कॉकरोच आंदोलन ; जागृत नागरिक और कन्फ्यूज्ड राजनीतिक दलीय कार्यकर्ता

0
Cockroach Movement; Awakened citizens and confused political party workers

Randhir K Gautam

— रणधीर कुमार गौतम —

ब भी आंदोलनों का दौर आता है, तब हमारी राजनीतिक अभिव्यक्ति यह बताती है कि हम अपनी आशाओं में कितने दृढ़ हैं और परिवर्तन के विज्ञान को समझने में कितने समर्थ हैं। कॉकरोच आंदोलन के संदर्भ में जिस प्रकार की राजनीतिक अभिव्यक्तियाँ सामने आई हैं, उनसे यह स्पष्ट होता है कि ज्यादातर लोगों में लोकतंत्र की बुनियादी समझ और जन आंदोलनों के प्रति समर्थन का स्तर कितना कमजोर हो गया है। अधिकांश लोग कॉकरोच आंदोलनों को अन्ना आंदोलन के प्रभाव में देखकर समझते हैं। शायद उन्हें किसान आंदोलन की सफलता का अभी तक समुचित आभास नहीं हुआ है, या फिर उनकी दृष्टि कांग्रेसीकरण और भाजपाकरण की ऐसी पट्टी से ढकी हुई है कि वे जनता के आंदोलनों में परिवर्तन की प्रक्रिया को देख ही नहीं पा रहे हैं। जब लोकतंत्र के चिंतन को संकीर्ण दलगत राजनीति के चश्मे से देखने की आदत बन जाती है, तब व्यापक राजनीतिक दृष्टि स्वतः कमजोर होने लगती है।

आंदोलन के शुरुआती दौर में इस पर लिखने वाले अनेक लोगों को इसकी व्यापकता का अनुमान नहीं था। यही कारण था कि उन्होंने इसे movement के बजाय moment कहा। मेरी समझ में हर movement की शुरुआत एक moment से ही होती है। यह ठीक उसी प्रकार है, जैसे हर रेखा की शुरुआत एक बिंदु से होती है।

CJP अपने आंदोलन को अभी तक निर्दलीय बनाया हुआ है. एक बात स्पष्ट है कि निर्दलीयता जन आंदोलन की वैधता (legitimacy) और संवेदनशीलता दोनों को बढ़ाती है। जनशक्ति के उभार की प्रक्रिया भी निर्दलीय अभिव्यक्ति के माध्यम से अधिक सहज हो जाती है।

जिस प्रकार सोनम वांगचुक के नेतृत्व की आलोचनाएँ कांग्रेस और भाजपा, दोनों की ओर से प्रस्तुत की गई हैं, उससे भी यह संकेत मिलता है कि उनका नेतृत्व इन दोनों दलों के लिए किसी न किसी रूप में चुनौती बनकर उभर रहा है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आप जन आंदोलन की प्रक्रिया से उत्पन्न लोकशक्ति, अथवा लोकशक्ति से उत्पन्न जन आंदोलन की प्रक्रिया में कितने सहायक और सरोकारी हैं। इस पूरे आंदोलन में सरोकार और संवाद की प्रक्रिया लगातार विकसित हो रही है। राजनीतिक दल प्रायः आंदोलनों की ऊर्जा को सीमित कर देते हैं, जबकि निर्दलीय आंदोलन उसकी व्यापकता को गति देता है। इसे महात्मा गांधी के आंदोलनों की राजनीति ( लोक सेवक संघ) को समझकर भी देखा जा सकता है।

आंदोलन, अभियान और इस प्रकार की राजनीति जनचेतना का विस्तार करने तथा लोगों को जागरूक करने का अवसर होती है। यह समय यह भी परखने का होता है कि जो लोग सत्ता में हैं, वे लोकशक्ति के निर्माण के प्रति कितने प्रतिबद्ध हैं, या फिर उनकी सरोकारिता केवल अपने राजनीतिक व्यक्तित्व के मंचन तक सीमित है। एक अर्थ में आंदोलनकारी और गैर-आंदोलनकारी होने की राजनीतिक अभिव्यक्ति को भी इस आंदोलन के माध्यम से देखा और समझा जा सकता है।

यद्यपि अधिकांश विपक्षी राजनीतिक दलों ने कॉकरोच आंदोलन को एक जन आंदोलन के रूप में समर्थन दिया है, फिर भी कुछ दल विशेषकर सत्तापक्ष तथा विपक्ष के कुछ हिस्से इस परिवर्तन में आशा की किरण नहीं देख पा रहे हैं। उनके लिए सत्ता परिवर्तन ही सबसे सहज विकल्प है; व्यवस्था परिवर्तन की कल्पना उनके लिए कहीं अधिक कठिन है। शायद यही कारण है कि वे इस प्रकार की राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कर रहे हैं।

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि राजनीतिक दलों पर नागरिकों का दबाव प्रभावी क्यों नहीं है, और सरकार पर लोकतांत्रिक दबाव अपेक्षित रूप से क्यों नहीं बन पा रहा है। लोकतंत्र में जवाबदेही (accountability) जन आंदोलन की प्रक्रिया से विकसित होती है। जब तक यह संवेदना लोकचेतना का हिस्सा नहीं बनेगी, तब तक किसी भी सफल लोकतंत्र की मजबूत बुनियाद स्थापित नहीं की जा सकती।

राजनीतिक दल और आंदोलन के बीच के अंतर को भी स्पष्ट रूप से समझना चाहिए। राजनीतिक दल मूलतः संगठित लोगों का ऐसा समूह होता है जो सत्ता की राजनीति करता है। इसके विपरीत, आंदोलन लोकशक्ति की अभिव्यक्ति होता है, जिसके माध्यम से सरकार को जवाबदेह बनाने की प्रवृत्ति विकसित होती है। आंदोलन मूलतः एक प्रश्न से जन्म लेता है, जिसके इर्द-गिर्द सरोकार रखने वाले लोगों का समूह सक्रिय होता है। कॉकरोच आंदोलन में शिक्षा व्यवस्था में सुधार और रोजगार की मांग लोगों को फिर से सरोकारी, संवेदनशील और शक्तिशाली बना रहा है।

हैरानी की बात है कि शिक्षा में परिवर्तन की मांग के पक्ष या विपक्ष में कुछ भी बोलने और लिखने के लिए जिस बौद्धिक साहस की आवश्यकता होती है, वह देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों के शिक्षक और विद्यार्थी नहीं दिखा पा रहे हैं। वैसे भी इन लोगों को शिक्षा में परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देने या उसमें ऊर्जा भरने से कोई विशेष सरोकार नहीं दिखता। लेकिन इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि वे भयग्रस्त दिखाई देते हैं। उनके भीतर नागरिकता-बोध क्षीण होता जा रहा है, और सबसे बड़ी बात यह है कि एक देश के नागरिक होने के नाते उनकी क्या जिम्मेदारी है, उससे भी वे स्वयं को मुक्त समझने लगे हैं।

शायद उनके भीतर लालच या डर ने जगह बना ली है। लालच और डर—दोनों ही नागरिक को कमजोर बनाते हैं और देश में जनमत (Public Opinion) के निर्माण में उसकी भूमिका को भी कमजोर कर देते हैं।

ज्यादातर व्हाट्सऐप समूहों में लोग एक-दूसरे की सफलता पर बधाई तो देते हैं, लेकिन देश में हो रहे परिवर्तनों या किसी भी महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे पर बोलने से घबराते हैं। ऐसा क्यों है? इसके अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन आज मैं उन कारणों की चर्चा करने के बजाय उन लोगों से आह्वान करना चाहता हूँ कि यदि आप एक सक्रिय और संवेदनशील नागरिक हैं, तो अपना मत अवश्य व्यक्त करें। यह आपका नागरिक होने का कर्तव्य है। आप अपने अधिकारों का प्रयोग करें या न करें, यह आपकी इच्छा हो सकती है; लेकिन अपने कर्तव्यों से आप स्वयं को मुक्त नहीं कर सकते।

मैं ऐसे लोगों से पूछना चाहता हूँ कि क्या आपको कभी यह नहीं लगता कि आप इस देश के लिए क्या योगदान दे रहे हैं? एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी (Public Intellectual) के रूप में हमारी क्या भूमिका है? क्या हम केवल एक ऐसे “इंटरेस्ट ग्रुप” का हिस्सा बनकर रह गए हैं, जो केवल उन्हीं मुद्दों पर बोलता है जिनसे उसका अपना हित जुड़ा होता है, और बाकी सभी प्रश्नों की उपेक्षा कर देता है?

मुझे लगता है कि जब एक संवेदनशील नागरिक अपनी राजनीतिक अभिव्यक्ति करने से डरने लगे, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत कमजोरी नहीं होती, बल्कि वह अपने समय के संकट का भी संकेत होता है।

आइए, हम अपने नागरिक होने का कर्तव्य निभाएँ। इस देश में जनमत के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएँ, राष्ट्र-निर्माण में अपना योगदान दें, संवाद करें, प्रश्न पूछें, सत्ता को जवाबदेह बनाएँ, लोकशक्ति का निर्माण करें और नागरिकता-बोध को सशक्त बनाकर लोकतंत्र को मजबूत करें।


Discover more from समता मार्ग

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Comment