अहिंसक आंदोलन पर सत्ता की दबंगई – डॉ योगेन्द्र

0
The authorities' high-handedness against a non-violent movement.

हले वह दृश्य याद कीजिए जो जंतर- मंतर पर घटित हुआ । किस तरह पहले सादे ड्रेस में पाँच- छह पुलिस सोनम वांगचुक के पास पहुँचे । फिर सफेद चादर लेकर सादे ड्रेस में पुलिस मंच पर दौड़ पड़ी । इसके बाद पुलिस ने मंच को घेर लिया । युवा चीखते- चिल्लाते रहे। यह दृश्य ध्यान में रखना ज़रूरी है, क्योंकि यह लोकतंत्र के अपहरण का दृश्य है। जब जब लोकतंत्र पर संकट गहरायेगा , यह दृश्य आँखों के सामने उपस्थित हो जाएगा ।

सोनम वांगचुक क्या डकैत, चोर या उचक्के थे जो उनसे बात नहीं हो सकती थी ? क्या एक लोकतांत्रिक सरकार को अपना प्रतिनिधि नहीं भेजना चाहिए था? क्या मंच पर ख़ूँख़ार भेड़िए की तरह टूटने से पहले संवाद नहीं करना चाहिए था? क्या सफेद चादर में लपेटकर आमरण अनशन कर रहे सोनम वांगचुक को ज़बर्दस्ती उठाना चाहिए था? सोनम वांगचुक की क्या गलती है? क्या एक जवाबदेह सरकार की माँग करना ग़लत है? प्रश्न पत्र लगातार लीक हो जाते हैं तो इसकी ज़िम्मेदारी किस पर है? नीट के प्रश्न पत्र लीक होने के बाद पच्चीसों छात्र- छात्राओं ने आत्महत्या कर ली। क्या यह सरकार द्वारा की गयी हत्या नहीं है?
लोकतंत्र लोकलाज से चलता है और जब सत्ता की आँखों में लोकलाज नहीं रहती , तब ऐसे दृश्य उपस्थित होते हैं ।

जब युवा जंतर- मंतर पर आये तो तथाकथित बीजेपी और आरएसएस पंथी युवाओं के साथ अभद्रता की। सोनम वांगचुक जब आमरण अनशन पर बैठे तो अफ़वाह उड़ाया गया कि वे बोतल से मांस का शोरबा पीते हैं । फिर बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने कहा कि जंतर मंतर पर देश द्रोही लोग बैठे हैं, उन्हें बीजेपी के कार्यकर्ता सबक सिखायेंगे । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या तो विदेश घूमते रहे या फिर हरियाणा- पंजाब में भाषण देते रहे। गृह मंत्री अमित शाह को सिर्फ़ विभिन्न पार्टियों को तोड़ने में मज़ा आता है। गृह में कोई मरे, जिये, उन्हें कोई मतलब नहीं ।अहिंसक आंदोलन के खिलाफ इतनी असंवेदनशीलता किसी भी सरकार को शोभा नहीं देती। लेकिन सच यही है कि बीजेपी सरकार शांतिपूर्ण आंदोलन को कोई तवज्जो नहीं देती ।

उत्तराखण्ड में बीजेपी की सरकार थी। हरिद्वार के मातृसदन के निगमानंद गंगा नदी में अवैध खनने और पत्थर उत्खनन को रोकने की माँग लेकर आमरण अनशन पर बैठे । 115 दिनों के बाद उनकी मृत्यु हो गई । आईआईटी के प्रोफेसर और मशहूर पर्यावरणविद जी डी अग्रवाल  अलकनंदा और मंदाकिनी में हाइड्रो इलेक्ट्रिक परियोजना और ग़ैर क़ानूनी खनन रोकने की माँग लेकर उपवासकिया और 111 दिन के बाद उनकी मृत्यु हो गई । गंगा से प्रेम जताने वाली सरकार किसी की नहीं सुनी। वे ठेकेदारों के साथ रही।

सोनम वांगचुक को ज़बर्दस्ती उठा लेने के बाद भी युवा जंतर मंतर पर बैठे हैं । उन्हें तरह-तरह से पुलिस और बीजेपी के लफ़ंगे तंग कर रहे हैं । कल क्रोकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दिपके के मुँह पर एक महिला ने स्याही फेंक दी। सरकार युवाओं को उकसा रही है और युवाओं के ख़ून गर्म होने के बावजूद शांति से बैठे हैं । मुंह पर स्याही पड़ने के बाद अभिजीत दिपके ने कहा कि नीला रंग क्रांति का प्रतीक है । आज युवा शांति से बैठे हैं । अच्छी बात है फ़िल्मी हस्तियां प्रकाश राज, रजनीकांत, राजनेता महुआ मोइत्रा, चंद्रशेखर रावण, कांग्रेस नेता पवन खेड़ा, समाजकर्मी योगेन्द्र यादव आदि ने आंदोलन का समर्थन किया है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी भूल गये हैं कि जब हिटलर- मुसोलिनी नहीं रहे तो वे कितने दिन टिकेंगे? युवाओं की आवाज़ सुनें, वरना दुर्दिन क़हर बन कर टूटेगा ।


Discover more from समता मार्ग

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Comment