृति, लोक और शास्त्र का अनंत विस्तार समाहित है। इस अनंत विस्तार को एक बार फिर पढ़िए और समझिए।

ध्यान रहे, भारत नाम बहुत बाद में आया है। उससे पहले भी इस भूमि के नाम थे, और उससे भी पहले वह काल था, जब धरती पर आज जैसी राजनीतिक सीमाएँ और नक्शे थे ही नहीं। धरती थी और धरती की संतान थी। भौगोलिक सीमाएँ राज्य-संस्था के विकास की यात्रा के पड़ाव मात्र हैं। मनुष्य के पूर्वज ऋषियों ने विराट की कल्पना की थी— “स्वदेशो भुवनत्रयम्” — अर्थात् तीनों लोक ही मेरा स्वदेश हैं।

भारत की मंगलमयी विराट परिकल्पना देश और काल की सीमाओं से परे व्याप्त है। किंतु वह बालबुद्धि व्यक्ति भारत ब्रांड की टॉफी को ही बार-बार चूसता है, फिर उसे जेब में रख लेता है और यही समझता है कि यही भारत है। ऐसी सीमित दृष्टि वाला व्यक्ति महापंडित राहुल सांकृत्यायन को कैसे समझ सकेगा? क्योंकि भारत को समझने वाला उसका चश्मा ही टूट चुका है। यह दृष्टिभेद का प्रश्न है— वह छोटी-छोटी चीजें तो देख लेता है, लेकिन आकाश की विराटता को देखने की दृष्टि उसने कभी विकसित ही नहीं की।


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